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Wednesday, October 28, 2026
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Priyanka Tripathi’s post


Priyanka Tripathi

कुछ लोग इस संसार में आँखें खोलकर जीते हैं। वे सवाल पूछते हैं, सबूत माँगते हैं, इतिहास पढ़ते हैं और असुविधाजनक सच्चाइयों से भी नहीं भागते। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आँखें बंद करके जीते हैं। उनकी आस्था इतनी गहरी होती है कि रोशनी भी उन्हें अँधेरा लगने लगती है। इन्हें आम भाषा में “अंध भक्त” कहा जाता है। इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है एक ऐसी दुनिया जहाँ तथ्य नहीं, भावनाएं शासन करती हैं, जहां तर्क नहीं, नारे चलते हैं, और जहां इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा लिखा जा सकता है।

इस दुनिया में कंगना रनौत झांसी की रानी हैं। वास्तविक झांसी की रानी ने तलवार उठाई थी, किले की रक्षा की थी और अंग्रेजों से लड़ी थी। लेकिन अंध भक्तों की दुनिया में तलवार की जगह माइक और ट्वीट पर्याप्त हैं। फिल्मों में भूमिका निभाना और वास्तविक संघर्ष में उतरना एक ही चीज मानी जाती है। अगर कंगना किसी मुद्दे पर सत्ता के पक्ष में बोलती हैं, तो वे वीरांगना बन जाती हैं। अगर कोई उनकी आलोचना करता है, तो वह “विदेशी एजेंट” या “टूटी हुई मानसिकता” का शिकार कहलाता है। इतिहास की किताबें चाहे कुछ भी कहें, इस दुनिया में नायिका वही है जो सही भावनाएं प्रदर्शित करे। वीरता अब कर्म से नहीं, घोषणा से नापी जाती है।

यहां रीना ठाकुर बहन हैं। बहन का दर्जा पाने के लिए खून का रिश्ता जरूरी नहीं। जरूरी है कि बात सही दिशा में हो। जो महिला सत्ता की प्रशंसा करती है, वह बहन है। जो सवाल करती है, वह “शहरी नक्सली”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग” या “एंटी-नेशनल” बन जाती है। रिश्ते यहां रक्त से नहीं, विचारधारा से बनते और बिगड़ते हैं। एक दिन कोई बहन हो सकती है, दूसरे दिन दुश्मन। इस व्यवस्था में स्त्रीत्व भी राजनीतिक उपकरण बन जाता है जब जरूरत हो तो सम्मान, जब असहमति हो तो अपमान।

आसाराम बापू यहां भी बापू ही हैं। अदालतें फैसला सुनाएं, गवाहियां आएं, सबूत पेश हों सब बेकार। अंधभक्तों की दुनिया में संत कभी गिरते नहीं। गिरते हैं तो “षड्यंत्र” का शिकार होकर। बापू की छवि इतनी पवित्र रखी जाती है कि वास्तविकता उसके सामने फीकी पड़ जाती है। आस्था की आड़ में सब कुछ माफ हो जाता है। अपराध अगर “हमारे” संत का हो, तो वह दुर्भाग्य है; अगर “उनके” किसी व्यक्ति का हो, तो वह साजिश है। नैतिकता यहां दोहरे मापदंड पर चलती है।

गोडसे इस दुनिया में देशभक्त है। जिस व्यक्ति को इतिहास ने हत्यारा कहा, उसे यहां वीर बना दिया गया है। हत्या को देशभक्ति का रूप दे दिया गया है। सवाल पूछने वाले को देशद्रोही करार दे दिया जाता है, और हत्यारे को नायक। इस दुनिया में हिंसा अगर “सही” मकसद से की जाए, तो वह पाप नहीं रहती। इतिहास की किताबें पलटने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि भावनाएं पहले से तय कर चुकी होती हैं कि नायक कौन है और खलनायक कौन। गोडसे की मूर्तियां लगाना, उनकी जयंती मनाना और उनकी विचारधारा को सही ठहराना, यह सब देशभक्ति का नया रूप बन गया है।

सावरकर यहां वीर हैं। उनकी विचारधारा, उनके लेखन, उनके जीवन के विवाद सब एक तरफ रख दिए जाते हैं। सिर्फ “वीर” का तमगा पर्याप्त है। आलोचना को “विदेशी मानसिकता” या “सेकुलर षड्यंत्र” कहकर खारिज कर दिया जाता है। इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार चुनने और छांटने का अधिकार इस दुनिया में पूरी तरह सुरक्षित है। जो बातें अनुकूल हों, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है; जो बातें असुविधाजनक हों, उन्हें या तो छिपाया जाता है या “संदर्भ से काटकर” गलत बताया जाता है। सावरकर की वीरता अब बहस का विषय नहीं, आस्था का विषय बन चुकी है।

और सबसे ऊपर चौकीदार भगवान हैं। चौकीदार का काम सुरक्षा करना होता है, लेकिन यहां चौकीदार स्वयं ईश्वर बन गए हैं। आलोचना करना पाप है, सवाल पूछना अधर्म। हर उपलब्धि का श्रेय उन्हीं को, हर कमी का दोष विपक्ष, पिछली सरकारों या “विदेशी ताकतों” को। भगवान की तरह वे कभी गलत नहीं हो सकते। उनकी तस्वीरें घरों में लगाई जाती हैं, उनके नाम पर व्रत रखे जाते हैं, और उनकी आलोचना सुनकर आस्था आहत हो जाती है। चौकीदार अगर सो जाएं, तो भी भक्त कहते हैं कि वे “रणनीति” से सो रहे हैं। अगर कीमतें बढ़ें, तो “वैश्विक परिस्थितियाँ” दोषी हैं। अगर बेरोजगारी बढ़े, तो “युवाओं में धैर्य की कमी” है। भगवान कभी असफल नहीं होते, असफल सिर्फ भक्तों की समझ होती है।

यह दुनिया बहुत सुव्यवस्थित है। इसमें कोई संदेह नहीं होता, कोई उलझन नहीं होती। सब कुछ साफ-सुथरा और एकतरफा होता है। सवाल पूछने वाले बाहर हैं, जवाब देने वाले अंदर। तर्क की जगह नारे हैं, सबूत की जगह विश्वास है, और इतिहास की जगह भावनाएँ। सोशल मीडिया इस दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है। वहां हर दिन नए मंत्र गूंजते हैं, नई दुश्मन की सूची बनती है, और नई वीरगाथाएं गढ़ी जाती हैं। टीवी चैनल इस दुनिया के पुजारी हैं, जो भक्ति का प्रसार करते हैं और संदेह को पाप बताते हैं।

वर्तमान राजनीति में यह दुनिया खूब फल-फूल रही है। हर मुद्दे पर एक ही जवाब तैयार रहता है जो हमारे पक्ष में है वह सही, जो खिलाफ है वह देशद्रोही। कंगना रानी हैं, रीना बहन हैं, आसाराम बापू हैं, गोडसे देशभक्त हैं, सावरकर वीर हैं, और चौकीदार भगवान हैं। बाकी सब कुछ तथ्य, इतिहास, तर्क, संदेह, विवेक, सब इस दुनिया के बाहर की चीजें हैं। अंदर सिर्फ आस्था है, और वह आस्था इतनी अंधी है कि रोशनी भी उसे दिखाई नहीं देती।

और सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस दुनिया के निवासी खुद को सबसे जागरूक और देशभक्त मानते हैं। वे सोचते हैं कि बाकी सब अंधे हैं। जबकि हकीकत यह है कि उन्होंने अपनी आँखें खुद बंद कर रखी हैं और अब अँधेरे को ही रोशनी समझने लगे हैं।


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