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Saturday, March 7, 2026
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गुमला के रवि उरांव की सफलता: वैज्ञानिक पद्धति से लाह उत्पादन कर बने लाखपति

गुमला, झारखंड – कभी गुमला जिला लाह उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था, लेकिन समय के साथ इसकी पैदावार में गिरावट आई। इसके बावजूद सिसई प्रखंड के जामपानी गांव के किसान रवि उरांव ने नई राह अपनाकर लाह की खेती से न केवल आर्थिक सफलता हासिल की बल्कि समाज में मान-सम्मान भी पाया।

खेती में नया प्रयोग

रवि उरांव के पास 12 एकड़ जमीन है, जिसमें 5 एकड़ जमीन दोन (निचली भूमि) और 7 एकड़ टाड़ (ऊंची भूमि) है। उनके खेतों में लगभग 75 बेर के पेड़ और एक एकड़ क्षेत्र में सेमियालता लगी हुई है। पहले वह परंपरागत तरीके से लाह का उत्पादन करते थे, लेकिन साल 2014-15 में कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला के वैज्ञानिकों से मिलने के बाद उनकी खेती में बड़ा बदलाव आया।

वैज्ञानिकों ने उन्हें लाह उत्पादन की वैज्ञानिक विधियां सिखाईं—जैसे समय पर बुआई, पेड़ों की सफाई, उचित समय पर ब्रूड (लाह का बीज) चढ़ाना और कीट प्रबंधन। रवि उरांव ने इस प्रशिक्षण को व्यवहार में उतारा और इसकी शानदार सफलता पाई।

आर्थिक सफलता और सम्मान

वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने पर लाह की गुणवत्ता बढ़ी और बाजार में ऊंचे दाम मिले। इस साल उन्होंने लाह की बिक्री से लगभग 4 लाख रुपये अर्जित किए। यह उनकी जिंदगी का बड़ा मोड़ था, क्योंकि पारंपरिक खेती से इतनी आमदनी संभव नहीं थी।

उनकी सफलता से प्रेरित होकर आसपास के 40 से 45 किसान भी लाह की खेती शुरू कर चुके हैं। इनमें मनु मुंडा (लालमाटी), छोटू उरांव (गोंदरोटोली) और विमल उरांव (गोंदरोटोली) जैसे किसान भी लाखपति बने हैं। कई किसानों ने उनकी राह पर चलकर अपनी आय और जीवनस्तर सुधारा है। अब उनके पास चारपहिया वाहन तक है और गांव में सम्मानजनक पहचान मिली है।

परिवार और समाज से सहयोग

रवि उरांव की पत्नी जयंती देवी भी खेती-बाड़ी में उनका सहयोग करती हैं। वह पहले पंचायत की मुखिया रह चुकी हैं। उनकी तीन बेटियां—किरण तिर्की, रोशनी तिर्की और प्रियंका तिर्की—लाह की खेती से ही हुई आमदनी के चलते पढ़ाई आगे बढ़ा रही हैं। बड़ी बेटियां एम.कॉम और बीए तक पढ़ चुकी हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी हैं, जबकि छोटी बेटी इंटरमीडिएट में पढ़ रही है।

महिलाओं की भागीदारी और सरकारी सहयोग

लाह उत्पादन अब गांव में सामूहिक प्रयास के रूप में उभर रहा है। महिलाएं भी इस कार्य से जुड़कर परिवार की आय बढ़ा रही हैं। सरकार और कृषि विज्ञान केंद्र समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, लाह बीहन, छंटाई उपकरण और पौधरोपण की सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं।

विशेषज्ञ के रूप में पहचान

समर्पण और मेहनत से रवि उरांव आज ‘लाह उत्पादन विशेषज्ञ’ के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी मेहनत और उपलब्धि ने सिसई प्रखंड के अन्य किसानों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है। गांव के लोग मानते हैं कि वैज्ञानिक पद्धति से लाह की खेती करने पर किसान न केवल अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं बल्कि गांव के समग्र विकास में भी योगदान कर सकते हैं।

न्यूज़ – गणपत लाल चौरसिया 


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