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Friday, June 5, 2026
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बिहार का कुख्यात प्रेस बिल, जिसके कारण जगन्नाथ मिश्र की कुर्सी गई, वर्तमान सत्ता के लिए सबक बन सकता है…!

बिहार प्रेस बिल के खिलाफ आंदोलन की एक तस्वीर वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अशोक वर्मा ने साझा की है, जिसमें वे स्वयं नजर आ रहे हैं. 
अशोक वर्मा

31 जुलाई 1982 को बिहार में जगन्नाथ मिश्र के शासनकाल में आजाद पत्रकारिता को कुचलने के मकसद से कुख्यात प्रेस बिल पारित हुआ था। लेकिन पत्रकारों के जुझारू प्रदर्शन-आंदोलन के परिणामस्वरूप काला प्रेस बिल तो वापस हुआ ही, डॉ जगन्नाथ मिश्र की कुर्सी भी चली गई थी। उस दौर में मीडिया में जेपी और वाम आंदोलनों से निकले आदर्शवादी युवाओं की फौज भरी हुई थी। इसलिए काले प्रेस बिल का बिहार सहित पूरे देश में तीव्र विरोध शुरू हो गया था.

दरअसल. 1982 में बिहार के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र मीडिया की आलोचनाओं से इतने बौखला गए थे कि प्रेस का मुंह बंद करने के उद्देश्य से विधानसभा से पारित करा कर एक बेहद ख़तरनाक काला कानून बना डाला था। उस जमाने में भी सत्ता के चाटुकार पत्रकार होते थे, पर संख्या में गिनती के ही थे।

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अशोक वर्मा ने पटना में प्रेस बिल के खिलाफ हुए मुखर आंदोलन की एक तस्वीर साझा की है. वे अपने दोस्तों के साथ एक ऐतिहासिक, अविस्मरणीय, दुर्लभ और गर्व का अहसास दिलाने वाली 38 साल पुरानी तसवीर शेयर किया है। श्री वर्मा ने कहा कि यह तसवीर मुझे आज ही पटना के मेरे पुराने मित्र और सीनियर फोटो जर्नलिस्ट राजीव कांत ने भेजी तो मैं सुखद आश्चर्य से भर उठा।

पोस्ट देख बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट दीपक कोचगवे जी ने तारीख़ बता दी। मौन जुलूस 1 अगस्त, 1982 को निकला था। इसके एक दिन पहले 31 जुलाई को बिहार विधानसभा में कुख्यात प्रेस बिल पारित हुआ था। दीपक जी भी जुलूस में शामिल थे। दीपक जी को बहुत धन्यवाद.

यह तसवीर प्रेस बिल के विरोध में पटना में हुए पत्रकारों के मौन जुलूस की है। जूलूस में सभी अखबारों के संपादकों सहित सैकड़ों की संख्या में मीडियाकर्मी और यहां तक कि अखबार वितरण से जुड़े हॉकर भी शामिल थे। जुलूस को राजभवन जाकर राज्यपाल को ज्ञापन देना था। मौन जुलूस बेली रोड होते हुए राजभवन की ओर बढ़ रहा था। पुलिस ने नया सचिवालय के पहले स्थित चौराहे की बैरिकेडिंग कर सड़क बंद कर दी थी।

वे बताते हैं कि सड़क पर बैरिकेडिंग देख जुलूस का नेतृत्व कर रहे सीनियर पत्रकारों के तो कदम ठिठक गए, पर हम युवा पत्रकार जोश और आक्रोश से भर उठे। मैं, राजीव रंजन नाग और अंचल सिन्हा दनदनाते हुए बैरिकेड तक पहुंच गए और पुलिस से बहस शुरू हो गई। इस तस्वीर में मैं पुलिस से बहस कर रहा हूं। जेपी आंदोलन में पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ने का अनुभव साथ था ही। हमलोग बैरिकेड तोड़ने पर उतारू हो गए।

पत्रकार संघर्ष समिति का आंदोलन और लाठी चार्ज

फिर क्या था, पुलिस ताबड़तोड़ लाठियां बरसाने लगी। एक तगड़ा लट्ठ मेरे सिर के पीछे लगा सिर फूट कर खून बहने लगा। हमें पीटता देख पत्रकार संघर्ष समिति के अध्यक्ष इंडियन नेशन के संपादक डीएन झा, पत्रकार यूनियन के नेता शिवेंद्र सिंह तथा अन्य सीनियर पत्रकारों ने विरोध किया तो पुलिस उन पर भी टूट पड़ी। सभी पत्रकारों को हिरासत में लेकर पटना कोतवाली थाना ले जाया गया।

लाठीचार्ज की घटना के बाद देश भर के पत्रकार आक्रोशित हो उठे थे। दिल्ली, जयपुर, मुंबई में पत्रकारों ने हेलमेट पहन कर विरोध प्रर्दशन किया। पटना लाठीचार्ज के कुछ ही दिनों बाद मैं अपने गृहनगर झुमरीतिलैया (कोडरमा) में प्रेस बिल के खिलाफ प्रर्दशन करते हुए गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। मेरे साथ दो पत्रकार साथी और तीन राजनीतिक कार्यकर्ता भी एक महीने जेल में रहे और सरकार द्वारा मुकदमा वापस लेने के बाद ही रिहा हुए।

क्या था बिहार प्रेस बिल ?

ठीक चार दशक पूर्व भारतीय मीडिया पर एक और सरकारी हमला हुआ था। तारीख थी 4 अगस्त। प्रेस को क्लीव बनाने की सुनियोजित साजिश थी। बिहार विधान मंडल (परिषद भी) ने प्रेस बिल पारित कर दिया था। कांग्रेसी मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र द्वारा उनके आलोचक-पत्रकारों को यह नायाब तोहफा था। इसके ठीक सात वर्षों पूर्व  (25 जून 1975) इंदिरा गांधी ने भी सेंरशिप थोप कर आपातकाल की घोषणा कर दी थी।

मगर आपातकाल की तुलना में बिहार प्रेस बिल अत्यंत चतुरायी से रचा गया था। इसके प्रावधानों के तहत यदि कोई खोंमचावाला भी अखबार के टुकड़े में चना लपेट रहा हो और उसमें सरकार विरोधी खबर छपी हो, तो वह फेरीवाला भी जेल भेजा जा सकता था। इतना जटिल तथा निकृष्ट था प्रेस बिल ! यहां याद दिला दें कि दोबारा सत्तासीन होने पर इंदिरा गांधी ने फिर वैसा ही प्रयोग करना चाहा था। उस समय मेनका-संजय गांधी और सास इंदिरा गांधी के बीच ठन गयी थी। उनके संबंधों के बीच उपजे हालात की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई थीं. इससे इंदिरा गांधी आहत थीं। लेकिन आपातकाल के परिणामस्वरूप उन्हें सबकुछ बर्दाश्त करना पड़ा था.

आज का मीडिया सत्ता की छत्रछाया में 

मौजूदा केंद्र सरकार की गोद में बैठे पत्तलकारों का एक बड़ा समूह (गोदी मीडिया) सत्तापक्ष का चंवर डुला रहा है. उसकी छत्रछाया में पल-बढ़ रहा है. सोशल मीडिया जरूर विरोध करने की हिम्मत जुटाता है और गाहे-बगाहे सरकार की कार्यशैली का विरोध करता है. नतीजतन कुछ पत्रकारों को जेल भेज कर चुप कराने की कोशिश की जाती है. वहीं खबरिया चैनलों के कुछ निर्भीक पत्रकारों को चैनल से निकलवा दिया जा रहा है या फिर चैनल ही खरीद लिया जा रहा है. ये सब एक दशक पूर्व से हो रहा है. अब देखना है कि ये सब कबतक और कैसे चलता रहेगा…?   


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