गुमला न्यूज़ ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया
गुमला: गुमला के किसानों के लिए गाजर की खेती अतिरिक्त आमदनी का एक अच्छा विकल्प बन सकती है। पौष्टिकता से भरपूर गाजर की बाजार में मांग बनी रहती है। स्थानीय किसानों के मुताबिक, वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर कम लागत में अच्छी गुणवत्ता की फसल तैयार की जा सकती है और बाजार से बेहतर आमदनी हासिल की जा सकती है।
गाजर में बीटा-कैरोटीन, विटामिन, जरूरी खनिज तत्व और डाइटरी फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए मौसम, मिट्टी की गुणवत्ता और सिंचाई का सही प्रबंधन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
ठंडा और शुष्क मौसम गाजर के लिए बेहतर
गाजर की अच्छी फसल के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु अनुकूल मानी जाती है। इसके पौधों और जड़ों के विकास के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान को आदर्श बताया गया है।
मिट्टी की बात करें तो गाजर के लिए हल्की, भुरभुरी, गहरी और अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी बेहतर रहती है। मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच होना उपयुक्त माना गया है। खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे गाजर की जड़ों के आकार और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
बुआई से पहले खेत की तैयारी जरूरी
गाजर की खेती शुरू करने से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करना जरूरी है। इसके लिए 2 से 3 बार गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा और समतल किया जा सकता है। अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर करीब 20 से 25 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाने की सलाह दी गई है।
किसान बुआई के लिए पूसा केसर, पूसा रुधिर और पूसा जमदग्नि जैसी उन्नत किस्मों का चयन कर सकते हैं।
सितंबर से नवंबर तक बुआई का सही समय
गाजर की बुआई के लिए सितंबर से नवंबर के बीच का समय उपयुक्त बताया गया है। बीजों को करीब 1.5 से 2 सेंटीमीटर की गहराई पर कतारों में बोना चाहिए। कतार से कतार की दूरी 20 से 30 सेंटीमीटर रखने की सलाह दी गई है।
बुआई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए और बीजों के अंकुरण तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है।
सिंचाई में रखें खास सावधानी
गाजर की फसल में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए। मौसम और मिट्टी की स्थिति को देखते हुए करीब 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। हालांकि, खेत में जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचना चाहिए।
बुआई के करीब 15 से 20 दिन बाद पौधों की छंटाई यानी थिनिंग करनी चाहिए, ताकि पौधों के बीच पर्याप्त दूरी बनी रहे और जड़ों को विकसित होने के लिए उचित जगह मिल सके।
खरपतवार और खाद पर भी दें ध्यान
फसल की शुरुआती अवस्था में नियमित निराई-गुड़ाई करना जरूरी है। इससे खेत में खरपतवार नियंत्रित रहते हैं और गाजर के पौधों को बेहतर विकास का अवसर मिलता है।
उर्वरक का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर ही करना बेहतर है। खास तौर पर नाइट्रोजन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल गाजर की जड़ों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।
इस तरह सही मौसम, उपयुक्त मिट्टी, बेहतर किस्म और वैज्ञानिक खेती पद्धति अपनाकर गुमला के किसान गाजर की खेती को अपनी अतिरिक्त आय का जरिया बना सकते हैं।







