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Monday, October 5, 2026
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छोटानागपुर – झारखंड की आन – बान – शान और सम्मान का गौरवशाली इतिहास स्वर्ण अक्षरों से हुआ दर्ज, अब लोक वाद्ययंत्र मांदर *मांदर ऑफ़ झारखंड के नाम से रजिस्टर हो चुका है, लोक वाद्ययंत्र मांदर

न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला प्रशासन द्वारा लोक वाद्ययंत्र मांदर को जी.आई टैक (भौगोलिक संकेतक ) दिलाने में पाँच साल के कड़े संघर्ष का सामना करने के बाद छोटानागपुर – झारखंड की आन – बान – शान और सम्मान लोक वाद्ययंत्र मांदर के लियें प्रारंभ से लेकर अब तक की संघर्ष की कहानी , अंततः लाया रंग और *मांदार ऑफ़ झारखंड के नाम से रजिस्टर हुआ लोग *वाद्ययंत्र मांदर – जी आई – टैक. ( भौगोलिक संकेतक ) को प्राप्त करने की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी और कहानी किस प्रकार है,,,,, झारखंड की सांस्कृतिक पहचान ‘मांदर’ को मिला भौगोलिक संकेतक पंजीकरण

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में गुमला से शुरू हुई पहल ने दिलाई झारखंड की पारंपरिक कला को विशिष्ट पहचान झारखंड की मिट्टी, लोकजीवन और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा पारंपरिक वाद्य ‘मांदर’ अब अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान के साथ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हो गया है। गुमला जिले से प्रस्तावित मांदर को भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्राप्त होना झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और मांदर निर्माण से जुड़े पारंपरिक कारीगरों के लिए एक महत्वपूर्ण एवं गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

मांदर केवल एक पारंपरिक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। पर्व-त्योहारों, पारंपरिक नृत्य, सामाजिक आयोजनों और सामुदायिक जीवन में मांदर की थाप लंबे समय से झारखंड की पहचान को स्वर देती रही है। ऐसे में मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान मिलना उन कारीगर परिवारों की पीढ़ियों पुरानी कला, कौशल और पारंपरिक ज्ञान को औपचारिक पहचान मिलने के रूप में भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपने हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।

मांदर को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण दिलाने की यह यात्रा गुमला जिले से शुरू हुई और इसके पीछे राज्य सरकार के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन, संबंधित संस्थाओं तथा मांदर कारीगरों के लंबे समय तक चले सामूहिक प्रयास रहे हैं। माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन एवं दिशा-निर्देशन में झारखंड की पारंपरिक कला, संस्कृति और स्थानीय कारीगरों को पहचान एवं सम्मान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के क्रम में गुमला जिला प्रशासन द्वारा मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने की पहल को आगे बढ़ाया गया।

इस दिशा में तत्कालीन उपायुक्त सुशांत गौरव की महत्वपूर्ण पहल रही। उन्होंने स्वयं मांदर कारीगरों के बीच पहुंचकर उनके पारंपरिक हुनर और मांदर निर्माण की प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर समझा। कारीगरों की स्थिति, उनके पारंपरिक ज्ञान, निर्माण तकनीक और इस कला से जुड़ी स्थानीय पहचान को समझने के बाद इसके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और आगे की प्रक्रिया के लिए पहल की गई। उनके प्रयासों से मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों और उनकी पारंपरिक कला को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार हुआ।

इस प्रारंभिक पहल को आगे बढ़ाने में तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके कार्यकाल में मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने से संबंधित तकनीकी और प्रक्रियात्मक कार्यों को गति मिली। आवश्यक दस्तावेजों के संकलन, शोध, तकनीकी प्रस्तुतीकरण तथा संबंधित स्तरों पर समन्वय के माध्यम से इस प्रयास को आगे बढ़ाया गया। गुमला से शुरू हुई यह पहल इसी क्रम में एक व्यवस्थित भौगोलिक संकेतक प्रक्रिया में परिवर्तित हुई।

मांदर की भौगोलिक संकेतक पंजीकरण यात्रा का औपचारिक चरण 24 सितंबर 2021 को शुरू हुआ, जब आवेदन एवं प्रकरण विवरण दाखिल किया गया। इसके बाद 18 अक्टूबर 2021 को औपचारिकता जांच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ। प्रक्रिया के अगले चरण में 30 जून 2022 को प्रथम अनुपालन जांच-2 जारी हुई। आवश्यक उत्तर एवं दस्तावेजी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 6 मई 2024 को आवेदक द्वारा अनुपालन जांच का उत्तर प्रस्तुत किया गया। इसके बाद 24 जून 2024 को अतिरिक्त अनुपालन जांच के उत्तर के साथ मानचित्र, प्रतीक चिह्न एवं अंतिम प्रतिवेदन आदि आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए।

भौगोलिक संकेतक पंजीकरण की प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ते हुए 30 जनवरी 2025 को परीक्षण प्रतिवेदन जारी हुआ। इसके जवाब में आवेदक द्वारा 23 जनवरी 2026 को परीक्षण प्रतिवेदन का उत्तर प्रस्तुत किया गया। लंबे समय तक चले इस तकनीकी, दस्तावेजी एवं प्रक्रियात्मक चरण के बाद अब मांदर को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि एक दिन के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि कई वर्षों से लगातार किए जा रहे प्रशासनिक, तकनीकी और दस्तावेजी प्रयासों की परिणति है।

इस पूरी प्रक्रिया में तत्कालीन उपायुक्त प्रेरणा दीक्षित द्वारा भी आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई एवं समन्वय किया गया। अलग-अलग चरणों में प्रक्रिया की प्रगति पर ध्यान देते हुए आवश्यक स्तर पर कार्रवाई को आगे बढ़ाया गया। वहीं वर्तमान उपायुक्त दिलेश्वर महतो द्वारा भी इस पूरी प्रक्रिया की निरंतर निगरानी की गई तथा पूर्व में शुरू किए गए प्रयासों को आवश्यक प्रशासनिक सहयोग और समन्वय के साथ आगे बढ़ाया गया।

मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने की प्रक्रिया में जिला प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों की सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण आधार रही। ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रायडीह सहित मांदर निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में कारीगरों की पहचान, उनके कौशल एवं निर्माण प्रक्रिया से संबंधित जानकारी का संकलन किया गया। पारंपरिक निर्माण पद्धति, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों तथा मांदर से जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों को भी दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में शामिल किया गया।

मांदर की पहचान को केवल भौगोलिक संकेतक पंजीकरण तक सीमित रखने के बजाय कारीगरों के कौशल और आजीविका को मजबूत करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। मांदर किसान उत्पादक कंपनी लिमिटेड, ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रायडीह के माध्यम से कारीगरों को संगठित करने और मांदर निर्माण की पारंपरिक कला को आजीविका से जोड़ने का प्रयास किया गया है। ग्राम जरजट्टा में 40 कारीगरों को मांदर निर्माण का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वहीं पालकोट प्रखंड के टेंगरिया गांव में 20 कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। सिसई प्रखंड के लकेया गांव में आगामी अक्टूबर माह में 20 कारीगरों को मांदर निर्माण का प्रशिक्षण देने की योजना है।

भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के बाद अब मांदर की प्रामाणिकता और इसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई है। इससे झारखंड के स्थानीय स्तर पर मांदर बनाने वाले कारीगरों के उत्पाद को व्यापक बाजार से जोड़ने, उनकी कला की पहचान को मजबूत करने तथा पारंपरिक शिल्प को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ेंगी। आने वाले समय में मांदर की पहचान, बाजार उपलब्धता, कौशल विकास और विपणन के क्षेत्र में भी नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

इस महत्वपूर्ण कार्य को धरातल पर आगे बढ़ाने में तत्काल गुमला जिला उद्यमी समन्वयक सूरज कुमार, मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड के पदाधिकारियों एवं कर्मियों तथा गुमला जिला प्रशासन की संबंधित टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आवेदन प्रक्रिया, शोध, आवश्यक दस्तावेजों के संकलन, कारीगरों के चिन्हांकन एवं मानचित्रण, प्रशिक्षण तथा प्रस्तुतीकरण सहित विभिन्न चरणों में टीम द्वारा निरंतर समन्वय एवं प्रयास किया गया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने मांदर निर्माण से जुड़े सभी कारीगरों, संबंधित विभागों, अधिकारियों, कर्मियों, तकनीकी दल तथा इस पूरी प्रक्रिया में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने विशेष रूप से मांदर कारीगरों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि उनकी पीढ़ियों से चली आ रही कला, मेहनत और पारंपरिक ज्ञान की पहचान है।

उपायुक्त ने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में झारखंड की पारंपरिक कला, संस्कृति और स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में मांदर को प्राप्त भौगोलिक संकेतक पंजीकरण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। गुमला से शुरू हुआ यह प्रयास अब झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है। जिला प्रशासन का प्रयास रहेगा कि भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के बाद मांदर के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ इससे जुड़े कारीगरों के कौशल विकास, आजीविका, उत्पादन, पहचान और बाजार उपलब्धता को भी मजबूत किया जाए।

मांदर को मिला भौगोलिक संकेतक पंजीकरण गुमला जिले के लिए भी विशेष महत्व रखता है। जिस पारंपरिक कला को स्थानीय कारीगर वर्षों से अपने हाथों और अनुभव के माध्यम से जीवित रखे हुए हैं, उसे अब एक औपचारिक भौगोलिक पहचान प्राप्त हुई है। यह उपलब्धि झारखंड की संस्कृति, यहां के कारीगरों और उनकी परंपरागत कला के सम्मान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

मांदर की थाप झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की आवाज रही है और अब इसकी विशिष्ट पहचान को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर भी औपचारिक मान्यता मिली है।


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