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Tuesday, June 30, 2026
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झारखण्ड का जामताड़ा साइबर अपराधियों का अड्डा

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झारखण्ड का जामताड़ा जिला पुरे देश में बदनाम होता जा रहा है वजह जानकर आप हैरान होंगे | देश की २२ प्रदेशों की पुलिस साल में एक दो बार जामताड़ा के चक्कर लगा जाती है साइबर चोरों को खोजने के लिए | जामताडा साइबर अपराध का अड्डा बनता जा रहा है यहाँ पर जयदतर यवा साइबर अपराध को ही अपना रोज़ी रोटी का जरिया बना रखे हैं ,

कुछ साल पहले यहाँ से कुछ युवक दिल्ली गए नौकरी की तलाश में और वह पर उनलोगों ने साइबर ठगी की कला को सीखा और इजी मनी के चक्कर में इस काम में एक्सपर्ट हो गए वापस आकर उन्होंने ये काम अपने जामताड़ा के घर से ही चालू कर दिया और दूसरे युवको को भी अपने साथ कर लिया | जामताड़ा के आस पास घने जंगलों से इनको काफी फायदा मिलता है और कभी पुलिस आये तो ये जंगलो में जाके चुप जाते है | इस छोटे से जिले में अपना साइबर पुलिस स्टेशन है जो समय समय पर करवाई करके इनसे ठगी का माल बरामद करती रहती है बदनामी का हाल ये है की यहाँ पर लड़कियों की सदी होनी मुश्किल हो गई है कही से भी इनके लिए रिस्ता आना बंद हो गया है पुलिस यहाँ के युवा को एड्रेस प्रूफ देने से कतराती है | अगली बार जब आपके पास बैंक वाले का आधार नंबर अपडेट कराने के लिए किसी का फ़ोन आये तो एक बार पूछ लीजियेगा भाई जामताड़ा से तो नहीं बोल रहे हो |

जनहित मे जारी – आपकी छोटी सी गलती कर सकती है आपके बैंक का खाता साफ , साइबर ठग से कैसे बचें लिंक का विडियो जरूर देखे , लाइक और शेयर करके अपने मित्रो को साइबर फ़्रौड से बचाए
https://www.youtube.com/watch?v=RHY2h1s1j_I

राम भक्तों के लिए

मन्नतें पूरी करते है ये झारखंडी बाबा

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गिरिडीह से करीब ४० किलोमीटर दूर खरगडीहा स्थित लगटा बाबा का मजार है | कहा जाता है की एक बार लंगटा बाबा अपने साथी संत साधुओं के साथ यात्रा मे जा रहे थे , रास्ते में खरगडीहा पहुँचते ही लंगटा बाबा का मन्न हुआ की ध्यान यही लगया जाए, और लंगटा बाबा यही रुक गए खरगडीहा के थाना के बगल मे वह अपना ध्यान लगाने लगे जिसके वजह से उस वक़्त के पुलिस कर्मी ने लंगटा बाबा को बहुत परेशान किया फिर भी बाबा उसी जगह पर अड़े रहे, पुलिस को लंगटा बाबा पागल लगते थे क्योंकि वह लिबास नही पहनते थे इस वजह से पुलिस बाबा को वहां से भागना चाहते थे लेकिन बाबा को वहीं ध्यान करना था इसलिए वे उसी जगह डटे रहे, धीरे धीरे आस पास के लोग बाबा को पसंद करने लगे और बाबा को पास में ही एक निश्चित स्थान दिए, जहां पर बाबा अपना ध्यान अच्छा से लगा सके, समय बीतता चला गया और 25/01/1910 ईo मे लंगटा बाबा दुनिया से चल बसे . लेकिन तब तक बाबा को इस क्षेत्र के सारे लोग चाहने लगे थे इसलिए जिस जगह पर वो रहते थे उसी जगह पर लोगों ने बाबा की समाधि बना दी . जिसे दुनिया आज लंगटा बाबा की समाधी के नाम से जानती है | अब बाबा की याद में पौ पूर्णिमा मे मेला लगाया जाता है, यहाँ बाबा की समाधि पर मन्नत मांगने, चादर चढ़ाने और बाबा की दर्शन करने राज्य के हर कोने से लोग हजारों की तादात मे आते है हालत ये हो जाती है की बाबा की दर्शन के लिए 2KM की लाइन लग जाती है फिर भी लोग इसी तादाद मे आते है और बाबा की दर्शन कर चादर चढ़ा जाते है, संत साधुओं के एक मिशाल मे से एक लंगटा बाबा भी मिसाल है। लोगों का कहना है की बाबा के दर से कोई खाली नहीं जाता और बाबा सबकी मन्नते पूरी करते है अगर आप गिरिडीह जाए तो एक बार बाबा के दर्शन जरूर करें |

राम भक्तों के लिए

दवाई दोस्त, आम आदमी की संजीविनी

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भगवान् कभी किसी को गरीब न बनाये , गरीबी अपने साथ कई दुःख दर्द लाती है इन्ही दुखो में एक है इलाज़ का खर्चा , आजकल छोटी से छोटी बीमारी के इलाज़ का खर्च भी हज़ारो में आ जाता है तो सोचिये गरीब जिसकी दिन की कमाई ही कुछ रूपये होता वो महंगे इलाज़ का खर्चा कैसे उठा पता होगा | डॉक्टर की फीस और फिर महंगी दवाई का खर्चा | देश में गरीबो के बारे में जिनको सोचना चाहिए वो पैसे कमाने में वस्त हैं ऐसे में रांची की एक स्वयंसेवी संसथान प्रेमसंस और बारोलिया ट्रस्ट ने एक अनोखा पहल किया है उन्होंने जेनेरिक दवा दुकानों की श्रेंख्ला झारखण्ड में चालू की है , गेनिरिक दवा की परिभाषा है एक जेनेरिक दवा एक दवा है जिसे खुराक के रूप, सुरक्षा, शक्ति, प्रशासन के मार्ग, गुणवत्ता, प्रदर्शन विशेषताओं और इच्छित उपयोग के लिए पहले से ही विपणन ब्रांड नाम वाली दवा के रूप में उपयोग किया जाता है। ये समानताएं जैवविविधता को प्रदर्शित करने में मदद करती हैं, जिसका अर्थ है कि एक जेनेरिक दवा उसी तरह से काम करती है और इसके ब्रांड-नाम संस्करण के समान नैदानिक ​​लाभ प्रदान करती है। दूसरे शब्दों में, आप इसके ब्रांड-नाम समकक्ष के लिए एक समान विकल्प के रूप में एक जेनेरिक दवा ले सकते हैं। सीधे सब्दो में कहा जाए तो जेनेरिक दवा वही असर करती है तो ब्रांडेड दवा करती है जो बड़ा फर्क है वो है दामों का , एक ब्रांडेड दवा जिसकी कीमत १० रूपये होती है वो दवा अगर आप जेनेरिक में ले तो शायद उसकी कीमत सिर्फ १ रुपया या उससे भी काम हो सकती है यानि के आपको ब्रांडेड दवा की जगह जेनेरिक दवा बहुत सस्ते में आएगी | आप जब भी डॉक्टर के पास जाए तो उनसे अनुरोध कीजियेगा की आपको जेनेरिक दवा लिखे आपको ये दवा रांची में किसी भी दवाई दोस्त के सेण्टर पर मिल जाएगी | दवाई दोस्त एक गैर लाभकारी सस्ता है जो लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने का कार्य करती है रांची में इनके अनेक सेण्टर है आप किसी भी सेण्टर में जाके अपने डॉक्टर के दिए पर्चे को दिखाकर सस्ती जेनेरिक दवा ले सकते हैं ये बिलकुल वैसे ही असर करेगी जैसी की ब्रांडेड दवा करती है, जो लोग महंगी दवा नहीं ले सकते वो दवाई दोस्त जाके सस्ती दवाई ले उनके लिए दवाई दोस्त संजीविनी है , निचे रांची में दवाई दोस्त के सेण्टर का पता दिया हुआ है आप इन पतों पर जाके अपनी दवाई ले सकते हैं .

राम भक्तों के लिए

अफसोस है ऐसे देश पर (कविता)

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अफसोस है ऐसे देश पर जहां के लोग भेड़ (भीड़) हैं,
जहां उनके चरवाहे ही उनको गुमराह करते हैं।
अफसोस है ऐसे देश पर जिसके नेता ही झूठ बोलते हैं,
और वहां के सज्जन लोग चुप रहते हैं,
और जहां की फिजाओं में, धर्मांधता, का डेरा है।
अफसोस है ऐसे देश पर जो मानवता पर जुल्म के खिलाफ आवाज नहीं उठाता है,
सिवाय धर्मोन्मादियों की जय जय कार के,
और स्तुति करता है दंगाइयों की नायक की तरह,
जिसका लक्ष्य पांच ट्रिलियन की इकॉनमी होना है, बल से और छल से।
अफसोस है ऐसे देश पर जो केवल अपनी भाषा जानता है दूसरे देशों की नहीं,
जो केवल अपनी संस्कृति जानता है दूसरों की नहीं।
अफसोस है ऐसे देश पर जहां प्रेम अलग-थलग पड़ गया हो और अलगाववाद केंद्र में हो,
और जो खाए पिए अघाये लोगों की गहरी नींद सोता हो,
अफसोस है ऐसे देश पर ओह! उसके ऐसे लोगों पर,
जो अपने अधिकारों को बंधक रख चुके हों,
जिनकी स्वतंत्रता उनके आत्मसम्मान के साथ धुल चुकी हो।
अफसोस है ऐसे देश पर जहां नागरिकता शब्द के अर्थ बनने से पहले से रह रहे नागरिकों से नागरिकता का प्रमाण मांगा जाता है।
कागज की खोज होने से पहले का कागज मांगा जाता हो।
मेरे देश! तुम्हारे आंसू,
इस प्यारी धरती की आजादी के लिए हैं।
©संदीप यादव

राम भक्तों के लिए

कवयित्री रजनी नैय्यर की कलम से – बोनसाई स्त्री

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जब भी उग जाती हूँ
खर पतवार सी,
कर दो मेरी निराई|
तुम्हारे लिए तो मैं
मखमली दूब हूँ…
मैं हूँ ग्रामीण बोनसाई
उग जाती हैं जैसे भी !
कभी हिचकती नहीं
छांटते रहो टहनियाँ
उफ़ नहीं करेगी
रोप् दिया बाबा ने तुम्हारे
आँगन में मुझे,
जब भी खिलूँगी
तुम्हारे आँगन में ही खिलूँगी…
मनभावन फसल की चाह में,
छाँटते रहो क़द मेरा
दे दो कोई मनचाहा आकर |
बाँध दो मेरी ऊँचाई की परिधि
मेरे अहम को सुलाते रहो
याद दिलाकर सातो वचन |
घेर दो मेरे हौसलों की ऊँचाई को,
बनकर मेरा आसमान …
दुखों ने भी पा लिया है अमरता |
मिटते देखा है कभी किसी ने
स्त्री की पीड़ा को ?
हर युग में स्त्री पीड़ा
नए सिरे से खड़ी
हो जाती है ।
देने हरियाली तुम्हारे आँगन को
पी लिया है अपने ही स्वेद
और आँसुओं को ।
क्या मेरी तरह ही होती हैं
शहरी बोनसाई ?

नाम ——— रजनी मल्होत्रा (नैय्यर) .
जन्म स्थान ——- झारखण्ड के पलामू जिले (कुमंदी ग्राम )लालन -पालन राँची में
जन्म की तिथि — —– ७-जून-
वर्तमान पता ——- बोकारो थर्मल (झारखण्ड)
शिक्षा —— झारखण्ड एवं उ .प्र में. इतिहास (प्रतिष्ठा) से बी.ए.संगणक
विज्ञान में बी .सी. ए. एवं हिंदी से बी.एड . राँची इग्नोऊ से हिंदी में
स्नातकोत्तर | इतिहास में स्नातकोत्तर | हिंदी में पी.एच. डी.
भाषा लेखन —हिंदी, पंजाबी, उर्दू
लेखन- गीत, ग़ज़ल, कहानियां, कविताएँ.
सम्प्रति —– ( संगणक विज्ञान की शिक्षिका)
कविता संग्रह ——– “स्वप्न मरते नहीं “
ग़ज़ल संग्रह — “चाँदनी रात “
साझा काव्य संग्रह ” ह्रदय तारों का स्पन्दन ” ,” पगडंडियाँ ” व् मृगतृष्णा
नूर-ए-ग़ज़ल ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लें प्रकाशित ।
प्रकाशन की प्रतीक्षा में — कहानी संग्रह – “वो बुरी औरत” व् दूसरी कविता संग्रह –“शोहदों का सफ़र”
विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित . मंच पर सामयिक सामाजिक, राजनीतिक व् नारी सम्बन्धित रचनाओं का काव्य पाठ हिंदी विकाष परिषद् द्वारा सम्मान प्राप्त |19 वॉ अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन 2011 (आगरा )में सम्मानित 20वॉ अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन 2012 (गाज़ियाबाद )में सम्मानित | साहित्यांचल द्वारा रंजना चौहान सम्मान 2013 भीलवाड़ा राजस्थान से प्राप्त | श्रीनगर उर्दू अकादमी द्वारा 2014 में सम्मान प्राप्त। 2017 में अटल सम्मान , 2018 में दिल्ली और नेपाल द्वारा ग़ज़ल कुम्भ में सम्मानित । 2018 प्रभात ख़बर द्वारा अपराजिता सम्मान । सुरभि सलोनी पत्रिका में “वो बुरी औरत ” चर्चित धारावाहिक कहानी मेरे द्वारा लिखे गए | हिंदी पत्रिका वागर्थ, कादम्बिनी, पाखी, अदबी दहलीज़ , आदि के साथ – साथ, अंतरजाल पर रचनाएँ प्रकाशित | पंख पत्रिका की सलाहकार ,। मंडी टुडे त्रैमासिक पत्रिका का संपादन, कनाडा की त्रैमासिक पत्रिका हिंदी चेतना में रचनाएँ प्रकाशित |अब्जद ,इंसा , बिहार उर्दू एकेडमी, उर्दू टुडे, अदीब कर्नाटक उर्दू एकेडमी ,सदा
कश्मीर, ज़र्रीन शोआयें, बंगलौर, उफ़ुके अदब, महफिले फनकार, आजकल दिल्ली ,आदि उर्दू पत्रिकाओं में , रचनाएँ प्रकाशित .” माँ दा नाम ध्या लौ भगतों “पंजाबी सी. डी .के गीत मेरे द्वारा लिखे गए |

राम भक्तों के लिए

समय याद रखेगा – प्रोफेसर संदीप यादव

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समय याद रखेगा
इस दिन को
जब पूरा विश्व
डगमगा रहा था
तब
भारत जगमगा रहा था ।
देश अदृश्य रोग के भय
से काँप रहा था,
कोई लोकप्रियता की नब्ज
भाँप रहा था।
इतिहास याद रखेगा
इस दिन
जब पूरा संसार
दुख के प्रलय को
मिटा रहा था,
देश कालरात्रि के अँधेरे
को बनावटी उजाले
में छुपा रहा था।
प्रोफेसर संदीप यादव , दिल्ली विश्वविद्यालय ।

राम भक्तों के लिए

भयानक काली अँधेरी रात – सुवीर कुमार परदेशी

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पहले तो कभी कभी अँधेरी रात होती थी , जिसमे कुछ उम्मीद की रोशनी होती थी ,
अब भयानक काली अँधेरी रात है ,
नाही रोशनी है नहीं उम्मीद की किरण है ,
अपने हिम्मत और बलबूते यहाँ तक अँधेरे में अकेले आ गया हु ,
कुछ लोग मेरे साथ भी बढ़ चले है ,
मगर उनके पास चाईंनिज टोर्च है ,
पता नहीं कब मुझे अँधेरे का लाभ उठाकर अपनी टोर्च की रौशनी में मुझे छोड़ जाएं ,
कहना मुश्किल है ,
जमाना ख़राब है किन्तु हम तो अभी भी वही है , जो अँधेरे में भी लोगों को रोशनी दिखाते है ,
पता नहीं वही रोशनी भगवान मुझे कब दिखाएंगे जिसके सहारे ,
घनघोर काली अँधेरी रात से निकल पाऊं,

लेखक – सुवीर कुमार परदेशी पटना , बिहार

राम भक्तों के लिए

सुप्रसिद्ध भजन गायिका प्रीति सरगम सिंह से एक मुलाक़ात

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झारखंड वीकली की टीम ने आज जबलपुर, मध्य प्रदेश की रहने वाली सुप्रसिद्ध भजन गायिका प्रीति सरगम से मुलाक़ात की और उनके बारे मे जानने का मौका मिला प्रीति जी ने कहा मुझे संगीत के क्षेत्र में आये हुए १४ साल हो गए , गायन का शौक बचपन से था पर राजपूत होने के कारण घरवालों ने इस क्षेत्र में आने की आज्ञा नहीं मिली और कोई घर में संगीत के क्षेत्र से नहीं था फिर भी अंदर से ये आशा थी की कभी तो गाऊँगी और एक बार किसी मित्र से ऑर्केस्ट्रा मे गाने का मौका मिला जब मैं घर से बाहर पढ़ने आई उसके बाद दो साल तक सभी प्रकार के गीत गाते रही और जब मैंने देखा की भजन गाने मे काफी सम्मान मिल रहा है तो मेरा रुझान भजनो की और और हो गया और फिर मैं केवल भजन गाने लगी , फिर माता के जगराता गाते गाते श्याम बाबा के दरबार पहुची और 2014 मे पहली बार बाबा के दरबार गई और उनसे मेरा ऐसा रिस्ता जुड़ा की कोई और रिस्ता याद ही नहीं रहा मैं बस चलते गई मेरे जुनून तो संगीत था ही पर श्याम बाबा भजनो को गा कर मुझे जो नाम शोहरत प्यार मिला वो मैं बता नहीं सकती और बचपन मे मुझे स्कूल मे जब संगीत के कारण मुझे एक अलग स्थान मिला था वो आज सपना सफल हुआ आज आप सभी प्रीति सरगम के नाम से अपना चैनल है और आप हर प्रकार के संगीत का आनंद ले सकते हैं
T सिरीज़ मे 1, माता ऐसा मेला लगाया 2, खप्पर काली का
सुंदरणी म्यूजिक मे 1, भस्मासुर भोले नाचे 2, , राम के नाम अनमोल
यूकी म्यूजिक से 1, नाता सरकार आ रहे हैं , श्याम सलोना
मैंने बहुत सारे भजन खुद भी लिखे हैं और मुंबई के कई कंपनियो के लिए भजन भी गाये हैं
मैंने अपनी मेहनत , लगन और श्रोताओं के प्यार से बहुत सारी उपलब्धि प्राप्त की है करोना काल मे मैंने एक गीत गया जिसको काफी पसंद किया गया और जबलपुर के सभी अखबारो मे मेरे नाम आया उस गीत को आप शुक्रिया नाम से सुदर्शनी कंपनी से सुन सकते हैं
आज जो कुछ हु अपनी मेहनत और संगीत से प्रेम के कारण हु क्योकि उससे जायदा प्रेम और किसी कार्ये मे नहीं मिलता

राम भक्तों के लिए

गिरिडीह – कोरोना पीड़ितों के लिए मसीहा बने समाज सेवी विजय सिंह

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गिरिडीह – आज के दौर में यह कहावत बिल्कुल चरितार्थ हो रही है कि जब भगवान खुद से कार्य नहीं करते तो वे कुछ नेक दिल इंसानों में यह गुण एक उपहार की भांति दे देते हैं और वह गुण है मानवता की सच्ची लगन से सेवा। न फल की चिंता न किसी प्रकार का डर।
इसी कड़ी में झारखंड राज्य के एक छोटे से शहर गिरिडीह के निवासी बिजय सिंह जी। बिजय सिंह जी ने इस कोरोना के दूसरे लहर में जो सामाजिक कार्य किया उसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। सबसे पहले जहाँ कोरोना के नाम से ही एक आम आदमी के दिल और दिमाग मे सिहरन दौड़ जाती है वहीं हमारे नेक दिल बिजय सिंह जी अपने सारे जरूरी कार्यों को छोड़कर कोरोना ग्रषित परिवार या उस व्यक्ति की सेवा में निकल पड़ते हैं। अभी हाल ही में शहर के सबसे चर्चित खबर जिसमें जाने माने अधिवक्ता स्व. श्री मुकेश सिन्हा जी जिनकी असामायिक मृत्यु कोरोना संक्रमण से हो गई थी, इस संकट की घड़ी में उनका सारा परिवार भी कोरोना से ग्रषित हो गया था , उनके शव के अंतिम संस्कार की विकट समस्या उत्पन्न हो गई तब इस संकट की घड़ी में बिजय सिंह जी ने मानवता का परिचय देते हुए अपने एक और मित्र अविनाश जी के साथ शव का सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार कराया। फिर क्या था उन्होंने तब ही से यह प्रण लिया कि जब तक यह कोरोना संकट काल है तब तक वह लोगों की निःस्वार्थ भाव से सेवा करते रहेंगे। बिजय सिंह जी का कहना है कि सुबह से लेकर रात्रि के किसी भी पहर में उनके मोबाइल पर जब भी संदेश प्राप्त होता है चाहे वो ऑक्सीजन सिलिंडर हो या खाना या जीवनरक्षक दवा मदद शीघ्र से शीघ्र मरीज तक पहुँचा दी जाती है। गिरिडीह शहर के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान सुभाष ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन के निदेशक बिजय सिंह जी के अंदर सेवा-भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ इस बार के कोरोना संकट काल में वे मदद कर रहे हैं पिछले वर्ष में जब पहली बार कोरोना संक्रमण का पता चला था उस समय भी उनके मन को कोई डिगा नहीं पाया और लगातार अपने सीमित संसाधनों के मदद से लोगों की सेवा करते रहे।
आपातकालीन सेवाओं के अलावे बिजय सिंह जी शहर के कोरोना संक्रमित मरीजों के यहाँ दिन भर
खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी ली है। प्रतिदिन लगभग 75 से 100 कोरोना मरीजों को इनकी टीम के द्वारा खाना पहुंचाया जाता है।
बिजय सिंह जी की एक और अनूठी पहल है “प्यार बांटते चलो”। यह एक मुहिम है जिसमें बिजय सिंह जी और उनके कुछ दोस्तों के द्वारा यह मुहिम चलाई गई है जिसमें कोई भी गरीब भूखा न सोये। इसी मुहिम के अंतर्गत आज भी असहाय लोगों को मुफ्त भोजन, जीवनरक्षक दवाइयां, ऑक्सिजन सिलिंडर इत्यादि मुहैया कराया जा रहा है। इनका यह कार्यक्रम सालों भर चलता रहता है। इस कलियुगी स्वार्थी समाज में जहाँ लोग सामान्य दिनों में मदद करने से कतराते हैं वहाँ बिजय सिंह सर निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा में तत्पर रहते हैं।
जबसे कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु दर में वृध्दि हुई है प्रतिदिन किसी न किसी परिवार में मृतक के शव का अंतिम संस्कार कराने का कार्य भी बिजय सिंह जी कर रहे हैं। जो काम आज के समय में जिला प्रशासन को करनी चाहिये वही काम बिजय सिंह जी अकेले कर रहे हैं।
बिजय सिंह सर की जितनी भी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। हमारा समाज सदैव उनके द्वारा राहत कार्यों और निःस्वार्थ भाव से किये गए कार्यों का सदैव ऋणी रहेगा। बिजय सिंह जी और उनकी पूरी टीम को प्रणाम और आभार !!!!

राम भक्तों के लिए

आलेख: रुक गयी ज़िन्दगी – रजनी मल्होत्रा नैय्यर

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बोकारो थर्मल – भागते- दौड़ते इंसान की तेज़ रफ़्तार को अचानक से प्रकृति ने एकदम से ब्रेक लगा दी !
एक से बढ़कर एक भौतिक सुख- साधनों की वृद्धि,परमाणु हथियारों का निर्माण ,प्रकृति से होड़ या यूँ कहें प्रकृति को सीधी चुनौती ।उसके ही बनाये नियमों का सीधे – सीधे विखंडन । इंसान से ख़ुदा का फ़र्क़ मिटाना एक घनघोर अपराध । तमाम सुविधाओं से जकड़ा मानव इंसान से कब शैतान बन गया वो स्वयं नहीं जान सका , विकास के नाम पर उसने कुछ निधियाँ हासिल की । पर, ये निधियाँ उसपर हावी होती स्पर्धा, के नीचे दबती चल गईं और यही निधियाँ उनके किये गए दुरूपयोग से मनुष्य का विनाश बनकर उभरी । वक़्त सँभलन का सभी को वक़्त देता है, पर हम बाह्य विकास की होड़ में इस क़दर भागने लगे कि मानव के आंतरिक गुणों को भूल बैठे, प्रकृति फिर भी हमें समझाती रही, अपने तरह -तरह के बदलते संकेतों के द्वारा , पर विज्ञान की तरक़्क़ी के बल पर मनुष्य ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा उसने प्रकृति के द्वारा प्रदत्त किये गए उपभोग की वस्तुओं का कभी दुरूपयोग किया कभी दोहन । हर बार प्रकृति से लड़कर जीतता रहा मानव ,पर उन जीत के पीछे हर बार क़ुर्बान हुई कई- कई ज़िंदगियाँ । इन्हीं तमाम सवालों के बीच उलझते फिर से विश्व एक ही छत नीचे आ गया है । वही संदेह शंकाएँ , कौन बड़ा प्रकृति या पुरुष ? विज्ञान का आकलन पूरी तरह धर्म पर ही आधारित है , पर धर्म क्या है ? वाह्य आडम्बरों से जो भरा है वो धर्म है ,अथवा मानवता की सच्ची सेवा धर्म है । अंतरात्मा से की गई उस परब्रम्हपरमेश्वर की वंदना अथवा कर्मकांडों में लिपटे हुए तन्त्रोक्त साधना , व मूर्ति पूजन ?
इन तमाल सवालों के कोई उपयुक्त जवाब न होंगे हमारे पास । अलग- अलग देशों में सबके धर्म , देव व उनसे जुड़े अनुष्ठान अलग-अलग हैं । मतैक्य में मतभेद अवश्यम्भावी है। मनुष्य के विकास की परंपरा और सफ़र अबाध रूप से चलता रहे , इसी विकास के होड़ ने विश्व को कभी दो भागों में बाँट कर 2 विश्वयुद्ध भी दिए । जिसके परिणति स्वरूप विश्व के कई देश वर्षों तक दुःख, ग़रीबी और टूटी अर्थव्यवस्था के रूप में झेलते रहे । आज फिर हम उसी मोड़ पर आकर समेकित रूप से खड़े हो गए हैं जहाँ बाज़ारवाद ने अपने पैर फैलाने के लिए, अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए , दूसरे राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था को डाँवाडोल करने के लिए विश्व को एक नई मुसीबत ( कोरोना ) से सामना करने के लिए घुटनों पर खड़ा कर दिया है , अब इस परिस्थिति में ये मुसीबत मनुष्य प्रदत है अथवा प्रकृति प्रदत्त कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता इसके परिणाम पर । क्योंकि, इसकी चपेट में आनेवाली ज़िंदगियाँ देश, राज्य, अमीर-ग़रीब बड़ा, छोटा, रंग, जाति सबका भेद त्याग कर सबको समान रूप से गले लगा रही, मानो कह रही है प्रकृति की नज़र में सभी एक समान हैं , यदि कोई भेद की नीति है तो वो तुम मनुष्यों द्वारा बनाई गई है ।
परमाणु के आविष्कारक भी अपने हथियार डाले बैठे हैं , इंसान जब किसी मुसीबत में पड़ता है तभी उसे उसके किये गए अच्छे-बुरे कर्म याद आते हैं और वो अपने इष्ट को याद करता है ये जानते हुए कि वो कहीं नहीं दिखते फिर भी मन में एक यक़ीं होता है उसे, कोई एक शक्ति है जो उसे इस संकट से उबार लेगी ।फिर यहीं से शुरू होता है एक और सफ़र आस्था, अनास्था का । आज वो सारे साधन हमें मुँह चिढ़ा रहे, न परमाणु हथियार काम आ रहे न कपड़ों से भरी आलमारियाँ । हम मोटरगाड़ियों की खरीदारी के लिए क़तारों में नहीं लग रहे,न ही किसी सजावटी वस्तु को लेने की होड़ में हैं । उफ़ कितनी सीमित साधनों में सिमट गया है आज का मानव ! बस उन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं में सिमट कर रह गया है फिरसे । प्रकृति उसे उसी आदम युग में खीच कर ले आयी जहाँ उसका एकमात्र उद्देश्य था खाद्य सामग्री का संग्रहण । अपनी ज़रूरतों के लिए प्रकृति का उपभोग करते करते दुरुपयोग की सीमा तोड़ विज्ञान की पकड़ से प्रकृति को झुकाने की अनर्गल कोशिशें करते मानव जब अपनी अहम की अट्टालिकाएँ , बढ़ाने लगा ,क्या उसे सचेत करने प्रकृति को इस तरह समझाना पड़ा ! एशिया क्या यूरोप क्या दक्षिणी क्षेत्र और क्या पूर्वी क्षेत्र । निर्माण की एक छोटी सी इकाई जिसे देख पाना असंभव है, उस अनदेखे आतंक ने विश्व को हिलाकर मानव की ईंट से ईंट बजा कर रख दी है । लोगों को दहशत में जीने को मजबूर कर भाषा, खान-पान, जलवायु, मौसम रंग,लिंग भेद सबका भेदभाव छोड़कर एक सकारात्मक संदेश के साथ सबको गले लगाते काल के गाल में धकेलता चला जा रहा कि प्रकृति के लिए सभी समान हैं, कोई नस्ल,धर्म भेद नहीं ।
अचानक इस विश्वव्यापी मुसीबत (कोरोना )से मानव जाति को बहुत कुछ सीखने को भी मिला है बहुत सारी भूलों को सुधारने का मौक़ा भी ।
वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास करते – करते विश्व कलिंग युद्ध के रचयिता के रूप में परिवर्तित हो गया । करने लगा निर्माण विनाशक शक्तियों का । हर शक्तिशाली देश ख़ुद को दूसरे देश से अधिक शक्तिशाली बनाने में लग गए , कमज़ोर राष्ट्र दबाए जाने लगे ,नीतियों द्वारा प्रस्तावों द्वारा बाज़ार के रास्ते खुले एकदूसरे से प्रगति की दौड़ में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी, फलस्वरूप देशों के अर्थव्यवस्था में अंतर आये माँग बढ़ी बाजार बढ़े ।
राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय बाजार बढ़ने लगे विचार बदले ,
अर्थव्यवस्थाएँ बदली परिवेश बदले भौतिकता ने ख़ूब पंख फैलाये , विकसित और विकसित हुए विकासशील प्रयत्नशील रहे । सात समंदर की दूरियों को मिटा कर विश्व के तार एकदूसरे से जुड़ने लगे ,
वैश्वीकरण होने से अर्थव्यवस्था के साथ पाश्चात्य संस्कृति भी दूसरे संस्कृतियों में घुलने लगी। आदान -प्रदान के दौर में सभी देशों ने दूसरे देशों से बहुत कुछ आत्मसात किये संस्कृतियों में नई -नई चीजें जुड़ने लगी । विश्वगुरु बन हमने पाश्चात्य को सिखाया तो
पाश्चात्य से बहुत कुछ आत्मसात किया ।मानव ने भौतिकता की अंधी दौड़ में भूला दिया कि प्रकृति ने मानव को एक श्रेष्ठ जीव के रूप में धरती पर बना कर भेजा है । हर ओर दम्भ, झूठ, आतंक, जीव हत्या, धर्म के नाम पर लूट पाखंड ,व्यभिचार बढ़ गए । ज्ञान अज्ञानियों के बोझ तले दब गया , धर्म की परिभाषा बदल गयी, नारी का स्थान बदल गया ।
हर ओर विनाश के संकेत ,चहुँओर ओर छा गया तो बस एक यही विचारधारा सामने वाले को कुचलते हुए अपनी मंज़िल की ओर जाना है । समय की धारा को मनुष्य अपने अनुसार चलाने लगा , संयम खो गए, सहृदयता जवाब दे गई, हृदय में कुटिलता का वास हो गया ।मानव समाज की सबसे छोटी इकाई होती है परिवार जिससे जुड़ कर जीवन की हर छोटी बड़ी खुशियों को साझा किया जाता है , तभी तो मनुष्य समाज का निर्माण करता है पर बदलते वक़्त की मेहरबानी देखिए भौतिकता में डूबे अपने सुख-सुविधाओं को बढ़ाने की ललक में न दो वक्त चैन की साँस ले पाया इंसान न चैन का निवाला नसीब उसे। दोहरे चरित्र के मनुष्यों के कार्य भी दोहरे चरित्र वाले हो गए , अधिक मुनाफ़े के चक्कर में अनाजों सब्जियों दुग्ध पदार्थों में भी कई तरह की मिलावट पाए जाने लगे रासायनिक पदार्थों के मिश्रण से उनकी गुणवत्ता खराब कर लोगों के सेहत और जीवन को संकट हुआ परिणाम , मौसमी बदलाव के कारण उत्पन्न बीमारियों से लड़ने की क्षमता (इम्युनिटी )घटने लगी
व्यसनों बुराईयों में घिर कर मन की एकाग्रता ख़त्म , मशीन के साथ जुड़ कर मानव के शारीरिक श्रम वाले सारे कार्य बंद हो गए जिससे शरीर को चुस्त बनाने वाली धातुओं का बनना कम हुआ या बनने बंद हो गए जिससे कई बीमारियों ( मधुमेह, उच्च रक्तचाप ,मोटापा जैसी ) को न्योता मिला ।दूषित भोज्य पदार्थों को खा पीकर व्यसन में डूबने से कई अनैतिक कार्यों को बढ़ावा मिला । ” जैसा अन्न वैसा मन ” कहा भी गया है । सोने उठने के नियम भी बदलती समय की माँग कहें या मजबूरी ,मशीनी जीवन ने इंसान को पूर्णरूप से मशीन कर छोड़ दिया । पर समय समय पर प्रकृति ने बहुत कुछ बदलाव करते रहे हैं , और उन्हीं बदलाव के कई परिणाम हमने अब तक सुने और देखे हैं ।
बद से भी कुछ अच्छाई निकल कर आती है जैसा कि हमें स्पष्ट नज़र आ रहे ।
भाग – दौड़ की दुनिया में इंसान इतना थक गया कि उसे अपने परिवार को देने के लिए प्यार की जगह उपेक्षा और अवहेलना मिले ।
अपनों के पास बैठने के लिए वक़्त की कमी , पर सैकड़ो मीलों दूर के रिश्ते ऑनलाइन जुड़ कर बनने और निभने लगे।
नैतिकता के बंधन टूटने लगे ,मर्यादाओं को भूल कर कई रिश्ते ऐसे बनें जिससे बसे बसाए घर टूटने लगे ।
रिश्तों की गरिमा , त्याग, समर्पण, धार्मिक भावनाएँ सब आहत होने लगीं ।
इंसान ही इंसान का शत्रु बन बैठा । मन कर्म और वचन से झूठे होने लगे लोग।
सृष्टि के निर्माण के बाद संसार में बढ़ते अनैतिकता को रोकने के लिए प्रकृति को किसी न किसी रूप में पाठ पढ़ाना ही पड़ा है ,इस बार भी प्रकृति ने इंसानों को चुनौती दी है विज्ञान को चुनौती दी है ,मंदिरों मस्जिदों गिरजाघरों में ताले लगवा कर ईश्वर ये सन्देश दे रहा लोगों को “पत्थरों में नहीं सच्चे हृदय में मेरा निवास है” मानवता की सेवा निरीहों की सेवा ही सच्चा धर्म है
। आज जो लोग दिख रहे इन माध्यमों में ( डॉ, नर्स, सफाईकर्मी आदि ) उनके ही रूप में भगवान नज़र आएँगे ,बस ज़रूरत है अन्तर्रात्मा को जगा कर देखिए । कोरोना का संकट भी हमें प्रकृति ने एक सूत्र में जोड़कर रखने के लिए दिए हैं देखिए स्पष्ट है।
सभी लोग इसकी ख़ुराक बन रहे कोई अमीर,गरीब, बड़ा छोटा नहीं ।
जन्म के अनुसार इंसानों ने कार्यों का बंटवारा किया, प्रकृति सबको एक क़तार में ले आयी ।
आज सभी अपने कार्य स्वयं कर रहे।
सबकी ज़रूरत एक है भोजन , आज विश्व इसी के लिए चिंतित है ।
प्रकृति सभी को एक जगह लाकर खड़ा कर दी है।
मनुष्य की मंशा को प्रकृति ने भी अपनी हामी भर दी
मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु होने लगा , यहाँ प्रकृति ने भी क्या सजा सुनाई है तत्काल परिस्थिति यही है मनुष्य की नज़दीकी से उसके छूने से मनुष्य की मौत होगी ।
ये आपदा प्रकृति प्रदत्त है तो भी चेतावनी है मानव जाति को उसकी भागती रफ़्तार और वसुधा में फैलते जाने वाली बेलगाम मानव बेल को रोक लगाने की क्योंकि प्रकृति सिर्फ़ मानव की नहीं समस्त जीवों की भी उतनी ही है जितनी मानव की ।
प्रकृति का न्याय देखिए आज समस्त मानव जाति घरों में दुबकने के लिए मजबूर है और अन्य जीवन सड़कों पर बेख़ौफ़ हैं ।
यदि ये आपदा मानवकृत है तो भी चेतावनी है विश्व को भविष्य के लिए, अन्यथा विनाश तो निश्चित है क्योंकि जो ” उत्पन्न है वो अमर नहीं “
रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल झारखंड

लेखक परिचय रजनी मल्होत्रा (नैय्यर) बोकारो थर्मल (झारखण्ड) शिक्षा – झारखण्ड एवं उ .प्र में. इतिहास (प्रतिष्ठा) से बी.ए.संगणक विज्ञान में बी .सी. ए. एवं हिंदी से बी.एड . राँची इग्नोऊ से हिंदी में स्नातकोत्तर | इतिहास में स्नातकोत्तर | हिंदी में पी.एच. डी. भाषा लेखन —हिंदी, पंजाबी, उर्दू लेखन- गीत, ग़ज़ल, कहानियां, कविताएँ. सम्प्रति ( संगणक विज्ञान की शिक्षिका) कविता संग्रह “स्वप्न मरते नहीं “ ग़ज़ल संग्रह – “चाँदनी रात ” साझा काव्य संग्रह ” ह्रदय तारों का स्पन्दन ” ,” पगडंडियाँ ” व् मृगतृष्णा नूर-ए-ग़ज़ल ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लें प्रकाशित । प्रकाशन की प्रतीक्षा में — कहानी संग्रह – “वो बुरी औरत” व् दूसरी कविता संग्रह –“शोहदों का सफ़र”

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