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Friday, October 16, 2026
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Rajeev Shanker Mishra

चेहरा मलिन, थका हुआ, कांतिहीन और बेचैनी से भरा हुआ दिखाई दे रहा है. माथे पर तनाव की लकीरें हैं, चेहरे पर खीज साफ झलक रही है। आखिर इतनी बेचैनी किस बात की है? सत्ता में रहते हुए भी मन अशांत क्यों है? आखिर कौन-सी चिंता है जो चेहरे की चमक और आत्मविश्वास को धीरे-धीरे निगलती हुई दिखाई दे रही है?

आप तो स्वयं को ईश्वर का भेजा हुआ कोई विशेष प्रतिनिधि मानते हैं। आपके आसपास मौजूद तथाकथित चापलूस चेले भी आपकी प्रशंसा में ऐसे कसीदे पढ़ते हैं, मानो धरती पर साक्षात भगवान का अवतार उतर आया हो। आपकी हर बात सही, आपका हर फैसला ऐतिहासिक और आपकी हर विफलता के लिए कोई न कोई दूसरा जिम्मेदार! वाह रे दरबारी राजनीति और वाह रे चाटुकारिता की परंपरा!

लेकिन एक बात याद रखिए—लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति न भगवान होता है, न उसकी सत्ता स्थायी होती है और न ही जनता हमेशा उसके जयकारे लगाती रहती है। जनता जब सवाल पूछना शुरू करती है, तो बड़े-बड़े सिंहासनों पर बैठे लोगों का आत्मविश्वास भी डगमगाने लगता है। सत्ता का नशा चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, जनता की अदालत में हर किसी को अपने कामों का हिसाब देना पड़ता है।

श्रीमद्भगवद्गीता भी हमें कर्म और उसके परिणाम का सिद्धांत समझाती है। इसलिए धैर्य रखिए, अपने कर्म करते जाइए। यदि आपके कर्म जनहित में हैं, तो जनता स्वयं उनका मूल्यांकन करेगी; और यदि जनता के सवालों, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानियों, युवाओं के भविष्य तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुंह मोड़ा गया है, तो उन सवालों से हमेशा बच पाना भी संभव नहीं है।

इतिहास गवाह है कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली तालियां हमेशा के लिए नहीं होतीं। आज जो लोग आपके सामने सिर झुकाकर खड़े हैं, कल वही परिस्थितियां बदलने पर अपनी सुविधा के अनुसार नए सुर अलाप सकते हैं। इसलिए चापलूसों की वाहवाही को जनता का समर्थन समझने की भूल मत कीजिए। असली ताकत दरबारियों की प्रशंसा में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है।

और जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, उन्हें कम मत आंकिए। लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की समीक्षा करना और जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना भी है। राहुल गांधी और विपक्ष को अपना काम करने दीजिए। जनता को भी अपना फैसला करने दीजिए।

आप अपना कर्म करते रहिए, राहुल गांधी अपना काम करते रहेंगे और जनता अपना निर्णय सुनाएगी। आखिर लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है।

याद रखिए—चेहरे की बेचैनी के कारणों का अनुमान लगाना आसान है, लेकिन असली परीक्षा कर्मों की होती है। सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जवाबदेही से बड़ी नहीं हो सकती। और जनता का फैसला आने पर न चापलूसों की भीड़ काम आती है, न अहंकार की दीवारें।

बाकी, गीता का संदेश स्पष्ट है—कर्म कीजिए, फल की चिंता मत कीजिए। लेकिन सार्वजनिक जीवन में किए गए कर्मों का हिसाब जनता जरूर मांगती है। यही लोकतंत्र है, यही जनशक्ति है और यही समय का न्याय है!

Atul Aggarwal

मोदी जी इस उम्र में इतना गुस्सा ठीक नहीं है। अगर बीपी ज्यादा बढ़ गया और आपको कुछ हो गया तो अंधभक्त बेचारे अनाथ हो जायेंगे। उनके बारे में भी सोचो। हम आपकी हताशा, निराशा, बौखलाहट, फ्रस्ट्रेशन और छटपटाहट समझ सकते हैं। उम्मीद है कि अब आपको इस प्रश्न का जवाब मिल गया होगा कि

** राहुल कौन **

एक अकेला ( राहुल ) सब पर भारी

Gopal Pancholi

पुलवामा पर गुस्सा नहीं आया।

ऑपरेशन सिंदूर पर गुस्सा नहीं आया।

बच्चियों के साथ गलत हुआ, गुस्सा नहीं आया।

गोधरा हुआ, तब गुस्सा नहीं आया।

हरेन पांड्य मरा, तब गुस्सा नहीं आया।

अकिंता भंडारी जैसी मासूम बच्चियों का बलात्कार हुआ तब गुस्सा नहीं आया,

बलात्कारी कुलदीप सेंगर पर गुस्सा नहीं आया।

अमेरिका भारत पर धौंस जमा रहा है, तब गुस्सा नहीं आया

चीनी भारत की सीमा में घुस कर कब्जा कर रहा है, तब गुस्सा नहीं आया।

माल्या पैसा लेकर भाग गया तब भी गुस्सा नहीं आया,

इस महामानव को गुस्सा तब आया, जब बात कुर्सी पर आ गई.

तानाशाह को पहली बार गुस्सा आया।

अब सत्ता को चुनौती मिल रही है, सवालों के जवाब नहीं सूझ रहे हैं , #वोट_चोरी का राज़ खुल चुका है ,

ऐसे में गुस्सा आना लाज़मी है ।


Ashok Jha 

मंच पर खड़े होकर जब साहब दहाड़ते थे— सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं बिकने दूंगा, तब सचमुच रोंगटे खड़े हो जाते थे!

फिर फ़ाइलों के पन्ने पलटे और पता चला साहब ने बहुत कुछ बेच दिया है

• एयर इंडिया टाटा की हो गई।

• नीलांचल इस्पात (NINL) भी टाटा की झोली में चला गया।

• लखनऊ, जयपुर, अहमदाबाद, मंगलुरु समेत 6 बड़े एयरपोर्ट्स अडानी संभाल रहे हैं।

• समंदर के प्रमुख बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल अडानी और निजी घरानों के हवाले हो गए।

• टैक्सपेयर्स के पैसे से बने हज़ारों किमी नेशनल हाईवे निजी कंपनियाँ 30 साल तक टोल वसूलने के लिए लीज़ पर ले गईं।

• ‘ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी’ का भरोसा देने वाली LIC का हिस्सा शेयर बाज़ार में बिक गया।

• रेलवे टिकट और कैटरिंग वाली मुनाफ़ेदार IRCTC की हिस्सेदारी भी किस्तों में बेच दी गई।

• IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी निजी हाथों में सौंपने की पूरी बिसात बिछ चुकी है।

• BSNL और MTNL की कीमती ज़मीनें, मोबाइल टावर और इमारतें ‘एसेट मोनेटाइजेशन’ के नाम पर नीलाम हो रही हैं।

• भोपाल का रानी कमलापति समेत रेलवे स्टेशन PPP मॉडल के नाम पर प्राइवेट बिल्डरों को सौंप दिए गए।

• पावर ग्रिड की बिजली ट्रांसमिशन लाइनें निजी इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) को थमा दी गईं।

• सरकारी एकाधिकार खत्म कर कोयला खदानों (Coal Blocks) की खुली नीलामी कॉर्पोरेट घरानों के लिए कर दी गई।

• हिंदुस्तान ज़िंक में बची हुई सरकारी हिस्सेदारी भी बाज़ार में बेचकर बाहर निकलने का रास्ता साफ़ कर दिया गया।

देश बिका नहीं है साहेब, बस राष्ट्रीय संपत्तियों की चाबियाँ धीरे से निजी तिजोरियों में सरका दी गई हैं!

खैर, हम गरीबों को उद्योग, नौकरी और संपत्तियों से क्या लेना-देना. सम्राट बाबू ने बता ही दिया है कि मोदी जी 10 करोड़ बिहारियों को मुफ्त का खाना दे ही रहे हैं। जब 5 किलो अनाज मिल ही रहा है तो हवाई अड्डे, ट्रेन और बैंक का क्या करेंगे? वैसे भी देश बहुत मजबूत हाथों में है!

Krishna Deo

बीजेपी के लिए 6 महीने पहले तक सब चंगा था। प्रधानमंत्री जी का दुनियाभर में डंका बज रहा था। तमाम देशों से पुरस्कार मिल रहे थे। चुनाव पर चुनाव जीते जा रहे थे। विरोधी गूलर के फूल की तरह गायब हो गए थे। फिर पार्टी में एक धुरंधर शामिल हो गया-राघव चड्ढा।

रिचार्ज और समोसे के दाम जैसे ज्वलंत मुद्दे उठाने वाले अप्रैल में AAP के सात सांसद लेकर बीजेपी में शामिल हुए। उसके बाद बीजेपी के अच्छे दिन शुद्ध पेट्रोल की तरह गायब हो गए। कुछ बानगी देखिए।

– जून में राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला सामने आया। इसने बीजेपी की अब तक सबसे ज्यादा किरकिरी कराई।

– जुलाई में नीट पेपर लीक मामले पर भारी बवाल हुआ। देश के अलग-अलग हिस्सों में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ।

– नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह बीजेपी सरकार में किसी मंत्री का पहला इस्तीफा है।

– अगस्त में बीजेपी की बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में करारी हार हुई। बांकीपुर तो बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष का गढ़ है।

– सितंबर में सरकार के 7.8% वाले GDP डेटा पर बवाल हो गया। पूर्व आर्थिक सलाहकार ने ही इस पर सवाल खड़े कर दिए।

– सितंबर शेयर बाजार के लिए सबसे बुरा महीना भी रहा। गिरावट के कई बड़े रिकॉर्ड टूट गए। विदेशी निवेशक हर शेयर बेचकर भाग रहे।

– अक्टूबर में वोट चोरी और चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर आंदोलन हो रहा है। विपक्षी दल सरकार पर भारी दबाव बना रहे हैं।

राघव चड्ढा साहब इससे पहले AAP में थे और उसे दिल्ली में साफ कर दिया। मनीष सिसौदिया, संजय सिंह समेत खुद अरविंद केजरीवाल को जेल की हवा खानी पड़ी। अब बीजेपी के दुर्दिन शुरू हो गए। भारतेंदु हरिश्चंद ने अंधेर नगरी में शायद चड्ढा साहब जैसे महापुरुषों के लिए ही लिखा है।

‘जहां पैर पड़े संतन के,

तहां-तहां बंटाधार।’

– अफवाह


शरदेन्दु कुमार पाण्डेय

2014 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि-भारत की सीमाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है, बैंकिग सेवाओं पर भारत सरकार का नियंत्रण है, ईडी सीबीआई इंटेलिजेंस एजेंसियां सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण में है, फिर भी भारत में अवैध फंडिंग कैसे हो जाता है?

प्रधानमंत्री को जबाब देना चाहिए.

इस बात का जवाब भारत के लोग 2026 में भारत के प्रधानमंत्री से जानना चाहते है लेकिन वह जवाब नहीं दे रहे हैं बल्कि वोट चोरी के कालिख से बचने के लिए चोर की तरह कही दुबके हुए हैं.

यह बहुत गम्भीर बात है, भारत में विदेशी फंडिंग आ रही है और प्रधानमंत्री चोर की तरह दुबका हुआ है, गृहमन्त्री कायर की तरह छिपा हुआ है, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कहीं अता पता नहीं है। वास्तव में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सम्प्रभुता दोनों खतरे में है.

बाकी हरीश साल्वे के पास धन पद प्रतिष्ठा सब कुछ है लेकिन जब राज दरबार में चाटने की आदत बन जाती है, तो आदमी अपना जमीर बेच देता है.

तो हरीश साल्वे अपना जमीर बेच चुके है क्योकि राज दरबार का झूठन चाटने की आदत बन गयी है, सो वह भी पूरी तन्मयता से चाट रहे हैं, चाटते रहे, चाटना उनको मुबारक हो.

बस पिछली बार जब किसान आंदोलन हुआ था, उस समय भी फंडिंग का आरोप लगा था, बस उसी का अपडेट दे दे कि उसमें क्या हुआ था.?

और यह भी बता दे कि 2014 के पहले की सरकारों में जो आंदोलन हुए थे, उसकी फंडिंग किसने की थी..?

2014 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि-भारत की सीमाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है,बैंकिग सेवाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है, ईडी सीबीआई इंटेलिजेंस एजेंसियां सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण में है, फिर भी भारत में अवैध फंडिंग कैसे हो जाता है?


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