गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया
आस्था से जुड़ी एक ऐतिहासिक परंपरा
गुमला : – गुमला जिला मुख्यालय स्थित मालवीय नगर करौंदी ग्राम में दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति – शक्ति और आस्था, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। गुमला नगर के निकट स्थित मालवीय नगर, करौंदी में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा इसी परंपरा का एक उल्लेखनीय हिस्सा है। यहां मां दुर्गा की आराधना के अवसर पर स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ आसपास के गांवों के लोग भी उत्साहपूर्वक सहभागिता बताई जाति हैं।
मालवीय नगर, करौंदी में दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1953 में हुई थी। इस लिहाज से यह आयोजन सात दशकों से अधिक पुरानी धार्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। मालवीय नगर करौंदी, तेलगांव और आसपास के ग्रामीण इलाकों के श्रद्धालुओं की भी भागीदारी इस उत्सव को स्थानीय स्तर पर विशेष पहचान देती है।
1953: करौंदी की दुर्गा पूजा का महत्वपूर्ण वर्ष
करौंदी की दुर्गा पूजा के इतिहास में वर्ष 1953 को महत्वपूर्ण माना जाता है, उल्लेख है कि मालवीय नगर, करौंदी में 1953 से दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है, बड़े बुजुर्गों का मानना है कि उस वक्त बलि प्रथा का भी प्रचलन था, उसके अलावे दुर्गा पूजा के दशमी को मालवीय नगर करौंदी में रावण दहन और रात्रि में मेले का आयोजन किया जाता है l
उस दौर गुमला और आसपास के क्षेत्रों का सामाजिक जीवन स्तर काफी हद तक ग्रामीण परिवेश, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक सहभागिता से जुड़ा हुआ था। ऐसे वातावरण में धार्मिक आयोजन लोगों को एक साथ लाने और सामूहिक रूप से पर्व,त्योहार मनाने का अवसर प्रदान करते थे।
हालांकि, उक्त दुर्गा पूजा की शुरुआत किन किन व्यक्ति या परिवार ने की, शुरुआती आयोजन कहां पर हुआ, पहली प्रतिमा किसने स्थापित की और पहली पूजा का खर्च कितना था—इन सवालों के प्रमाणित विवरण उपलब्ध नहीं हैं । इसलिए इन तथ्यों की पुष्टि के लिए संबंधित स्थानीय बुजुर्गों, पुराने पूजा आयोजकों और समिति के अभिलेखों से जानकारी लेना आवश्यक होगा।
करौंदी और आसपास के गांवों की भागीदारी
करौंदी की दुर्गा पूजा की एक महत्वपूर्ण विशेषता आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से श्रद्धालुओं का करौंदी और तेलगांव सहित आसपास के गांवों से संबंधित बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने का उल्लेख किया जाता है।
दुर्गा पूजा के अवसर पर मंदिर या पूजा स्थल में दर्शन, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है। ऐसे आयोजन स्थानीय लोगों को अपनी परंपराओं से जुड़े रहने और सामूहिक रूप से त्योहार मनाने का अवसर देते हैं।
इस प्रकार करौंदी की दुर्गा पूजा को केवल एक मोहल्ले का धार्मिक आयोजन मानने के बजाय आसपास के ग्रामीण समाज से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भी देखा जा सकता है।
गुमला की व्यापक दुर्गा पूजा परंपरा से करौंदी का संबंध
मालवीय नगर करौंदी की दुर्गा पूजा को बेहतर ढंग से समझने के लिए गुमला जिले की व्यापक धार्मिक परंपरा पर भी नजर डालना जरूरी है।
गुमला शहर की दुर्गाबाड़ी में बंगाली समुदाय द्वारा वर्ष 1921 में दुर्गा पूजा शुरू किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त, पालकोट क्षेत्र में नागवंशी राजा यदुनाथ शाह द्वारा वर्ष 1765 में मां दसभुज्जी सह दुर्गा पूजा प्रारंभ किए जाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
उक्त ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि गुमला क्षेत्र में दुर्गा पूजा की परंपरा के अलग-अलग केंद्र और अलग-अलग ऐतिहासिक पड़ाव रहे हैं, मालवीय नगर करौंदी ग्राम में दुर्गा पूजा 1953 में प्रारंभ करने का स्थानीय परंपराओं के इतिहास में एक अलग और महत्वपूर्ण अध्याय है।
साथ ही साथ यह ध्यान रखना जरूरी है कि पालकोट प्रखंड और गुमला शहर की दुर्गाबाड़ी और मालवीय नगर, करौंदी की पूजा को एक ही आयोजन या एक ही स्थापना-इतिहास का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।
बदलते समय के साथ धार्मिक उत्सव का महत्व
समय के साथ किसी भी धार्मिक आयोजन का स्वरूप बदल सकता है, और उक्त पीढ़ियों की भागीदारी, स्थानीय संसाधन, आयोजन की व्यवस्थाएं और संबंधित लोगों की बदलती जरूरतें पर्वों (त्योहारों ) को एक नया रूप देती हैं। करौंदी में दुर्गा पूजा की निरंतरता भी स्थानीय धार्मिक जीवन में इसके महत्व को दर्शाती है।
हालांकि, करौंदी में शुरुआती वर्षों से लेकर वर्तमान समय तक पंडालों के आकार, बजट, प्रतिमा निर्माण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजन समितियों में हुए बदलावों का क्रमवार प्रमाणित विवरण जुटाना अभी आवश्यक है। पुराने छायाचित्र, समिति की बैठक-पुस्तिकाएं, चंदे के रजिस्टर और स्थानीय समाचार पत्र इस दिशा में उपयोगी स्रोत हो सकते हैं।
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत
दुर्गा पूजा जैसे पर्व धार्मिक आस्था के साथ – साथ सामाजिक आपसी मेलजोल का अवसर भी बनते हैं। ऐसे आयोजनों में स्थानीय परिवारों, युवाओं, बुजुर्गों और आसपास के गांवों के लोगों की सहभागिता सामुदायिक संबंधों को मजबूत कर सकती है।
करौंदी की दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक पहचान को सामने लाने के लिए उन लोगों की भूमिका दर्ज करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, जिन्होंने वर्षों तक उक्त आयोजन में अपना योगदान दिया और पुराने आयोजकों, पुजारियों, स्थानीय परिवारों और समिति के सदस्यों के साक्षात्कार इस इतिहास को अधिक जीवंत और विश्वसनीय बना सकते हैं।
विरासत को दर्ज करने की जरूरत
मालवीय नगर, करौंदी ग्राम गुमला की दुर्गा पूजा का वर्ष 1953 से चला आ रहा इतिहास गुमला की स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सात दशकों से अधिक पुरानी यह परंपरा क्षेत्र में मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और सामुदायिक सहभागिता की निरंतरता को दर्शाती है।
उक्त विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए केवल पूजा की तिथि और वर्ष दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित संस्थापकों, शुरुआती आयोजनों, पुराने रीति-रिवाजों, आर्थिक सहयोग और समय के साथ आए बदलावों को भी प्रमाणों के साथ संकलित किया जाना चाहिए।
करौंदी की दुर्गा पूजा का संपूर्ण इतिहास तभी अधिक प्रामाणिक रूप में सामने आएगा, जब लिखित अभिलेखों के साथ स्थानीय लोगों की स्मृतियों और पुराने दस्तावेजों को भी सुरक्षित किया जाएगा। यही प्रयास इस धार्मिक परंपरा को गुमला की सांस्कृतिक पहचान के एक स्थायी अध्याय के रूप में स्थापित कर सकता है।