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Saturday, July 4, 2026
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दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ है रजरप्पा मंदिर

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झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर आस्था की धरोहर है। असम के कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है।रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मंदिर के लिए ही विख्यात नहीं है। छिन्नमस्तिके मंदिर के अलावा यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल 7 मंदिर हैं। पश्चिम दिशा से दामोदर तथा दक्षिण दिशा से कल-कल करती भैरवी नदी का दामोदर में मिलना मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है।दामोदर और भैरवी के संगम स्थल के समीप ही मां छिन्नमस्तिके का मंदिर स्थित है। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है।मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। किसी के अनुसार मंदिर का निर्माण 6,000 वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है। यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।असम स्थित मां कामाख्या मंदिर को सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। मंदिर में बड़े पैमाने पर विवाह भी संपन्न कराए जाते हैं।मंदिर में प्रातःकाल 3 बजे माता का दरबार सजना शुरू होता है। भक्तों की भीड़ भी सुबह से पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है, खासकर शादी-विवाह, मुंडन-उपनयन के लगन और दशहरे के मौके पर भक्तों की 3-4 किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती है। इस भीड़ को संभालने और माता के दर्शन को सुलभ बनाने के लिए कुछ माह पूर्व पर्यटन विभाग द्वारा गाइडों की नियुक्ति की गई है। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पुलिस भी मदद करती है।मंदिर के आसपास ही फल-फूल, प्रसाद की कई छोटी-छोटी दुकानें हैं। आमतौर पर लोग यहां सुबह आते हैं और दिनभर पूजा-पाठ और मंदिरों के दर्शन करने के बाद शाम होने से पूर्व ही लौट जाते हैं। ठहरने की अच्छी सुविधा यहां अभी उपलब्ध नहीं हो पाई है।मां छिन्नमस्तिके मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की 3 आंखें हैं। बायां पांव आगे की ओर बढ़ाए हुए वे कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केश, जिह्वा बाहर, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं। दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है। इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हें वे रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। इनके गले से रक्त की 3 धाराएं बह रही हैं।मंदिर का मुख्य द्वार पूरबमुखी है। मंदिर के सामने बलि का स्थान है। बलि स्थान पर प्रतिदिन औसतन 100-200 बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। मंदिर की ओर मुंडन कुंड है। इसके दक्षिण में एक सुंदर निकेतन है जिसके पूर्व में भैरवी नदी के तट पर खुले आसमान के नीचे एक बरामदा है। इसके पश्चिम भाग में भंडारगृह है।रुद्र भैरव मंदिर के नजदीक एक कुंड है। मंदिर की भित्ति 18 फुट नीचे से खड़ी की गई है। नदियों के संगम के मध्य में एक अद्भुत पापनाशिनी कुंड है, जो रोगग्रस्त भक्तों को रोगमुक्त कर उनमें नवजीवन का संचार करता है।यहां मुंडन कुंड, चेताल के समीप ईशान कोण का यज्ञ कुंड, वायु कोण कुंड, अग्निकोण कुंड जैसे कई कुंड हैं। दामोदर के द्वार पर एक सीढ़ी है। इसका निर्माण 22 मई 1972 को संपन्न हुआ था। इसे तांत्रिक घाट कहा जाता है, जो 20 फुट चौड़ा तथा 208 फुट लंबा है। यहां से भक्त दामोदर में स्नान कर मंदिर में जा सकते हैं।दामोदर और भैरवी नदी का संगम स्थल भी अत्यंत मनोहारी है। भैरवी नदी स्त्री नदी मानी जाती है जबकि दामोदर पुरुष। संगम स्थल पर भैरवी नदी ऊपर से नीचे की ओर दामोदर नदी के ऊपर गिरती है। कहा जाता है कि जहां भैरवी नदी दामोदर में गिरकर मिलती है उस स्थल की गहराई अब तक किसी को पता नहीं है।⬛मां छिन्नमस्तिके की महिमा की पौराणिक कथाएंमां छिन्नमस्तिके की महिमा की कई पुरानी कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीनकाल में छोटा नागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया।एक कथा के अनुसार एक बार पूर्णिमा की रात में शिकार की खोज में राजा दामोदर और भैरवी नदी के संगम स्थल पर पहुंचे। रात्रि विश्राम के दौरान राजा ने स्वप्न में लाल वस्त्र धारण किए तेज मुख मंडल वाली एक कन्या देखी।उसने राजा से कहा- हे राजन, इस आयु में संतान न होने से तेरा जीवन सूना लग रहा है। मेरी आज्ञा मानोगे तो रानी की गोद भर जाएगी।राजा की आंखें खुलीं तो वे इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उनकी आंखें स्वप्न में दिखी कन्या से जा मिलीं। वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई। उसका रूप अलौकिक था। यह देख राजा भयभीत हो उठे।राजा को देखकर देख वह कन्या कहने लगी- हे राजन, मैं छिन्नमस्तिके देवी हूं। कलियुग के मनुष्य मुझे नहीं जान सके हैं जबकि मैं इस वन में प्राचीनकाल से गुप्त रूप से निवास कर रही हूं। मैं तुम्हें वरदान देती हूं कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।देवी बोली- हे राजन, मिलन स्थल के समीप तुम्हें मेरा एक मंदिर दिखाई देगा। इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी। तुम सुबह मेरी पूजा कर बलि चढ़ाओ। ऐसा कहकर छिन्नमस्तिके अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया।एक अन्य कथा के अनुसार एक बार भगवती भवानी अपनी सहेलियों जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान करने के बाद भूख से उनका शरीर काला पड़ गया। सहेलियों ने भी भोजन मांगा। देवी ने उनसे कुछ प्रतीक्षा करने को कहा।बाद में सहेलियों के विनम्र आग्रह पर उन्होंने दोनों की भूख मिटाने के लिए अपना सिर काट लिया। कटा सिर देवी के हाथों में आ गिरा व गले से 3 धाराएं निकलीं। वह 2 धाराओं को अपनी सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं। तभी से ये छिन्नमस्तिके कही जाने लगीं।रजरप्पा के स्वरूप में अब बहुत परिवर्तन आ चुका है। तीर्थस्थल के अलावा यह पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो चुका है। आदिवासियों के लिए यह त्रिवेणी है। मकर संक्रांति के मौके पर लाखों श्रद्धालु आदिवासी और भक्तजन यहां स्नान व चौडाल प्रवाहित करने तथा चरण स्पर्श के लिए आते हैं। अब यह पर्यटन स्थल का मुख्य केंद्र है।⬛कैसे पहुंचें?झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके मंदिर के निकट ठहरने के लिए उत्तम व्यवस्था है। मंदिर तक जाने के लिए पक्की सड़क है। यह पर्यटन स्थल का मुख्य केंद्र है। सुबह से शाम तक मंदिर पहुंचने के लिए बस, टैक्सियां एवं ट्रैकर उपलब्ध हैं।

राम भक्तों के लिए

बिहार विभूति दानवीर सर गणेश दत्त

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पटना – दानवीर सर गणेश दत्त ने बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद (1912) बिहार के नवनिर्माण में सर्वाधिक अग्रणी भूमिका निभाई । एक जमींदार परिवार में पैदा होकर शुरूआती दौर में उनका पढाई से वास्ता नहीं था । किन्तु ससुराल में घटित एक घटना के बाद बड़ी उम्र में जब उन्होंने पढ़ना शुरू किया तो कलकत्ता यूनिवर्सिटी से न केवल बीए, बीएल किया अपितु कलकत्ता हाईकोर्ट और पटना हाईकोर्ट के नामी एडवोकेट भी बने । अंग्रेजों ने जब भारतीयों के लिए सदन प्रवेश के लिए व्यवस्था की तो सर गणेश दत्त 1922 में बिहार विधान परिषद् में आए और 1923-36 तक बिहार -उड़ीसा के एवं 1936 में उड़ीसा के अलग होने के बाद एक वर्ष बिहार – झारखंड के स्वायत्त शासन एवं अन्य विभागों के मंत्री रहे । उस सरकार के मुखिया गवर्नर होते थे और उनके साथ मिनिस्टर काउंसिल में चार सदस्य होते थे । बाकि मंत्री बदलते रहे लेकिन सर गणेश दत्त लगातार मंत्री परिषद में बने रहे । कई बार तो वे मंत्री मंडल में एकमात्र मंत्री के रूप में रहे । मंत्री रहने के दौरान उन्होंने बिहार के विकास के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया । पटना विश्वविद्यालय के निर्माण से लेकर विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी । पीएमसीएच, आयुर्वेद काॅलेज, तिब्बती कॉलेज, राँची सैनिटोरियम समेत अनेक संस्थाओं में उनकी गौरव गाथा झलकती है ।उस समय मंत्री का वेतन चार हजार महीना था । अपने खर्च के लिए एक हजार रखकर प्रति माह तीन हजार 14 वर्षों तक दान देकर उन्होंने एक बड़ी राशि का कोष बनाया जिससे गरीब एवं मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती थी….उससे सभी जाति के मेधावी छात्रों ने बिहार का नाम रौशन किया जिसमें प्रख्यात नेत्र रोग विशेषज्ञ डाक्टर दुखन राम, प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ लाला सुरजनंदन प्रसाद जैसे लोग भी थे । दानवीरता में सर गणेश दत्त दधिची, कर्ण, शिवि की परम्परा के व्यक्ति धे ।अपनी कमाई ही नहीं सम्पत्ति को बेचकर भी उन्होंने समाज और देश की सेवा किया । शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने कई कालेजों, विद्यालयों की स्थापना की ही, BHU की स्थापना के लिए महामना मदन मोहन मालवीय जी को अपनी जमीन बेचकर 50 हजार रुपये दिया ।महात्मा गाँधी जब स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए मदद माँगने आए तो परिवार का सारा गहना दान में दे दिया ।बड़े शौक से बनवाया गंगा किनारे का अपना शानदार मकान कृष्ण कुंज भी मरने के पहले पटना विश्वविद्यालय को दान कर दिया जिसमें पटना विश्वविद्यालय का मनोविज्ञान विभाग चलता है । इससे उनके दोनों पुत्र बहुत नाराज हुए क्योंकि दोनों की स्वाभाविक नजर उस मकान पर थी ।आदर्शवाद की चरम पराकाष्ठा थे सर गणेश दत्त सिंह । उनके पुत्र का नाम हाईकोर्ट जज के लिए गया । उन्होंने गवर्नर को दृढ़ता से मना कर दिया कि इससे मेरे लिए पक्षपात माना जाएगा । उनके मृत्यु के उपरांत ही उनके लड़के जज बने । अपनी पोती की शादी में अपने कोष से अपने पुत्र को 20 हजार रुपये हैंडनोट लिखवाकर कर्ज दिया और समय से नहीं लौटाने पर नालिश के लिए वकालतन नोटिस भेजा जिससे पिता – पुत्र का सम्बन्ध खराब हो गया । आज चौतरफा गिरावट के युग में यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि ऐसा महामानव अपने समाज में पैदा हुए थे ।मैंने सर गणेश दत्त सेवा संस्थान के बैनर तले वर्षों तक उनकी जयंती और पुण्य तिथि पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हाल से लेकर रविन्द्र भवन, नृत्य कला मंदिर, आईएमए हाल में मनाया । बिहार के कई गवर्नर (ए. आर. किदवई, सुंदर सिंह भंडारी, विनोद चंद्र पांडेय), नीतीश कुमार, कैलाश पति मिश्र, यशवंत सिन्हा, सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव, समाजवादी नेता कपिलदेव सिंह कार्यक्रम में आते रहे । 2003 में तो पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने डाक टिकट ही श्री कृष्ण मेमोरियल हाल में जारी किया था । मेरे सतत प्रयास से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी जयंती सरकारी समारोह के रूप में मनाने का निर्णय लिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं ।हमारे लोगों को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम सर गणेश दत्त की महान परंपरा के वारिस हैं ।जब हम किसी अपराधी, वंशवादी या सत्ता के दलाल का महिमा मंडन करते हैं तो हमारे पुरखों की आत्मा स्वर्ग में कराहती होगी । बिहार के निर्माण की जो आधारशिला सर गणेश दत्त सिंह ने रखी, जिसको डाक्टर श्री कृष्ण सिंह ने ठोस स्वरूप प्रदान किया वह अभी भी अधुरी है ।इस विकाष यात्रा को जारी रखने की जिम्मेदारी सर्वाधिक हमारे उपर है ।

राम भक्तों के लिए

हज़ारों किलोमीटर साइकल का सफर, पर्यावरण के प्रति सजग झारखण्ड के शारिक अहमद खान

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शारिक अहमद खान मूलतः रांची झारखण्ड के रहनेवाले है इन्होने नई दिल्ली के जामिआ मिलिया इस्लामिआ से मेकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद देश, विदेश में कई जगह नौकरी की और आजकल नई दिल्ली के जामिआ नगर में रहते हैं, इनकी खास बात ये है की ये स्वयं साईकिल की सवारी करते है लोगों को सेहत, वातावरण और प्रदूषण के प्रति सजग रहने के लिए प्रेरित करते है | अब तक ये हज़ारो किलोमीटर साइकल से सवारी कर चुके हैं और आगे भी कई स्थान घूमने जाने का कार्यक्रम है, आईये पढ़ते है इनकी कलम से इन्ही की कहानी |एक मित्र से प्रभावित हो कर मैंने २०१४ में साइकिल खरीदी और चलाना शुरु किया। सोचा सेहत के लिए भी काफी लाभदायक रहेगा।  साइकिल चलने का शौक तो बचपन से रहा है।   उम्र के साथ और व्यस्त होने की वजह से वह शौक जाता रहा।   लेकिन जब  दुबारा साइकिल चलाना शुरू किया तो शुरू में ५-१० किलो मीटर चालता था।  लेकिन जब मैंने फेसबुक पे अपने एक मित्र को साइकिलिंग ग्रुप क साथ देखा तो मैंने उससे संपर्क किया और एक ग्रुप के साथ जुड़ गया।   उसके बाद मुझे एहसास हुआ के ग्रुप में साइकिल चलाने  के  बहुत फायदे हैं।  आप हंसी मज़ाक करते हुए काफी लम्बी दुरी आसानी के साथ तय केर लेते हैं। ग्रुप में साइकिलिंग करते करते ५०-१०० किलो मीटर भी बड़ी आसानी से हो जाया करता था। मैंने सबसे लम्बी साइकिलिंग दिल्ली से आगरा की करि थी , जो करीब २२५ किलो मीटर की थी , अभी तक हज़ारों किलो मीटर की साइकिलिंग कर  चूका हूँ।  अमेरिका में भी मुझे साइकिलिंग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।   २०१८ मैं मैंने सेहत के लिए रनिंग भी शुरू कर दी। करीब ५ महीने अभ्यास करने के बाद पहली बार दिसंबर में हाफ मैराथन में भाग लिया। जो की २१ किलो मीटर की दौड़ थी।  उसको मैंने करीब ३ घंटे में तय किया। उसके बाद लगातार अभ्यास करता रहा और पिछले एक साल में ६ बार १० किलो मीटर की रेस में भाग लिया।   अभी अक्टूबर २०१९ मैं एयरटेल दिल्ली हाफ मैराथन में १० किलो मीटर की दौड़ को लगभग एक घंटे और दो मिनट में समाप्त किया। प्रयास यह  है के १० किलो मीटर को एक घंटे से कम समय में समाप्त करूँ। और फुल मैराथन मैं भाग लूँ और तय समय से पहले उसको समाप्त करूँ।   और मेरी इच्छा यह है के साइकिल से दिल्ली से लेह लद्दाख का सफर तय करूँ ।

राम भक्तों के लिए

झारखण्ड में कांग्रेस की नई पीढ़ी का चेहरा

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बोकारो – झारखंड काँग्रेस मे जाना माना नाम है श्वेता सिंह का , बोकारो की रहने वाली श्वेता सिंह मेरठ विश्वविद्यालय से इकोनॉमिक्स में ग्रैजुएट हैं। श्वेता सिंह का पालन पोषण राजनीतिक परिवेष में हुआ है और बचपन से ही उन्होंने अपने माता पिता और चाचा को समाज के प्रति हमेशा से ही अग्रसर पाया और फिर उनकी शादी भी राजनीतिक परिवार में हुई। नित्य जीविका के दौरान जब वो लोगों से बाबु जी से मिलते देखती थी तो उन लोगों आंखों में हमारे( श्वेता और उनके पति) के प्रति उम्मीद और विश्वास देखती थी। उसी पल उन्हें एहसास हुआ कि उनका भी इनके प्रति दायित्व है।एक बेटी जिसने राजघराने की चमक दमक भी देखी लेकिन एक आम लड़की की तरह पली बढ़ी। एक बहू जो राजनीतिक उठा पटक की गवाह बनी और जनता के दुख दर्द की सहभागी बनी। झारखण्ड में राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी की समस्या ने श्वेता को अंदर से झकझोर दिया था। भूख से होती मौतें, बेसुध सरकार, लचर प्रशासनिक व्यवस्था से त्रस्त झारखण्ड की तस्वीर हर पल श्वेता को विचलित करती थी। राजनीति में महिलाओं के लिए राह आसान नहीं, फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी, वो अपने स्तर पर लोगों के बीच जाकर उनका दुख दर्द बांटने लगीं। परिवार और पति का साथ मिला तो श्वेता ने सबसे पहले 2013 में एक एनजीओ ब्रह्मा सर्विस के जरिए जनसेवा का कार्य शुरू किया, बोकारो की महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की समस्यों को सुनतीं औऱ उन्हें हर हाल में हल करने की कोशिश ने ही श्वेता को एक अलग पहचान दी। जन-जन की जुबां पर उऩके द्वारा किए सामाजिक कार्यों की चर्चा थी और साथ ही बोकारो की जनता ये भी मांग करने लगी कि उन्हें सक्रिय राजनीति में अब आ जाना चाहिए।बोकारो को एक युवा नेतृत्व चाहिए था, घिसी पिटी राजनीति से जनता परेशान थी, जनता की मांग पर श्वेता ने सक्रिय राजनीति शुरू की, कांग्रेस पार्टी का साथ मिला औऱ श्वेता ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। झारखण्ड की राजनीति में महिलओं को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती लेकिन श्वेता की ईमानदार नेतृत्व औऱ युवा सोच ने इस विचारधारा को बदल कर रख दिया। तत्कालीन भाजपा सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ श्वेता ने मोर्चा खोला, जनता को हो रहे नुकसान की आवाज राजधानी रांची तक पहुंचाई, पुलिस के डंडे और जेल की सलाखें भी श्वेता के आत्मिविश्वास को तोड़ नहीं सकी। हर मोर्चे पर श्वेता ने जनता की आवाज को बुलंदी से रखा। श्वेता के राजनीतिक करियर में युवा काँग्रेस की बहुत ही अहम भूमिका रही है। बोकारो के विकास के लिए, जनता की आवाज बनीं। निस्वार्थ भाव से जनसेवा से उन्हें जनता का आशीर्वाद मिलने लगा, युवाओं के लिए वो रोल मॉडल बन गईं। गरीबों के हक के लिए लड़ना, बच्चों को बेहतर सुविधाएं दिलवाना, महिलाओं सशक्तीकरण के लिए कई नए प्रोजेक्ट्स शुरू करना- बोकारो की जनता श्वेता सिंह को इन्हीं कामों के लिए जानती है।श्वेता चाहतीं तो एक आम और आराम की जिंदगी चुन सकती थीं लेकिन श्वेता ने फैसला किया कि वो महिलाओं को सशक्त बनाएंगी, गरीबों के हक के लिए लड़ेंगी। आज श्वेता झारखण्ड में कांग्रेस की नई पीढ़ी का चेहरा हैं जो झारखण्ड की एक नई छवि बनाने में अपना अहम योगदान दे रही हैं। आज श्वेता नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है, उनके लिए श्वेता दीदी हैं जो हमेशा उनका ख्याल रखती हैं। बोकारो में कई ऐसे परिवार हैं जिन्हें श्वेता की मदद से नई जिंदगी मिली है, श्वेता कहती हैं कि चुनाव तो आते जाते रहते हैं लेकिन बोकारो वासियों से जो उनका रिश्ता है वही उनकी अमानत है। है। श्वेता के नेतृत्व में हजारों युवाओं की टीम है जो बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी राजनीतिक दाव-पेंच के जनता की सेवा में जुटी है। झारखण्ड की राजनीति में श्वेता जैसा नेतृत्व बेहद जरूरी है, झारखण्ड को प्रगतिशील नेतृत्व की बेहद जरूरत | आज श्वेता झारखण्ड में कांग्रेस की नई पीढ़ी का चेहरा हैं जो झारखण्ड की एक नई छवि बनाने में अपना अहम योगदान दे रही हैं।

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विकास के नाम पर लोगों को ठगते आई है बीजेपी – अम्बा प्रसाद

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हज़ारीबाग़ – आज बड़कागांव की विधायक अम्बा प्रसाद ने बीजेपी पर बड़ा प्रहार करते हुए कहा “हजारीबाग शहर में उप विकास आयुक्त के आवास के बगल में सरकारी पैसों के साथ साथ विभिन्न विधायक निधि का इस्तेमाल कर सिम्प्सन पार्क का निर्माण कराया गया है। इस निर्माण में विधायक निधि के उपयोग से संबंधित नियमों का पालन नहीं किया गया है। ग्रामीण विकास के विभागीय पत्रांक 1212 दिनांक 01.02.1999 द्वारा जारी आदेशानुसार विधायक निधि का प्रयोग विधायक की अनुशंसा पर संबंधित विधायक के विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत ही किया जा सकता है। परंतु इस पार्क के निर्माण में इस दिशा निर्देश को दरकिनार करते हुए अपने विधान सभा क्षेत्र के बाहर इस पार्क के लिए विधायक निधि का प्रयोग किया गया है। यदि भारतीय जनता पार्टी के विधायकों को अपने क्षेत्र के बाहर पार्क बनाने की इतनी आवश्यकता थी तो उन्हें अपने वेतन से जनता की भलाई के लिए पैसे खर्च करना चाहिए था।भारतीय जनता पार्टी के विधायक अपने आप को नियमों के ऊपर मानते हैं। जो पैसे नियमानुसार उनको अपने क्षेत्र के अंतर्गत पिछड़े ग्रामीण इलाकों में खर्च करने चाहिए थे, उन्होंने वो राशि का दुरुपयोग करते हुए पार्क बनाने में खर्च कर दी।भारतीय जनता पार्टी के नेता विकास के नाम पर लोगों को ठगते आ रहे हैं। कोरोना महामारी में भी पीएम केयर्स फंड बनाकर उसको सरकारी ऑडिट से बाहर रख दिया गया ताकि उसके खर्च के बारे में पूछताछ ना की जा सके।परंतु लोग प्रश्न करने लगे हैं। इस पार्क के निर्माण में भी जनता प्रश्न पूछ रही है की उनके लिए खर्च होने वाली राशि किसी और क्षेत्र के लिए क्यों दे दी गई, और किस आधार पर कानून की अनदेखी की गई ? इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिए।जहां तक इस पार्क के विकास का प्रश्न है तो इस संबंध में मैं इसके रखरखाव के लिए अपने वेतन से 1 लाख का दान देने की घोषणा करती हूं ।

राम भक्तों के लिए

झारखण्ड का २० साल का दिव्यांग, राजनीति के सोशल मीडिया का है चैम्पियन

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रांची – चंदनकियारी विधानसभा के एक देहात गाव से उभरता हुआ सितारा झारखंड राजनीती के सोशल मीडिया में एक जाना माना नाम है निलकमल रजवार, सोशल मीडिया में बहुत ही एक्टिव रहते है और अपनी पार्टी के लिए सोशल मीडिया रणनीति तैयार करते हैं ।आईये जानते हैं हम इनके बारे में इन्ही की जुबार्नी , मेरा नाम नाम निलकमल रजवार,गांव कुमारदागा,थाना पिंड्राजोरो प्रखंड – चास,जिला- बोकारो चंदनकियारी विधानसभा (झारखंड) पढ़ाई 10 पास तक की है मैं शारीरिक रूल से विकलांग हूँ,कुछ तकलीफ के वजह से से पढ़ाई छोड़नी पड़ी सोशल मीडिया से जुड़े 2015 में, मेरी जब से राजनीति को सोचने और समझने की ज्ञान हुई तब से राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री आदरणीय बाबूलाल मरांडी जी द्वारा की गए कार्य गांव देहात में उनकी चर्चा हमेशा होती रहती थी,लोग उनकी सोच की तारीफ करते थे,जिसे हम अक्सर सुनते थे ओर सोचते थे कि हम भी जब राजनीति में कदम रखेंगे,कम उम्र होंने की वजह से राजनीति में कदम रख नही पाए,मगर मेरी सोच थी कि जब भी कोई पार्टी जॉइन करेंगे तो वो आदरणीय बाबूलाल जी की पार्टी जॉइन करेगे ओर बाबूलाल जी के साथ एक अच्छे ओर खुशहाल झारखंड बनाने में हम भी सर का साथ दे कर उनके आवाज़ बुलन्द करेंगे,और हमने अपना प्रयास सोशल मीडिया के माध्यम से शुरू किया, सोशल मीडिया में अपनी प्रयत्न जारी रखने लगे धीरे धीरे पार्टी के तमाम लोगों से सोशल मीडिया के द्वारा जुड़ने लगे ओर आखिर टाइम आ गया उस वक़्त की जो मुझे बेसब्री से इंतज़ार था वो पल 2016 में में रांची जेवीएम ऑफिस में आदरणीय बाबुलाल मरांडी सर से मुलाकात हुई,और मेरे आत्मविश्वास को और अधिक बल मिला,वहीं से मेरी सोशल मीडिया में एक नई पहचान मिली,इसी क्रम में बाबुलाल मरांडी सर लगातार हमारे हौसला बढ़ाते रहे उसके बाद हमें बोकारो जिला कमेटी द्वारा पार्टी के सोशल मीडिया प्रभारी बनाया गया, भले ही हम पढ़ाई छोड़ चुके हैं फिर भी हमारा शौक पढ़ना है चाहे वह न्यूज़ पेपर हो, न्यूज़ हो, नॉवेल हो, जी के बुक हो या किसी भी अच्छे लेखक द्वारा लिखी गई ज्ञानवर्धक किताब हो। मैं हमेशा कहानी की किताबें, समाचार पत्र, पत्रिकाएं, और किसी भी अन्य सामग्री को पढ़ता हूं जो मुझे अपने खाली समय में दिलचस्प लगता है। मेरी किताबों को पढ़ने का यह शौक पहली बार मेरे पिता ने देखा था और उन्होंने मुझे यह कहकर प्रेरित किया कि यह मेरे बेटे को स्वाभाविक रूप से दी जाने वाली एक बहुत अच्छी आदत है, इस आदत को कभी दूर न करें और इसे अभ्यास में रखें। मैं सिर्फ एक छोटा लड़का था और मुझे अपने माता-पिता द्वारा दी गई परीओ की कहानियों और अन्य कहानियों को पढ़ने में बहुत दिलचस्पी थी। सोशल मीडिया के बारे में कहना चाहूंगा आज यह गर्व से कह सकता हूँ कि यह सोशल मीडिया-इन्टरनेट की ताकत ही है कि तमाम अनजाने लोगो से मेरी जान-पहचान हुई और उनके स्नेह ने मुझे दिनों दिन हौसला दिया। अब मेरी स्थिति सभी स्नेही जनों के आशीर्वाद से अच्छी है। में उन लोगों धन्यवाद जिन्होंने मेरा साथ दिया आज मैं फेसबुक के सभी मित्र आज मुझे अपने परिवार के ही लगते हैं। मेरा अनुभव तो यही है इस सोशल मीडिया अंतर्जाल के सन्दर्भ में ……मैं तो सोशल मीडिया पर बने रिश्तों-अपने मित्रों से बहुत लाभान्वित हुआ हूँ, दुखी भी हुआ हूँ, दुःख भी साझा किया है और संघर्ष भी किया है साथ-साथ। सोशल मीडिया आम जन हेतु अभिशाप तो कतई नहीं है मेरी नजर में, यह समाज के हाथों में एक हथियार है जिसके उपयोग की प्रवृत्ति से यह निश्चित किया जा सकता है कि अमुक मामले में यह अभिशाप साबित हुआ और अमुक में वरदान। सोशल मीडिया रूपी यह धारदार हथियार समाज के हाथों में है और इसका गलत प्रयोग करने वाले व्यक्ति,समूह की प्रवृत्ति का दोष सोशल मीडिया के मंच पर ही थोपना उचित नहीं है।सोशल मीडिया पर लोग अपनी बात धड़ल्ले और बेबाकी से लिख रहे हैं। अख़बारों के पत्रकारों-सम्पादकों और चिंतकों से ज्यादा लोकप्रिय चेहरे सोशल मीडिया पर सुर्खियां और टिप्पणियां बटोर रहे हैं। आज कल तक अनजान रहे चेहरों की लेखन के पीछे बड़े-बड़े चिंतक, लेखक, पत्रकार दौड़ लगा रहे है,उस लिखत की भर्त्सना या प्रशंसा कर रहे हैं और यही तो सोशल मीडिया की असली ताकत है।

राम भक्तों के लिए

रामगढ की श्वेता, भजन गायन में कर रही है झारखण्ड का नाम रोशन

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रामगढ – ज़िन्दगी गुलज़ार है, कब अपने सपनो के पंख लगाकर उड़ चली पता ही नहीं चला !!हम बात कर रहे हैं , रामगढ़ कैंट (झारखंड) की सुप्रसिद्ध गायिका श्वेता अग्रवाल की, जिनमे प्रसिद्ध भजनो को भक्तो के बीच बहुत ऊर्जा से रखने की अद्भुत प्रतिभा है, जिन्होंने अपनी गायकी से सिर्फ अपने राज्य की ही नहीं बल्कि पुरे भारत देश के लोगो के दिलो पे राज किया है। आइये हम उनकी जीवनी को कुछ शब्दों के माध्यम से रूबरू कराते हैं। श्वेता अग्रवाल का जन्म १९ जुलाई को रामगढ जिले में हुआ। उन्हें शुरू से ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने की बहुत रूचि थीं, जो बढ़ती उम्र के साथ उनका जूनून बन गया। वो बताती हैं की जब वह चौथी कक्षा में थीं तभी उनके स्कूल के एक शिक्षक ने उनकी गायकी को खूब सराहा, और उन्हें इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन दिया। फिर उन्होंने संगीत को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। अपने इस लक्ष्य को पाने की शुरुआत उन्होंने शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षण से की। वो दो साल कोलकाता से भी फ़िल्मी संगीत की शिक्षा ली, और रियलिटी शोज़ में भी अपने गायन को दर्शाया। इसमें उनके परिवार का भी पूर्ण सहयोग रहा। वो बताती हैं की आज उनकी इस ऊंचाई का मूल कारण सभी का प्यार और आशीर्वाद है। आज वो भजन-कीर्तन के क्षेत्र में भी अपना नाम बनाने में सफल हुई हैं।  उनके कई भजन यू-ट्यूब चैनल के माध्यम से सुनने को मिल जायेंगे जिनमे “तेरा बड़ा उपकार”, “अपना ले मेरे श्याम” भजन शामिल हैं।  अपने भजनो की भी रचना वो खुद ही करती आई हैं ,और उनका कहना है की संगीत ही उनके जीवन का आधार है।  जिससे उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। श्वेता अग्रवाल के शब्दों में : अपने लक्ष्य को पाने के लिए इतनी मेहनत करो की कामयाबी आपके कदम चूम ले !!  श्वेता के भजनो का आनंद आप उनके यूट्यूब चैनल पर ले सकते हैंhttps://www.youtube.com/watch?v=TXgASH-mRxk → अपना ले मेरे श्यामhttps://www.youtube.com/watch?v=MuPgqM3G4pA → तेरा बड़ा उपकारhttps://www.youtube.com/watch?v=CN2285pWMCA  → तेरे बिना ज़िन्दगी से

राम भक्तों के लिए
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