विजय शंकर नायक
रांची की जगन्नाथ रथयात्रा एक ऐसा धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है, जो न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि झारखंड की समृद्ध परंपराओं और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। यह यात्रा पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा की तर्ज पर आयोजित की जाती है और रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से शुरू होती है।
रांची का जगन्नाथ मंदिर, जिसे 1691 में नागवंशी राजा ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने बनवाया था, पुरी के जगन्नाथ मंदिर की छोटी प्रतिकृति के रूप में स्थापित किया गया था। यह मंदिर लगभग 80-90 मीटर ऊंची एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है, जिससे रांची शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। मंदिर की स्थापना के साथ ही रथयात्रा की परंपरा शुरू हुई.
यह मंदिर रांची के अलबर्ट एक्का चौक से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित है और 328 साल से भी अधिक समय से आस्था का केंद्र रहा है। इस मंदिर की रथ यात्रा की परंपरा भी उतनी ही प्राचीन है, जो पिछले तीन शताब्दियों से निरंतर चली आ रही है।
रथयात्रा का आयोजन हर साल आषाढ़ मास (जून-जुलाई) में होता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा के विग्रहों को रथों पर सजाकर मंदिर से मौसीबाड़ी तक ले जाया जाता है। यह यात्रा नौ दिनों तक चलती है, जिसमें भक्त रथ खींचते हैं और भगवान के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।
रांची की रथयात्रा की सबसे खास बात इसका सर्वधर्म समभाव है। ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने इस उत्सव को सभी जातियों और धर्मों के लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया था। यह परंपरा आज भी जीवित है, और यात्रा में विभिन्न समुदायों का योगदान देखने को मिलता है।

रथयात्रा के कुछ अनछुए पहलू
सर्वधर्म सहभागिता: ऐतिहासिक रूप से, रथ यात्रा में विभिन्न समुदायों की भागीदारी रही है। उदाहरण के लिए, घासी समुदाय फूलों की व्यवस्था करता था, उरांव समुदाय घंटियाँ प्रदान करता था, और मुस्लिम समुदाय मंदिर की पहरेदारी करता था। इसके अलावा, राजवर समुदाय रथ को सजाने में, कुम्हार मिट्टी के बर्तन देने में, और बढ़ई व लोहार रथ निर्माण में योगदान देते थे। यह सामाजिक एकता का अनूठा उदाहरण है, जो आज के समय में भी प्रासंगिक है।
ब्रिटिश काल में चुनौतियां: 1857 की क्रांति के दौरान, ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह किया था, जिसके परिणामस्वरूप मंदिर की 84 में से तीन गाँवों की जमीन ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर ली थी। हालांकि, मंदिर के मुख्य पुजारी बैकुंठ नाथ तिवारी की अपील पर ब्रिटिश सरकार ने जगन्नाथपुर गाँव की 859 एकड़ जमीन मंदिर को वापस कर दी थी।
वर्तमान में मंदिर के पास केवल 41 एकड़ जमीन शेष
महिलाओं की भूमिका: रथ यात्रा में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। जहाँ पुरी की रथ यात्रा में कुछ परंपराएँ पुरुष-प्रधान हैं, वहीं रांची में महिलाएँ भी रथ खींचने और पूजा-अर्चना में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। यह समावेशी दृष्टिकोण इस उत्सव को और भी खास बनाता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
रांची की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। यह उत्सव स्थानीय कला, शिल्प, और परंपराओं को बढ़ावा देता है। रथ की जटिल नक्काशी और रंग-बिरंगे पत्थरों से सजा मंदिर वास्तुकला का अनूठा नमूना है।
रथ निर्माण: रथ का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो लकड़ी और धातु का उपयोग करके इसे भव्य रूप देते हैं। रथ की सजावट में पारंपरिक चित्रकारी और शिल्पकारी की झलक देखने को मिलती है।
संगीत और नृत्य: यात्रा के दौरान भक्ति भजनों, ढोल-नगाड़ों, और स्थानीय लोक नृत्यों का आयोजन होता है, जो उत्सव को और रंगीन बनाता है।
मौसीबाड़ी की परंपरा: नौ दिनों तक भगवान जगन्नाथ मौसीबाड़ी में विराजमान रहते हैं, जो पुरी की परंपरा का अनुसरण करता है। इस दौरान भक्तों के बीच भोजन वितरण और सामुदायिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
वैदिक काल से चली आ रही है रथ यात्रा
जगन्नाथ रथ यात्रा की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है, और इसका उल्लेख स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। रांची में इसकी शुरुआत नागवंशी राजाओं के शासनकाल में हुई। माना जाता है कि नागवंशी राजा भगवान जगन्नाथ के भक्त थे और उन्होंने पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर रांची में इस मंदिर और रथ यात्रा की शुरुआत की। यह मंदिर और रथ यात्रा स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के साथ-साथ वैष्णव धर्म की गहरी छाप को दर्शाते हैं।
रांची में रथ यात्रा की विशेषता यह है कि यह न केवल हिंदू धर्मावलंबियों को आकर्षित करती है, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय, जैसे मुंडा और उरांव, भी इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। यह उत्सव विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समन्वय का प्रतीक है।
यात्रा का मार्ग: रथ यात्रा जगन्नाथपुर मंदिर से शुरू होकर पास में स्थित मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) तक जाती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, और सुभद्रा नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में विश्राम करते हैं, जिसके बाद बाहुड़ा यात्रा के दौरान वे वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं।

प्रमुख पौराणिक कथाएं
सुभद्रा की इच्छा: एक कथा के अनुसार, देवी सुभद्रा ने नगर भ्रमण की इच्छा व्यक्त की थी। इस इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। इस दौरान वे अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं, जहां सात दिनों तक विश्राम करते हैं। यह परंपरा रथ यात्रा का आधार बनी।
रांची में रथ यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। रांची की सांस्कृतिक विविधता, जिसमें मुंडारी, नागपुरी, और उरांव जैसी भाषाएं और डोकरा कला जैसी परंपराएं शामिल हैं, इस उत्सव में झलकती है।
रथ यात्रा के दौरान आयोजित मेला स्थानीय कला, संस्कृति, और व्यंजनों को बढ़ावा देता है। यह उत्सव रांची के लोगों के लिए एकता, भक्ति, और उत्साह का प्रतीक है।
रथ यात्रा का पौराणिक महत्व, जैसे पापों का नाश, मोक्ष की प्राप्ति, और आत्मा-परमात्मा के मिलन का प्रतीक, इसे और भी खास बनाता है। रांची में यह उत्सव हर साल लाखों लोगों को एक साथ लाता है, जो भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रथ खींचने के पुण्य कार्य में भाग लेते हैं। यह उत्सव रांची की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को और भी मजबूत करता है।
लेखक : आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच केन्द्रीय उपाध्यक्ष हैं
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