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Monday, November 2, 2026
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दिल्ली के रामलीला मैदान ने 1975 में जेपी को देखा है, 1993 में बीजेपी को देखा और अब 2026 में राहुल गांधी के 12 साल के संघर्षरत धैर्य और राजनीतिक सफर का गवाह बना. रामलीला में भीड़ को लेकर भाजपाइयों और उनके गोदी के एंकर-एंकरानियों का विधवा विलाप असरहीन साबित हुआ है, लेकिन मौसमी सिंह की रिपोर्टिंग की ग्राउंड रिपोर्ट क़ाबिले तारीफ़ है. रामलीला की भीड़ ने यह जरूर दर्शा दिया है कि देश में लोकतंत्र अभी जिंदा है।

देश में अब तक सत्तापक्ष के खिलाफ जितने भी बड़े आंदोलन हुए है, उनमें आरएसएस की सक्रिय भागीदारी रही है। वह चाहे 1977 का इमरजेंसी के खिलाफ आंदोनल हो, वीपी सिंह का बोफोर्स के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरना रहा हो या फिर 2011 में अन्ना आंदोलन हो। आरएसएस ने कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ होने वाले हर आंदोलन में सहयोग किया। कड़वा सच यह भी है कि आरएसएस ने कभी अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती नहीं दी।

यह समझा जाने लगा था कि आजाद भारत में कोई आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक आरएसएस उसे समर्थन न दे। भले ही वह पीछे से दिया गया हो या आगे आकर दिया गया हो। कांग्रेस की रामलीला मैदान में जो रैली हुई है, वह आरएसएस की भागीदारी के बिना हुई है। भले ही कीचड़ और पानी की वजह से मैदान का कुछ हिस्सा खाली रह गया हो, लेकिन जनसैलाब ने बता दिया कि बीजेपी की सत्ता को चुनौती मिल रही है।

गोदी मीडिया पूरी शिद्दत और वफादारी से रैली को फ्लॉप बताने की कोशिश कर रहा है। सत्तापक्ष को कितनी जबरदस्त चुनौती मिल रही है, यह इस बात से समझा जा सकता है कि सत्तापक्ष को भी जवाब में रैली करनी पड़ी। बीजेपी नेताओं को सामने आकर रैली की आलोचना करनी पड़ी। 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का जो किला दरका था, उसकी दरारें और चौड़ी हो चुकी हैं। एमएलसी के चुनाव ने ट्रेलर दिखा दिया है। युवाओं की बेचैनी को बीजेपी समझ नहीं रही है। वह अभी भी समझती है कि धर्म के नाम पर मंदिर-मस्जिद के नाम पर नैया पार लगा लेगी।

कांग्रेस युवाओं के बीच यह बात पहुंचाने में कामयाब रही है कि इस सरकार के रहते उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा। यह संदेश भी देने में कामयाब रही है कि वोट चोरी का आरोप हवा हवाई नहीं है। डीएमके, बीजू जनता दल और आप पार्टी भले इंडिया गठबंधन की रैली में शामिल नहीं हुई लेकिन सीईसी के एसआईआर की तमाम खामियों को लेकर वे भी साथ दे रहे हैं. वहीं एनडीए के सहयोगी दलों का भी मन अब डोल रहा है. बहुत जल्द वे भी अपना नफा-नुकसान के अनुसार कदम उठा सकते हैं. सत्तापक्ष को दक्षिण का डर जरूर सता रहा है.

रैली की सफलता-असफलता को लेकर मोदी के दरबारी मीडिया चाहे जिस एंगेल से बयां कर लें परन्तु इतना जरूर आभास हो रहा है कि आज की परिस्थितियों के मद्देनजर देश की साठ प्रतिशत से अधिक लोगों को मोदी एंड कंपनी मोहभंग हो चुका है.


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