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Tuesday, June 30, 2026
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झारखंड में अब बिना थाना गए लोग दर्ज करवा सकेंगे ऑनलाइन ई-एफआईआर

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रांची – झारखंड में अब बिना थाना गए लोग दर्ज करवा सकेंगे ऑनलाइन ई-एफआईआर22 जिलों में ई-एफआईआर (e-FIR) थाना सृजन से संबंधित प्रस्ताव को मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने दी मंजूरी, मंत्रिपरिषद की स्वीकृति हेतु रखा जाएगा===================ई-एफआईआर से आम नागरिकों को बिना थाना गए पोर्टल/ मोबाइल एप्प के माध्यम से ऑनलाइन प्राथमिकी दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध होगी===================मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने रामगढ़ और खूंटी जिले को छोड़कर शेष 22 जिलों में ई-एफआईआर (e-FIR) थाना सृजन से संबंधित प्रस्ताव को अनुमोदित कर दिया है.👨‍💻 ई-एफआईआर थानों के सृजन का आधार आम नागरिकों को बिना थाना गए पोर्टल/ मोबाइल एप्प के माध्यम से ऑनलाइन प्राथमिकी दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध कराने से है.👨‍💻 ई- एफआईआऱ के क्रियान्वित होने से आम नागरिकों को वाहन चोरी, विभिन्न प्रकार की संपत्ति चोरी, सेंधमारी, महिला एवं नाबालिगों से संबंधित अपराध. नाबालिगों की गुमशुदगी से संबंधित कांड जिसमें अभियुक्त अज्ञात हो, ऐसे मामलों में ऑनलाइन प्राथमिकी दर्ज कराने की सुविधा से अनावश्यक कठिनाई से निजात मिलेगी.ई-एफआईआऱ दर्ज कराने की प्रक्रिया👮‍♂️समाधान पोर्टल पर लॉग इन कर अपना आवेदन ई-साइन या डिजिटल सिग्नेचर के माध्यम से समर्पित करना होगा, तभी आवेदन स्वीकार किया जाएगा.👮‍♂️समाधान पोर्टल या मोबाइल एप्प के माध्यम से प्राप्त शिकायतों के आधार पर थाना प्रभारी ई-एफआईआऱ संबंधित धाराओं के तहत कांड दर्ज कर जिस स्थानीय थाना कार्य क्षेत्र में घटना हुई है उसके पुलिस पदाधिकारी को अनुसंधान हेतु नामित करेंगे.👮‍♂️इसके अलावा पुलिस महानिदेशक अथवा पुलिस महानिरीक्षक स्तर से समीक्षोपरांत प्रतीत हो तो उपरोक्त अंकित प्रकृति के कांडों के अलावे अन्य विविध कांडों जिनकी प्रकृति ई-एफआईआऱ मानकों के तहत हो, उन्हें अपने स्तर से ई-एफआईआऱ के तहत सूचीबद्ध करने हेतु अलग से आदेश जारी कर सकते हैं.👮‍♂️ई-एफआईआऱ को लेकर थाना प्रभारी खुद डिजिटली सिग्नेचर प्राथमिकी की प्रति वादी के साथ सभी संबंधित अधिष्ठानों जैसे- जिस थाना क्षेत्र में घटना हुई हो उसके थाना प्रभारी, उक्त थाना के पर्यवेक्षण पदाधिकारी, संबंधित कोर्ट, बीमा कंपनी ( अप्लीकेबल होने पर), सभी पीसीआर, पुलिस अधीक्षक, एससीआरबी एवं एनसीआरबी को इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिट / ई-मेल के माध्यम से प्रेषित करेंगे.👮‍♂️अनुसंधानकर्ता द्वारा कांड का अनुसंधान कार्य पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल में किया जाएगा. अनुसंधान के क्रम में की गई कार्रवाई एवं केस डायरी की प्रविष्टि भी इलेक्ट्रॉनिक फॉरमेट में होगी. साथ ही जिन कांडों में प्राथमिकी दर्ज होने से 30 दिनों के अंदर उद्भेदन नहीं हो पाए तो संबंधित अनुसंधानकर्ता ई-एफआईआऱ थाना प्रभारी के माध्यम से उक्त अंतिम प्रतिवेदन न्यायालय में समर्पित करेंगे.👮‍♂️ई-एफआईआऱ के तहत उल्लेखित अपराध की घटना संबंधित जिले या झारखंड राज्य की सीमा के बाहर घटित होने, अभियुक्त का संदिग्ध ज्ञात हो और यदि अपराध की घटना में कोई जख्मी हुआ हो तो इन परिस्थितियों में ई-एफआईआऱ की सुविधा निषेध होगी. न्यूज़ सोर्स जोहर न्यूज़ रांची

राम भक्तों के लिए

धोनी युग का अंत :(

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रांची – धोनी एक खिलाड़ी नहीं,एक पीढ़ी है,एक सफर है,एक संघर्ष है,एक कहानी है जो कभी समाप्त नहीं हाेती है,लगातार जारी रहती हैकभी सोचा था कि धोनी चुपके से ऐसे अलविदा कह देंगे? खामोशी से। वक्त कितना क्रूर होता है,बेरहम होता है हम इससे सीख ले सकते हैं।धोनी की चुपके से ‘आई क्विट ‘ घटना के बीच याद करें कि ठीक एक दशक पहले 2007 में वर्ल्ड कप में बुरी तरह हार कर जब पहली बार T-20 वर्ल्ड कप हुआ तो सारे सीनियर हटा दिए गए थे। ‘जूनियर’ धोनी को कमान दे दी गयी टीम इंडिया की। उन्हें प्रूव करना था,उनमें वह जज्बा है कि नहीं। वह स्टॉर इलिमेंट हैं कि नहीं? डाउन मार्केट माहौल से आने के कारण उसमें एक्स फैक्टर है कि नहीं? क्योंकि क्रिकेट देश में सिर्फ खेल नहीं बल्कि एक जुनून भी है जिसके किरदार को नायक सरीखा होना चाहिए। लेकिन उसके बाद फिर क्या हुआ,वह इतिहास है।धोनी ‘लार्जर दैन लाइफ’ सा लगने लगे। कोई ऐसे सक्सेस नहीं रही,जो उनकी लीडरशिप में न मिली। विश्व में एकमात्र ऐसा कैप्टन जिसने भारत को क्रिकेट के हर फॉर्मेट में नम्बर-1 बनाया।बचपन में पढ़ते थे,चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है। क्रिकेट में हमने देखा है-धोनी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है।इंडिव्यूजल सक्सेस तो सुनील गावस्कर,सचिन जैसे प्लेयर लेते रहे लेकिन सौरव गांग्रुली ने बतौर टीम जीत दिलाने की परंपरा की शुरूआत की उसे धोनी ने आदत बना दी। अगर धोनी चाहते तो देश की जीत से अधिक अपनी सेंचुरी बना लेते। लेकिन वह उस मूल्यों में पले बढ़े जहां परिवार का मुखिया सभी का पेट भरने के बाद अपने लिए खाना बचाता है।धोनी के काल में भारत की हार खबर बनने लगी। पहले जीत खबर,सरप्राइज एलिमेंट होता था। लेकिन मैदान पर सक्सेस के बावजूद उन्हें डाउन मार्केट से अप मार्केट में प्रोमोशन में काफी परेशानी उठानी पड़ी। कभी उन्हें कोकोकोला की मॉडलिंग इसलिए नहीं दी गयी कि उनका अपीयरेंस डाउन मार्केट सा था। बाद में क्रिकेट मैदान पर ही नहीं बल्कि स्पोर्टस ब्रांड में भी इस मुकाम तक पहुंचे जहां आज तक कोई भारतीय खिलाडी नहीं पहुंच सका था। मेसी,रोनैल्डो के स्तर तक पहुंच गए। लेकिन अपने धोनी टिपिकल मिडिल क्लास बैकग्राउंड से हैं जहाँ पूरी जिंदगी प्रूव करने में ही गुजर जाती है और फिर भी लगता है बहुत कुछ छूट गया। अपनों की अपेक्षा पूरी नहीं होती। उसी अपेक्षा के बीच धोनी ने पूरी तरह से कप्तानी छोड़ दी। बेस्ट लक धोनी। यू आर हीरो। तुम्हें किसी को नहीं,खुद को प्रूव करना है। कुछ गलती हुई, थोड़े अरोगेंस हुए। लेकिन यह सब पार्ट ऑफ लाइफ है। यू आर हीरो। तुम्हें किसी को नहीं,खुद को प्रूव करना है। धोनी कभी अनजान जोगिन्दर शर्मा से वर्ल्ड कप जीतवाते हैं कभी हार्दिक पंड्या से हारा हुआ मैच। वह ऐसे हीरो रहे जो दूसरो पर विश्वास किया,उन्हें हीरो बनाया। हर कोई मानेगा कि खुद अपने रिकार्ड पर ध्यान देता तो वनडे में कई शतक और हजारों अतिरिक्त रन बना चुका होता। लेकिन धोनी ने देश को जीताने का जिम्मा लिया। कप्तान से हटकर,टीम से बाहर रहकर भी धोनी रोल मॉडल रहेंगे। स्मॉल टाउन,बिग ड्रीम की जब भी मिसाल होगी,धोनी उस चैप्टर के एक नायक बने रहेंगे।बेस्ट लक धोनी। यू आर हीरो। तुम्हें किसी को नहीं,खुद को प्रूव करना है। धोनी एक मिडिल क्लास के संघर्ष की अंतहीन कहानी के प्रतिनिधि करने वाले किरदार हैं। इसे किसी एक ब्रैकेट में बांध कर नहीं समझा जा सकता है।धोनी एक खिलाड़ी नहीं,,एक पीढ़ी है,एक सफर है,एक संघर्ष है,एक कहानी है जो कभी समाप्त नहीं हाेती है,लगातार जारी रहती है

राम भक्तों के लिए

झारखण्ड की रूपम, जिसने लोगों को दिया घर बैठे रोजगार का मौका

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रांची – दोस्तों किसी ने सच ही कहा है कठिन परिश्रम और लगन से हम वो सब हासिल कर सकते है जो बहुत से लोगो के लिए एक सपना मात्र है। आज हम आपको एक ऐसी सख्शियत के बारे में बताने जा रहे है जिसने काफी मेहनत के बाद अपनी मंजिल पायी और आज वो ऐसे बहुत से नए लोगो की मदद भी कर रहीं हैं जो घर मे रहकर कुछ करना चाहतें हैं। उन्होंने बहुत से फ्रेशर्स को वर्क फ्रॉम होम के अवसर दिये है। रूपम मिश्रा एक छोटे से शहर की रहने वाली है। परन्तु वो एक ऐसी महिला है जिनके काम की सराहना आज काफी लोग कर रहे है। कठिन मेहनत और लगन से उन्होंने अपनी टेक्निकल पढ़ाई पूरी की और आज वो अपनी एक टेक्नो कॉमर्शियल मार्केटिंग की कंपनी चला रही हैं। इतना ही नहीं वो इसके साथ साथ हाथ से बने हुए खास तरह के सामान जो कि इण्डियन आर्ट और क्राफ्ट की श्रेणी में आते है, उन्हे प्रोमोट करती हैं। रूपम मिश्रा एक ऐसी महिला हैं जो विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी भरतीय कला को एक खास पहचान दिलाने के लिए काफी मेहनत कर रहीं है। रूपम मिश्रा ने अपने इस काम के जरिये कला के क्षेत्र में एक ख़ास पहचान बनाई है और साथ ही वो अपनी वेबसाइट के जरिये भी अच्छी कंपनी ग्रोथ कर रहीं हैं। आसान नही था सफर:कहते हैं किसी भी काम को करने के लिए उसमें बहुत से रोड़े आते हैं रूपम ने भी इन रुकावटों को फेस किया । अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 10 साल तक नौकरी की और अपनी कंपनी खोलने का plan किया। आज वह टेक्नो कॉमेरशल,आर्ट और क्राफ्ट कंपनी को तो पूरी तरह से संभालती ही है और साथ ही साथ इंडियन आर्ट एंड क्राफ्ट को भी प्रोमोट करती है । इतना ही नहीं उनकी कंपनी से जुड़े लोगों को एक नई पहचान मिल रही है, उनका काम ना सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में सराहा जा रहा है। आज रूपम दो वर्टिकल मैनेज करती है और उनके साथ जुड़े लोग अपने काम को आनंद लेते हैं।ये थी कंपनी की पॉलिसी:रूपम मिश्रा ने जब अपनी कंपनी की शुरुआत की तो यह पॉलिसी थी कि वह हर से काम करने की अपॉर्चुनिटी देंगे और टाइम फ्लैक्सिबिलिटी उनकी कंपनी के प्रमुख पॉलिसीज में एक था। जिसके कारण बहुत से न्यूकमर्स काफी फायदा मिलने वाला था क्योंकि टाइम फ्लैक्सिबिलिटी के चलते वह काम अपनी इच्छा अनुसार से कर सकते थे। इस तरह से उनकी कम्पनी से जुड़े सारे लोग अपने काम को खूब एंजॉय करतें हैं।घर की जिम्मेदारियों के साथ साथ करती है गरीब समुदाय की मददरूपम मिश्रा शादीशुदा है, तो जाहिर सी बात है हर शादीशुदा महिला की तरह इन पर भी घर की काफी सारी जिम्मेदारियां हैं। वो न सिर्फ इन जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं बल्कि वो अपने आर्ट और क्राफ्ट के बिजनेस में ऐसे लोगों को सम्मलित करती है जो काफी गरीब है। उनको अपने यहां काम देकर आर्थिक रूप से उन्हें मजबूत बनाती है।

राम भक्तों के लिए

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बेटी को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार

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नयी दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक बेटी को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार है। अदालत ने कहा कि संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत यह बेटियों का अधिकार है और बेटी हमेशा बेटी रहती है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू महिला को अपने पिता की संपत्ति में भाई के समान ही हिस्सा मिलेगा।
कोर्ट ने कहा कि नौ सितंबर 2005 के बाद से बेटियों के हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्तियों में हिस्सा मिलेगा। बता दें कि साल 2005 में कानून बना था कि बेटा और बेटी दोनों के पिता की संपत्ति पर बराबर का अधिकार होगा। लेकिन, इसमें यह स्पष्ट नहीं था कि अगर पिता की मृत्यु 2005 से पहले हुई हो तो क्या ये कानून ऐसे परिवार पर लागू होगा या नहीं।
इस मामले में मंगलवार को न्यायाधीश अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने फैसला सुनाया कि यह कानून हर परिस्थिति में लागू होगा। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यह कानून बनने से पहले अर्थात साल 2005 से पहले भी अगर पिता की मृत्यु हो गई है तो भी पिता की संपत्ति पर बेटी को बेटे के बराबर का अधिकार मिलेगा।
बता दें कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1965 में साल 2005 में संशोधन किया गया था। इसके तहत पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबरी का हिस्सा देने का प्रावधान है। इसके अनुसार कानूनी वारिस होने के चाने पिता की संपत्ति पर बेटी का भी उतना ही अधिकार है जितना कि बेटे का। विवाह से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

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जाने-माने शायर राहत इंदौरी नहीं रहे

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दिल्ली – जाने-माने शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को निधन हो गया है। इंदौरी कोरोना से संक्रमित थे और उन्हें आज ही दिल का दौरा पड़ा था। इंदौरी भारत के मशहूर शायरों में से एक थे और उनकी दुनिया भर में भी पहचान थी।कोरोना से संक्रमित होने के बाद 70 साल के इंदौरी को सोमवार रात को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। राहत इंदौरी ने इस बारे में ट्वीट कर जानकारी दी थी। उन्होंने लिखा था, ‘अरबिंदो हॉस्पिटल में भर्ती हूं, दुआ कीजिये जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं।’राहत इंदौरी का जन्म इंदौर में 1 जनवरी, 1950 को हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा नूतन स्कूल, इंदौर में हुई थी और इसलामिया करीमिया कॉलेज, इंदौर से 1973 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। इंदौरी साहब ने 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया था।शायरी के अलावा राहत इंदौरी अपनी गजलों के लिए भी जाने जाते थे। डाॅ. राहत इंदौरी के शेर व्यवस्था को आइना भी दिखाते हैं। एक शेर में वह कहते हैं- तूफ़ानों से आंख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो, मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो। एक दूसरे शेर में वह कहते हैं- हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे, कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।

राम भक्तों के लिए

आलेख: रुक गयी ज़िन्दगी – रजनी मल्होत्रा नैय्यर

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बोकारो थर्मल – भागते- दौड़ते इंसान की तेज़ रफ़्तार को अचानक से प्रकृति ने एकदम से ब्रेक लगा दी !एक से बढ़कर एक भौतिक सुख- साधनों की वृद्धि,परमाणु हथियारों का निर्माण ,प्रकृति से होड़ या यूँ कहें प्रकृति को सीधी चुनौती ।उसके ही बनाये नियमों का सीधे – सीधे विखंडन । इंसान से ख़ुदा का फ़र्क़ मिटाना एक घनघोर अपराध । तमाम सुविधाओं से जकड़ा मानव इंसान से कब शैतान बन गया वो स्वयं नहीं जान सका , विकास के नाम पर उसने कुछ निधियाँ हासिल की । पर, ये निधियाँ उसपर हावी होती स्पर्धा, के नीचे दबती चल गईं और यही निधियाँ उनके किये गए दुरूपयोग से मनुष्य का विनाश बनकर उभरी । वक़्त सँभलन का सभी को वक़्त देता है, पर हम बाह्य विकास की होड़ में इस क़दर भागने लगे कि मानव के आंतरिक गुणों को भूल बैठे, प्रकृति फिर भी हमें समझाती रही, अपने तरह -तरह के बदलते संकेतों के द्वारा , पर विज्ञान की तरक़्क़ी के बल पर मनुष्य ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा उसने प्रकृति के द्वारा प्रदत्त किये गए उपभोग की वस्तुओं का कभी दुरूपयोग किया कभी दोहन । हर बार प्रकृति से लड़कर जीतता रहा मानव ,पर उन जीत के पीछे हर बार क़ुर्बान हुई कई- कई ज़िंदगियाँ । इन्हीं तमाम सवालों के बीच उलझते फिर से विश्व एक ही छत नीचे आ गया है । वही संदेह शंकाएँ , कौन बड़ा प्रकृति या पुरुष ? विज्ञान का आकलन पूरी तरह धर्म पर ही आधारित है , पर धर्म क्या है ? वाह्य आडम्बरों से जो भरा है वो धर्म है ,अथवा मानवता की सच्ची सेवा धर्म है । अंतरात्मा से की गई उस परब्रम्हपरमेश्वर की वंदना अथवा कर्मकांडों में लिपटे हुए तन्त्रोक्त साधना , व मूर्ति पूजन ?इन तमाल सवालों के कोई उपयुक्त जवाब न होंगे हमारे पास । अलग- अलग देशों में सबके धर्म , देव व उनसे जुड़े अनुष्ठान अलग-अलग हैं । मतैक्य में मतभेद अवश्यम्भावी है। मनुष्य के विकास की परंपरा और सफ़र अबाध रूप से चलता रहे , इसी विकास के होड़ ने विश्व को कभी दो भागों में बाँट कर 2 विश्वयुद्ध भी दिए । जिसके परिणति स्वरूप विश्व के कई देश वर्षों तक दुःख, ग़रीबी और टूटी अर्थव्यवस्था के रूप में झेलते रहे । आज फिर हम उसी मोड़ पर आकर समेकित रूप से खड़े हो गए हैं जहाँ बाज़ारवाद ने अपने पैर फैलाने के लिए, अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए , दूसरे राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था को डाँवाडोल करने के लिए विश्व को एक नई मुसीबत ( कोरोना ) से सामना करने के लिए घुटनों पर खड़ा कर दिया है , अब इस परिस्थिति में ये मुसीबत मनुष्य प्रदत है अथवा प्रकृति प्रदत्त कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता इसके परिणाम पर । क्योंकि, इसकी चपेट में आनेवाली ज़िंदगियाँ देश, राज्य, अमीर-ग़रीब बड़ा, छोटा, रंग, जाति सबका भेद त्याग कर सबको समान रूप से गले लगा रही, मानो कह रही है प्रकृति की नज़र में सभी एक समान हैं , यदि कोई भेद की नीति है तो वो तुम मनुष्यों द्वारा बनाई गई है ।परमाणु के आविष्कारक भी अपने हथियार डाले बैठे हैं , इंसान जब किसी मुसीबत में पड़ता है तभी उसे उसके किये गए अच्छे-बुरे कर्म याद आते हैं और वो अपने इष्ट को याद करता है ये जानते हुए कि वो कहीं नहीं दिखते फिर भी मन में एक यक़ीं होता है उसे, कोई एक शक्ति है जो उसे इस संकट से उबार लेगी ।फिर यहीं से शुरू होता है एक और सफ़र आस्था, अनास्था का । आज वो सारे साधन हमें मुँह चिढ़ा रहे, न परमाणु हथियार काम आ रहे न कपड़ों से भरी आलमारियाँ । हम मोटरगाड़ियों की खरीदारी के लिए क़तारों में नहीं लग रहे,न ही किसी सजावटी वस्तु को लेने की होड़ में हैं । उफ़ कितनी सीमित साधनों में सिमट गया है आज का मानव ! बस उन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं में सिमट कर रह गया है फिरसे । प्रकृति उसे उसी आदम युग में खीच कर ले आयी जहाँ उसका एकमात्र उद्देश्य था खाद्य सामग्री का संग्रहण । अपनी ज़रूरतों के लिए प्रकृति का उपभोग करते करते दुरुपयोग की सीमा तोड़ विज्ञान की पकड़ से प्रकृति को झुकाने की अनर्गल कोशिशें करते मानव जब अपनी अहम की अट्टालिकाएँ , बढ़ाने लगा ,क्या उसे सचेत करने प्रकृति को इस तरह समझाना पड़ा ! एशिया क्या यूरोप क्या दक्षिणी क्षेत्र और क्या पूर्वी क्षेत्र । निर्माण की एक छोटी सी इकाई जिसे देख पाना असंभव है, उस अनदेखे आतंक ने विश्व को हिलाकर मानव की ईंट से ईंट बजा कर रख दी है । लोगों को दहशत में जीने को मजबूर कर भाषा, खान-पान, जलवायु, मौसम रंग,लिंग भेद सबका भेदभाव छोड़कर एक सकारात्मक संदेश के साथ सबको गले लगाते काल के गाल में धकेलता चला जा रहा कि प्रकृति के लिए सभी समान हैं, कोई नस्ल,धर्म भेद नहीं ।अचानक इस विश्वव्यापी मुसीबत (कोरोना )से मानव जाति को बहुत कुछ सीखने को भी मिला है बहुत सारी भूलों को सुधारने का मौक़ा भी ।वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास करते – करते विश्व कलिंग युद्ध के रचयिता के रूप में परिवर्तित हो गया । करने लगा निर्माण विनाशक शक्तियों का । हर शक्तिशाली देश ख़ुद को दूसरे देश से अधिक शक्तिशाली बनाने में लग गए , कमज़ोर राष्ट्र दबाए जाने लगे ,नीतियों द्वारा प्रस्तावों द्वारा बाज़ार के रास्ते खुले एकदूसरे से प्रगति की दौड़ में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी, फलस्वरूप देशों के अर्थव्यवस्था में अंतर आये माँग बढ़ी बाजार बढ़े ।राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय बाजार बढ़ने लगे विचार बदले ,अर्थव्यवस्थाएँ बदली परिवेश बदले भौतिकता ने ख़ूब पंख फैलाये , विकसित और विकसित हुए विकासशील प्रयत्नशील रहे । सात समंदर की दूरियों को मिटा कर विश्व के तार एकदूसरे से जुड़ने लगे ,वैश्वीकरण होने से अर्थव्यवस्था के साथ पाश्चात्य संस्कृति भी दूसरे संस्कृतियों में घुलने लगी। आदान -प्रदान के दौर में सभी देशों ने दूसरे देशों से बहुत कुछ आत्मसात किये संस्कृतियों में नई -नई चीजें जुड़ने लगी । विश्वगुरु बन हमने पाश्चात्य को सिखाया तोपाश्चात्य से बहुत कुछ आत्मसात किया ।मानव ने भौतिकता की अंधी दौड़ में भूला दिया कि प्रकृति ने मानव को एक श्रेष्ठ जीव के रूप में धरती पर बना कर भेजा है । हर ओर दम्भ, झूठ, आतंक, जीव हत्या, धर्म के नाम पर लूट पाखंड ,व्यभिचार बढ़ गए । ज्ञान अज्ञानियों के बोझ तले दब गया , धर्म की परिभाषा बदल गयी, नारी का स्थान बदल गया ।हर ओर विनाश के संकेत ,चहुँओर ओर छा गया तो बस एक यही विचारधारा सामने वाले को कुचलते हुए अपनी मंज़िल की ओर जाना है । समय की धारा को मनुष्य अपने अनुसार चलाने लगा , संयम खो गए, सहृदयता जवाब दे गई, हृदय में कुटिलता का वास हो गया ।मानव समाज की सबसे छोटी इकाई होती है परिवार जिससे जुड़ कर जीवन की हर छोटी बड़ी खुशियों को साझा किया जाता है , तभी तो मनुष्य समाज का निर्माण करता है पर बदलते वक़्त की मेहरबानी देखिए भौतिकता में डूबे अपने सुख-सुविधाओं को बढ़ाने की ललक में न दो वक्त चैन की साँस ले पाया इंसान न चैन का निवाला नसीब उसे। दोहरे चरित्र के मनुष्यों के कार्य भी दोहरे चरित्र वाले हो गए , अधिक मुनाफ़े के चक्कर में अनाजों सब्जियों दुग्ध पदार्थों में भी कई तरह की मिलावट पाए जाने लगे रासायनिक पदार्थों के मिश्रण से उनकी गुणवत्ता खराब कर लोगों के सेहत और जीवन को संकट हुआ परिणाम , मौसमी बदलाव के कारण उत्पन्न बीमारियों से लड़ने की क्षमता (इम्युनिटी )घटने लगीव्यसनों बुराईयों में घिर कर मन की एकाग्रता ख़त्म , मशीन के साथ जुड़ कर मानव के शारीरिक श्रम वाले सारे कार्य बंद हो गए जिससे शरीर को चुस्त बनाने वाली धातुओं का बनना कम हुआ या बनने बंद हो गए जिससे कई बीमारियों ( मधुमेह, उच्च रक्तचाप ,मोटापा जैसी ) को न्योता मिला ।दूषित भोज्य पदार्थों को खा पीकर व्यसन में डूबने से कई अनैतिक कार्यों को बढ़ावा मिला । ” जैसा अन्न वैसा मन ” कहा भी गया है । सोने उठने के नियम भी बदलती समय की माँग कहें या मजबूरी ,मशीनी जीवन ने इंसान को पूर्णरूप से मशीन कर छोड़ दिया । पर समय समय पर प्रकृति ने बहुत कुछ बदलाव करते रहे हैं , और उन्हीं बदलाव के कई परिणाम हमने अब तक सुने और देखे हैं ।बद से भी कुछ अच्छाई निकल कर आती है जैसा कि हमें स्पष्ट नज़र आ रहे ।भाग – दौड़ की दुनिया में इंसान इतना थक गया कि उसे अपने परिवार को देने के लिए प्यार की जगह उपेक्षा और अवहेलना मिले ।अपनों के पास बैठने के लिए वक़्त की कमी , पर सैकड़ो मीलों दूर के रिश्ते ऑनलाइन जुड़ कर बनने और निभने लगे।नैतिकता के बंधन टूटने लगे ,मर्यादाओं को भूल कर कई रिश्ते ऐसे बनें जिससे बसे बसाए घर टूटने लगे ।रिश्तों की गरिमा , त्याग, समर्पण, धार्मिक भावनाएँ सब आहत होने लगीं ।इंसान ही इंसान का शत्रु बन बैठा । मन कर्म और वचन से झूठे होने लगे लोग।सृष्टि के निर्माण के बाद संसार में बढ़ते अनैतिकता को रोकने के लिए प्रकृति को किसी न किसी रूप में पाठ पढ़ाना ही पड़ा है ,इस बार भी प्रकृति ने इंसानों को चुनौती दी है विज्ञान को चुनौती दी है ,मंदिरों मस्जिदों गिरजाघरों में ताले लगवा कर ईश्वर ये सन्देश दे रहा लोगों को “पत्थरों में नहीं सच्चे हृदय में मेरा निवास है” मानवता की सेवा निरीहों की सेवा ही सच्चा धर्म है। आज जो लोग दिख रहे इन माध्यमों में ( डॉ, नर्स, सफाईकर्मी आदि ) उनके ही रूप में भगवान नज़र आएँगे ,बस ज़रूरत है अन्तर्रात्मा को जगा कर देखिए । कोरोना का संकट भी हमें प्रकृति ने एक सूत्र में जोड़कर रखने के लिए दिए हैं देखिए स्पष्ट है।सभी लोग इसकी ख़ुराक बन रहे कोई अमीर,गरीब, बड़ा छोटा नहीं ।जन्म के अनुसार इंसानों ने कार्यों का बंटवारा किया, प्रकृति सबको एक क़तार में ले आयी ।आज सभी अपने कार्य स्वयं कर रहे।सबकी ज़रूरत एक है भोजन , आज विश्व इसी के लिए चिंतित है ।प्रकृति सभी को एक जगह लाकर खड़ा कर दी है।मनुष्य की मंशा को प्रकृति ने भी अपनी हामी भर दीमनुष्य ही मनुष्य का शत्रु होने लगा , यहाँ प्रकृति ने भी क्या सजा सुनाई है तत्काल परिस्थिति यही है मनुष्य की नज़दीकी से उसके छूने से मनुष्य की मौत होगी ।ये आपदा प्रकृति प्रदत्त है तो भी चेतावनी है मानव जाति को उसकी भागती रफ़्तार और वसुधा में फैलते जाने वाली बेलगाम मानव बेल को रोक लगाने की क्योंकि प्रकृति सिर्फ़ मानव की नहीं समस्त जीवों की भी उतनी ही है जितनी मानव की ।प्रकृति का न्याय देखिए आज समस्त मानव जाति घरों में दुबकने के लिए मजबूर है और अन्य जीवन सड़कों पर बेख़ौफ़ हैं ।यदि ये आपदा मानवकृत है तो भी चेतावनी है विश्व को भविष्य के लिए, अन्यथा विनाश तो निश्चित है क्योंकि जो ” उत्पन्न है वो अमर नहीं “रजनी मल्होत्रा नैय्यरबोकारो थर्मल झारखंडलेखक परिचय रजनी मल्होत्रा (नैय्यर) बोकारो थर्मल (झारखण्ड) शिक्षा – झारखण्ड एवं उ .प्र में. इतिहास (प्रतिष्ठा) से बी.ए.संगणक विज्ञान में बी .सी. ए. एवं हिंदी से बी.एड . राँची इग्नोऊ से हिंदी में स्नातकोत्तर | इतिहास में स्नातकोत्तर | हिंदी में पी.एच. डी. भाषा लेखन —हिंदी, पंजाबी, उर्दू लेखन- गीत, ग़ज़ल, कहानियां, कविताएँ. सम्प्रति ( संगणक विज्ञान की शिक्षिका) कविता संग्रह “स्वप्न मरते नहीं “ ग़ज़ल संग्रह – “चाँदनी रात ” साझा काव्य संग्रह ” ह्रदय तारों का स्पन्दन ” ,” पगडंडियाँ ” व् मृगतृष्णा नूर-ए-ग़ज़ल ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लें प्रकाशित । प्रकाशन की प्रतीक्षा में — कहानी संग्रह – “वो बुरी औरत” व् दूसरी कविता संग्रह –“शोहदों का सफ़र”

राम भक्तों के लिए

Star of Jharkhand – Indu Sharma

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इंदु शर्मा झारखण्ड की प्रसिद्ध कलाकार है इन्होने झारखण्ड के अलावा भारत के सभी राज्यों में अब तक हज़ारो स्टेज शोज किया है | ये धनबाद की रहनेवाली है , झारखण्ड वीकली की टीम काफी समय से इनसे इंटरव्यू लेने का प्रयास कर रही पर इनके व्यस्त कार्यकर्मो की वजह से हमसे बात नहीं हो पाई , पिछले हफ्ते हमारी इनसे मुलाकात हुई |
झारखण्ड वीकली – इंदु जी झारखण्ड वीकली से बात करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद सबसे पहले आप हमारे रीडर्स को अपने बारे में बताइये आप कहा की रहनेवाली है और संगीत के क्षेत्र में कैसे और कितने सालों से हैं आप |
इंदु शर्मा – बहुत बहुत धन्यवाद सबसे पहले मैं धनबाद शहर से हु और संगीत की दुनिआ में १५ सालों से हु , बचपन से ही संगीत का शौक था |
झारखण्ड वीकली – आप झारखण्ड के आलावा कहा कहा पर स्टेज शोज किया है और किन किन बॉलीवुड सिंगर्स के साथ आपने काम किया है
इंदु शर्मा – झारखण्ड, बंगाल , और करीब इंडिया के हर स्टेट में स्टेज शोज कर चुकी हु , बॉलीवुड सिंगर मोहम्मद अज़ीज़ , शब्बीर कुमार , विनोद राठोड , अर्जुन कानूनगो , उषा उथुप के साथ स्टेज शोज कर चुके हैं
झारखण्ड वीकली – आप कब से स्टेज शोज कर रही है और अब तक आपने कितने स्टेज शोज कर लिया है
इंदु शर्मा – मैं २००४ से स्टेज शोज कर रही हु और अब तक हज़ारों शोज कर चुकी हु |
झारखण्ड वीकली – स्टेज शोज के आलावा आपने कितने एलबम्स में काम किया है आने वाले आप एलबम्स कौन कौन से हैं |
इंदु शर्मा – मेरे कुछ अनप्लग्ड वीडियोस यूट्यूब चॅनेल पर इंदु शर्मा धनबाद पर उप्लोडेड है आप उन्हें देख सकते हैं इनमे से एक बहुत ही पॉपुलर वाला है सजना है मुझे सजना के लिए |
झारखण्ड वीकली – आप अपना आइडल किसे मानती है
इंदु शर्मा – मेरे आइडल लता मंगेशकर जी हैं |
झारखण्ड वीकली – संगीत के अलावा आपके क्या क्या होब्बीएस है
इंदु शर्मा – संगीत के अलावा मेरी हॉबी कुकिंग है |
झारखण्ड वीकली – प्लेबैक में आने का क्या प्रोग्राम है क्या आपको आने वाले समय में बॉलीवुड के किसी सांग्स में हम सुन सकेंगे |
इंदु शर्मा – अभी तक वैसा कुछ तो नहीं हुआ है मगर कोशिश कर रही हु |
झारखण्ड वीकली – नए कलाकारों को कोई सन्देश देना चाहेंगी आप
इंदु शर्मा – म्यूजिक बहुत साधना की चीज़ है म्यूजिक सीखना चाहिए जब तक आप गा रहे है तब तक रिचार्ज करें और सीखें

राम भक्तों के लिए

समय होता बलवान – दिल को छु जाने वाली हकीकत

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रमेश चंद्र शर्मा, जो उत्तर प्रदेश के ‘गोरखपुर’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे, उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया जो #पाठकों की आँखें भी खोल सकता है और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से भी बचा सकता है।
रमेश चंद्र शर्मा का उत्तर प्रदेश के ‘गोरखपुर” नामक शहर में एक #मेडिकल स्टोर था जो कि अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था। लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।
रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि #मेडिकल_फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।
शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।
वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक #बूढ़ा_व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। लेकिन बूढ़ा सोच रहा था। उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।
बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह #वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”
लेकिन मैंने उस समय उस #बूढ़े_व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।
फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।
समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।
2015 में मुझे भी #लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमत को जानता हूं।
एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।
मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन #वैध_तरीके_से_कमाएं_ईमानदारी_से_कमाएं । गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं है, क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।
पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है..#बेईमानी का पैसा पेट की एक-एक आंत फाड़कर निकलता है.. !!
यदि आपके समझ में आ गई हो तो #लाइक_व_शेयर #एक_जाति_धर्म

राम भक्तों के लिए

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इंदौर की डॉक्टर रईसा अंसारी, सड़क पर बेचती है फल

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इंदौर – ठेले पर आम बेचती इंदौर की डॉक्टर रईसा अंसारी हमारी व्यवस्था का वो सच हैं जिसे जानते तो सब हैं लेकिन जिस पर बात कोई नहीं करना चाहता. फ़िज़िक्स में पीएचडी इस महिला पर आज सबको तरस आ रहा है. लेकिन मुझे उन पर तरस नहीं आ रहा, बल्कि गर्व हो रहा है. क्योंकि मैं जानता हूं रईसा को फल बेचते हुए शर्म नहीं आ रही है और ना ही उन्हें ये काम छोटा लग रहा है. बल्कि शर्म उस समाज और व्यवस्था को आनी चाहिए जो डॉ. रईसा अंसारी जैसी प्रतिभा को सड़क पर ला देता है.इंदौर की देवी अहल्या बाई यूनीवर्सिटी से फ़िज़िक्स में मास्टर और पीएचडी रईसा को बेल्जियम से रिसर्च करने का ऑफ़र मिला था. लेकिन उनके रिसर्च हेड ने उनके रिकमेंडेशन लेटर पर हस्ताक्षर नहीं करे. थीसिस सबमिट होने के दो साल बाद तक उनका वाइवा नहीं किया गया और फिर प्रशासनिक दख़ल के बाद उनका वाइवा हो सका.रईसा ने सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ़ साइंटीफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) की फेलोशिप पर कोलकाता के आईआईएसईआर (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च) से रिसर्च की है. एक दस्तख़त की वजह से रईसा शोध करने के लिए बेल्जियम नहीं जा सकीं. 2011 में पीएचडी करने वाली रईसा को एक बार जूनियर रिसर्च के लिए अवार्ड मिला था. मीडिया उनका साक्षात्कार लेने उनके पास पहुंची. उनके गाइड का नाम पूछा लेकिन गाइड सामने नहीं आना चाह रहे थे. रईसा ने किसी और का नाम ले दिया. यही बात गाइड को चुभ गई. फिर आगे की कहानी आप जान ही चुके हैं.रईसा को एसोसिएट प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. वो अब फल बेच रही हैं. एक पढ़ी लिखी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाली महिला को फल बेचते हुए देखकर बहुत से लोगों को अफ़सोस हो रहा है. मुझे भी कहीं न कहीं अफ़सोस हो रहा है. लेकिन इस बात का फ़क्र भी है कि एक महिला ने अपने सम्मान से समझौता नहीं किया.रईसा जैसी महिलाएं हार नहीं मानती हैं. वो मुश्किल चुनौतियों को अवसर में बदल देती हैं. रईसा को मौका मिलेगा और वो अपना मुकाम हासिल कर लेंगी. उनके रिकमेंडेशन लेटर पर साइन न करने वाला उनका गाइड कहीं न कहीं मन-मन में कुढ़ रहा होगा. सबकुछ होते हुए भी उसके पास कुछ नहीं होगा.

राम भक्तों के लिए
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