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हापामुनी महामाया मंदिर : आस्था, परंपरा और इतिहास की 1100 वर्ष पुरानी विरासत

गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित घाघरा प्रखंड का हापामुनी गांव, जो गुमला-लोहरदगा – झारखंड की राजधानी रांची मार्ग पर स्थित एक प्राचीन ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, उक्त गांव हापामुनी की पहचान यहां स्थित माता महामाया मंदिर से जुड़ी हुई है। जिला प्रशासन के अनुसार हापामुनी घाघरा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित है और माता महामाया मंदिर इस गांव की प्रमुख पहचान है। उक्त मंदिर का इतिहास नागवंशी राजपरंपरा से जुड़ा बताया गया है और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण इसे करीब 1100 वर्ष पुरानी धार्मिक विरासत के रूप में सामने रखा गया हैं।

मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हापामुनी महामाया मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी नागवंशी शासक गजघाट राय से जुड़ी है। गुमला जिला प्रशासन के अनुसार गजघाट राय नागवंश के 22 वें राजा और राजा मोहन राय के पुत्र थे। उन्होंने 869 से 905 ईस्वी के बीच शासन किया और हापामुनी में माता महामाया मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी उन्होंने अपने गुरु हरिनाथ, जिन्हें जिला प्रशासन ने राष्ट्रकूट परंपरा से जुड़े मराठी ब्राह्मण के रूप में वर्णित किया है, को सौंपी थी।

हालांकि विभिन्न स्रोतों में निर्माण-वर्ष को लेकर अंतर मिलता है। जिला प्रशासन के पृष्ठ पर गजघाट राय के शासनकाल 869-905 ईस्वी के बीच मंदिर निर्माण का उल्लेख है, जबकि अन्य प्रकाशित स्रोत इसे विक्रम संवत 965 यानी लगभग 908 ईस्वी से जोड़ते हैं। इसलिए समाचार लेख में इसे लगभग 1100 वर्ष पुराना मंदिर कहना अधिक सुरक्षित है।

1391 ईस्वी : विष्णु प्रतिमा की स्थापना

मंदिर के इतिहास में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 14 वीं शताब्दी में सामने आता है। जिला प्रशासन के अनुसार 1391 ईस्वी में राजा शिवदास कर्ण ने मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कराई। इससे यह संकेत मिलता है कि हापामुनी का धार्मिक परिसर केवल शक्ति उपासना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहां वैष्णव परंपरा का भी समावेश हुआ।

कुछ अन्य स्रोत इस स्थापना को विक्रम संवत 1458 अर्थात लगभग 1401 ईस्वी से जोड़ते हैं। इसलिए वर्ष को लेकर स्रोतों में अंतर मौजूद है।

चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा प्रसंग

हापामुनी मंदिर की ऐतिहासिक महत्ता को एक और धार्मिक परंपरा विशेष बनाती है। गुमला जिला प्रशासन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु (1445-1535) जगन्नाथ पुरी से मथुरा की यात्रा के दौरान लगभग 1485 ईस्वी में इस मार्ग से गुजरे थे। हापामुनी से जुड़ी यह परंपरा इस स्थल को व्यापक वैष्णव धार्मिक यात्रा-परंपरा से भी जोड़ती है।

माता महामाया की रहस्यमयी परंपरा

हापामुनी मंदिर की सबसे विशिष्ट मान्यताओं में मां महामाया की प्रतिमा का मंजूषा यानी विशेष बक्से में रखा जाना शामिल है। स्थानीय धार्मिक मान्यता है कि देवी की मूल प्रतिमा को खुले नेत्रों से नहीं देखा जाता। इसी कारण श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के बाहर या अलग स्थान पर मां की एक दूसरी प्रतिमा रखी गई है, जहां सामान्य पूजा-अर्चना की जाती है।

विशेष अवसर पर मंजूषा को बाहर लाकर निर्धारित धार्मिक विधि से पूजा की जाती है। प्रकाशित स्थानीय विवरणों के अनुसार पूजा के दौरान मुख्य पुजारी अपने आंखों पर पट्टी बांधकर अनुष्ठान करते हैं। यह परंपरा हापामुनी मंदिर की धार्मिक पहचान को अन्य देवी मंदिरों से अलग बनाती है।

डोल जतरा : परंपरा का अनूठा स्वरूप

हापामुनी में चैत्र कृष्ण पक्ष की परेवा – अमावस्या के अवसर पर डोल जतरा का आयोजन महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है। इस अवसर पर माता महामाया की मंजूषा को मंदिर से बाहर डोल चबूतरे पर लाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक सहभागिता का भी अवसर बनता है। मेले और धार्मिक कार्यक्रमों के कारण हापामुनी में विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है।

लरका आंदोलन और मंदिर का इतिहास

हापामुनी माता महामाया मंदिर का इतिहास क्षेत्र के उथल-पुथल भरे सामाजिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ बताया जाता है। स्थानीय और प्रकाशित विवरणों में मंदिर के पुराने स्वरूप के विनाश का संबंध कोल – लरका विद्रोह से जोड़ा गया है। गुमला जिला प्रशासन के विवरण में रांची गजेटियर का हवाला देते हुए पुराने मंदिर के विद्रोह के दौरान नष्ट किए जाने का उल्लेख है।

स्थानीय लोगों से जुड़े विवरणों में बरजू राम और उनके परिवार पर हमले तथा मंदिर की रक्षा से संबंधित लोककथा भी प्रचलित है। इन घटनाओं के अलग-अलग संस्करण प्रकाशित हुए हैं, इसलिए इन्हें लोकस्मृति और स्थानीय परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है, न कि निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।

मंदिर के द्वार से जुड़ी लोकमान्यता

हापामुनी मंदिर से एक अत्यंत रोचक लोककथा भी जुड़ी है। स्थानीय विवरणों के अनुसार पुराने मंदिर का द्वार पहले पूर्व दिशा की ओर था। विद्रोह के समय मंदिर की शक्ति को चुनौती देते हुए द्वार की दिशा बदलने की बात कही गई और मान्यता है कि इसके बाद मंदिर का द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो गया। यह प्रसंग स्थानीय धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

तांत्रिक पीठ के रूप में मान्यता

हापामुनी माता महामाया मंदिर को कुछ स्थानीय परंपराओं और प्रकाशित रिपोर्टों में तांत्रिक पीठ के रूप में भी वर्णित किया गया है। पुराने समय में यहां शक्ति साधना और तंत्र-मंत्र से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों की मान्यता होने की बात कही जाती है। कुछ स्थानीय कथाओं में यह भी कहा जाता है कि विवाद या अपराध के मामलों में लोगों को मंदिर में शपथ दिलाई जाती थी। ये विवरण मुख्यतः लोकमान्यताओं और स्थानीय कथाओं पर आधारित हैं।

मंडा पूजा और आस्था

हापामुनी की धार्मिक परंपरा में मंडा पूजा का भी विशेष महत्व बताया जाता है। हाल के प्रकाशित विवरणों के अनुसार रामनवमी के बाद मंडा पूजा और उससे जुड़े धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान मेला भी लगता है और विभिन्न राज्यों के दूर-दूर से माता महामाया के मंदिर में श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना मनीता पूर्ण होने पर पूजा अर्चना कर माथा टेकते हैं ।

मंदिर की आस्था का दायरा केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं दिखाई देता। जनजातीय बहुल क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां की धार्मिक परंपराओं में स्थानीय श्रद्धालु भक्ति लोकविश्वास और मुख्यधारा की देवी माता महामाया के उपासना का मेल दिखाई देता है। 2020 की स्थानीय रिपोर्ट ने भी हापामुनी महामाया मंदिर को क्षेत्र में शक्ति उपासना और व्यापक जनआस्था के केंद्र के रूप में वर्णित किया था।

आज भी जीवित है 1100 वर्ष पुरानी परंपरा

आज हापामुनी माता महामाया मंदिर केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और धार्मिक परंपरा का जीवंत केंद्र है। हर वर्ष विशेष पर्वों पर यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। मंदिर का शांत ग्रामीण परिवेश, प्राचीन परंपराएं और माता महामाया की रहस्यमयी पूजा-पद्धति श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां इतिहास केवल पुराने पत्थरों या अभिलेखों में नहीं, बल्कि जीवित परंपराओं में दिखाई देता है— मंजूषा (बॉक्स ) में सुरक्षित माता महामाया देवी की मान्यता, डोल जतरा, मंडा पूजा, लोककथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा आज भी इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

कालक्रम एक नजर में

काल – वर्ष, प्रमुख घटना
869–905 ई. – जिला प्रशासन के अनुसार नागवंशी राजा गजघाट राय का शासनकाल; इसी काल में माता महामाया मंदिर निर्माण का उल्लेख।
लगभग 908 ई.| अन्य स्रोत मंदिर निर्माण को विक्रम संवत 965 से जोड़ते हैं।
1391 ई. – जिला प्रशासन के अनुसार राजा शिवदास कर्ण द्वारा विष्णु प्रतिमा की स्थापना।
लगभग 1485 ई.| जिला प्रशासन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु की यात्रा के दौरान हापामुनी मार्ग से गुजरने की परंपरा।
19वीं–20वीं सदी की स्थानीय परंपराएं| मंदिर और क्षेत्र से जुड़े विद्रोह, लोककथाओं तथा पुराने मंदिर के विनाश के प्रसंग।
आधुनिक काल – डोल जतरा – मंडा पूजा और अन्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से परंपरा जारी।

हापामुनी की माता महामाया इसलिए विशिष्ट हैं, क्योंकि यहां करीब ग्यारह शताब्दियों का इतिहास आज भी पूजा-पद्धति और लोकपरंपराओं के रूप में सांस लेता दिखाई देता है। नागवंशी राजाओं की विरासत से शुरू हुई यह धार्मिक धारा आज स्थानीय समाज की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।


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