तमाम राजनीतिक अनुमानों और मीडिया की सुर्खियों से इतर यह तय है कि नीतीश कुमार जो भी फैसला लेंगे यह 14 जनवरी के बाद ही मालूम चल पाएगा. फिलहाल अनुमान के तौर पर यह कहा जा सकता है कि नीतीश विधानसभा भंग कर चुनाव में जाने का एलान कर सकते हैं. वे समय से पूर्व विधानसभा चुनाव कराने की मांग कर सकते हैं। इंडिया ब्लॉक की ओर से उन्हें किस तरह का ऑफर मिलेगा, यह अभी तय नहीं है पर, एनडीए में नीतीश असहज महसूस जरूर कर रहे हैं.
नारायण विश्वकर्मा
पटना : दिल्ली से लेकर पटना तक पिछले कुछ दिनों से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर राजनीति के केंद्र बिंदु बने हुए हैं. मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में नीतीश कुमार लेेेकर खूब ब्रेकिंग न्यूज परोसी जा रही है. बगैर प्रमाणिकता के भी न्यूज डाल कर सनसनी फैलाने की कोशिश की जा रही है.
मीडिया में इस बात की होड़ मची है कि कौन कितना सनसनीखेज खबर परोस सकता है. इसके उलट बिहार सरकार के मंत्री और जदयू-भाजपा के नेताओं की ओर से कोई सही सूचना उपलब्ध नहीं करायी जा रही है. वहीं नीतीश कुमार को लेकर एनडीए में कोलाहल की स्थिति जरूर उत्पन्न हो गई है. ‘इंडिया’ खेमे में गुपचुप तरीके से क्या कुछ चल रहा है, इसके बारे में सिर्फ अटकलें लगाई जा रही हैं।
पटना में राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं का बाजार गरम है. कहा जा रहा है कि आरजेडी को नीतीश कुमार के इंडिया ब्लॉक में लौट आने की उम्मीद है तो, भाजपा की ओर से गुपचुप तरीके से नीतीश को शंट करने की पटकथा लिखी जा रही है. इन सबके बीच नीतीश कुमार अभी तक खामोशी अख्तियार किये हुए. इससे मीडिया के अंदर अजीब तरह की बेचैनी देखी-समझी जा रही है. करीब एक माह बीत गया पर, नीतीश मीडिया के सामने अभी तक प्रकट नहीं हुए हैं।
मकर संक्रांति के बाद राजनीतिक उलटफेर संभव
वैसे जानकार यह मान रहे हैं कि जब-जब नीतीश कुमार खामोश होते हैं, तो बिहार में सियासी उलटफेर की आशंका बढ़ जाती है। अलबत्ता, यह बात जरूर है कि पिछली बार बिहार में सत्ता का खेमा मकर संक्रांति के बाद ही बदला था। पिछली बार तो अमित शाह ने गुस्से में कह दिया था कि नीतीश बाबू के लिए एनडीए में सदा के लिए दरवाजे बंद हो गए हैं. वहीं नीतीश जी भी बड़का झूठा पार्टी के नाम से भाजपा को नवाजा था. इसके बावजूद सत्ता की अदली-बदली हुई.
अघोषित रूप से भाजपा के अध्यक्ष या मैनेजर के रूप में लोकप्रिय अमित शाह ही पार्टी या संगठन चला रहे हैं. इसलिए उनकी बातों को सत्ता के गलियारों में हल्के ढंग से नहीं लिया जाता. अमित शाह ने अगली बार नीतीश को सीएम बनाए जाने के सवाल पर ऐसा बयान दे दिया कि उनका नाराज होना स्वाभाविक था.
शाह ने कहा कि संसदीय बोर्ड ही सीएम का फैसला करेगा। उनके इस बयान पर बवाल मचना स्वाभाविक था. क्योंकि उनके बयान को महाराष्ट्र प्रकरण से जोड़ कर देखा जाने लगा. मुमकिन है नीतीश जैसे परिपक्व राजनेता को यह बुरा लगा होगा. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के साथ जो हुआ, उसकी पुनरावृत्ति के आसार बिहार में भी दिख रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार का इसके बावजूद चुप रहने से एनडीए खेमे में खदबदाहट जरूर है.
एनडीए खेमे में इस बात को लेकर नीतीश से नाराजगी जरूर हो सकती है कि उन्होंने दिल्ली की यात्रा की और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के परिजनों से मिल कर उन्हें सांत्वना दी, लेकिन भाजपा नेताओं से बिना मिले वे एक दिन पहले ही दिल्ली से लौट आए। अमित शाह द्वारा बुलाई एनडीए की बैठक से भी नीतीश ने दूरी बनाई. इससे यह जरूर पता चलता है कि दोनों ओर से दूरियां बढ़ने लगी हैं.
गिरिराज सिंह का यह बयान कि नीतीश कुमार को भारत रत्न मिलना चाहिए. हालांकि उनके बयानों को राजनीतिक हलकों में अब उतनी गंभीरता नहीं लिया जाता पर भारत रत्न के बारे में दिये गए बयान उनका अपना बयान नहीं माना जा सकता.
वैसे गिरिराज के धार्मिक जुलूस प्रकरण को लेकर जदयू की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आना और भाजपा की ओर से यह दलील पेश करना कि यह उनकी निजी यात्रा है. यह बात कई राजनेताओं को हजम नहीं हुई. तर्क दिया गया बतौर मंत्री वह इस तरह का धार्मिक जुलूस नहीं निकाल सकते. लेकिन इसके बावजूद नीतीश ने अपनी ओर से पार्टी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. इसके अलावा अमित शाह के संसद में डॉ. आंंबेडकर को लेकर दिये गए हलके बयान पर भी नीतीश ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
आरसीपी सिंह की राह पर ललन-संजय
जदयू में इस बात को लेकर जरूर कोलाहल है कि जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह भाजपा के अधिक करीब होने के क्या मायने हैं? माना जा रहा है कि नीतीश कुमार की मर्जी के खिलाफ दोनों नेताओं को भाजपा की ओर से शह मिल रही है. चूंकि आरसीपी सिंह के प्रकरण के बाद से भाजपा से नीतीश काफी नाराज हुए थे.
आरसीपी सिंह जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते राज्यसभा गए थे। नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में वे मंत्री बने तो वे भाजपा की भाषा बोलने लगे थे। जैसे कि अब ललन सिंह करने लगे हैं. यह सब कुछ पब्लिक डोमेन में है.
हालांकि आरसीपी सिंह को बाद में नीतीश ने उन्हें जदयू से निकाल कर ही दम लिया था। ललन-संजय भी उसी राह पर हैं. ये दोनों नेता अब नीतीश के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं. नीतीश के सामने सबसे बड़ी दिक्कत आ सकती है कि अगर वे एनडीए से अलग होने का फैसला लिया तो जेडीयू में टूट संभव है.
इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच नीतीश के बारे में यह कहा जा रहा है कि नीतीश फिर पलटेंगे. लेकिन कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि नीतीश इस बार पलटू राम नहीं बल्कि पटक राम साबित हो सकते हैं. बिहार विधानसभा के चुनाव में अभी छह माह का समय शेष है. इंडिया ब्लॉक में शामिल आरजेडी को उम्मीद है कि नीतीश ने नाराजगी में एनडीए छोड़ा तो इंडिया ब्लॉक में आने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचेगा।
एनडीए-इंडिया ब्लॉक में हलचल
नीतीश के एनडीए छोड़ कर आरजेडी के साथ आने की बातें उसके विधायक भाई वीरेंद्र कह चुके हैं। वीरेंद्र की बातों पर लोगों को भरोसा इसलिए है कि वे लालू यादव के परिवार के करीबी बताए जाते हैं। हालांकि तेजस्वी यादव ने मीडिया में यह बयान दे दिया है कि अब उनका इधर भी आना स्वीकार नहीं होगा. हालांकि राजनीति में इस तरह की बयानबाजी अब ज्यादा मायने नहीं रखती.
बहरहाल, तमाम राजनीतिक अनुमानों और मीडिया की सुर्खियों से इतर यह तय है कि नीतीश कुमार जो भी फैसला लेंगे यह 14 जनवरी को बाद ही मालूम चल पाएगा. फिलहाल अनुमान के तौर पर यह कहा जा सकता है कि नीतीश विधानसभा भंग कर चुनाव में जाने का एलान कर सकते हैं. वे समय से पूर्व विधानसभा चुनाव कराने की मांग कर सकते हैं। इंडिया ब्लॉक की ओर से उन्हें किस तरह का ऑफर मिलेगा, यह अभी तय नहीं है लेकिन एनडीए में नीतीश असहज महसूस कर रहे हैं ये आभास तो दोनों खेमे में है.
एनडीए से अगर नीतीश किनारा करते हैं तो विकल्प के तौर पर इंडिया ब्लॉक में उनके लिए क्या जगह होगी. ये बड़ा सवाल है. नीतीश-नायडू की बैशाखी पर टिकी मोदी सरकार को उनके अगले निर्णय पर निर्भर रहना होगा. ये उनकी मजबूरी है. चिराग पासवान का मन भी डोल रहा है. इस बीच नीतीश मीडिया में हॉटकेक बने रहेंगे. फिलहाल नीतीश के लिए बीपीएससी को लेकर मचे बवाल को शांत करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए.
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