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Wednesday, November 4, 2026
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नशे के अवैध कारोबार पर सख्ती, अवैध खनन पर नियंत्रण एवं कारा सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करने को लेकर उपायुक्त एवं पुलिस अधीक्षक गुमला की संयुक्त अध्यक्षता में समीक्षा बैठक आयोजित

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

अवैध गतिविधियों पर नियमित छापेमारी, यातायात नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई तथा कारा के विस्तारित खंड में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने के निर्देश

गुमला : – गुमला उपायुक्त दिलेश्वर महतो एवं पुलिस अधीक्षक हारिस बिन ज़मां की संयुक्त अध्यक्षता में आज एन.सी.ओ.आर.डी. (नारकोटिक्स कोऑर्डिनेशन), कारा सुरक्षा, परिवहन एवं खनन से संबंधित संयुक्त समीक्षात्मक बैठक आयोजित की गई। बैठक में संबंधित विभागों द्वारा संचालित कार्यों की समीक्षा करते हुए उपायुक्त ने विभिन्न महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की तथा संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

नशे के अवैध कारोबार पर नियंत्रण को लेकर उपायुक्त ने सभी प्रखंडों में अफीम एवं ब्राउन शुगर जैसे मादक पदार्थों के अवैध कारोबार पर कड़ी निगरानी रखने तथा नियमित रूप से सघन जांच अभियान चलाने का निर्देश दिया। पुलिस अधीक्षक ने सभी थाना प्रभारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में लगातार जांच अभियान संचालित करने, शहरी क्षेत्रों के संदिग्ध स्थानों पर विशेष निगरानी रखने तथा विद्यालयों के आसपास मादक पदार्थों की बिक्री एवं आपूर्ति रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। त्योहारों के दौरान विशेष सतर्कता बरतते हुए शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी जांच अभियान तेज करने को कहा गया। उत्पाद विभाग को संदिग्ध स्थानों एवं लाइन होटलों में अवैध शराब की बिक्री पाए जाने पर नियमानुसार प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया। साथ ही, मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में वाहनों की सघन जांच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।

खनन विभाग की समीक्षा के दौरान अवैध खनन एवं परिवहन में संलिप्त वाहनों के विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी ली गई। पिछली बैठक के बाद तीन वाहनों के पकड़े जाने की जानकारी दी गई। उपायुक्त ने अवैध खनन एवं परिवहन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए नियमानुसार जुर्माने की कार्रवाई को सख्ती से लागू करने तथा अवैध बालू लदे वाहनों को पकड़ने और उनके चालान की गहन जांच करने का निर्देश दिया। बॉक्साइट लदे वाहनों में रिफ्लेक्टर की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित करने को भी कहा गया, ताकि सड़क दुर्घटनाओं की आशंका को कम किया जा सके।

परिवहन एवं यातायात सुरक्षा के संबंध में पुलिस अधीक्षक ने शराब पीकर वाहन चलाने वालों की ब्रीथ एनालाइजर से नियमित जांच करने तथा उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई एवं जुर्माना लगाने का निर्देश दिया। थाना प्रभारियों को अवैध शराब बिक्री के विरुद्ध भी नियमित छापेमारी करने को कहा गया। वहीं, बसिया अनुमंडल क्षेत्र में सड़क पर यातायात बाधित करने वाले वाहनों एवं अतिक्रमण को हटाने तथा सिलमुल पुल को शीघ्र चालू कराने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।

बैठक में कारा सुरक्षा एवं आधारभूत संरचना से संबंधित विषयों की भी समीक्षा की गई। नवनिर्मित विस्तारित खंड में इलेक्ट्रिक फेंसिंग स्थापित करने तथा 16 बेड वाले नवनिर्मित अस्पताल वार्ड की आधारभूत संरचनाओं में सुधार पर विशेष चर्चा हुई। वार्ड तक पहुंच पथ एवं नाली के क्षतिग्रस्त स्लैब, कुछ स्थानों पर टूटे दरवाजे एवं खिड़कियों तथा छत से जल निकासी के लिए लगाए गए क्षतिग्रस्त पाइपों की मरम्मत सहित अन्य निर्माण कार्यों में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

उपायुक्त ने संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि सभी बिंदुओं पर गंभीरता से कार्रवाई करते हुए निर्धारित कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करें। बैठक में संबंधित विभागों के पदाधिकारी एवं पुलिस प्रशासन के अधिकारी उपस्थित रहे।

इस दौरान मुख्य रूप से अपर समाहर्ता, पुलिस उपाधीक्षक, अनुमंडल पदाधिकारी – गुमला – बसिया – चैनपुर, जिला परिवहन पदाधिकारी,जिला खनन पदाधिकारी, अधीक्षक मंडल कारा (जेल सुपरिटेंडेंट),सहायक आयुक्त – अधीक्षक, उत्पाद विभाग,खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी,
सभी प्रखंडों के थाना प्रभारी सहित अन्य सम्बंधित पदाधिकारी एवं कर्मी मौजूद रहें।

राम भक्तों के लिए

हापामुनी महामाया मंदिर : आस्था, परंपरा और इतिहास की 1100 वर्ष पुरानी विरासत

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित घाघरा प्रखंड का हापामुनी गांव, जो गुमला-लोहरदगा – झारखंड की राजधानी रांची मार्ग पर स्थित एक प्राचीन ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, उक्त गांव हापामुनी की पहचान यहां स्थित माता महामाया मंदिर से जुड़ी हुई है। जिला प्रशासन के अनुसार हापामुनी घाघरा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित है और माता महामाया मंदिर इस गांव की प्रमुख पहचान है। उक्त मंदिर का इतिहास नागवंशी राजपरंपरा से जुड़ा बताया गया है और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण इसे करीब 1100 वर्ष पुरानी धार्मिक विरासत के रूप में सामने रखा गया हैं।

मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हापामुनी महामाया मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी नागवंशी शासक गजघाट राय से जुड़ी है। गुमला जिला प्रशासन के अनुसार गजघाट राय नागवंश के 22 वें राजा और राजा मोहन राय के पुत्र थे। उन्होंने 869 से 905 ईस्वी के बीच शासन किया और हापामुनी में माता महामाया मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी उन्होंने अपने गुरु हरिनाथ, जिन्हें जिला प्रशासन ने राष्ट्रकूट परंपरा से जुड़े मराठी ब्राह्मण के रूप में वर्णित किया है, को सौंपी थी।

हालांकि विभिन्न स्रोतों में निर्माण-वर्ष को लेकर अंतर मिलता है। जिला प्रशासन के पृष्ठ पर गजघाट राय के शासनकाल 869-905 ईस्वी के बीच मंदिर निर्माण का उल्लेख है, जबकि अन्य प्रकाशित स्रोत इसे विक्रम संवत 965 यानी लगभग 908 ईस्वी से जोड़ते हैं। इसलिए समाचार लेख में इसे लगभग 1100 वर्ष पुराना मंदिर कहना अधिक सुरक्षित है।

1391 ईस्वी : विष्णु प्रतिमा की स्थापना

मंदिर के इतिहास में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 14 वीं शताब्दी में सामने आता है। जिला प्रशासन के अनुसार 1391 ईस्वी में राजा शिवदास कर्ण ने मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कराई। इससे यह संकेत मिलता है कि हापामुनी का धार्मिक परिसर केवल शक्ति उपासना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहां वैष्णव परंपरा का भी समावेश हुआ।

कुछ अन्य स्रोत इस स्थापना को विक्रम संवत 1458 अर्थात लगभग 1401 ईस्वी से जोड़ते हैं। इसलिए वर्ष को लेकर स्रोतों में अंतर मौजूद है।

चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा प्रसंग

हापामुनी मंदिर की ऐतिहासिक महत्ता को एक और धार्मिक परंपरा विशेष बनाती है। गुमला जिला प्रशासन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु (1445-1535) जगन्नाथ पुरी से मथुरा की यात्रा के दौरान लगभग 1485 ईस्वी में इस मार्ग से गुजरे थे। हापामुनी से जुड़ी यह परंपरा इस स्थल को व्यापक वैष्णव धार्मिक यात्रा-परंपरा से भी जोड़ती है।

माता महामाया की रहस्यमयी परंपरा

हापामुनी मंदिर की सबसे विशिष्ट मान्यताओं में मां महामाया की प्रतिमा का मंजूषा यानी विशेष बक्से में रखा जाना शामिल है। स्थानीय धार्मिक मान्यता है कि देवी की मूल प्रतिमा को खुले नेत्रों से नहीं देखा जाता। इसी कारण श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के बाहर या अलग स्थान पर मां की एक दूसरी प्रतिमा रखी गई है, जहां सामान्य पूजा-अर्चना की जाती है।

विशेष अवसर पर मंजूषा को बाहर लाकर निर्धारित धार्मिक विधि से पूजा की जाती है। प्रकाशित स्थानीय विवरणों के अनुसार पूजा के दौरान मुख्य पुजारी अपने आंखों पर पट्टी बांधकर अनुष्ठान करते हैं। यह परंपरा हापामुनी मंदिर की धार्मिक पहचान को अन्य देवी मंदिरों से अलग बनाती है।

डोल जतरा : परंपरा का अनूठा स्वरूप

हापामुनी में चैत्र कृष्ण पक्ष की परेवा – अमावस्या के अवसर पर डोल जतरा का आयोजन महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है। इस अवसर पर माता महामाया की मंजूषा को मंदिर से बाहर डोल चबूतरे पर लाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक सहभागिता का भी अवसर बनता है। मेले और धार्मिक कार्यक्रमों के कारण हापामुनी में विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है।

लरका आंदोलन और मंदिर का इतिहास

हापामुनी माता महामाया मंदिर का इतिहास क्षेत्र के उथल-पुथल भरे सामाजिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ बताया जाता है। स्थानीय और प्रकाशित विवरणों में मंदिर के पुराने स्वरूप के विनाश का संबंध कोल – लरका विद्रोह से जोड़ा गया है। गुमला जिला प्रशासन के विवरण में रांची गजेटियर का हवाला देते हुए पुराने मंदिर के विद्रोह के दौरान नष्ट किए जाने का उल्लेख है।

स्थानीय लोगों से जुड़े विवरणों में बरजू राम और उनके परिवार पर हमले तथा मंदिर की रक्षा से संबंधित लोककथा भी प्रचलित है। इन घटनाओं के अलग-अलग संस्करण प्रकाशित हुए हैं, इसलिए इन्हें लोकस्मृति और स्थानीय परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है, न कि निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।

मंदिर के द्वार से जुड़ी लोकमान्यता

हापामुनी मंदिर से एक अत्यंत रोचक लोककथा भी जुड़ी है। स्थानीय विवरणों के अनुसार पुराने मंदिर का द्वार पहले पूर्व दिशा की ओर था। विद्रोह के समय मंदिर की शक्ति को चुनौती देते हुए द्वार की दिशा बदलने की बात कही गई और मान्यता है कि इसके बाद मंदिर का द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो गया। यह प्रसंग स्थानीय धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

तांत्रिक पीठ के रूप में मान्यता

हापामुनी माता महामाया मंदिर को कुछ स्थानीय परंपराओं और प्रकाशित रिपोर्टों में तांत्रिक पीठ के रूप में भी वर्णित किया गया है। पुराने समय में यहां शक्ति साधना और तंत्र-मंत्र से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों की मान्यता होने की बात कही जाती है। कुछ स्थानीय कथाओं में यह भी कहा जाता है कि विवाद या अपराध के मामलों में लोगों को मंदिर में शपथ दिलाई जाती थी। ये विवरण मुख्यतः लोकमान्यताओं और स्थानीय कथाओं पर आधारित हैं।

मंडा पूजा और आस्था

हापामुनी की धार्मिक परंपरा में मंडा पूजा का भी विशेष महत्व बताया जाता है। हाल के प्रकाशित विवरणों के अनुसार रामनवमी के बाद मंडा पूजा और उससे जुड़े धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान मेला भी लगता है और विभिन्न राज्यों के दूर-दूर से माता महामाया के मंदिर में श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना मनीता पूर्ण होने पर पूजा अर्चना कर माथा टेकते हैं ।

मंदिर की आस्था का दायरा केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं दिखाई देता। जनजातीय बहुल क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां की धार्मिक परंपराओं में स्थानीय श्रद्धालु भक्ति लोकविश्वास और मुख्यधारा की देवी माता महामाया के उपासना का मेल दिखाई देता है। 2020 की स्थानीय रिपोर्ट ने भी हापामुनी महामाया मंदिर को क्षेत्र में शक्ति उपासना और व्यापक जनआस्था के केंद्र के रूप में वर्णित किया था।

आज भी जीवित है 1100 वर्ष पुरानी परंपरा

आज हापामुनी माता महामाया मंदिर केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और धार्मिक परंपरा का जीवंत केंद्र है। हर वर्ष विशेष पर्वों पर यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। मंदिर का शांत ग्रामीण परिवेश, प्राचीन परंपराएं और माता महामाया की रहस्यमयी पूजा-पद्धति श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां इतिहास केवल पुराने पत्थरों या अभिलेखों में नहीं, बल्कि जीवित परंपराओं में दिखाई देता है— मंजूषा (बॉक्स ) में सुरक्षित माता महामाया देवी की मान्यता, डोल जतरा, मंडा पूजा, लोककथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा आज भी इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

कालक्रम एक नजर में

काल – वर्ष, प्रमुख घटना
869–905 ई. – जिला प्रशासन के अनुसार नागवंशी राजा गजघाट राय का शासनकाल; इसी काल में माता महामाया मंदिर निर्माण का उल्लेख।
लगभग 908 ई.| अन्य स्रोत मंदिर निर्माण को विक्रम संवत 965 से जोड़ते हैं।
1391 ई. – जिला प्रशासन के अनुसार राजा शिवदास कर्ण द्वारा विष्णु प्रतिमा की स्थापना।
लगभग 1485 ई.| जिला प्रशासन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु की यात्रा के दौरान हापामुनी मार्ग से गुजरने की परंपरा।
19वीं–20वीं सदी की स्थानीय परंपराएं| मंदिर और क्षेत्र से जुड़े विद्रोह, लोककथाओं तथा पुराने मंदिर के विनाश के प्रसंग।
आधुनिक काल – डोल जतरा – मंडा पूजा और अन्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से परंपरा जारी।

हापामुनी की माता महामाया इसलिए विशिष्ट हैं, क्योंकि यहां करीब ग्यारह शताब्दियों का इतिहास आज भी पूजा-पद्धति और लोकपरंपराओं के रूप में सांस लेता दिखाई देता है। नागवंशी राजाओं की विरासत से शुरू हुई यह धार्मिक धारा आज स्थानीय समाज की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

राम भक्तों के लिए

उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने दुर्गा पूजा पंडालों का किया निरीक्षण, सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित पदाधिकारियों को दिए आवश्यक निर्देश

गुमला : – गुमला जिला में दुर्गा पूजा के अवसर पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा एवं विधि-व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आज उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने गुमला शहरी क्षेत्र के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पूजा पंडालों में सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन, अग्नि सुरक्षा सहित अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं का जायजा लिया तथा आम नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

निरीक्षण के क्रम में उपायुक्त ने पुराना बस डिपो, दुंदरिया; भारतीय नवयुवक संघ, गुमला; श्री बड़ा दुर्गा मंदिर तथा दुर्गाबाड़ी स्थित पूजा पंडालों का जायजा लिया। उन्होंने पंडालों में श्रद्धालुओं के आवागमन, भीड़ नियंत्रण, आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की तैयारी तथा सुरक्षा संबंधी आवश्यक व्यवस्थाओं का अवलोकन किया। साथ ही, संबंधित पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि पूजा के दौरान सभी आवश्यक सुरक्षा मानकों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित वातावरण में पूजा-अर्चना कर सकें।

उपायुक्त ने कहा कि दुर्गा पूजा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा पंडालों में पहुंचते हैं। ऐसे में सभी संबंधित विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें तथा सुरक्षा एवं सुविधा से जुड़े सभी आवश्यक प्रबंध सुनिश्चित रखें। उन्होंने किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सतर्कता बनाए रखने और आवश्यक व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी करने पर भी जोर दिया।

उक्त निरीक्षण के दौरान उप विकास आयुक्त गुमला अनिमेष रंजन , अपर समाहर्ता राजीव नीरज, अनुमंडल पदाधिकारी अखिलेश कुमार, भूमि सुधार उप समाहर्ता राजीव कुमार, नगर परिषद के पदाधिकारी तथा गुमला थाना प्रभारी सहित अन्य संबंधित पदाधिकारी उपस्थित रहे।

राम भक्तों के लिए

गुमला जिले के सभी विद्यालयों में 23 एवं 24 अक्टूबर को चलेगा POCSO जागरूकता अभियान

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया 

उप विकास आयुक्त अनिमेष रंजन के द्वारा अच्छी पहल नेतृत्व में पहल

गुमला : – गुमला जिला में बच्चों की सुरक्षा, सम्मान एवं अधिकारों के संरक्षण तथा लैंगिक एवं यौन अपराधों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से गुमला जिले के सभी सरकारी, अल्पसंख्यक एवं निजी विद्यालयों में 23 एवं 24 अक्टूबर 2026 को विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। उप विकास आयुक्त अनिमेष रंजन के नेतृत्व में शिक्षा विभाग द्वारा यह पहल की जा रही है। इस संबंध में जिला शिक्षा पदाधिकारी कविता खलखो ने जिले के सभी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों एवं प्राचार्यों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं। यह पहल बच्चों की सुरक्षा एवं संरक्षण से संबंधित जागरूकता गतिविधियों को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से की जा रही है।

POCSO एक्ट और गुड टच-बैड टच की दी जाएगी जानकारी

अभियान के दौरान विद्यार्थियों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 के प्रावधानों की जानकारी सरल एवं आयु-उपयुक्त भाषा में दी जाएगी। इसके तहत गुड टच-बैड टच, व्यक्तिगत सुरक्षा, लैंगिक एवं यौन अपराधों की पहचान तथा ऐसी घटनाओं से बचाव के उपायों पर विशेष जोर दिया जाएगा।

शिक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे बच्चों को समझाएं कि किसी भी व्यक्ति के अनुचित व्यवहार, गलत स्पर्श, अश्लील संदेश, निजी तस्वीरें मांगने या ऑनलाइन माध्यम से परेशान करने जैसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विद्यार्थियों को यह भी बताया जाएगा कि किसी अप्रिय घटना की स्थिति में उन्हें चुप रहने या डरने के बजाय अपने माता-पिता, विश्वसनीय शिक्षक अथवा संबंधित प्राधिकारी को जानकारी देनी चाहिए।

विद्यालयों में होंगी विभिन्न जागरूकता गतिविधियां

निर्धारित कार्यक्रम के तहत विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान विशेष संबोधन, कक्षा-वार जागरूकता सत्र, पोस्टर निर्माण, स्लोगन लेखन, चित्रकला एवं प्रश्नोत्तरी जैसी गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। विद्यार्थियों को मोबाइल फोन एवं इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग तथा ऑनलाइन माध्यमों से होने वाले अनुचित व्यवहार के प्रति भी जागरूक किया जाएगा।

बच्चों को आवश्यकता पड़ने पर सहायता प्राप्त करने के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और आपातकालीन हेल्पलाइन 112 की जानकारी दी जाएगी। विद्यालयों को इन हेल्पलाइन नंबरों को सूचना-पट्ट पर प्रदर्शित करने का भी निर्देश दिया गया है।

घटना की जानकारी मिलने पर तत्काल कार्रवाई का निर्देश

जिला शिक्षा पदाधिकारी कविता खलखो ने निर्देश दिया है कि यदि किसी शिक्षक या विद्यालय कर्मी को किसी बच्चे के साथ लैंगिक अथवा यौन अपराध होने की जानकारी या आशंका मिलती है, तो बच्चे की सुरक्षा एवं गोपनीयता सुनिश्चित करते हुए नियमानुसार तत्काल कार्रवाई की जाए। ऐसे मामलों में बच्चे को दोषी नहीं ठहराया जाए तथा संबंधित पुलिस प्राधिकारी को सूचना देने के वैधानिक दायित्व का पालन किया जाए।

प्रखंड एवं संकुल स्तर पर होगी निगरानी

जिले के सभी प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारियों, प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारियों तथा प्रखंड एवं संकुल साधन सेवियों को अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन एवं अनुश्रवण की जिम्मेदारी दी गई है। विद्यालयवार गतिविधियों, प्रतिभागी विद्यार्थियों की संख्या, नोडल शिक्षक के नाम एवं फोटोग्राफ सहित प्रतिवेदन संकलित कर जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
जिला प्रशासन एवं शिक्षा विभाग का उद्देश्य विद्यार्थियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना, उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना तथा किसी भी प्रकार के अनुचित व्यवहार की स्थिति में बिना भय के सहायता मांगने के लिए प्रोत्साहित करना है। अभियान के माध्यम से जिले के सभी विद्यालयों में बाल-सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने और बच्चों के लिए सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा।

राम भक्तों के लिए

गुमला जिले के विभिन्न ग्रामो मे विश्व हाथ धुलाई दिवस पर व्यापक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला पेयजल एवं स्वच्छता पर मंडल द्वारा जिला में
विश्व हाथ धुलाई दिवस के अवसर पर गुमला जिले के सभी प्रखंडों के विभिन्न स्कूलों – ग्रामो में व्यापक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान बच्चों को साबुन से सही तरीके से हाथ धोने, व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखने, स्वच्छ पेयजल के उपयोग एवं जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया। कार्यक्रम के माध्यम से स्वच्छता को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर आत्मसात करने एवं स्वस्थ समाज के निर्माण मे भागीदार बनने का संदेश दिया गया।

राम भक्तों के लिए

प्रसिद्ध खोरा देवी मंदिर, गुमला आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति की जीवंत विरासत

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला मुख्यालय शहर से सटे खोरा गांव की धार्मिक पहचान में खोरा देवी माता मंदिर का अपना एक अलग विशेष स्थान है। यह मंदिर सनातनी हिंदू धर्म लंबियों और माता रानी के श्रद्धालुओं के लिए माँ देवी-आराधना का केंद्र है। मंदिर खोरा क्षेत्र में स्थित है और स्थानीय धार्मिक स्थलों की सूची में इसे खोरा देवी माँ मंदिर के रूप में दर्ज किया गया है।

खोरा की पहचान केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र अपनी पुरानी ग्रामीण और आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। यहां आयोजित होने वाला प्राचीन दसई जतरा आज भी आसपास के अनेक गांवों को जोड़ता है। इस कारण खोरा की धार्मिक परंपरा को समझने के लिए देवी-आराधना के साथ यहां की लोकसंस्कृति और सामुदायिक परंपराओं को भी समझना आवश्यक है।

आस्था : सनातनी हिंदू धर्म लंबियों की आराध्या माता रानी देवी का स्थान

खोरा देवी मंदिर माता रानी के भक्तों के लिए श्रद्धा और विश्वास का स्थान है। गुमला जिला और विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु देवी माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

आस्था और धार्मिक परंपरा में देवी मंदिरों की भूमिका केवल पूजा तक सीमित नहीं होती। ऐसे मंदिर माता रानी के श्रद्धालु परिवार, गांव और सामाजिक जीवन के साथ गहराई से जुड़े रहते हैं। किसी शुभ कार्य की शुरुआत, मनोकामना, पारिवारिक सुख-शांति या किसी धार्मिक पर्व के अवसर पर माता रानी देवी के सामने प्रार्थना करना लोकजीवन का हिस्सा रहा है।

खोरा माता रानी देवी मंदिर भी भक्ति – शक्ति-आराधना की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।

खोरा की धरती और माता रानी देवी की -आराधना

गुमला जिला क्षेत्र में देवी की पूजा की परंपरा बहुत व्यापक है। शहर के देवी मंडप, काली मंदिर और बड़ा दुर्गा मंदिर से लेकर गांवों के छोटे देवी स्थानों तक भक्ति – शक्ति – उपासना के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

खोरा माता रानी देवी मंदिर इसी परंपरा की स्थानीय कड़ी है

यहां देवी की आराधना में शहरी मंदिरों की औपचारिकता की तुलना में ग्रामीण धार्मिक जीवन की सहजता और सामुदायिक भावना अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है।

गांव के लोगों के लिए मंदिर केवल एक धार्मिक भवन नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था और सामूहिक स्मृति का केंद्र होता है।

इतिहास : उपलब्ध जानकारी क्या कहती है ?

खोरा देवी मंदिर की स्थापना को लेकर इंटरनेट पर उपलब्ध स्रोतों में फिलहाल कोई ऐसा विश्वसनीय दस्तावेज नहीं मिला है जिसमें मंदिर की स्थापना का निश्चित वर्ष, संस्थापक, निर्माणकर्ता या किसी राजा से इसका स्पष्ट संबंध प्रमाणित रूप से दर्ज हो।

इसलिए मंदिर को 100 वर्ष, 200 वर्ष या उससे अधिक पुराना बताना बिना स्थानीय अभिलेख अथवा पुरानी प्रमाणिक सामग्री के उचित नहीं होगा।

उपलब्ध स्थानीय व्यापारिक धार्मिक निर्देशिकाओं में मंदिर का स्थान खोरा, गुमला के रूप में दर्ज है

यही कारण है कि खोरा देवी मंदिर के इतिहास को फिलहाल स्थानीय मौखिक परंपरा, ग्रामीण धार्मिक संस्कृति और उपलब्ध वर्तमान संदर्भों के आधार पर समझना अधिक उचित है।

खोरा की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा

खोरा गांव का धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन केवल देवी मंदिर तक सीमित नहीं है।

वर्ष 2025 में खोरा गांव में आयोजित प्राचीन दसई जतरा में लगभग एक दर्जन गांवों के हजारों लोगों के शामिल होने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। पारंपरिक वेशभूषा में खोड़हा दलों ने नृत्य और गीत प्रस्तुत किए तथा पूरा जतरा क्षेत्र ढोल, मांदर और नगाड़े की ध्वनि से गूंज उठा। स्थानीय लोगों ने इस परंपरा को प्राचीन सांस्कृतिक विरासत बताते हुए नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

यह तथ्य खोरा की सामाजिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण है

यहां धार्मिक आस्था और लोकसंस्कृति अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।

दसई जतरा और देवी-परंपरा

झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी समाज में दशहरा और उससे जुड़ी लोकपरंपराओं का विशेष महत्व है।

खोरा में होने वाला दसई जतरा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। जतरा में विभिन्न गांवों के दलों का एकत्र होना, पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य करना तथा सामूहिक उत्सव मनाना सामाजिक एकता को मजबूत करता है।

ऐसे सांस्कृतिक आयोजन देवी-आराधना से जुड़े ग्रामीण वातावरण को और व्यापक बनाते हैं।

इस दृष्टि से खोरा देवी मंदिर को केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि खोरा की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।

परंपरा : पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक चेतना

गांवों में धार्मिक परंपराएं अक्सर लिखित इतिहास की तुलना में मौखिक स्मृतियों के माध्यम से आगे बढ़ती हैं।

दादा-दादी और बुजुर्गों से सुनी गई देवी की कथाएं, पूजा के नियम, पर्व के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान और मंदिर से जुड़ी मान्यताएं धीरे-धीरे नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं।

खोरा देवी मंदिर की परंपरा को भी इसी लोक-स्मृति के संदर्भ में समझना उचित है

मंदिर में आने वाला श्रद्धालु केवल देवी के दर्शन नहीं करता, बल्कि वह अपने गांव की उस सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़ता है, जिसे उसके पूर्वजों ने अपने जीवन का हिस्सा बनाया था।

नवरात्र और देवी पूजा

शारदीय नवरात्र शक्ति-उपासना का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है

गुमला जिले के अलग-अलग देवी मंदिरों की तरह खोरा क्षेत्र में भी नवरात्र के दौरान धार्मिक वातावरण विशेष रूप से सक्रिय होता है। देवी की पूजा, आरती, दीप प्रज्ज्वलन और श्रद्धालुओं की आवाजाही से मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल बनता है।

हालांकि खोरा देवी मंदिर के नवरात्र आयोजन की विशिष्ट पूजा-पद्धति या कार्यक्रमों का विस्तृत प्रमाणित विवरण उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला है, इसलिए उससे जुड़े विशेष अनुष्ठानों को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

ग्रामीण समाज में मंदिर की भूमिका

ग्रामीण समाज में मंदिर सामाजिक संवाद का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है।

किसी धार्मिक आयोजन के अवसर पर अलग-अलग परिवार एक जगह जुटते हैं। इससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और गांव की सामूहिक पहचान भी कायम रहती है।

खोरा में दसई जतरा के दौरान जिस तरह आसपास के गांवों से हजारों लोग जुटते हैं, उससे क्षेत्र में सामुदायिक सहभागिता की मजबूत परंपरा का संकेत मिलता है।

इसी सामाजिक परिवेश में देवी मंदिर लोगों की धार्मिक आस्था को एक साझा मंच प्रदान करता है

खोरा देवी : लोकविश्वास की शक्ति

ग्रामीण देवी मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता उनका लोकविश्वास होता है।

शास्त्रीय ग्रंथों में देवी के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है, लेकिन गांवों में देवी की पहचान अक्सर स्थानीय नाम, स्थानीय कथा और स्थानीय अनुभवों से बनती है।

खोरा देवी नाम भी इस स्थानीय जुड़ाव को दर्शाता है—देवी और गांव की पहचान एक-दूसरे से जुड़ जाती है।

ऐसे में देवी केवल मंदिर में स्थापित प्रतिमा नहीं रहतीं, बल्कि गांव की रक्षक शक्ति और सामूहिक आस्था का प्रतीक बन जाती हैं।

इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण है जीवित परंपरा

खोरा देवी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों में कोई निश्चित प्राचीन निर्माण-वर्ष नहीं, बल्कि उसकी जीवित धार्मिक परंपरा है।

कई ग्रामीण धार्मिक स्थलों का इतिहास शिलालेखों या सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होता। उनका इतिहास लोगों की स्मृतियों, पूजा-पद्धतियों और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं में सुरक्षित रहता है।

इसलिए खोरा देवी मंदिर के अध्ययन में स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक परंपरा, मंदिर समिति के पुराने दस्तावेज, पूजा से जुड़े परिवारों की जानकारी और पुराने फोटो या शिलालेख विशेष महत्व रखते हैं।

खोरा और गुमला की देवी-आराधना की बड़ी परंपरा

गुमला जिले में शक्ति-उपासना के कई ऐतिहासिक केंद्र हैं।

हापामुनी का महामाया मंदिर प्राचीन नागवंशी परंपरा से जुड़ा है।
पालकोट का दशभुजी मंदिर राजपरंपरा और दुर्गा पूजा के इतिहास से जुड़ा है।
गुमला का बड़ा दुर्गा मंदिर शहर की सार्वजनिक दुर्गा पूजा की पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
बंगाली क्लब दुर्गाबाड़ी में 1921 से चली आ रही सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा दर्ज है।
और खोरा देवी मंदिर ग्रामीण स्तर पर देवी-आराधना और स्थानीय सांस्कृतिक जीवन की कड़ी के रूप में सामने आता है।

इन सभी स्थलों को एक साथ देखने पर गुमला की शक्ति-परंपरा की व्यापक तस्वीर सामने आती है।

संस्कृति और धर्म का संगम

खोरा की विशेषता यही है कि यहां धार्मिक विश्वास और लोकसंस्कृति साथ-साथ चलते हैं।

एक ओर देवी मंदिर में श्रद्धा और पूजा है, दूसरी ओर दसई जतरा में ढोल-मांदर, पारंपरिक नृत्य और गीत हैं।

एक ओर देवी के सामने दीप जलाने की परंपरा है, दूसरी ओर सामूहिक उत्सव में गांवों का एकत्र होना।

यही संगम झारखंड की स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाता है।

नई पीढ़ी के लिए विरासत

आज के समय में ग्रामीण परंपराओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका अगली पीढ़ी तक पहुंचना है।

खोरा में दसई जतरा को बचाने की आवश्यकता पर स्थानीय लोगों द्वारा दिया गया जोर इसी चिंता को सामने लाता है। 2025 की रिपोर्ट में भी युवा पीढ़ी से प्राचीन परंपरा सीखने और उसे आगे बढ़ाने की अपील की गई थी।

खोरा देवी मंदिर की परंपरा के लिए भी यही बात महत्वपूर्ण है

यदि मंदिर से जुड़ी पुरानी कथाओं, पूजा-पद्धति और स्थानीय इतिहास को लिखित रूप दिया जाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज बन सकता है।

कालक्रम : उपलब्ध जानकारी के आधार पर

काल – समय| प्रमुख संदर्भ
प्राचीन – पुरानी ग्रामीण परंपरा| खोरा क्षेत्र में लोक-सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का विकास
पीढ़ियों से| देवी-आराधना और स्थानीय धार्मिक विश्वासों की मौखिक परंपरा
आधुनिक काल| खोरा देवी मंदिर स्थानीय धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित
2025 प्राचीन दसई जतरा में लगभग एक दर्जन गांवों के हजारों लोगों की सहभागिता दर्ज
वर्तमान| खोरा देवी मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र

खोरा देवी मंदिर के लिए निश्चित स्थापना-वर्ष उपलब्ध न होने के कारण इससे अधिक सटीक कालक्रम बताने के लिए स्थानीय अभिलेख या मंदिर से जुड़े पुराने दस्तावेज आवश्यक होंगे।

खोरा देवी मंदिर गुमला की उस धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसकी जड़ें ग्रामीण जीवन, लोकविश्वास और सामुदायिक एकता में गहराई तक जुड़ी हुई हैं।

मंदिर का लिखित इतिहास अभी विस्तृत रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन इसकी वर्तमान पहचान, खोरा की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराएं और दसई जतरा जैसे सामुदायिक आयोजन बताते हैं कि यह क्षेत्र लंबे समय से धार्मिक एवं लोक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।

खोरा की धरती पर जब दसई जतरा के दौरान मांदर और नगाड़े गूंजते हैं, पारंपरिक वेशभूषा में लोग नृत्य करते हैं और गांवों के लोग एक साथ जुटते हैं, तब यह केवल एक उत्सव नहीं होता—यह उस सामूहिक विरासत का प्रदर्शन होता है जिसने पीढ़ियों से इस क्षेत्र को जोड़े रखा है।

खोरा देवी मंदिर इसी जीवित विरासत का धार्मिक प्रतीक है—जहां देवी में आस्था, गांव में विश्वास और परंपरा में समाज की पहचान दिखाई देती है।

और शायद इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसका इतिहास केवल किसी पत्थर या शिलालेख में नहीं, बल्कि लोगों की स्मृतियों, पूजा की परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था में जीवित है।

राम भक्तों के लिए

नशे के अवैध कारोबार पर सख्ती, अवैध खनन पर नियंत्रण एवं कारा सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करने को लेकर उपायुक्त एवं पुलिस अधीक्षक गुमला की संयुक्त अध्यक्षता में समीक्षा बैठक आयोजित

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

अवैध गतिविधियों पर नियमित छापेमारी, यातायात नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई तथा कारा के विस्तारित खंड में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने के निर्देश

गुमला : – गुमला उपायुक्त दिलेश्वर महतो एवं पुलिस अधीक्षक हारिस बिन ज़मां की संयुक्त अध्यक्षता में आज एन.सी.ओ.आर.डी. (नारकोटिक्स कोऑर्डिनेशन), कारा सुरक्षा, परिवहन एवं खनन से संबंधित संयुक्त समीक्षात्मक बैठक आयोजित की गई। बैठक में संबंधित विभागों द्वारा संचालित कार्यों की समीक्षा करते हुए उपायुक्त ने विभिन्न महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की तथा संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

नशे के अवैध कारोबार पर नियंत्रण को लेकर उपायुक्त ने सभी प्रखंडों में अफीम एवं ब्राउन शुगर जैसे मादक पदार्थों के अवैध कारोबार पर कड़ी निगरानी रखने तथा नियमित रूप से सघन जांच अभियान चलाने का निर्देश दिया। पुलिस अधीक्षक ने सभी थाना प्रभारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में लगातार जांच अभियान संचालित करने, शहरी क्षेत्रों के संदिग्ध स्थानों पर विशेष निगरानी रखने तथा विद्यालयों के आसपास मादक पदार्थों की बिक्री एवं आपूर्ति रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। त्योहारों के दौरान विशेष सतर्कता बरतते हुए शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी जांच अभियान तेज करने को कहा गया। उत्पाद विभाग को संदिग्ध स्थानों एवं लाइन होटलों में अवैध शराब की बिक्री पाए जाने पर नियमानुसार प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया। साथ ही, मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में वाहनों की सघन जांच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।

खनन विभाग की समीक्षा के दौरान अवैध खनन एवं परिवहन में संलिप्त वाहनों के विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी ली गई। पिछली बैठक के बाद तीन वाहनों के पकड़े जाने की जानकारी दी गई। उपायुक्त ने अवैध खनन एवं परिवहन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए नियमानुसार जुर्माने की कार्रवाई को सख्ती से लागू करने तथा अवैध बालू लदे वाहनों को पकड़ने और उनके चालान की गहन जांच करने का निर्देश दिया। बॉक्साइट लदे वाहनों में रिफ्लेक्टर की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित करने को भी कहा गया, ताकि सड़क दुर्घटनाओं की आशंका को कम किया जा सके।

परिवहन एवं यातायात सुरक्षा के संबंध में पुलिस अधीक्षक ने शराब पीकर वाहन चलाने वालों की ब्रीथ एनालाइजर से नियमित जांच करने तथा उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई एवं जुर्माना लगाने का निर्देश दिया। थाना प्रभारियों को अवैध शराब बिक्री के विरुद्ध भी नियमित छापेमारी करने को कहा गया। वहीं, बसिया अनुमंडल क्षेत्र में सड़क पर यातायात बाधित करने वाले वाहनों एवं अतिक्रमण को हटाने तथा सिलमुल पुल को शीघ्र चालू कराने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।

बैठक में कारा सुरक्षा एवं आधारभूत संरचना से संबंधित विषयों की भी समीक्षा की गई। नवनिर्मित विस्तारित खंड में इलेक्ट्रिक फेंसिंग स्थापित करने तथा 16 बेड वाले नवनिर्मित अस्पताल वार्ड की आधारभूत संरचनाओं में सुधार पर विशेष चर्चा हुई। वार्ड तक पहुंच पथ एवं नाली के क्षतिग्रस्त स्लैब, कुछ स्थानों पर टूटे दरवाजे एवं खिड़कियों तथा छत से जल निकासी के लिए लगाए गए क्षतिग्रस्त पाइपों की मरम्मत सहित अन्य निर्माण कार्यों में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

उपायुक्त ने संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि सभी बिंदुओं पर गंभीरता से कार्रवाई करते हुए निर्धारित कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करें। बैठक में संबंधित विभागों के पदाधिकारी एवं पुलिस प्रशासन के अधिकारी उपस्थित रहे।

इस दौरान मुख्य रूप से अपर समाहर्ता, पुलिस उपाधीक्षक, अनुमंडल पदाधिकारी – गुमला – बसिया – चैनपुर, जिला परिवहन पदाधिकारी,जिला खनन पदाधिकारी, अधीक्षक मंडल कारा (जेल सुपरिटेंडेंट),सहायक आयुक्त – अधीक्षक, उत्पाद विभाग,खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी,
सभी प्रखंडों के थाना प्रभारी सहित अन्य सम्बंधित पदाधिकारी एवं कर्मी मौजूद रहें।

राम भक्तों के लिए

सत्ता का नशा चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, जनता की अदालत में हर किसी को अपने कामों का हिसाब देना पड़ता है

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लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति न भगवान होता है, न उसकी सत्ता स्थायी होती है और न ही जनता हमेशा उसके जयकारे लगाती रहती है। जनता जब सवाल पूछना शुरू करती है, तो बड़े-बड़े सिंहासनों पर बैठे लोगों का आत्मविश्वास भी डगमगाने लगता है। सत्ता का नशा चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, जनता की अदालत में हर किसी को अपने कामों का हिसाब देना पड़ता है। यदि जनता के सवालों, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानियों, युवाओं के भविष्य तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुंह मोड़ा गया है, तो उन सवालों से हमेशा बच पाना भी संभव नहीं है।

इतिहास गवाह है कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली तालियां हमेशा के लिए नहीं होतीं। आज जो लोग आपके सामने सिर झुकाकर खड़े हैं, कल वही परिस्थितियां बदलने पर अपनी सुविधा के अनुसार नए सुर अलाप सकते हैं। इसलिए चापलूसों की वाहवाही को जनता का समर्थन समझने की भूल मत कीजिए। असली ताकत दरबारियों की प्रशंसा में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है।

लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं

और जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, उन्हें कम मत आंकिए। लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की समीक्षा करना और जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना भी है। राहुल गांधी और विपक्ष को अपना काम करने दीजिए। जनता को भी अपना फैसला करने दीजिए। आप अपना कर्म करते रहिए, राहुल गांधी अपना काम करते रहेंगे और जनता अपना निर्णय सुनाएगी। आखिर लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है।

याद रखिए—चेहरे की बेचैनी के कारणों का अनुमान लगाना आसान है, लेकिन असली परीक्षा कर्मों की होती है। सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जवाबदेही से बड़ी नहीं हो सकती। और जनता का फैसला आने पर न चापलूसों की भीड़ काम आती है, न अहंकार की दीवारें।

बाकी, गीता का संदेश स्पष्ट है—कर्म कीजिए, फल की चिंता मत कीजिए। लेकिन सार्वजनिक जीवन में किए गए कर्मों का हिसाब जनता जरूर मांगती है। यही लोकतंत्र है, यही जनशक्ति है और यही समय का न्याय है!

अब कुछ सवाल

पुलवामा पर गुस्सा नहीं आया?

बच्चियों के साथ गलत होता तो गुस्सा क्यों नहीं आता?

अकिंता भंडारी का बलात्कार हुआ तब गुस्सा क्यों नहीं आया?

बलात्कारी कुलदीप सेंगर पर गुस्सा क्यों नहीं आया?

अमेरिका लगातार भारत पर धौंस जमाता रहता है, तब गुस्सा क्यों नहीं आता?

मंच पर खड़े होकर जब साहब दहाड़ते थे— सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं बिकने दूंगा, तब सचमुच रोंगटे खड़े हो जाते थे ! फिर फ़ाइलों के पन्ने पलटे और पता चला साहब ने बहुत कुछ बेच दिया. 

• एयर इंडिया टाटा की हो गई।

• नीलांचल इस्पात (NINL) भी टाटा की झोली में चला गया।

• लखनऊ, जयपुर, अहमदाबाद, मंगलुरु समेत 6 बड़े एयरपोर्ट्स अडानी संभाल रहे हैं।

• समंदर के प्रमुख बंदरगाह और कंटेनर टर्मिनल अडानी और निजी घरानों के हवाले हो गए।

• टैक्सपेयर्स के पैसे से बने हज़ारों किमी नेशनल हाईवे निजी कंपनियाँ 30 साल तक टोल वसूलने के लिए लीज़ पर ले गईं।

• ‘ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी’ का भरोसा देने वाली LIC का हिस्सा शेयर बाज़ार में बिक गया।

• रेलवे टिकट और कैटरिंग वाली मुनाफ़ेदार IRCTC की हिस्सेदारी भी किस्तों में बेच दी गई।

• IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी निजी हाथों में सौंपने की पूरी बिसात बिछ चुकी है।

• BSNL और MTNL की कीमती ज़मीनें, मोबाइल टावर और इमारतें ‘एसेट मोनेटाइजेशन’ के नाम पर नीलाम हो रही हैं।

• भोपाल का रानी कमलापति समेत रेलवे स्टेशन PPP मॉडल के नाम पर प्राइवेट बिल्डरों को सौंप दिए गए।

• पावर ग्रिड की बिजली ट्रांसमिशन लाइनें निजी इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) को थमा दी गईं।

• सरकारी एकाधिकार खत्म कर कोयला खदानों (Coal Blocks) की खुली नीलामी कॉर्पोरेट घरानों के लिए कर दी गई।

• हिंदुस्तान ज़िंक में बची हुई सरकारी हिस्सेदारी भी बाज़ार में बेचकर बाहर निकलने का रास्ता साफ़ कर दिया गया।

देश बिका नहीं है साहेब, बस राष्ट्रीय संपत्तियों की चाबियाँ धीरे से निजी तिजोरियों में सरका दी गई हैं!

खैर, हम गरीबों को उद्योग, नौकरी और संपत्तियों से क्या लेना-देना. सम्राट बाबू ने बता ही दिया है कि मोदी जी 10 करोड़ बिहारियों को मुफ्त का खाना दे ही रहे हैं। जब 5 किलो अनाज मिल ही रहा है तो हवाई अड्डे, ट्रेन और बैंक का क्या करेंगे? वैसे भी देश बहुत मजबूत हाथों में है!

बीजेपी के लिए 6 महीने पहले तक सब चंगा था। प्रधानमंत्री जी का दुनियाभर में डंका बज रहा था। तमाम देशों से पुरस्कार मिल रहे थे। चुनाव पर चुनाव जीते जा रहे थे। विरोधी गूलर के फूल की तरह गायब हो गए थे। 

देेश सुरक्षित हाथों में है, फिर भी भारत में अवैध फंडिंग कैसे हो जाती है…?

2014 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि-भारत की सीमाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है, बैंकिग सेवाओं पर भारत सरकार का नियंत्रण है, ईडी सीबीआई इंटेलिजेंस एजेंसियां सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण में है, फिर भी भारत में अवैध फंडिंग कैसे हो जाता है?

प्रधानमंत्री को जबाब देना चाहिए. इस बात का जवाब भारत के लोग 2026 में भारत के प्रधानमंत्री से जानना चाहते है लेकिन वह जवाब नहीं दे रहे हैं. यह बहुत गम्भीर बात है, भारत में विदेशी फंडिंग आ रही है और प्रधानमंत्री चोर की तरह दुबका हुआ है, गृहमन्त्री कायर की तरह छिपा हुआ है, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कहीं अता पता नहीं है। वास्तव में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सम्प्रभुता दोनों खतरे में है.

किसान आंदोलन के समय भी विदेशी फंडिंग का सोसा छोड़ा गया था

बाकी हरीश साल्वे के पास धन पद प्रतिष्ठा सब कुछ है लेकिन जब राज दरबार में चाटने की आदत बन जाती है, तो आदमी अपना जमीर बेच देता है. तो हरीश साल्वे अपना जमीर बेच चुके है क्योंकि राज दरबार का झूठन चाटने की आदत बन गयी है. 

बस पिछली बार जब किसान आंदोलन हुआ था, उस समय भी फंडिंग का आरोप लगा था, बस उसी का अपडेट दे दे कि उसमें क्या हुआ था? और यह भी बता दे कि 2014 के पहले की सरकारों में जो आंदोलन हुए थे, उसकी फंडिंग किसने की थी..?

2014 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि-भारत की सीमाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है,बैंकिग सेवाओ पर भारत सरकार का नियंत्रण है, ईडी सीबीआई इंटेलिजेंस एजेंसियां सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण में है, फिर भी भारत में अवैध फंडिंग कैसे हो जाता है? सरकार को यह बताना चाहिए कि आखिर फंडिंग की रोकथाम के लिए सरकार इतना ढीला रवैया क्यों अपनाए हुए हैं. 

 

राम भक्तों के लिए

दुर्गा पूजा को लेकर प्रशासन अलर्ट, अधिकारियों ने किया पंडालों का निरीक्षण; निकाला फ्लैग मार्च

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News – Kahkashan Farooqi 

गोमिया__ आगामी दुर्गा पूजा 2026 को शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं सुरक्षित माहौल में संपन्न कराने को लेकर पुलिस-प्रशासन पूरी तरह अलर्ट है। इसी क्रम में एसडीएम, एसडीपीओ, बीडीओ एवं सीओ सहित विभिन्न थाना और ओपी प्रभारियों ने क्षेत्र के दुर्गा पूजा पंडालों का निरीक्षण किया। इस दौरान फ्लैग मार्च निकालकर लोगों को सुरक्षा व्यवस्था के प्रति आश्वस्त किया गया।

निरीक्षण एवं फ्लैग मार्च में एसडीएम, एसडीपीओ, बीडीओ, सीओ के साथ जागेश्वर बिहार थाना प्रभारी, चतरोचट्टी थाना प्रभारी, महुआटांड़ थाना प्रभारी, रहावन ओपी प्रभारी तथा ललपनिया ओपी प्रभारी शामिल रहे। अधिकारियों ने पूजा पंडालों का जायजा लेते हुए दुर्गा पूजा के दौरान सुरक्षा एवं विधि-व्यवस्था बनाए रखने की तैयारियों का निरीक्षण किया।

प्रशासन का उद्देश्य पूजा के दौरान शांति एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा श्रद्धालुओं को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना है। फ्लैग मार्च के माध्यम से प्रशासन ने यह संदेश दिया कि पर्व के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी। शांतिपूर्ण पूजा आयोजन के लिए पुलिस एवं प्रशासन पूरी सतर्कता के साथ मुस्तैद रहेगा।

राम भक्तों के लिए

मां दुर्गा की स्तुति से गूंजा पिट्स मॉडर्न स्कूल, नृत्य और गीतों ने बांधा समां

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News – Kahkashan Farooqi 

गोमिया__ पिट्स मॉडर्न स्कूल, गोमिया में गुरुवार को दुर्गा पूजा के अवसर पर विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने भक्ति गीत, ओजस्वी वक्तव्य और मनमोहक नृत्य प्रस्तुत कर नवरात्रि के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत कक्षा 11वीं के विद्यार्थियों द्वारा मां दुर्गा की स्तुति ‘अयिगिरि नंदिनी’ के सुमधुर गायन से हुई। इसके बाद सिद्धि नयन ने अपने वक्तव्य में नवरात्रि को नारी शक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बताया। वहीं, कक्षा आठवीं के विद्यार्थियों ने ‘नवरात्रि नवदुर्गा’ विषय पर आकर्षक नृत्य प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों की खूब सराहना बटोरी। पूरा विद्यालय परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा।

विद्यालय के प्राचार्य बृज मोहन लाल दास ने कहा कि नवरात्रि जैसे पर्व बच्चों को भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जोड़ते हैं। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियां उनकी प्रतिभा, आत्मविश्वास और संस्कारों को दर्शाती हैं।

विद्यालय प्रबंधन समिति के उपाध्यक्ष अरिंदम दासगुप्ता ने कहा कि इस तरह के आयोजन बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं, आईईपीएल (ओरिका), गोमिया के एमसीएम अभिषेक बिस्वास ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से बच्चों में अनुशासन, टीम भावना और सांस्कृतिक चेतना का विकास होता है।

कार्यक्रम का संचालन दिव्या कुमारी ने किया। आयोजन को सफल बनाने में नृत्य शिक्षिका सुजाता दास, संगीत शिक्षक चिन्मया भट्टाचार्य और अंग्रेजी शिक्षिका सोनी शालिनी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन ।

राम भक्तों के लिए
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