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Tuesday, May 11, 2021
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झारखंड मे क्या है हड़िया

झारखंड के वन-प्रांतर में रहने वाले जनजातीय एवं मूलवासी परिवारों में एक पारम्परिक पेय पदार्थ ‘हड़िया’ के सार्वजनिक रूप से सेवन का प्रचलन सर्वमान्य है। इस पेय पदार्थ में उर्जा और मादकता दोनों का सामंजस्य है। किन्तु शासकीय स्तर पर हड़िया को मद्य निषेध कानूनों के दायरे से मुक्त रखा गया है। वस्तुतः हड़िया घर-धर में बनाया जाता है। इसका मूल घटक चावल है, जो आसानी से उपलब्ध है। हड़िया बनाने की विधि बहुत अधिक जटिल नहीं होने से इसे तैयार करने में परहेज नहीं किया जाता है। वस्तुतः सीधे शब्दों में कहा जाए तो हड़िया चावल के भात से बनता है। लेकिन इसके मूल घटक में चावल के अतिरिक्त गेहूँ और मडु़वा को भी शामिल कर लिया गया है। गेहूँ और मड़ुवा का भी भात सीझा कर समान-विधि से हड़िया बनाया जाता है। चावल में अरवा और उसना दोनों प्रकार का उपयोग हो सकता है। लेकिन विशेष रूप से उसना चावल के भात से ही हड़िया बनाने का प्रचलन है। चावल में करैनी धान का चावल अधिक उपयुक्त माना जाता है। स्वाद के कारण किसी भी किस्म के उसना चावल से परिवारों में हड़िया बनाने का प्रचलन है।कैसे तैयार होता है हड़ियाहड़िया बनाने की मूल प्रक्रिया फर्मन्टेशन है। इस प्रक्रिया में ‘रानू’ नामक एक जड़ी को भी मिलाया जाता है। विधि के अनुसार, सर्वप्रथम चावल को भात के रूप में पका देते हैं, जिसे भात ‘सीझाना’ भी कहते हैं। इसके बाद भात को ठंडा होने देते हैं। इसे भात का ‘जुड़ाना’ कहते हैं। जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो एक बडे़-चौड़े बर्तन या डलिया में भात को उडे़ल देते हैं, जिसे भात पसारना कहा जाता है।अब इस पसरे हुए न गर्म न ठंडे भात मं रानू नामक जड़ी के पाउडर को अच्छी तरह मिला देते हैं और फिर जड़ी मिले इस पदार्थ (भात) को तसला या अन्य उपयुक्त बर्तन में रखकर गलाने (सड़ने) या कहें तो फर्मेन्टेशन के लिए छोड़ देते हैं। इसमें अभी पानी नहीं मिलाया जाता है। इस कार्य में परिवार की महिलाआें का हीं विशेष योगदान होता है। सर्वेक्षण के अनुसार जाड़े के दिनों में सिर्फ चावल (भात) और ‘रानू’ के मिश्रण को हड़िया के रूप में तैयार होने में चार से पॉंच दिन या एक-दो दिन अधिक भी समय लग सकता है। जबकि गर्मी के दिनों में दो-तीन दिन में ही हड़िया का माल तैयार हो जाता है।कैसे सेवन करते हैं हड़ियाहड़िया का पदार्थ तैयार हो जाने के बाद अब उसमें शुद्ध और साफ पानी मिला कर धीरे-धीरे बर्तन को हिलाते हैं, जब हिलाते-हिलाते हड़िया-पदार्थ में मिलाया पानी एकरूप से सफेद हो जाता है तब उसे ग्लास में, कटोरा में, कटोरी में या अन्य प्रकार के सुविधा जनक पात्र में छननी से छानकर और ढालकर पीते हैं। हड़िया अकेले में पीया जाता है, तो समूह में बैठकर भी पीया जाता है। हित-कुटुम्ब, नाते-रिश्तेदार, दोस्त-मित्रों को भी हड़िया परोस कर स्वागत करने की परम्परा झारखण्ड के जनजातीय एवं मूलवासी परिवारों में रही है और आज भी है। सार्वजनिक समारोहां में भी हड़िया का सेवन वर्जित नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हड़िया को प्रतिष्ठापूर्वक पारम्परिक पेय के रूप में लोग सेवन करने से परहेज नहीं करते।हड़िया और परम्परासर्वेक्षण के अनुसार स्पष्ट होता है कि झारखण्ड के जनसमाज में हड़िया एक मादक पेय होते हुए भी परम्परागत और सांस्कृतिक रूप से सर्वग्राह्य एवं प्रचलित पेय पदार्थ है। यह कृषि-श्रमिकों को भी पीने के लिए दिया जाता है। इससे श्रमिकों में उत्साह और श्रम की प्रवृति प्रबल होती है। जबकि हड़िया को किसी भी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक या पारिवारिक कार्यक्रमों के दौरान भी पवित्रतापूर्वक उपयोग किया जाता है। इसे न केवल कुल देवता पर चढ़ाया जाता है बल्कि अन्य देवी-देवताओं पर भी चढ़ा कर श्रद्धा अर्पित करते हैंं। शादी-ब्याह, जन्म-मरण के अवसरों पर भी हड़िया का सामूहिक सेवन वर्जित नहीं है। वस्तुतः ऐसे अवसरों पर हड़िया का सेवन कराना सामाजिक रूप से अनिवार्य माना जाता है। हालांकि अभी शिक्षित परिवारों में पारिवारिक-सामाजिक या अन्य प्रकार के समारोहों में हड़िया के सेवन के प्रति उपेक्षा की सुगबुगाहट भी देखने को मिल रही है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रां में ऐसी कोई ‘क्रांति’ देखने को नहीं मिल रही है।हड़िया और स्वास्थ्यमादकता के बावजूद हड़िया का सेवन करनेवाले इसे अपेक्षाकृत एक निर्दोष पेय बताते हैं लेकिन मात्रा से अधिक सेवन करने पर शरीर में तत्कालिक भारी शिथिलता और प्रमाद की भी शिकायत मिलती है। इसके अत्यधिक सेवन से व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है और किसी कार्य के प्रति वह अनिच्छा का शिकार हो जाता है। सीमित सेवन करने पर हड़िया को स्वास्थ्यकर पेय का दर्जा देने वालों का मानना है कि पीलिया (जॉन्डिस) जैसी बीमारी में यह बहुत फायदा करता है। हालांकि एक बार में चुलाए गए हड़िया के तीसरी बार के पानी हड़िया का सेवन ही स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त बताया जाता है।हड़िया में हो रही मिलावटखाद्य एवं पेय पदार्थों में मिलावट के दोष और अपराध से हड़िया भी ग्रसित है। जानकार बताते हैं कि शहरों-बाजारों में ग्रामीण हाटों में जहाँ-तहाँ सड़क किनारे हड़िया की भी खुलेआम ब्रिक्री हो रही है। लेकिन अधिकांश विक्रेता हड़िया को नशीला बनाने के लिए उसमें यूरिया मिलाकर तैयार करते हैं। इससे न केवल यूरिया मिला हड़िया त्वरित नशा करता है बल्कि जानलेवा भी बन जाता है। हड़िया में अन्य नशीले पदार्थां की मिलावट की भी शिकायत मिलती है। यह दुष्कृत्य वस्तुतः हड़िया बेचनेवाले अपराधी लोग ही करते हैं, जैसा अपराध अन्य मिलावटखोर करते हैं। गांवों में यह विकृति अभी कम है। यह इसलिए कि जिस तरह अन्य प्रदेशों में स्वयं या अतिथियों के लिए स्वागत मं चीनी-गुड़-दूध-दही से तैयार पेय पिलाया जाता है, उसी तरह झारखण्ड के जनजातीय और मूलवासियों क परिवार में हड़िया को प्रस्तुत किया जाता है। बच्चों को हड़िया से दूर रखा जाता है। जबकि युवक चाहें तो सेवन कर सकत हैं। नमक, मिर्च, चना, मटर, नरमकी, पकौड़ी या अन्य प्रकार के बाजारू नमकीन पदार्थ हड़िया के साथ ‘चखना’ के रूप में खाया जाता है।एक बार का बना हड़िया कितने दिन चलता हैचावल, गेहूँ या मडुवा के भात से एक बार बना हड़िया 15 दिन तक सेवन करने के योग्य माना जाता है। उसके स्वाद में दिन बीतने पर खट्टापन आ सकता है लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं हो सकता है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि सीझे चावल में रानू मिलाकर जब उसे फर्मेन्टेशन के लिए छोड़ा जाता है और प्रक्रिया पूरी होने पर पानी डालकर पहली बार आवश्यकतानुसार हड़िया चुआ लेते हैं तो दो-तीन दिन छोड़-छोड़ कर भी उसमें पानी मिलाकर कई बार हड़िया चुलाते हैं और पीते हैंं।रानू है असली जड़ीहड़िया बनाने में रानू नामक जड़ी का महत्व है। यह बाजार में या जड़ी बनाने वाले जानकार लोगां द्वारा बेची जाती है। जंगलां में उपलब्ध ‘चौली कंदा’ एवं अन्य गुप्त जड़ी को अरवा चावल के आटे में कूटकर मिला देने के बाद इसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर बिक्री होती है। इसी को ‘रानू’ कहते हैं। जब हड़िया का चावल, गेहूँ या मडुवा का भात सीझ जाता है तो ठंडा होने के बाद ‘रानू की सफेद गोली’ को गर्म कर बुकनी बना ली जाती है और प्रति एक किलोग्राम भात में तीन गोली की मात्रा में रानू की बुकनी (पाउडर) मिलाकर छोड़ दिया जाता है। रानू के बिना हड़िया का भात खराब हो जाता है। रानू मिलाने से चार-पॉंच दिनां तक गलने से भात से हड़िया चुलाया जा सकता है।Note:- यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है नशापान का किसी भी प्रकार से मैं समर्थन नहीं करता।

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