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Monday, October 19, 2026
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पालकोट की दशभुजी माँ दुर्गा पूजा : कालक्रम में आस्था, परंपरा और इतिहास

न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित पालकोट प्रखंड मुख्यालय में – मां दशभुजी मंदिर गुमला जिले की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है। उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यहां दुर्गा पूजा की परंपरा 1765 ई. से चली आ रही है। यानी यह परंपरा ढाई शताब्दियों से अधिक समय से पालकोट की सामाजिक और धार्मिक स्मृति का हिस्सा है।

1765 : माँ दुर्गा पूजा की शुरुआत

पालकोट की माँ दुर्गा पूजा के इतिहास में 1765 ई. को महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। प्रकाशित स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार नागवंशी महाराजा यदुनाथ शाह ने पालकोट में माँ दुर्गा पूजा की शुरुआत कराई थी। इसी परंपरा से मां दशभुजी मंदिर की पूजा को जोड़ा जाता है। मंदिर और मां की प्रतिमा आज भी पालकोट में मौजूद होने का उल्लेख स्रोतों में मिलता है।

राजपरिवार और मां दशभुजी की आराधना

स्थानीय परंपरा में मां दशभुजी को नागवंशी राजपरिवार की इष्ट देवी के रूप में भी याद किया जाता है। एक स्थानीय विवरण के अनुसार, रीवा राज्य की राजकुमारी का विवाह नागवंशी राजपरिवार में हुआ था और वह अपने साथ माँ देवी की प्रतिमा पालकोट लेकर आई थीं। इसके बाद मां दशभुजी की पूजा राजपरिवार की धार्मिक परंपरा का हिस्सा बनी। इस विवरण की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है, इसलिए इसे स्थानीय परंपरा के रूप में देखना उचित है।

यदुनाथ शाह के बाद : परंपरा का विस्तार

यदुनाथ शाह के बाद उनके वंशजों ने पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। स्थानीय प्रकाशित विवरणों में विश्वनाथ शाह, उदयनाथ शाह, श्यामसुंदर शाह, बेलीराम शाह, मुनीनाथ शाह, धृतनाथ शाहदेव, देवनाथ शाहदेव, गोविंद शाहदेव और जगरनाथ शाहदेव के नाम इस परंपरा को बनाए रखने वाले राजवंशीय उत्तराधिकारियों के रूप में दिए गए हैं।

राजपरंपरा से लोकआस्था की ओर,,,,,

समय के साथ मां दशभुजी की पूजा केवल राजपरिवार तक सीमित नहीं रही। पालकोट के आम लोगों की भागीदारी बढ़ती गई और मां दशभुजी को स्थानीय ग्राम देवी के रूप में भी प्रतिष्ठा मिली। आज पालकोटवासी विशेष रूप से नवरात्रि की नवमी तिथि पर मां मां दशभुजी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। 2024 की स्थानीय रिपोर्ट में नवमी के अवसर पर विशेष श्रृंगार, पूजा, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का उल्लेख मिलता है।

बलि प्रथा में बदलाव

मंदिर की परंपरा में समय के साथ महत्वपूर्ण बदलाव भी आया। पुराने स्थानीय विवरणों के अनुसार मां दशभुजी मंदिर के समीप भैंस की बलि देने की प्रथा थी। बाद में राजपरिवार के शासनकाल में इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया। प्रकाशित स्रोत इस बदलाव को राजा कंदर्पनाथ शाहदेव के समय से जोड़ते हैं।

हाल के एक स्थानीय विवरण में बलि प्रथा समाप्त होने के बाद राजपरिवार के शासनकाल और धार्मिक निर्देश से जोड़ा गया है। दोनों विवरणों में नाम – कालक्रम को लेकर अंतर दिखाई देता है, इसलिए इस प्रसंग को अंतिम ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय परंपरा और प्रकाशित रिपोर्टों में दर्ज विवरण के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा।

20 वीं-21वीं सदी : परंपरा का निरंतर विस्तार

समय बदलने के साथ पालकोट की दुर्गा पूजा का स्वरूप भी विस्तृत हुआ। राजपरिवार की पूजा परंपरा के साथ स्थानीय पूजा समितियों और आम श्रद्धालुओं की भागीदारी बढ़ी। नवरात्रि के दौरान पालकोट प्रखंड मुख्यालय में पंडाल, विद्युत सज्जा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होने लगे। हाल की रिपोर्टों में पालकोट मुख्यालय सहित आसपास के क्षेत्रों में पूजा समितियों द्वारा आकर्षक सजावट और आयोजन का उल्लेख है।

2024-25 : जीवंत धार्मिक विरासत

2024 में मां दशभुजी मंदिर में नवमी के अवसर पर विशेष श्रृंगार और पूजा-अनुष्ठान आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण भी हुआ।

2025 की स्थानीय रिपोर्टों में मां दशभुजी मंदिर को नागवंशी राजपरिवार की शाही परंपरा और क्षेत्र के प्रमुख आस्था केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। नवरात्रि के दौरान मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाने तथा विशेष हवन-अनुष्ठान आयोजित करने का उल्लेख भी मिलता है।

कालक्रम एक नजर में

काल – वर्ष – प्रमुख घटना
1765 ई.| स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार महाराजा यदुनाथ शाह ने पालकोट में दुर्गा पूजा की शुरुआत की।
यदुनाथ शाह के बाद, राजवंश के उत्तराधिकारियों ने पूजा की परंपरा को जारी रखा।
बाद का राजकाल – मां दशभुजी की पूजा राजपरंपरा से आगे बढ़कर स्थानीय जनआस्था से जुड़ती गई।
राजा कंदर्पनाथ शाहदेव का काल, स्थानीय प्रकाशित विवरणों के अनुसार भैंसा बलि की प्रथा समाप्त की गई।
आधुनिक काल – नवरात्रि में आम श्रद्धालुओं की भागीदारी और पूजा समितियों के आयोजन का विस्तार हुआ।
2024 – नवमी पर विशेष श्रृंगार, पूजा, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का आयोजन।
2025 – मंदिर को राजपरंपरा और क्षेत्रीय जनआस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थानीय रिपोर्टों में रेखांकित किया गया।

इतिहास से वर्तमान तक

पालकोट की मां दशभुजी की पूजा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि 1765 में राजपरंपरा से जुड़ी पूजा आज एक व्यापक जनआस्था का रूप ले चुकी है। ढाई शताब्दियों से अधिक समय में पूजा की विधियों और आयोजन के स्वरूप में परिवर्तन आया, लेकिन मां के प्रति श्रद्धा की निरंतरता बनी रही। आज नवरात्रि के दिनों में मंदिर परिसर में उमड़ते श्रद्धालु, गूंजते जयकारे, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा-अनुष्ठान इस विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।

पालकोट की माँ दशभुजी की पूजा अर्चना इसलिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नागवंशी इतिहास, राजपरंपरा, लोकविश्वास और सामुदायिक आस्था के संगम की कहानी भी है।


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