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Tuesday, October 13, 2026
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गुमला का दुर्गाबाड़ी (बंगाली क्लब ) द्वारा प्रारंभ किया गया – नवरात्र माँ दुर्गा पूजा ( त्योहार ) अब समस्त गुमला जिला में विशाल रूप ले चुका है

गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

आस्था, परंपरा और इतिहास की 105 वर्ष पुरानी विरासत

गुमला : – गुमला शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान दुर्गाबाड़ी ( बंगाली क्लब ) गुमला का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल नवरात्र मां दुर्गा की पूजा का स्थल नहीं, बल्कि गुमला में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत, बंगाली संस्कृति के संरक्षण और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच सामुदायिक एकता की एक लंबी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है, बल्कि
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार गुमला में पहली सार्वजनिक दुर्गा पूजा वर्ष 1921 में बंगाली समुदाय द्वारा शुरू की गई थी। उस समय गुमला आज जैसा विकसित शहर नहीं था, बल्कि छोटा-सा कस्बाई क्षेत्र था। ब्रिटिश शासन के दौर में कोलकाता और बंगाल क्षेत्र से यहां आकर बसे बंगाली परिवार ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने के उद्देश्य नवरात्र माँ दुर्गा की पूजा शुरू की।

1921 : गुमला में नवरात्र माँ दुर्गा पूजा की पहली शुरुआत

गुमला की नवरात्र माँ दुर्गा पूजा के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष 1921 माना जाता है।

स्थानीय ऐतिहासिक स्मृतियों के अनुसार बंगाली समुदाय के लगभग दस लोग उस समय गुमला में आकर बसे थे। इनमें वकील, ठेकेदार और व्यवसाय से जुड़े लोग शामिल थे। अपने साथ वे बंगाल की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराएं भी लेकर आए।

इन्हीं लोगों ने वर्तमान बंगाली दुर्गाबाड़ी ( बंगाली क्लब ) गुमला परिसर में नवरात्र माँ दुर्गा की पूजा प्रारंभ की। एक अन्य स्थानीय विवरण में बताया गया है कि शुरुआत में पांच बंगाली परिवारों ने स्थानीय लोगों की सहभागिता के साथ कलश पूजा से परंपरा शुरू की थी। बाद में प्रतिमा स्थापित कर विधिवत नवरात्र माँ दुर्गा पूजा का स्वरूप विकसित हुआ।

यही वह धार्मिक शुरुआत थी जिसने आगे चलकर गुमला में नवरात्र माँ दुर्गा पूजा को एक बड़े सामुदायिक ने भव्य नवरात्र मां दुर्गा पूजा (त्योहार ) में बदल दिया।
उस दौर का गुमला और दुर्गाबाड़ी
आज जहां पक्का भवन, सड़क, बिजली और शहर की चहल-पहल दिखाई देती है, वहां लगभग एक सदी पहले का दृश्य बिल्कुल अलग था।
स्थानीय बुजुर्गों के संस्मरणों के अनुसार उस समय दुर्गाबाड़ी का भवन खपरैल और मिट्टी की संरचना वाला था। पूजा के लिए अस्थायी व्यवस्था करनी पड़ती थी और मां दुर्गा की मूर्ति को मिट्टी से बने मां दुर्गा की मूर्ति को सुखाने के लिए उस समय नीली रोशनी वाले लैंप का इस्तेमाल किए जाने की स्मृति भी स्थानीय लोगों ने साझा की है।
पूजा के लिए मूर्तिकार और पुरोहित बंगाल से बुलाए जाते थे। संसाधन सीमित थे, लेकिन माता भवानी के प्रति श्रद्धा – विश्वास – भक्ति और सामुदायिक उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

एक छोटे से भवन में शुरू हुई पूजा धीरे-धीरे गुमला की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

प्रारंभिक संस्थापकों की भूमिका

गुमला में दुर्गा पूजा की इस ऐतिहासिक शुरुआत में कई लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

स्थानीय स्रोतों में रेवती मोहन सेन, लाल बाबू, कन्हैयालाल घोष, प्राण रंजन सेन और हरिदास अधिकारी जैसे लोगों का नाम प्रमुखता से मिलता है। इन्हीं अग्रणी लोगों के प्रयासों से नवरात्र मां दुर्गा पूजा ( त्योहार ) की व्यवस्था आगे बढ़ी।
उनका उद्देश्य केवल पूजा आयोजित करना नहीं था, बल्कि परदेश में रहते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी इस प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

इस दृष्टि से दुर्गाबाड़ी (बंगाली क्लब ) केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि उस समय गुमला में बसे बंगाली समाज के लिए सांस्कृतिक मिलन केंद्र भी रहा।

दुर्गाबाड़ी (बंगाली क्लब ) : केवल पूजा स्थल नहीं

“दुर्गाबाड़ी (बंगाली क्लब) गुमला” नाम अपने भीतर ही एक व्यापक सांस्कृतिक उद्देश्य को समेटे हुए है।
शुरुआती दौर में यहां धार्मिक आयोजन के साथ-साथ बंगाली समाज के लोग आपस में मिलते-जुलते थे। पूजा के अवसर पर सांस्कृतिक गतिविधियां होती थीं और समुदाय के लोग अपनी भाषा, साहित्य, गीत संगीत तथा सामाजिक परंपराओं से जुड़े रहते थे।
इस प्रकार बंगाली क्लब ने गुमला में रहने वाले बंगाली परिवारों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन इसकी सबसे बड़ी विरासत बनी— नवरात्र मां दुर्गा की सार्वजनिक पूजा

आस्था : नवरात्रि मां दुर्गा के प्रति पीढ़ियों का विश्वास

बंगाली क्लब की दुर्गा पूजा में आस्था का स्वरूप बंगाल की पारंपरिक पूजा-पद्धति से गहराई से आज भी जुड़ा हुआ है।
मांँ भवानी- मांँ दुर्गा यहां केवल भक्ति और शक्ति की देवी नहीं, बल्कि परिवार और समाज की आराध्या के रूप में पूजित हैं। नवरात्र और दुर्गोत्सव के दौरान श्रद्धालु मांँ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और सुख-शांति, समृद्धि तथा परिवार की मंगलकामना करते हैं।

पूजा के दिनों में मंदिर परिसर में शंखध्वनि, घंटियों की आवाज, धूप-अगरबत्ती की सुगंध और मंत्रोच्चार का वातावरण श्रद्धालुओं को धार्मिक अनुभूति से भर देता है।

पुरानी परंपरा को बनाए रखते हुए आज भी पूजा में बंगाली रीति-रिवाजों की छाप दिखाई देती है।
परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता : पुरानी पूजा-पद्धति का संरक्षण

बंगाली क्लब की पूजा की विशेष पहचान यह है कि आधुनिकता के बावजूद पुरानी पूजा-पद्धति को बचाए रखने का प्रयास किया जाता है।

2013 में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में पूजा समिति से जुड़े लोगों ने बताया था कि पूर्वजों द्वारा शुरू की गई पूजा-पद्धति और उसकी मौलिकता को आज भी बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

यह परंपरा केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है।

मांँ दुर्गा, मांँ लक्ष्मी मांँ सरस्वती, भगवान गणेश महाराज और भगवान कार्तिक महाराज की प्रतिमा, पूजा की विधि, पुरोहितों की परंपरा, सांस्कृतिक वातावरण और सामूहिक आयोजन—इन सभी में पुराने समय की स्मृतियों को जीवित रखने का प्रयास दिखाई देता है।

बंगाल से गुमला तक : मूर्तिकारों – रोहित की परंपरा सहित
इस दुर्गा पूजा की एक उल्लेखनीय विशेषता परंपरागत बंगाला की झलक वाली प्रतिमा निर्माण की परंपरा भी है।

ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि शुरुआती वर्षों में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए बंगाल से मूर्तिकार बुलाए जाते थे। बाद के वर्षों में भी बंगाल से जुड़े कलाकारों और पुरोहितों की परंपरा जारी रही। 2025 की रिपोर्ट में पूजा से जुड़े लोगों ने बताया कि मूर्ति बनाने वाले एक कारीगर परिवार की चौथी पीढ़ी तक के कलाकार गुमला आकर प्रतिमा निर्माण करते रहे हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि यह केवल गुमला में आयोजित बंगाली शैली की पूजा नहीं, बल्कि बंगाल की पारंपरिक कला और शिल्प को भी यहां तक लाने वाली सांस्कृतिक कड़ी रही है।

सौ साल पुराना लकड़ी का आधार

बंगाली क्लब की दुर्गा पूजा की ऐतिहासिकता का एक अनूठा पहलू पुराना लकड़ी का संरचना मंच है।

स्थानीय पूजा समिति से जुड़े लोगों के अनुसार जिस लकड़ी के संरचना मंच पर लगभग एक सदी पहले से लेकर आज भी मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती हैं, उसका उपयोग आज भी पूजा में किया जा रहा है।

यह संरचना मंच केवल लकड़ी का ढांचा नहीं हैं बल्कि यह उन हजारों श्रद्धालुओं की स्मृतियों का प्रतीक है जिन्होंने अलग-अलग पीढ़ियों में उसी पर स्थापित मां भवानी – मांँ दुर्गा के दर्शन कर रहे हैं।

एक दृष्टि से देखें तो उक्त लकड़ी की संरचना – मंच – गुमला की माँ दुर्गा पूजा के इतिहास का जीवित दस्तावेज है।
1921 से 2026 तक : परंपरा की लंबी यात्रा

वर्ष 2026 में गुमला की बंगाली क्लब की माँ दुर्गा पूजा परंपरा 105 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। सितंबर 2026 की स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार सनातन दुर्गा पूजा समिति, जिसे दुर्गाबाड़ी (बंगाली क्लब) के नाम से भी जाना जाता है, ने 2026 के दुर्गा पूजा और काली पूजा आयोजन की तैयारियों के लिए नई कार्यकारिणी का गठन किया।
इसका अर्थ है कि 1921 में शुरू हुई धार्मिक परंपरा ने एक सदी से अधिक समय पार कर लिया है।

इतने लंबे समय में शासन बदला, सामाजिक व्यवस्था बदली, गुमला शहर का विस्तार हुआ और जीवनशैली में बड़ा परिवर्तन आया— लेकिन दुर्गाबाड़ी में मांँ दुर्गा की आराधना की परंपरा आज बनी हुई है।

ब्रिटिश काल से स्वतंत्र भारत तक

नवरात्रि माँ दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह है कि इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल में हुई

1921 में जब देश स्वतंत्र नहीं हुआ था, उस समय गुमला में बंगाली समुदाय के लोगों ने अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को कायम रखते हुए मां दुर्गा की पूजा शुरू की।

इसके बाद देश ने स्वतंत्रता प्राप्त की।

गुमला जिला और पूरा क्षेत्र सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन से गुजरा।

लेकिन दुर्गाबाड़ी की पूजा लगातार आगे बढ़ती रही।

इस दृष्टि से बंगाली क्लब की नवरात्रि मां दुर्गा पूजा केवल धार्मिक इतिहास नहीं, बल्कि गुमला के सामाजिक परिवर्तन की भी साक्षी है।

सामुदायिक एकता का केंद्र

बंगाली क्लब की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है कि समय के साथ यह पूजा केवल बंगाली समाज तक सीमित नहीं रही।

स्थानीय हिंदू समाज के प्रमुख लोगों ने भी नवरात्र दुर्गा पूजा में प्रारंभ से ही पूजा में सहभागिता निभाता रहा, पुराने विवरणों में स्थानीय लोगों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।

आज यह नवरात्र मां दुर्गा पूजा ( त्योहार ) व्यापक सामुदायिक सहभागिता का रूप ले चुकी है।

यही कारण है कि गुमला की नवरात्र माँ दुर्गा पूजा ( त्योहार ) केवल किसी एक समुदाय का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक साझेदारी का नवरात्र माँ दुर्गा पूजा ( त्योहार ) समस्त गुमला जिला में एक विशाल रूप ले चुका है।


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