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Friday, June 5, 2026
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200 आदिवासी संगठनों ने कहा-आदिवासी वनवासी नहीं हैं…भाजपा सरना-सनातन में घालमेल करने से बाज आए…! 

बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर उलगुलान को याद कर जन कार्यक्रम करने की अपील

बिरसा की विरासत को आरएसएस, जनजाति सुरक्षा मंच और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे मनुवादी संगठनों से बचाने के संकल्प का आह्रवान 

रांची : 200 से अधिक जाने-माने आदिवासी, मूलवासी, जन संगठन के प्रतिनिधि, पारंपरिक स्वशासन प्रतिनिधि, शिक्षाविद व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को संयुक्त वक्तव्य जारी करके आदिवासी समेत सभी झारखंडियों से धरती आबा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को आदिवासी संस्कृति, संघर्ष और उलगुलान को याद करते हुए राज्य के कोने-कोने में जन कार्यक्रम का आयोजन करने की अपील की. 

जारी विज्ञप्ति में 24 मई 2026 को आरएसएस से जुड़े संगठन जनजाति सुरक्षा मंच ने दिल्ली में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम को याद दिलाया गया है। इस कार्यक्रम में वक्ताओं, खासकर अमित शाह ने आदिवासियों को बार-बार वनवासी बोलकर संबोधित किया। इस समागम में एक बार भी बिरसा मुंडा के जल, जंगल, जमीन के संघर्ष और दिकुओं के शोषण के विरुद्ध लड़ाई को याद नहीं किया गया।

दरअसल, आरएसएस व इससे जुड़े संगठन कभी भी आदिवासी शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं क्योंकि वे आदिवसियों को हिन्दू वर्ण व्यवस्था में आखरी पायदान में खड़े वनवासी के रूप में देखते हैं। ये संगठन एक ओर “सरना-सनातन एक” बोलकर आदिवासियों के स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म करने में लगे हैं।

वहीं दूसरी ओर ईसाई आदिवासियों की आदिवासी सूची से डीलिस्टिंग की मांग कर आदिवासियों की सामूहिकता को तोड़ने में लगे हैं। आदिवासियों को वनवासी बनाने, उनकी सामूहिकता तोड़ने और उनके जल, जंगल, जमीन को लूटने के लिए; धरती आबा के विरासत को खत्म करने के लिए आरएसएस उनके नाम का इस्तेमाल कर रही है।

रघुवर सरकार ने तो CNT को ही खत्म करने की कोशिश की थी

कहा गया है कि बिरसा मुंडा के जल, जंगल, जमीन के लिए उलगुलान एवं अंग्रेजों व हर प्रकार के शोषणकारी दिकुओं के विरुद्ध संघर्ष ने झारखंड की नींव रखी थी। लेकिन संघ इस इतिहास को बदलने में लगा हुआ है। भाजपा की रघुवर सरकार ने तो उलगुलान से निकले CNT कानून को भी खत्म करने की कोशिश की थी। जिस मुंडा दिसुम में बिरसा मुंडा ने उलगुलान का नारा दिया था, वहीं रघुवर सरकार ने हजारों आदिवासियों को देशद्रोही घोषित कर दिया था।

मोदी सरकार आदिवासियों की स्वायत्तता और जल, जंगल, जमीन के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को खत्म करने में लगी हुई है। इन मनुवादी संगठनों द्वारा तो आदिवासियों के स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था को औपचारिक मान्यता और जनगणना में अलग कोड के मांगों का भी विरोध किया जाता रहा है।

संयुक्त विज्ञप्ति में प्रमुख सामाजिक-राजनैतिक नेता पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव, पूर्व विधायक बहादुर उरांव व मंगल सिंह बोबोंगा, ज्योत्सना केरकेट्टा, देवकीनंदन बेदिया, कुमारचंद्र मार्डी, डेमका सोय, रमेश जराई, रजनी मुर्मू, सुखनाथ लोहरा, दुर्गवाती उरांव, अलोका कुजूर, बिंसाय मुंडा, हरी कुमार भगत, कालीचरण बिरुवा, दिनेश मुर्मू, साधु हो, जयकिशन गोडसोरा, वासवी किड़ो आदि एवं जाने-माने शिक्षाविद व सांस्कृतिक अगुआ जैसे जसिन्ता केरकेट्टा, जोसेफ बाड़ा, अनुज लुगुन व नीतीश खलखो शामिल हैं।

इसके अलावा अखिल भारतीय आदिवासी विकास समिति, गाँव गणराज्य परिषद, सरना सगोम समिति, खूंटी, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी मूलवासी अधिकार मंच, बोकारो, भारत जकत माझी परगना महल रामगढ़, पारंपरिक ग्राम सभा समन्वय समिति, खूंटी, आदिवासी अधिकार मंच, मानकी मुंडा स्वशासन व्यवस्था, पश्चिमी सिंहभूम, आदिवासी हो समाज सेवानिवृत संगठन, चाईबासा, आदिवासी आंदोलनकारी मोर्चा,  आदिवासी समन्वय समिति, बिरसा सेना, आदिवासी एकता मंच, मुंडा आदिवासी समाज महासभा, संयुक्त ग्राम सभा, युवा झुमुर, झारखंड जनाधिकार महासभा, जोहार, ओमोन महिला संगठन, झारखंड जनतान्त्रिक महासभा समेत अनेक संगठनों के प्रतिनिधि हैं। 


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