कभी-कभी बेहद आश्चर्य होता है कि हमारे पूर्वजों ने कैसे इतने सटीक मुहावरे रचे जो वक्त की ढाल पर आज भी तन कर खड़े हैं और जिनके अर्थ शाश्वत हैं. अब इस मुहावरे को ही देखिये- घर का भेदी लंका ढ़ाये, आज भी आज की राजनीति पर कितना सटीक बैठता है. नीतीश कुमार, शिंदे, अर्जुन मुंडा, हेमंता विस्वा सरमा, शुभेंदु अधिकारी जैसे राजनेता इसी मुहावरे के जीवंत उदाहरण बन गये हैं. ऐसे नामों की फेहरिस्त लंबी है, यहां हमने बस उन चंद नामों को लिया है जो मौजू है.
पहले तो इस मुहावरे के पीछे की कहानी को याद कर लें. अनार्य रावण और आर्यपुत्र राम में युद्ध चल रहा था. राम के मारे रावण मर नहीं रहा था. अंत में रावण का छोटा भाई विभीषण राम के कान में फुसफुसा कर कहता है- प्रभु, उसकी नाभि में वाण मारिये जहां अमृत धारण किये हुए है रावण. उसके सूखते ही उसका अंत हो जायेगा. राम वाण का संधान करते हैं और रावण की नाभि में निशाना साध कर तीर मारते हैं. रावण धराशायी होकर जमीन पर बिछ जाता है. और विभीषण को केंद्र में रख कर यह मुहावरा बन जाता है- घर का भेदी लंका ढ़ाये.
अब आइये आज की राजनीति पर गौर कर लें. अभी-अभी बिहार की सत्ता संभालने वाले सम्राट चौधरी लालू खेमे के ही राजनेता हैं. इनके पूर्व जिस नीतीश कुमार ने भाजपा को बिहार में प्रत्यारोपित किया, वे समाजवादी धारा की कोख से ही निकले हैं.
दूसरी पार्टी से आए हेमंता, शुभेंदु, शिंदे, सम्राट, अर्जुन मुंडा सहित कई नेता भाजपा में दीक्षित हुए…अब बाबूलाल की बारी
झारखंड में भाजपा को जड़ जमाने में मदद करनेवाले अर्जुन मुंडा झामुमो में ही रह कर राजनीतिक दीक्षा पायी. हेमंता विस्वा सरमा दो दशकों तक कांग्रेस में ही रहे थे. शिवसेना की मिट्टीपलीद करनेवाले शिंदे, उद्धव ठाकरे के विश्वासपात्र थे. शुभेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के ही सिपहसालार रहे हैं.
नीतीश बिहार में सवर्ण राजनीति को खत्म करनेवाले रणनीतिकारों में एक थे. उस समाजवादी खेमे से आये थे, उस भाजपा को बिहार में जमाने में मददगार बने जिसे संविधान में समाजवाद शब्द रखे जाने से आपत्ति है.
अर्जन मुंडा झामुमो में रह कर ही राजनीति में दीक्षित हुए, लेकिन बाद में भाजपा के भरोसे के आदमी बन गये, इस हद तक कि उनके लिए बाबूलाल की बलि दे दी थी भाजपा ने. कांग्रेस आज की तारीख में धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाली पार्टी है. हेमंता उसी पार्टी में दो दशकों तक रहे. और अब मुसलमानों के लिए नफरत व्यक्त करना उनकी राजनीति का मूलमंत्र बन गया है. बेशर्मी इतनी कि पूछते हैं- कौन कांग्रेस?. और ये शुभेंदु अधिकारी तृणमूल को बंगाल में सींचने वाले माली रहे हैं और अब उसे जड़ से उखाड़ने पर आमादा हैं.
अब संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इन्हें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा दुश्मन खेमे में ले गयी. उन्होंने भाजपा की विभाजनकारी नीतियों को अंगीकार कर उसके प्रवक्ता बन गये. भाजपा ने अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए इनका बखूबी इस्तेमाल किया. उनके प्रभावकारी नेताओं और रणनीतिकारों में आज संघ की शाखाओं में रह चुके नेता कम हैं, संघ विरोधी रहे विभिन्न राजनीतिक दलों से आये नेता ही अधिक हैं.
दरअसल, वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुयायी हैं. उन्हें इस बात का इल्म है कि ‘घर का भेदी ही लंका ढाह सकता है.’ यह अलग बात कि उनका इस्तेमाल कर वे उन्हें देर-सबेर इतिहास के कूड़ेदानी में डाल दे, जैसे उन्होंने नीतीश को, शिंदे को, अर्जुन मुंडा को डाल दिया है और जहां बाबूलाल को डालने वाली है.
-वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार फेसबुक वाल से




























































