हकीकत ये है कि नरेंद्र मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक तो बन गए, पर जिम्मेदार प्रधानमंत्री कभी नहीं बन पाए, जो जनता की आंखों में आंखे डालकर उन्हें जवाब दे सके, उनकी परेशानियां सुन सके. मंच पर खड़े होकर चिल्लाना बड़ा आसान है पर जिम्मेदारियों के साथ नफे-नुकसान की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं है. हिम्मत होती तो देश के सभी प्रधानमंत्रियों की तरह प्रेस कांफ्रेंस करके पत्रकारों के सवालों का जवाब देते…!
प्रधानमंत्री आज खुद सरेंडर होकर बोल रहे हैं कि हम गरीबी की चपेट में आ सकते हैं. क्या ये है इनका अमृतकाल जिसके लिए भक्त रात दिन इनकी मूर्खताओं का डेमेज कंट्रोल करते रहते हैं।
ऐसी कौनसी आपदा आ गई इस दशक में जो देश भयंकर गरीबी झेल सकता है जबकि भक्त तो भाजपा शासन को अमृतलाल कहते नहीं थक रहे हैं। जब हम पूछते हैं 35 लाख करोड़ से कर्जा 225 लाख करोड़ कैसे हुआ तो ये विकास के बिंदु गिनवा देते हैं.
जब हम महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ता ऋण और सत्ता पर जड़े जमाए भ्रष्ट नेताओं की बात करें तो ये हमे देशद्रोही बता देते हैं. जब हम पूछे कैसे 39 हजार करोड़ की रिफायनरी जल गई तो ये कोंग्रेस पर लाँछन लगाते हैं.
जब हम पूछे कैसे 21 करोड़ की टंगी, 12 हजार करोड़ का पुल और 400 करोड़ का हाईवे धंस गया या स्वच्छ जल मिशन, पोषण मिशन, नमामि गंगे का करोड़ों रुपया किधर ठिकाने लगाया तो ये हमें कॉंग्रेसी टूलकिट कहते हैं.
जब हम कहें देश विश्व का सबसे बड़ा कर्जदार बन चुका है तो ये अमेरिका से तुलना कर देते हैं. जब हम हार्मुज़ में डूबे भारतीय जहाज़ों की बात करें तो ये नंदा देवी और शिवालिक के सुरक्षित आने को कूटनीतिक जीत बताते हैं जबकि उसके बाद बाकी जहाजों का कोई जिक्र तक नहीं करते।
केयर फंड का हिसाब क्योें नहीं देते?
जब हम पूछे पीएम केयर फंड के 14 हजार करोड़ से भी ज्यादा की राशि का हिसाब क्यों नहीं है, क्यों भाजपा के आलीशान कार्यालय बन रहे, क्यों नेताओं के भत्ते, सुविधा और ऐशोआराम में कटौती नहीं होती तो ये नेहरू का राग अलापते हैं.
जब हम पूछे भाजपा प्रतिदिन 71 लाख की राशि विज्ञापन पर खर्च क्यों कर रहा तो फिर ये नेहलु-नेहलु बोलकर रोने लगते हैं। जब हम पूछे रुपया पतला क्यों हुआ तो ये कहते हैं क्या तुम डॉलर में शॉपिंग करते हो. कमर्शियल सिलेंडरों के दाम की बात करे तो ये पूछते हैं क्या तुम ढाबा चलाती हो.
अरे मूर्खों रेस्त्रों बिजनेस, भोजनालय टिफिनसेन्टर के साथ निर्माण और विनिर्माण इकाइयों में भी कमर्शियल सिलेंडर लगते हैं. आज नट, बोल्ट, स्क्रू, वेल्डिंग, स्प्रिंग, और लोहे के हर एक समान, कल पुर्ज़ों की कीमत 4/5 रुपये एकदम से बढ़ गई है अब ये मत कहना कि क्या तुम नट-बोल्ट खाती हो.
महंगाई, बेरोजगारी, आपदा केवल आम जनता के लिए हैं नेताओं के लिए तो न को कोविड में बिस्तर और दवाइयों की कमी हुई न ईंधन, राशन और महंगी धातुओं की कोई कमी है।
हिन्दू खतरे में है, का झुनझुना पकड़ाकर पूरे देश की अर्थव्यवस्था, विकास, अधोसंरचना, विदेशी साख और उद्योगों की ऐसी-तैसी कर दी।
अब ये डचों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, मैं तो कहूँ लगे हाथ ईस्ट इंडिया कम्पनी, फ्रांसिस, पुर्तगाली और डेनिश को भी बुला ही लो ताकि अगली पीढ़ी अंग्रेज़ों के शासन वाले समय को टाइम केप्स्यूल में जाकर फिर जी सके। किताबें पढ़कर ब्रिटिश एरा की डेट्स और घटनाएं याद रखना बड़ा बोरियत भरा है। चलो फिर से मॉडर्न हिस्ट्री की नई शुरुआत करें।
