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Sunday, November 1, 2026
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दीपावली की रोशनी में कुम्हारों की मेहनत का उजाला, मिट्टी के विभिन्न आकार प्रकार मूर्तियां – दीयों और बर्तनों से जीवंत होती है सदियों पुरानी परंपरा

गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

मिट्टी के दीये केवल घरों को रोशन नहीं करते, बल्कि कुम्हारों की मेहनत, भारतीय संस्कृति और स्वदेशी परंपरा की पहचान भी हैं। आधुनिक सजावटी लाइटों के बढ़ते चलन के बीच आज भी दीपावली पर मिट्टी के विभिन्न आकार प्रकार के दीयों की मांग और उनका धार्मिक महत्व बरकरार है

गुमला : – गुमला जिला में – दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों और घरों में तैयारियां तेज हो जाती हैं। कहीं रंग-बिरंगी झालरों और आकर्षक सजावटी सामान की खरीदारी होती है, तो कहीं पूजा के लिए मिट्टी के भगवान गणेश – माता लक्ष्मी – सहित विभिन्न आकार प्रकार के ग्वालिन – घोड़े – हाथी – दीये – कलश – धूपदानी और अन्य पारंपरिक बर्तनों की मांग बढ़ने लगती है। इस पूरे उत्सवी त्योहार के माहौल के बीच कुम्हार समुदाय की मेहनत विशेष महत्व रखती है। महीनों की तैयारी, मिट्टी को आकार देने की कला और भट्ठी की तपिश से तैयार होने वाले मिट्टी के दीये – दीपावली की असली सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करते हैं।

दीपावली पर जब घरों की चौखट, आंगन, मंदिर और तुलसी चौरा मिट्टी के दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं, तब उस उजाले के पीछे कुम्हारों की मेहनत, हुनर और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा भी दिखाई देती है। मिट्टी के छोटे-छोटे दीये केवल प्रकाश फैलाने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन, आस्था और आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं।

मिट्टी के दीयों से जुड़ी है दीपावली की धार्मिक आस्था

हिंदू धार्मिक परंपरा में दीपावली को अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है तथा घरों में दीप जलाकर सुख, समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है।

मिट्टी का दीया इस पर्व के धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष स्थान रखता है। मिट्टी से बने दीये में तेल या घी और बाती डालकर प्रकाश किया जाता है। अनेक परिवारों में पूजा स्थल, घर के मुख्य द्वार, आंगन और अन्य स्थानों पर दीये जलाने की परंपरा है।

मिट्टी से बना दीया प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को भी दर्शाता है। धरती की मिट्टी से तैयार होकर – आग में पकने वाला यह साधारण पात्र जब प्रकाश फैलाता है, तो वह जीवन में सकारात्मकता और आशा का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि बिजली की झालरों और आधुनिक विभिन्न आकार प्रकार के सजावटी लाइटों के प्रचलन के बावजूद पारंपरिक मिट्टी के दीयों का महत्व अब तक बना हुआ है।

चाक पर आकार लेती है कुम्हारों की मेहनत

मिट्टी का एक छोटा-सा दीया देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन उसे तैयार करने के पीछे काफी मेहनत और कौशल होता है। कुम्हार सबसे पहले उपयुक्त मिट्टी एकत्र करते हैं। इसके बाद मिट्टी को साफ कर, गूंथकर और आवश्यकतानुसार तैयार करके चाक या सांचे की मदद से दीयों तथा विभिन्न आकार प्रकार के मूर्तियां – मिट्टी के खिलौने आदि और बर्तनों का आकार दिया जाता है।

तैयार कच्चे दीयों को धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उन्हें भट्ठी में पकाया जाता है, ताकि वे मजबूत और उपयोग के योग्य बन सकें। कुछ कारीगर दीयों पर रंग, सजावट और अन्य कलात्मक काम भी करते हैं। हर चरण में सावधानी और अनुभव की जरूरत होती है।

दीपावली के समय मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए कुम्हार परिवार पहले से ही उत्पादन की तैयारी करते हैं। परिवार के अलग-अलग सदस्य मिट्टी तैयार करने, दीये बनाने, उन्हें सुखाने, भट्ठी में पकाने और बाजार तक पहुंचाने में सहयोग करते हैं।

इस तरह दीपावली केवल खरीदारों के लिए उत्सव नहीं, बल्कि कुम्हार परिवारों के लिए अपने पारंपरिक हुनर को प्रदर्शित करने और आजीविका अर्जित करने का महत्वपूर्ण अवसर भी बनती है, इस बार बादलों, आंधी – तूफान सहित समय पर सूर्योदय का नहीं होना और बारिश के इस मौसम ने उन्हें कुछ अधिक ही मायूस किया है ।

दीयों के साथ मिट्टी के बर्तनों की भी रहती है मांग

दीपावली और महा छठ व्रत के अवसर पर मिट्टी के दीयों के अलावा पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों का भी विशेष महत्व है। विभिन्न पूजा-पाठ और त्योहार में उपयोग होने वाले कलश, छोटे पात्र, धूपदानी, मिट्टी के दीपस्तंभ और सजावटी वस्तुएं कुम्हारों की कला का हिस्सा हैं।

कुछ क्षेत्रों में मिट्टी के खिलौने, हाथी-घोड़े की आकृतियां, छोटी बड़ी ग्वालिन मूर्तियां और अन्य अनेक पारंपरिक सजावटी सामान भी त्योहारों के अवसर पर बनाए जाते हैं। इन वस्तुओं में स्थानीय संस्कृति, लोककला और कारीगरों की रचनात्मकता की झलक दिखाई देती है।

दशकों पूर्व समस्त जाति धर्म के लोगों के घरों में खाना पकाया जाता था, और आज के आधुनिक युग में भी मिट्टी के बर्तनों में खाना बाने और खाने की परंपरा पुण: जोर पकड़ती जा रही है, लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं और लोग मिट्टी के बर्तनों का खाना खाने के लिए बेचैन हो रहे हैं, फलस्वरूप उक्त मिट्टी के बर्तनों की संबंधित उपयोग और उनकी खासियत यह है कि इन्हें स्थानीय जरूरतों और परंपराओं के अनुसार मिट्टी के अलग-अलग आकारों में बनाया जा सकता है। साधारण दीयों से लेकर कलात्मक पात्रों तक, हर वस्तु कुम्हार के अनुभव और हाथों की कारीगरी का परिणाम होती है।

आधुनिक बाजार की चुनौतियों से जूझते कुम्हार

समय के साथ बाजार में बिजली से चलने वाली सजावटी लाइटों, प्लास्टिक की वस्तुओं और विभिन्न प्रकार के तैयार सजावटी सामान का चलन बढ़ा है। इन उत्पादों की उपलब्धता ने पारंपरिक मिट्टी के दीयों के बाजार को कई जगह प्रतिस्पर्धा के सामने खड़ा किया है।

कुम्हारों के सामने मिट्टी की उपलब्धता, ईंधन की लागत, परिवहन, उत्पादन में लगने वाला समय और तैयार सामान को उचित मूल्य पर बेचने जैसी चुनौतियां भी हो सकती हैं। दीये बनाने में श्रम अधिक लगता है, जबकि कई बार कारीगरों को अपने उत्पादों का अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता।

इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक सुंदरता आज भी लोगों को आकर्षित करती है। प्राकृतिक मिट्टी से बने दीये दीपावली की पूजा और पारंपरिक सजावट में अलग स्थान रखते हैं। स्थानीय कुम्हारों से सीधे खरीदारी करने से उनके श्रम का उचित मूल्य मिलने में मदद मिल सकती है।

स्वदेशी परंपरा और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा

दीपावली पर स्थानीय कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीये और बर्तन खरीदना केवल एक वस्तु खरीदना नहीं, बल्कि पारंपरिक कारीगरी और स्थानीय रोजगार को प्रोत्साहित करना भी है।

जब लोग स्थानीय बाजारों से मिट्टी के दीये खरीदते हैं, तो इसका लाभ उन परिवारों तक पहुंचता है जो अपने पारंपरिक हुनर के माध्यम से आजीविका चलाते हैं। इससे स्थानीय बाजार में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है और नई पीढ़ी को भी इस कला से जुड़े रहने की प्रेरणा मिल सकती है।

स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने का अर्थ है अपने क्षेत्र के कारीगरों, उनकी कला और उनकी मेहनत को सम्मान देना। त्योहारों पर स्थानीय उत्पादों की खरीदारी इस दिशा में एक छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी रखें ध्यान

मिट्टी के दीये पारंपरिक सजावट का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनका पर्यावरणीय लाभ इस बात पर भी निर्भर करता है कि उन्हें कैसे बनाया, इस्तेमाल किया और निपटाया जाता है। स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए सादे मिट्टी के दीये उपयोग के बाद सामान्यतः आसानी से मिट्टी में मिल सकते हैं, बशर्ते उनमें प्लास्टिक, रासायनिक कोटिंग या अन्य गैर-जैविक सामग्री न मिली हो।

दीपावली पर दीये जलाते समय तेल या घी का सीमित उपयोग करना, आग से सुरक्षा के उपाय अपनाना और दीयों को सुरक्षित स्थान पर रखना भी आवश्यक है। सजावट के लिए ऐसे उत्पाद चुनना बेहतर है जिनसे अनावश्यक कचरा न बढ़े।

इस प्रकार परंपरा को अपनाने के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी दीपावली की खुशियों को और सार्थक बना सकता है।

कुम्हारों की कला को बचाना समाज की साझा जिम्मेदारी

मिट्टी के दीये बनाने की कला केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कला पीढ़ियों के अनुभव, पारंपरिक तकनीक और स्थानीय संसाधनों से विकसित हुई है। यदि इस कला को प्रोत्साहन नहीं मिला, तो आने वाले समय में कई पारंपरिक कौशलों के कमजोर पड़ने की आशंका बनी रह सकती है।

स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठनों, स्वयं सहायता समूहों और आम नागरिकों के सहयोग से कुम्हारों को बाजार, प्रशिक्षण और उचित बिक्री के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। त्योहारों के दौरान स्थानीय कारीगरों के लिए बाजार या प्रदर्शनी आयोजित करना भी उपयोगी कदम हो सकता है।

इसके साथ ही स्कूलों और सामाजिक संस्थानों में मिट्टी के दीये बनाने की कला से परिचित कराने वाले कार्यक्रम नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ सकते हैं।

दीया खरीदें, परंपरा बचाएं और मेहनत को सम्मान दें

दीपावली का वास्तविक संदेश केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि समाज में खुशियां, सहयोग और सकारात्मकता फैलाना भी है। कुम्हारों के हाथों से बने मिट्टी के दीये इसी संदेश को साकार करते हैं। इनमें मिट्टी की सादगी, कारीगरों का हुनर, धार्मिक आस्था और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।

जब दीपावली की रात मिट्टी के दीये घरों में प्रकाश फैलाते हैं, तो उनके साथ कुम्हार परिवारों की मेहनत और उम्मीदें भी रोशन होती हैं। इसलिए इस दीपावली स्थानीय कुम्हारों के बनाए दीये और पारंपरिक मिट्टी के बर्तन खरीदकर उनकी कला को प्रोत्साहित करना एक सार्थक पहल हो सकती है।

आइए, इस दीपावली मिट्टी के दीयों से घर सजाएं, स्थानीय कारीगरों की मेहनत का सम्मान करें और भारतीय परंपरा की इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में अपना योगदान दें। क्योंकि मिट्टी का एक छोटा-सा दीया केवल अंधकार दूर नहीं करता, वह मेहनत, आत्मनिर्भरता और संस्कृति की लौ भी जलाए रखता है।


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