“एक अकेला सब पर भारी” यह अब केवल एक तकिया कलाम नहीं रहा, यह इस देश के लिए दुर्भाग्य का स्थायी प्रतीक बन चुका है। एक ऐसा वाक्य, जो कभी ताकत का भ्रम पैदा करता था, आज 140 करोड़ लोगों के लिए बोझ, अपमान और त्रासदी बन चुका है। वाकई, उस एक अकेले के कुकर्म, उनकी सनक, उनकी ज़िद और उनकी घोर अदूरदर्शिता अब पूरे देश पर भारी पड़ चुकी है। यह कोई भावनात्मक आरोप नहीं, यह एक कड़वा यथार्थ है जिसे देश रोज़ भुगत रहा है।
2014 के बाद जन्मा यह तथाकथित “अजैविक” अब भारत की अस्मिता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुका है। उनकी विकृत, विद्रूप और छुपी हुई मनोवृतियां ही आज इस देश का भाग्य तय कर रही है। उनकी बीमार इच्छाएं देश का कानून बन चुकी है. उनकी छिछली, अधकचरी और आत्ममुग्ध समझ ही देश का भविष्य बन चुकी है। उनका अहंकार अब व्यक्तिगत दोष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दुर्भाग्य बन चुका है।
देश-विदेश में किए गए उनके कर्म और कुकर्म अब भारत के सिर पर भुगतान बनकर लाद दिए गए हैँ। वह भुगतान जिसे न चुना गया, न स्वीकार किया गया, लेकिन फिर भी 140 करोड़ लोगों को चुकाना पड़ रहा है. उनकी भीरुता आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की पहचान बन चुकी है। कभी जो देश आत्मसम्मान की बात करता था, आज डर और झिझक का दही जमाएं बैठा है.
देश के भीतर वे 56 इंची बनते हैँ। देश पर रौब झाड़ते हैँ। अहंकार थोपते हैँ। ज़िद परोसते हैँ। मनमर्जी चलाते हैँ। हीन भावना में लिपटी हुई ठसक बिखेरते हैँ। लेकिन जैसे ही चीन और अमेरिका का नाम आता हैँ, उसी क्षण वे सरेंडर मोड में स्विच हो जाते हैँ। सारा अहंकार, सारा रौब, सारी 56 इंची छाती पिघल कर बह जाती है। दृश्य ऐसा होता है जैसे कोई मदारी भालू को नचा रहा हो और वे बिना सोचे-समझे नाचने लग जाएं। कमर नब्बे डिग्री झुक जाती है और आत्मसम्मान ज़मीन पर गिर जाता है।
अमेरिका हमारी संप्रभुता को अपने बूटों तले रौंद रहा है…और आप चुप्पी साधे हैँ…!
ट्रम्प बार-बार 140 करोड़ भारतीयों और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वाभिमान और संप्रभुता को अपने बूटों तले रौंद रहा है, लेकिन मजाल है कि उस बंदे के मुंह से एक शब्द भी निकल जाए। यह चुप्पी सामान्य नहीं हैँ। यह चुप्पी किसी गहरे डर, किसी बड़े राज़ और किसी भारी अपराध की गवाही देती है।
आखिर ट्रम्प ने उनके कुकर्मों और ढीली लंगोट की ऐसी कौन-सी नस दबा रखी है कि पूरा देश अमेरिका के पास गिरवी रख दिया गया है। किस भय ने, किस मजबूरी ने, किस समझौते ने भारत को इस अपमानजनक स्थिति तक पहुंचा दिया है।
वहीं दूसरी ओर, अपने ही देश के विपक्ष पर और दशकों पहले गुजर चुकी इंदिरा नेहरू पर वे खोखली 56 इंची छाती लेकर कीचड़ उछालते है। यह इन अजैविक जी की गहरी हीन ग्रंथि है, जो उन्हें कमजोर और मृत व्यक्तियों पर हमला करने के लिए मजबूर करती है, जबकि जीवित और ताकतवर विदेशी आकाओं के सामने वे घुटनों के बल बैठ जाते हैँ.
यह अजन्मा अजैविक अब केवल एक आत्ममुग्ध नहीं रहा। यह इस देश पर एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है. यह देश की बर्बादी का कारण बन चुका है। संस्थाओं को खोखला करनेवाला, भविष्य को गिरवी रखने वाला और पीढ़ियों को अंधकार में धकेलने वाला खतरा।
यदि कोई गलत हो भी गया है, तो थोड़ी हिम्मत दिखाइए। उस सनकी ट्रम्प दादा से कहिए कि जो उखाड़ना हैँ उखाड़ ले। जो तेरे पास है, सब रिलीज़ कर दे। मैं नहीं डरता। मैं गद्दी छोड़ दूंगा और अपनी जनता के दरबार में जाऊंगा। यदि आप ऐसा करेंगे, तो शायद यह देश आपको माफ भी कर दे।
पश्चिमी जगत के नेताओं से कुछ सीखिए, जो अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं और जनता उन्हें माफ भी कर देती है। लेकिन इसके लिए जिगरा चाहिए। और वह जिगरा आप में है नहीं और माफी शब्द तो आपकी डिक्शनरी है नहीं, फिर समय ही आपका हिसाब करेगा.
आप आखिरी सांस तक सत्ता सुख भोगना चाहते हैं, लेकिन अब यह संभव नहीं हैँ। आपने 2014 में शेर की सवारी चुनी थी। तब बहुत मज़ा आ रहा था। अब शेर की पीठ से उतरने का समय आ गया हैँ। लेकिन डर यह है कि उतरते ही शेर आपको छोड़ेगा नहीं।
-सुरेंद्र सिंह के फेसबुक से साभार