उत्तर-पूर्व के चार राज्यों-असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा से जुड़े राजनीतिक चंदे का जो खुलासा रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने किया है, वह केवल एक वित्तीय घोटाले या ‘काले धन’ की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक-आर्थिक संरचना का अनावरण है, जिसे बीते दस वर्षों में अत्यधिक व्यवस्थित और केंद्रीकृत रूप देकर राष्ट्रीय राजनीति पर थोपा गया है। यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब बीजेपी अपने नैतिक दावों- “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा”- को प्रचारित करते नहीं थकती, और विपक्ष पर भ्रष्टाचार का ठप्पा लगाने के अभियान में हर तरह की सरकारी मशीनरी झोंक देती है।
सत्ता की छत्रछाया में पनपता ठेकेदार-राज
लेकिन यह खुलासा एक बेहद असहज सच दिखाता है: सत्ता की छत्रछाया में पनपता एक ठेकेदार-राज, जिसमें सरकारी लाभ और राजनीतिक चंदा एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।
ठेका लो, चंदा दो-नया राजनीतिक कॉन्ट्रैक्ट
रिपोर्ट के अनुसार, 2022–24 के बीच बीजेपी को उत्तर-पूर्व के इन चार राज्यों से कुल ₹77.63 करोड़ का चंदा मिला। इसमें से 54.89%-यानी लगभग ₹42.61 करोड़-प्रत्यक्ष रूप से उन ठेकेदारों और व्यवसायियों से आया, जिन्हें केंद्र या राज्य सरकारों से सरकारी ठेके, टेंडर या नियामकीय मंजूरियाँ मिली थीं।
यह सिर्फ एक संयोग नहीं। यह एक पैटर्न है, जिसे जितना पढ़ते जाएँ, उतना साफ होता जाता है।
असम में तो हालात लगभग textbook example की तरह हैं-2022–23 में बीजेपी को मिले चंदे में से 64.48% उन्हीं हाथों से आया जो सरकारी काम पा चुके थे। अगले ही साल यह अनुपात 52.34% रहा। चुनावी फंडिंग का यह मॉडल लोकतांत्रिक राजनीति नहीं, बल्कि एक ‘कॉन्ट्रैक्टर इकॉनोमी’ का नमूना है, जिसमें कारोबार और राजनीति एक-दूसरे को पोषित करते हैं।
इस ‘मॉडल’ में कौन-कौन शामिल हैं?
इस रिपोर्ट में दिए गए उदाहरण किसी निजी अफवाह या राजनीतिक आरोप का हिस्सा नहीं, बल्कि दस्तावेज़-आधारित तथ्य हैं।
1. एसपीएस कंस्ट्रक्शन
असम में पुल बनाने का ठेका—और एक वित्तीय वर्ष में भाजपा को ₹5 करोड़ का दान।
बिहार में इसी कंपनी का एक पुल पहले ढह चुका था। लेकिन उसकी योग्यता पर सवाल खड़े करने के बजाय, उसे ठेके और सत्ता पक्ष को चंदे दोनों मिलते रहे।
2. धानुका समूह
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बेहद करीबी माने जाने वाले अशोक धानुका के नेटवर्क से जुड़ी कंपनियों ने 2023–24 में ₹3.35 करोड़, और पिछले वर्ष ₹90 लाख का दान बीजेपी को दिया।
इसी समूह की एक कंपनी-घनश्याम फार्मा- नेशनल हेल्थ मिशन से नियमों को दरकिनार करते हुए टेंडर हासिल किए।
राजनीति और व्यवसाय का यह अद्भुत संयोग भारतीय लोकतंत्र का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान बता रहा है।
3. बद्री राय एंड कंपनी
मेघालय विधानसभा भवन का गुंबद गिरा, लेकिन इस कंपनी को ठेके मिलते रहे, और 2023–24 में बीजेपी को ₹1 करोड़ का चंदा भी गया।
4. स्टार सीमेंट
2023–24 में ₹5 करोड़ का चंदा, तीन साल में ₹6.68 करोड़।
और इसके तुरंत बाद असम सरकार के साथ ₹3,200 करोड़ के क्लिंकर प्रोजेक्ट पर MoU।
साथ ही, BRO और IOC जैसी संस्थाओं से 18 टेंडर।
5. एलई सैमस बोरंग (अरुणाचल)
2023–24 में ₹4.3 करोड़ का दान।
इनकी फर्म को राज्य PWD और NHPC से तीन बड़े ठेके।
चंदा ही नहीं, जानकारी भी छुपाई गई
यह खुलासा केवल चंदे के पैटर्न तक सीमित नहीं।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने बताया कि बीजेपी ने चुनाव आयोग को दिए गए अपने दानकर्ताओँ के लॉग में सैकड़ों दानदाताओं की पहचान छुपाई।
यह सिर्फ तकनीकी ग़लती नहीं, बल्कि पारदर्शिता के सिद्धांत का जानबूझकर उल्लंघन है।
मतलब, जो सामने आया है, वही “कंज़र्वेटिव फिगर” है-असल कहानी काफी बड़ी हो सकती है।
कानूनी, लेकिन नैतिक रूप से भ्रष्ट मॉडल
चंदा लेना गैरकानूनी नहीं।
ठेकेदार द्वारा चंदा देना भी कानून के दायरे में है।
यही बात इस पूरे मॉडल को खतरनाक बनाती है।
इलेक्टोरल बॉन्ड्स के ज़रिये भी इसी तरह राजनीति और कारपोरेट फाइनेंसिंग को वैधानिक बनाने का प्रयोग किया गया था—और उसी तरह यह सिस्टम भी सत्ता और पूंजी के गठजोड़ को कानूनी बना कर, नैतिक रूप से भ्रष्ट कर देता है। यह चंदा नहीं, अनिवार्य टैक्स है—जिसे रिपोर्ट में सही ही कहा गया: “संस्थागत रंगदारी”।
उत्तर-पूर्व: ‘एक्ट ईस्ट’ से ‘कॉन्ट्रैक्टर इकॉनमी’ तक
बीजेपी ने दावा किया था कि वह उत्तर-पूर्व को विकास के मुख्यधारा में ला रही है।
लेकिन विकास की पूरी अवधारणा अब सरकारी खर्चों पर निर्भर ठेकेदारों, उप-ठेके और मुनाफे के नेटवर्क में तब्दील हो गई है।
आज उत्तर-पूर्व में वास्तविक अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि सिंडिकेट-चालित अर्थव्यवस्था पनप रही है—जहाँ कुछ मुट्ठीभर ठेकेदार सरकारी योजनाओं, फंड और प्रोजेक्ट पर कब्ज़ा रखते हैं, और वही राजनीतिक चंदे के मुख्य स्तंभ भी बन जाते हैं।
यह लोकतंत्र नहीं, सत्ता-प्रेरित आर्थिक केंद्रीकरण है।
बीजेपी अपने “संगठन” पर गर्व करती है—लेकिन सवाल यह है कि वह संगठन किन मूल्यों पर काम कर रहा है?
संगठन का स्वभाव है-
“सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता।”
यह एक बंद चक्र है, जिसमें अपनों को लाभ देना ‘कार्यशैली’ बन जाती है।
समाज का स्वभाव इसके उलट है—
न्याय प्रधान होना, समानता पर आधारित होना, और शक्ति-संतुलन बनाए रखना।
एक समाज में कानून PM से लेकर नागरिक तक, सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए।
रिपोर्ट साफ कहती है कि बीजेपी का वर्तमान मॉडल इस बुनियादी लोकतांत्रिक चरित्र को चोट पहुँचाता है—जहाँ संगठन का हित, सामाजिक हित से ऊपर रखा जा रहा है।
इस खुलासे का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह सिर्फ एक पार्टी का मामला नहीं बता रहा।
यह यह भी दिखाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह जिस राजनीतिक मॉडल को स्थापित कर रहे हैं, वह किस तरह सत्ता के केंद्रीकरण, आर्थिक निर्भरता और राजनीतिक वफादारी पर आधारित है।
जब सरकारी ठेके, अनुमतियाँ और नीति-निर्णय उसी पार्टी के हाथों की तरफ बहने लगें जो सत्ता में हो—तो लोकतंत्र सिर्फ एक औपचारिक ढाँचा रह जाता है।
और सबसे चिंता की बात यह है कि यह सब कुछ उत्तर-पूर्व जैसे संवेदनशील, पिछड़े और राजनीतिक रूप से उपेक्षित क्षेत्र में हो रहा है—जहाँ विकास की जरूरत, लोकतांत्रिक सुरक्षा की तुलना में कहीं अधिक है।
नतीजा: यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, लोकतांत्रिक ढाँचे का क्षरण है
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की यह पड़ताल दस्तावेज़ी सबूतों के ज़रिये हमें बताती है कि
यह एक संगठित मॉडल है—
सत्ता→ ठेका→ चंदा→ और ज़्यादा सत्ता।
अगर यह मॉडल अनियंत्रित चलता रहा, तो आने वाले वर्षों में नीति-निर्माण न जनता के हित में होगा, न समाज के हित में बल्कि उन कॉन्ट्रैक्टर-पूंजीपतियों के हित में जो सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक ऑक्सीजन बन चुके हैं।
लोकतंत्र की सेहत इस पर निर्भर करेगी कि क्या इस खुलासे को विपक्ष, मीडिया, न्यायपालिका और नागरिक समाज गंभीरता से लेते हैं—या इसे भी एक और ‘न्यूज़ साइकिल’ की भेंट चढ़ने दिया जाएगा।
-Lala Bauddh के फेसबुक वाल से
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