दिल्ली के रामलीला मैदान ने 1975 में जेपी को देखा है, 1993 में बीजेपी को देखा और अब 2026 में राहुल गांधी के 12 साल के संघर्षरत धैर्य और राजनीतिक सफर का गवाह बना. रामलीला में भीड़ को लेकर भाजपाइयों और उनके गोदी के एंकर-एंकरानियों का विधवा विलाप असरहीन साबित हुआ है, लेकिन मौसमी सिंह की रिपोर्टिंग की ग्राउंड रिपोर्ट क़ाबिले तारीफ़ है. रामलीला की भीड़ ने यह जरूर दर्शा दिया है कि देश में लोकतंत्र अभी जिंदा है।
देश में अब तक सत्तापक्ष के खिलाफ जितने भी बड़े आंदोलन हुए है, उनमें आरएसएस की सक्रिय भागीदारी रही है। वह चाहे 1977 का इमरजेंसी के खिलाफ आंदोनल हो, वीपी सिंह का बोफोर्स के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरना रहा हो या फिर 2011 में अन्ना आंदोलन हो। आरएसएस ने कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ होने वाले हर आंदोलन में सहयोग किया। कड़वा सच यह भी है कि आरएसएस ने कभी अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती नहीं दी।
यह समझा जाने लगा था कि आजाद भारत में कोई आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक आरएसएस उसे समर्थन न दे। भले ही वह पीछे से दिया गया हो या आगे आकर दिया गया हो। कांग्रेस की रामलीला मैदान में जो रैली हुई है, वह आरएसएस की भागीदारी के बिना हुई है। भले ही कीचड़ और पानी की वजह से मैदान का कुछ हिस्सा खाली रह गया हो, लेकिन जनसैलाब ने बता दिया कि बीजेपी की सत्ता को चुनौती मिल रही है।
गोदी मीडिया पूरी शिद्दत और वफादारी से रैली को फ्लॉप बताने की कोशिश कर रहा है। सत्तापक्ष को कितनी जबरदस्त चुनौती मिल रही है, यह इस बात से समझा जा सकता है कि सत्तापक्ष को भी जवाब में रैली करनी पड़ी। बीजेपी नेताओं को सामने आकर रैली की आलोचना करनी पड़ी। 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का जो किला दरका था, उसकी दरारें और चौड़ी हो चुकी हैं। एमएलसी के चुनाव ने ट्रेलर दिखा दिया है। युवाओं की बेचैनी को बीजेपी समझ नहीं रही है। वह अभी भी समझती है कि धर्म के नाम पर मंदिर-मस्जिद के नाम पर नैया पार लगा लेगी।
कांग्रेस युवाओं के बीच यह बात पहुंचाने में कामयाब रही है कि इस सरकार के रहते उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा। यह संदेश भी देने में कामयाब रही है कि वोट चोरी का आरोप हवा हवाई नहीं है।
डीएमके, बीजू जनता दल और आप पार्टी भले इंडिया गठबंधन की रैली में शामिल नहीं हुई लेकिन सीईसी के एसआईआर की तमाम खामियों को लेकर वे भी साथ दे रहे हैं. वहीं एनडीए के सहयोगी दलों का भी मन अब डोल रहा है. बहुत जल्द वे भी अपना नफा-नुकसान के अनुसार कदम उठा सकते हैं. सत्तापक्ष को दक्षिण का डर जरूर सता रहा है.
रैली की सफलता-असफलता को लेकर मोदी के दरबारी मीडिया चाहे जिस एंगेल से बयां कर लें परन्तु इतना जरूर आभास हो रहा है कि आज की परिस्थितियों के मद्देनजर देश की साठ प्रतिशत से अधिक लोगों को मोदी एंड कंपनी मोहभंग हो चुका है. इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता.

‘दस लाख’ के बयान से कांग्रेस की हुई किरकिरी, भाजपा को मजाक उड़ाने का मौका दिया
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक वर्मा और अन्य बुद्धिजीवियों के अनुसार राहुल गांधी को अपने बड़बोलेपन पर नियंत्रण रखना होगा. रामलीला मैदान में भीड़ के लिहाज से रैली कमजोर रही। दिल्ली के पत्रकार और एक्टिविस्ट मित्रों के मुताबिक अधिकतम दो लाख की उपस्थिति थी। राहुल गांधी ने लगातार दस लाख लोगों के आने का दावा कर ख्वामखाह भाजपा को मजाक उड़ाने का मौका दे दिया।
अलबत्ता, नरेटिव गढ़ने और संदेश देने के लिहाज से रैली सौ प्रतिशत सफल रही। सफलता को दो पैमानों पर आंका जा सकता है। पहला यह कि इंडिया गठबंधन की ठोस एकजुटता दिखी। अभी तक इंडिया गठबंधन में दरारें ही दरारें दिखती थीं। दूसरी सफलता यह कि राहुल गांधी निर्विवाद रूप से देश में विपक्ष के नेता के रूप में स्थापित हो गए। कोई चुनौती नहीं दिख रही।
राहुल को चुनौती देने वाले ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल निपट चुके हैं। अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि उनकी औकात उत्तर प्रदेश तक ही है। अखिलेश की महात्वाकांक्षा सबसे बड़े प्रदेश का मुखिया बनने तक ही सीमित रहेगी।
अब यह राहुल गांधी के ऊपर निर्भर करता है कि वे रामलीला मैदान से बने मोमेंटम को कितना आगे ले जाते हैं। यह सच्चाई है कि वोट चोरी, लोकतंत्र और संविधान जैसे मुद्दों का जनता पर बहुत ज्यादा असर नहीं है। आर्थिक असमानता, मंहगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे आम लोगों को छूते हैं। इन मुद्दों को जोड़ेंगे तभी एक देशव्यापी जनांदोलन खड़ा होगा।
2029 आने में दो साल से अधिक का समय है। मुद्दे सही और जनता को छूने वाले हों तो छह महीने में आंदोलन रफ्तार पकड़ लेगा। वैसे उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन अगर कमजोर रहा तो इंडिया गठबंधन के लिए 2029 के लिए दिल्ली फतह आसान हो सकता है.
कांग्रेस को एक आवाज, एक विचार पर मंथन करना होगा
अशोक वर्मा अपने जेपी आंदोलन के अनुभव के बारे में बताते हैं कि जेपी आंदोलन मार्च में शुरू हुआ और अक्टूबर आते-आते इतनी प्रचंड रफ्तार पकड़ ली थी। 2 से 4 अक्टूबर,1974 का तीन दिनों का स्वयंर्स्फूत बिहार बंद हुआ था। दो लाख से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए थे। दिल्ली में बैठी सत्ता तक की चूलें हिल गई थीं। आंदोलनों के इतिहास से सबक लेना अच्छा होता है।
उन्होंने कहा कि दरअसल, कांग्रेस दो भागों में बंटा हुआ, एक है आरएसएस विरोधी राहुल गांधी के कांग्रेस और एक है आरएसएस प्रायोजित नरसिंहा राव की कांग्रेस. कांग्रेस की लड़ाई शुरू से आरएसएस के स्लीपर सेल से, ये स्लीपर सेल कांग्रेस में सेंट्रल कमेटी से लेकर बूथ कमेटी तक में मौजूद है.
कांग्रेस को अपनी पकड़ मजबूत करनी है तो सबसे पहले कांग्रेस के अंदर संघी स्लीपर सेल से मुक्त करना होगा। सेंट्रल कमेटी से लेकर बूथ कमेटी तक सभी में एक आवाज एक विचार पर आंदोलन करने के बाद ही कांग्रेस पुनःस्थापित होगा।
कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा है कमज़ोर
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी की परिपक्वता को लेकर सवाल उठाया है. वोट चोरी और मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने जैसे मुद्दे ग्रामीण जनता या कम पढ़े-लिखे लोगों की समझ से परे है. राहुल को असल मुद्दे उठाने चाहिए। इसी से आम जनता में उनकी सही छवि बनेगी।
असल मुद्दे हैं, बेरोज़गारी, मंहगाई , भ्रष्टाचार आदि। नफ़रत के बीज इतने गहरे हैं कि उनको आसानी से मिटाया नहीं जा सकता। इसे कोई सेकुलर सरकार ही कुछ हद तक कम कर सकती है। दूसरी बात यह कि कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा बहुत ही कमज़ोर है। बूढ़े और अकर्मण्य लोग पार्टी में भरे हुए हैं। इसलिए ज़रूरी है कि युवा पीढ़ी के ऐसे लोगों को स्थान दिया जाय जो कर्मठ और जुझारू हों। राजनीति में भावनाएं काम नहीं करतीं।
संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक से राहुल गांधी के परिवार पर घोर आपत्तिजनक कमेंट किये गये पर गांधी परिवार की ओर से कभी पलटवार नहीं किया गया. कई बार भाजपा के शीर्ष नेता से लेकर छुटभैये नेताओं ने बहुत हल्की बातें कही. कई मामलों में तो मानहानि का मुकदमा दायर हो सकता है पर राहुल गांधी ने कभी इसके लिए कदम नहीं उठाया जबकि राहुल गांधी पर आज भी मानहानि के कई मुकदमे चल रहे हैं.