Source – Facebook – Aditya Dutta
27 दिसंबर 1975 को धनबाद के नजदीक स्थित चासनाला के आईआईएससीओ द्वारा संचालित कोयला खदान में एक विस्फोट होता है और खदान में लाखों गैलन पानी घुस जाता है जिसके चलते खदान में उस समय काम कर रहे सैकड़ों मजदूर घिर जाते हैं और कोई भी जिंदा नहीं बचता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कोई 372 मजदूर मारे गए थे, पर गई सरकारी अनुमानों के अनुसार कोई 700 खदान मजदूर उस दुर्घटना में मारे गए।
उस घटना से लेखक द्वय सलीम-जावेद काफी उद्वेलित हो गए और उन्होंने उसी घटना को आधार बनाकर उन्होंने एक पटकथा लिखी जिसका नाम रखा ”काला पत्थर”। कहानी को विस्तार देने के लिए नायक विजय ( अमिताभ बच्चन) के मजदूर बनने की पृष्ठभूमि के लिए उन्होंने जोसेफ कॉनराड के उपन्यास ”लॉर्ड जिम” से प्रेरणा ली। कोयला खदानों की कार्यप्रणाली और खान में घटने वाले दुर्घटनाओं के बारे में उन्हें कई महत्वपूर्ण जानकारियों अमिताभ बच्चन, जो फिल्मों में आने से पहले ”बर्ड & कंपनी” के कोयला विभाग में काम करते थे और इस दौरान उन्होंने खदान पर जाकर अनुभव प्राप्त किए थे, से भी मिली।
कहानी संक्षेप में ये है कि विजय एक कोयला खान में मजदूर है जो अपने काम से काम रखता है और सबसे अलग थलग रहता है। दरअसल विजय एक भूतपूर्व मर्चेन्ट नेवी कैप्टन है। उस पर कायर होने का ठप्पा लगा है क्योंकि उसने अपने साथियों के कहने पर अपना डूबता जहाज छोड़ दिया और 300 से ज़्यादा यात्रियों की जान जोखिम में डाल दी थी। पर जहाज डूबता नहीं है और उस पर ड्यूटी में लापरवाही और कायरता का आरोप लगाकर उसे बर्खास्त कर दिया जाता है। उसके पिता जो कि बहादुर फौजी हैं, भी उसका त्याग कर देते हैं। अपनी कायरता के कारण दोषी महसूस करते हुए, वह अपना अतीत भूलने के लिए कोयला खदान में काम करने लगता है जहां रातों को उसका अतीत अक्सर परेशान करता राहत है।
खदान में उसकी मुलाक़ात खदान के नए इंजीनियर रवि( शशि कपूर) से होती है और वे दोस्त बन जाते हैं। मंगल( शत्रुघन सिन्हा) नाम के एक और सहकर्मी से उनकी दुश्मनी हो जाती है, जो कि एक भागा हुआ डकैत है और पुलिस से बचने के लिए खदान में काम कर रहा है। विजय और मंगल में कुछ लड़ाइयाँ होती हैं और फिर एक दिन मंगल एक घटना में घायल हो जाता है। विजय उसे डॉ. सुधा के क्लिनिक ले जाता हैं और मंगल की जान बचाने के लिए अपना खून देता है। इसके बाद वे दोस्त बन जाते हैं। इसी दौरान खदान पर रिपोर्ट लिखने के लिए पत्रकार अनीता ( परवीन बॉबी), जो कि कॉलेज में रवि की साथी रह चुकी है, वहाँ आती है। डॉ. सुधा सेन( राखी) उस खदान की आदर्शवादी डॉक्टर है जिसे धन से नहीं गरीब मजदूरों से प्यार है और शहर की आराम की जिंदगी छोड़कर खदान के पिछड़े ईलाके में काम कर रही है। वह विजय का साथ देती हैं और उसे अपने अतीत का सामना करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। विजय धीरे धीरे अपने अतीत का सामना करने लगता है और खदान के कार्यों और खदान मजदूरों की भलाई के लिए खदान के मालिक से उनके लिए न्याय की मांग करने लगता है। इस कार्य में उसका साथ डॉक्टर सुधा, रवि, अनीता और मंगल भी देते हैं। इसी दौरान दोनों एक-दूसरे को चाहने लगते हैं। उधर रवि और मंगल की प्रेम कहानियाँ क्रमशः अनीता और चन्नो( नीतू सिंह), जो खदान के मजदूरों के बीच चूड़ी बेचती है, के साथ चलती हैं।
सेठ धनराज( प्रेम चोपड़ा) एक लालची खदान मालिक है जो कोयला खदान में काम करने वालों को खराब उपकरण, ज़रूरत से कम मेडिकल सप्लाई और सुविधाओं की कमी देकर उनकी ज़िंदगी मुश्किल बना देता है। विजय, रवि और मंगल मिलकर धनराज के खिलाफ़ न्याय के लिए लड़ते हैं। इसी बीच रवि द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद धनराज उस हिस्से से और कोयला निकालने के लिए खुदाई करवाने लगता है जहां पानी का दबाव बहुत ज्यादा था और ज्यादा कोयला निकालने पर दीवार टूट सकती है। इसका परिणाम होता है कि नदी और खदान को के बीच की दीवाल टूट जाती है और खदान में पानी भरने लगता है, जिससे ज़मीन के नीचे फँसे सैकड़ों मज़दूरों की जान खतरे में पड़ जाती है। रवि, विजय और मंगल मज़दूरों को बचाने में कामयाब हो जाते हैं, हालाँकि इस दौरान रवि के पैर में चोट लग जाती है और मंगल की मौत हो जाती है। खदान मजदूरों को मौत के मुंह से निकालकर विजय का प्रयश्चित पूरा हो जाता है और उसके माता-पिता उसे फिर से अपना लेते हैं।
फिल्म हालांकि चासनाला की वास्तविक घटना और जोसेफ कॉनराड के उपन्यास ”लॉर्ड जिम” से प्रेरित है, पर पटकथा को फिल्म में कम कर रहे सितारों के अनुसार ही ढाला गया प्रतीत होता है। काला पत्थर उस समय आई जब सलीम-जावेद जंजीर, दीवार, शोले, डॉन जैसी हिट फिल्में दे चुके थे और अपने करियर के शिखर पर माने जाते थे। दीप्तकीर्ति चौधरी की किताब ‘रिटन बाय सलीम-जावेद’ के अनुसार, 1970 के दशक के अंत तक लेखक जोड़ी की फीस 21 लाख रुपये तक पहुंच गई थी, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। किताब में बताया गया है कि तब अमिताभ बच्चन एक फिल्म के लिए 25 लाख रुपये लेते थे और सलीम-जावेद की फीस भी लगभग उतनी ही थी। लेखक अपनी महानता के भ्रम में डूबे हुए थे और इस समय तक, उनकी फिल्मों का पैमाना और उनमें अभिनय करने वाले कलाकार, शायद कहानी से ज्यादा मायने रखते थे। चोपड़ा के सहायक रमेश तलवार ने चौधरी को किताब के लिए बताया, “सलीम-जावेद ने तीनों मुख्य अभिनेताओं की अलग-अलग शैलियों की कल्पना की और यशजी से इस बारे में चर्चा की, ताकि तीनों अभिनेता फिल्म करने के लिए उपलब्ध और सहमत हों। शुरुआती सहमति बनने के बाद, उन्होंने विस्तृत पटकथा लिखना शुरू कर दिया।” इससे यह स्पष्ट होता है कि फिल्म वास्तव में कई सितारों को लेकर बनाई गई थी, जिसमें कहानी को बाद में सोचा गया था। यही कारण है कि यथार्थ घटना पर आधारित होने के बावजूद फिल्म की कहानी फिल्मी ही लगती है और इसे बाद में लेखक द्वय ने स्वीकार भी किया।
अभिनय की बात करें तो अमिताभ इसमें शायद आखिरी बार शुरू से लेकर अंत तक ”ऐंग्री यंग मैन” की भूमिका में हैं – बोलती आहत आँखें, चेहरे पर चुप्पी, मगर चुप्पी में भी कुछ बोलते नजर आने वाले, मुस्कराहट से कोसों दूर चेहरा मानो ”जंजीर” का विजय एक खदान मजदूर के रूप में वापस परदे पर आ गया हो। जब राखी द्वारा मॉर्फीन का इंजेक्शन लेने पर जोर देने पर उनके द्वारा कहा गया संवाद ” “My pain is my destiny, and I can’t avoid it” में भावनाओं का विस्फोट उनके अभिनय की पराकाष्ठा है। शत्रुघन सिन्हा ने अपने करियर की बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक दी और अमिताभ के दमदार रोल के लिए एक मज़बूत प्रतिद्वंद्वी साबित हुए। उनके द्वारा बोल गया संवाद ” तीसरे बादशाह हैं” ने उस समय खूब तालियाँ बटोरी थी।दोनों के बीच के फाइट सीन इस फिल्म की जान है।
शशि कपूर ने एक तेज़-तर्रार, खुशमिजाज़ और समझदार इंजीनियर के तौर पर अमिताभ बच्चन और सिन्हा के बीच एक पुल का काम किया। किशोर दा द्वारा गाए दो बेहतरीन रोमांटिक गाने ” एक रास्ता है जिंदगी… ” और ” बाहों में तेरी… ” उनपर ही फिल्माया गया है। हालाँकि यह खनिकों की पुरुष-प्रधान कहानी थी, लेकिन राखी, परवीन बाबी और नीतू सिंह ने भी मज़बूत भूमिकाएँ निभाईं; उनके अलग-अलग तरह के किरदारों ने ‘काला पत्थर’ को और भी गहरा और दिलचस्प बना दिया। सबसे मुख्य बात ये है कि तीनों ही नायिकाएं स्वावलंबी हैं और किसी पुरुष पर जीविकोपार्जन के लिए निर्भर नहीं हैं। उन सभी ने अपने किरदारों को बहुत अच्छे से निभाया। अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिंह सिन्हा और नीतू सिंह को उनकी परफॉर्मेंस के लिए क्रमशः बेस्ट एक्टर, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के तौर पर फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिले।
चूंकि यह फ़िल्म एक वास्तविक त्रासदी पर आधारित थी, इसलिए इसे असली जैसा दिखना ज़रूरी था और निर्देशक यश चोपड़ा ने इस बात का पूरा ख्याल रखा। अक्सर वे फिल्मों में ग्लैमर दिखाने के लिए जाने जाते हैं, पर इस फिल्म में उन्होंने कोयला खदान और उसके इर्द-गिर्द बसे गाँव की कहानी के ज़रिए, मज़दूरों की मुश्किल हकीकत को एक यथार्थवादी माहौल में दिखाया। फ़िल्म में गरीबी, चोट लगने का खतरा, मौत, दुख, निराशा और हमेशा मुश्किल हालात का सामना कैसे किया जाता है, इन सबको दिखाया गया। खदानों में मजदूरों की खराब हालत का अंदाज फिल्म में चन्नों ( नीतू सिंह) के द्वारा चूड़ियाँ बेचे जाने पर विजय बेहद तल्खी कहता है -” इन कोयले के खानों में आए दिन मरने वालों की औरतें चूड़ियाँ पहनने के लिए नहीं, तोड़ने के लिए खरीदती हैं।” यह उनकी आम तौर पर बनने वाली रंगीन और असल ज़िंदगी से दूर ले जाने वाली फ़िल्मों से बिल्कुल अलग थी। फ़िल्ममेकर ने असल ज़िंदगी के जितना हो सके करीब रहकर कुछ अलग करने की हिम्मत दिखाई।
इसके साथ ही उन्होंने खदान मालिक के लालच और किसी भी कीमत पर लाभ कमाने की कृत्य को दिखा कर एक तरह से पूंजीवादी चरित्र को भी उजागर किया है जो कि मुख्य धारा की सिनेमा की परंपराओं से हटकर था। फिल्म में साफ तौर पर दिखाया गया है कि इस तरह की घटनाएं प्राकृतिक आपदा नहीं होती है बल्कि मानव के लालच और असंवेदनशीलता का परिणाम होती है। साथ ही इसमें समाजवाद की और निजी खानों की राष्ट्रीयकरण की वकालत कर सामाजिक न्याय का भी संदेश दिया गया है।
”काला पत्थर” बॉलीवुड की शायद पहली फिल्म है जो कि आपदा पर बनी है। अगले ही साल यश चोपड़ा के बड़े भाई बी आर चोपड़ा के बैनर के तले ” दी बर्निंग ट्रेन” बनी। फिल्म में जबरदस्त ड्रामा और रोमांच है, खासकर दूसरे हाफ में आखिर तक। बॉलीवुड में अब तक त्रासदियों पर जितनी भी फ़िल्में बनी हैं, कुछ हद तक द बर्निंग ट्रेन को छोड़ दिया जाए तो उन सब में काला पत्थर जैसा थ्रिल कहीं नजर नहीं आता। खदान के अंदर के कई रेस्क्यू दृश्य भावुक कर देने वाले हैं।मजदूरों के बीच के आपसी सहयोग, नायकों की बहादुरी और सबसे बड़ी बात उन विषम परिस्थितियों में मानवीय संवेदनशीलता का बचे रहना, कई बार दर्शकों को भावुक कर देता है। मंगल की मौत, ”शोले” में जय की मौत की तरह आँखों में आँसू ला देता है। उस जमाने में जब तकनीकी रूप से इतने संसाधन नहीं थे इसके बावजूद कई दृश्य और रेस्क्यू के तरीके काफी वास्तविक लगते हैं। पर ये फिल्म सिर्फ त्रासदी की ही फिल्म नहीं है, बल्कि मानवीय सहयोग, संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय का भी संदेश देती है।
हालांकि इतने बड़े स्टार कास्ट, वास्तविक घटना पर आधारित कहानी, मजबूत पटकथा, कलाकारों के शानदार अभिनय और यश जी के कुशल निर्देशन के बावजूद ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफल नहीं रही। फिर भी 1979 में ये फिल्म बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में 7वें स्थान पर रही। पहले दो स्थानों पर अमिताभ की फिल्में ” सुहाग” और ” मिस्टर नटवरलाल ” थी। पर इसके बावजूद ”ऐंग्री यंग मैन” के रूप में अमिताभ के बेहतरीन 5 फिल्मों में ”काला पत्थर” को कोई भी समीक्षक शामिल करेगा, इसमें कोई दो मत नहीं है
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