पटना – दानवीर सर गणेश दत्त ने बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद (1912) बिहार के नवनिर्माण में सर्वाधिक अग्रणी भूमिका निभाई । एक जमींदार परिवार में पैदा होकर शुरूआती दौर में उनका पढाई से वास्ता नहीं था । किन्तु ससुराल में घटित एक घटना के बाद बड़ी उम्र में जब उन्होंने पढ़ना शुरू किया तो कलकत्ता यूनिवर्सिटी से न केवल बीए, बीएल किया अपितु कलकत्ता हाईकोर्ट और पटना हाईकोर्ट के नामी एडवोकेट भी बने । अंग्रेजों ने जब भारतीयों के लिए सदन प्रवेश के लिए व्यवस्था की तो सर गणेश दत्त 1922 में बिहार विधान परिषद् में आए और 1923-36 तक बिहार -उड़ीसा के एवं 1936 में उड़ीसा के अलग होने के बाद एक वर्ष बिहार – झारखंड के स्वायत्त शासन एवं अन्य विभागों के मंत्री रहे । उस सरकार के मुखिया गवर्नर होते थे और उनके साथ मिनिस्टर काउंसिल में चार सदस्य होते थे । बाकि मंत्री बदलते रहे लेकिन सर गणेश दत्त लगातार मंत्री परिषद में बने रहे । कई बार तो वे मंत्री मंडल में एकमात्र मंत्री के रूप में रहे । मंत्री रहने के दौरान उन्होंने बिहार के विकास के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया । पटना विश्वविद्यालय के निर्माण से लेकर विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी । पीएमसीएच, आयुर्वेद काॅलेज, तिब्बती कॉलेज, राँची सैनिटोरियम समेत अनेक संस्थाओं में उनकी गौरव गाथा झलकती है ।उस समय मंत्री का वेतन चार हजार महीना था । अपने खर्च के लिए एक हजार रखकर प्रति माह तीन हजार 14 वर्षों तक दान देकर उन्होंने एक बड़ी राशि का कोष बनाया जिससे गरीब एवं मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती थी….उससे सभी जाति के मेधावी छात्रों ने बिहार का नाम रौशन किया जिसमें प्रख्यात नेत्र रोग विशेषज्ञ डाक्टर दुखन राम, प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ लाला सुरजनंदन प्रसाद जैसे लोग भी थे । दानवीरता में सर गणेश दत्त दधिची, कर्ण, शिवि की परम्परा के व्यक्ति धे ।अपनी कमाई ही नहीं सम्पत्ति को बेचकर भी उन्होंने समाज और देश की सेवा किया । शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने कई कालेजों, विद्यालयों की स्थापना की ही, BHU की स्थापना के लिए महामना मदन मोहन मालवीय जी को अपनी जमीन बेचकर 50 हजार रुपये दिया ।महात्मा गाँधी जब स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए मदद माँगने आए तो परिवार का सारा गहना दान में दे दिया ।बड़े शौक से बनवाया गंगा किनारे का अपना शानदार मकान कृष्ण कुंज भी मरने के पहले पटना विश्वविद्यालय को दान कर दिया जिसमें पटना विश्वविद्यालय का मनोविज्ञान विभाग चलता है । इससे उनके दोनों पुत्र बहुत नाराज हुए क्योंकि दोनों की स्वाभाविक नजर उस मकान पर थी ।आदर्शवाद की चरम पराकाष्ठा थे सर गणेश दत्त सिंह । उनके पुत्र का नाम हाईकोर्ट जज के लिए गया । उन्होंने गवर्नर को दृढ़ता से मना कर दिया कि इससे मेरे लिए पक्षपात माना जाएगा । उनके मृत्यु के उपरांत ही उनके लड़के जज बने । अपनी पोती की शादी में अपने कोष से अपने पुत्र को 20 हजार रुपये हैंडनोट लिखवाकर कर्ज दिया और समय से नहीं लौटाने पर नालिश के लिए वकालतन नोटिस भेजा जिससे पिता – पुत्र का सम्बन्ध खराब हो गया । आज चौतरफा गिरावट के युग में यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि ऐसा महामानव अपने समाज में पैदा हुए थे ।मैंने सर गणेश दत्त सेवा संस्थान के बैनर तले वर्षों तक उनकी जयंती और पुण्य तिथि पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हाल से लेकर रविन्द्र भवन, नृत्य कला मंदिर, आईएमए हाल में मनाया । बिहार के कई गवर्नर (ए. आर. किदवई, सुंदर सिंह भंडारी, विनोद चंद्र पांडेय), नीतीश कुमार, कैलाश पति मिश्र, यशवंत सिन्हा, सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव, समाजवादी नेता कपिलदेव सिंह कार्यक्रम में आते रहे । 2003 में तो पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने डाक टिकट ही श्री कृष्ण मेमोरियल हाल में जारी किया था । मेरे सतत प्रयास से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी जयंती सरकारी समारोह के रूप में मनाने का निर्णय लिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं ।हमारे लोगों को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम सर गणेश दत्त की महान परंपरा के वारिस हैं ।जब हम किसी अपराधी, वंशवादी या सत्ता के दलाल का महिमा मंडन करते हैं तो हमारे पुरखों की आत्मा स्वर्ग में कराहती होगी । बिहार के निर्माण की जो आधारशिला सर गणेश दत्त सिंह ने रखी, जिसको डाक्टर श्री कृष्ण सिंह ने ठोस स्वरूप प्रदान किया वह अभी भी अधुरी है ।इस विकाष यात्रा को जारी रखने की जिम्मेदारी सर्वाधिक हमारे उपर है ।
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