वरिष्ठ पत्रकार बिनोद कुमार के पहले उपन्यास ‘समर शेष है’ का एक अंश बिनोद बाबू को समर्पित
रांची : कुड़मी समाज के सबसे कद्दावर नेता बिनोद बिहारी महतो की आज जयंती है. बिनोद बिहारी महतो ने ही शिबू सोरेन और कामरेड एके राय के साथ मिल कर झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया था. हालांकि, झामुमो की स्थापना करने के बावजूद वे मन से वामपंथी थे और उनकी दोस्ती अंत तक कामरेड एके राय से बनी रही.
कैसी विडंबना कि आज तीनों नेता दिवंगत हो चुके हैं और आदिवासी, सदानों के जिस एकता के बल पर झारखंड में महाजनी शोषण और माफियागिरी के खिलाफ जंग लड़ी गयी और सैकड़ों लोगों ने शहादत दी, वे आपस में लड़ रहे हैं.
मैट्रिक पास करनेवाले पहले कुर्मी युवक थे बिनोद बाबू
बलियापुर प्रखंड का एक गांव है बड़ादहा। बड़ादहा यानी एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र जहां जल जमाव बहुत ज्यादा होता है। इस गांव के एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार की इकलौती सन्तान के रूप में उनका बिनोद बाबू का जन्म 1 मार्च 1921 को हुआ था। पिता का नाम महिन्द्री महतो और मां का नाम मन्दाकिनी देवी। इकलौते पुत्र होने की वजह से वे अपने माता-पिता के लाड़ले थे।
बावजूद इसके इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा बहुत कठिनाई से हुई। कुसमाटांड़ के मिडिल स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका नामांकन एच. ई. स्कूल धनबाद में कराया गया।
बिनोद बाबू मीलों पैदल चलकर स्कूल जाया करते। लेकिन परिश्रम काम आया और अपने इलाके में वे मैट्रिक पास करने वाले पहले कुर्मी युवक थे। मैट्रिक के बाद भी वे आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक मजबूरियों की वजह से उन्होंने धनबाद में आपूर्ति विभाग में किरानी की नौकरी कर ली।
उस वक्त तक उनका विवाह कुसमाटांड़ में हो चुका था। लेकिन वह नौकरी बहुत दिनों तक चली नहीं। कहते हैं कोर्ट परिसर में एक वकील से उनकी बकझक हो गई और वकील ने ताना मारते हुए कह दिया- ‘अरे तुम कितना भी तेज-तर्रार क्यों न बनो, आखिर हो तो किरानी ही।’

यह बात बिनोद बाबू के अन्तर्मन को घायल कर गई और उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। निश्चय किया कि वे आगे पढ़ेंगे। घरवालों को उनके इस फैसले पर आश्चर्य तो हुआ लेकिन सभी जानते थे कि वे दृढ़ इच्छाशक्ति के मालिक हैं। एक बार जो ठान लेते हैं वही करते हैं।
इसलिए किसी ने भी उनके साथ टोका-टाकी नहीं की। उन्होंने 1941 में मैट्रिक किया था। पूरे आठ वर्ष बाद एक बार फिर विद्यार्थी जीवन में प्रवेश किया और पी. के. राय कॉलेज में आई.ए. में नामांकन करवाया।
पूरे आठ वर्ष पढ़ाई-लिखाई छोडे रहने के बाद उन्होंने नियमित छात्र के रूप में कॉलेज में नामांकन कराया था. सामान्य छात्रों से उम्र में काफी बड़े थे और उनके सहपाठी बूढ़ा कहकर उनका मजाक उड़ाते। लेकिन लोगों के ताने और छात्रों के मजाक उन्हें अपने निश्चय से डिगा नहीं पाए।
उनकी पढ़ाई का तरीका भी अन्य छात्रों से भिन्न था। छात्रावास के अपने कमरे को वे भीतर से बन्द कर लेते और जोर-जोर से ‘सोहराय गीत’ की धुन में पढ़ते। बहुधा सबेरे उनके जोर-जोर से पढ़ने की आवाज से ही अन्य छात्रों की नींद टूटती।
खैर, 1952 में उन्होंने आई.ए. की परीक्षा पास की और 1954 में उसी कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा। उसके बाद वकालत पढ़ी और वकील बनकर धनबाद के उसी कोर्ट में पहुँचे जहाँ एक वकील ने उनकी खिल्ली उड़ाई थी।
स्वभाव से वामपंथी विचारधारा के थे
छात्र-जीवन में ही वे वामपंथी विचारधारा के सम्पर्क में आए थे और जल्द ही वे वकालत के क्षेत्र में स्थापित होने के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के एक सक्रिय कार्यकर्ता और बाद में नेता के रूप में स्थापित हो गए।
1952 में उन्होंने झरिया में जनता पार्टी के प्रत्याशी राजा कालीपद सिंह के खिलाफ एम.एल.ए. का चुनाव भी लड़ा जिसमें वे सफल नहीं हो सके। उसके बाद वे विधानसभा चुनावों में भी भाग लेते रहे लेकिन जीत न सके।
वह जमाना कामख्या नारायण सिंह की राजा पार्टी का था, जिन्हें आदिवासियों का समर्थन प्राप्त था। उनके अपने समुदाय के लोग कांग्रेस की तरफ धीरे-धीरे मुखातिब हो रहे थे। वैसी परिस्थिति में एक वामपंथी रुझान के युवक को चुनावी सफलता कैसे मिलती?
1965 में शिवाजी समाज की नींव डाली
बिनोद बाबू इस तथ्य को तीव्रता से महसूस किया कि जब तक उनका अपना कुर्मी समाज जाग्रत नहीं होता, अन्धविश्वासों और सामाजिक बुराइयों से मुक्त नहीं होता और जब-तक उनमें राजनीतिक चेतना नहीं जागती, तब तक उनकी अपनी राजनीतिक सफलता भी संदिग्ध बनी रहेगी।
उन्होंने 1965 में शिवाजी समाज की नींव डाली। उनकी कोशिश रहती कि उनके समाज की समस्याओं का निराकरण जन-अदालतों के माध्यम से हो। वे पेशे से वकील बन चुके थे। उनकी आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर थी।
बिनोद बाबू की वाणी में गरज और जोश था। उन्हें अपने समाज में प्रतिष्ठा मिलने लगी थी। और जन अदालतों के माध्यम से जब वे अपने समाज की सताई औरतों को न्याय दिलाने लगे, दोषी व्यक्ति को सजा देने लगे, तो उनकी ख्याति और भी तेजी से बढ़ी। लेकिन राजनीतिक जीवन में अभी उनकी पहचान नहीं बन पाई थी। इसी मुकाम पर ए. के. राय से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद फिर उनका राजनीतिक जीवन आगे बढने लगा.अपने समाज के लोगों से वे अक्सर कहा करते थे कि लड़ना है तो पढ़ना सीखो.
बिनोद बाबू को याद करते हुए अपने पहले उपन्यास ‘समर शेष है’ का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूं. यह उपन्यास मैंने झारखंड बनने के पहले लिखी थी, यानी आज से 26-27 वर्ष पूर्व. उनके व्यक्तित्व को समझने में शायद आपको कुछ मदद मिले.
-बिनोद कुमार
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