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Saturday, June 6, 2026
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सरकार के पास ‘परीक्षा पे चर्चा’ का इवेंट मैनेजमेंट तो है, पर ‘रोजगार पर नीति’ का भारी अकाल है

परीक्षा पे चर्चा’ सिर्फ एक इवेंट बनकर रह गया है, जबकि हकीकत में युवाओं का भविष्य पेपर लीक के अंधेरे में खो रहा है।​ याद रहे इतिहास गवाह है कि जब-जब छात्र सड़कों पर उतरा है, बड़े से बड़े सिंहासन ताश के पत्तों की तरह ढह गए हैं। 

खुद को ‘विश्वगुरु’ कहने वाली बीजेपी सरकार की प्रशासनिक रीढ़ की हड्डी इस कदर सड़ चुकी है कि पिछले 5 सालों में देश के अलग-अलग राज्यों में 70 से अधिक प्रमुख सरकारी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं, जिससे 1.7 करोड़ युवाओं की जिंदगी बर्बाद हो चुकी है। वहीं यूपी के शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय का बयान तो काफी निम्न स्तर और काफी हास्यास्पद है. वे कहते हैं कि पहले सौ पेपर लीक होते थे अब सिर्फ दस होते हैं. इस प्रकार 90 प्रतिशत की कमी आई है.

24 लाख छात्रों के भविष्य को नीट (NEET) के कसाईखाने में हलाल करने के बाद जो लोग इस कॉकरोच वाली छात्र-क्रांति को कांग्रेस या आम आदमी पार्टी का ‘टूलकिट’ बता रहे हैं, उनकी बौद्धिक कंगाली पर तरस आता है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत में स्नातक युवाओं की बेरोजगारी दर रिकॉर्ड 29.1 प्रतिशत तक जा पहुंची है, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि इस सरकार के पास ‘परीक्षा पे चर्चा’ का इवेंट मैनेजमेंट तो है, लेकिन ‘रोजगार पर नीति’ का भारी अकाल है।

विजन व नीयत में जमीन-आसमान का फर्क

​इतिहास के पन्नों से अगर हम बीजेपी की मौजूदा नीतियों की तुलना करें, तो यह साफ हो जाता है कि विजन और नीयत में जमीन-आसमान का फर्क क्या होता है।

कांग्रेस के शासनकाल में जब 1951 में पहले आईआईटी (IIT Kharagpur) और 1956 में एम्स (AIIMS) की स्थापना की गई थी, तब मकसद देश को मजबूत वैज्ञानिक और डॉक्टर देना था, न कि पेपर लीक माफियाओं की तिजोरियां भरना।

साल 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) के तहत देश के अकादमिक ढांचे को जो स्वायत्तता दी गई थी, आज उसे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी गैर-जवाबदेह संस्था बनाकर पूरी तरह क्रूरता से कुचल दिया गया है,

जहां परीक्षा केंद्र से लेकर उत्तर पुस्तिकाओं तक की सरेआम बोली लगाई जा रही है। ​ये वो सरकार है जो इतिहास की बात तो बहुत करती है, लेकिन इतिहास से कुछ सीखती नहीं है, वरना इन्हें याद होता कि जब 1974 में तत्कालीन सरकार की नीतियों के खिलाफ बेरोजगारी को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे थे, तो देश की राजनीति का भूगोल बदल गया था।

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की रिपोर्ट गवाह है कि आज देश का हर तीसरा शिक्षित युवा (लगभग 33 प्रतिशत) बेरोजगार बैठा है, जो कांग्रेस के दौर के औसत शिक्षा-बेरोजगारी अनुपात से कहीं अधिक भयावह है। जो सरकार एक नेशनल लेबल की परीक्षा को बिना धांधली के आयोजित कराने की 100 प्रतिशत क्षमता नहीं रखती, वह किस मुंह से डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भरता का ढोल पीटती है, यह देश का युवा आज अच्छी तरह समझ रहा है।

​इस सड़े हुए सिस्टम को धरातल पर घुटनों पर लाने के लिए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले युवा अब जंतर-मंतर पर उस शिक्षा मंत्री का इस्तीफा पहुंच चुके हैं, जो इस प्रशासनिक पाप के मुख्य सूत्रधार हैं।

मांगें किसी खोखले राजनीतिक घोषणापत्र की तरह नहीं हैं, बल्कि सीधे तौर पर यूपीएससी (UPSC) की तर्ज पर एक स्वायत्त ‘राष्ट्रीय परीक्षा जवाबदेही आयोग’ के गठन की मांग करते हैं, जिसके पास पेपर लीक करने वाले रैकेट की संपत्ति कुर्क करने का सीधा अधिकार हो। इसके साथ ही, जीडीपी (GDP) का अनिवार्य 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा बजट के लिए आवंटित किया जाए और युवाओं को रोजगार सुरक्षा देने के लिए धरातल पर काम करने वाला ‘युवा रोजगार गारंटी कानून’ तुरंत लागू हो।

​वक्त आ गया है कि इस जुमला-भक्त सत्ता के अहंकार को युवाओं की संगठित ताकत से तोड़ा जाए, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब छात्र सड़कों पर उतरा है, बड़े से बड़े सिंहासन ताश के पत्तों की तरह ढह गए हैं। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से बाहर निकलिए, आंकड़ों और तर्कों के इस हथियार को थामिए और जंतर-मंतर की इस वैचारिक क्रांति का हिस्सा बनिए ताकि इन सत्ताधीशों को पता चले कि देश का युवा इनका गुलाम नहीं है।

जिस तरह भारतीय जनता पार्टी अभी तक भारतीय जनता की नहीं हुई, उसी तरह काकरोच जनता पार्टी के भारतीय युवा काकरोच नहीं है बल्कि इन बारह सालों में पैदा हुए सिस्टम के काकरोच को चुनौती देने के लिए सामने आए हैं 

परीक्षा पे चर्चा’ सिर्फ एक इवेंट बनकर रह गया है, जबकि हकीकत में युवाओं का भविष्य पेपर लीक के अंधेरे में खो रहा है। जब देश का पढ़ा-लिखा युवा सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाए, तो समझो हुकूमत के पतन के दिन शुरू हो चुके हैं।

-पंकज कुमार जाट के फेसबुक वाल से


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