गुमला शिव भक्तों के लिए महा सदाशिव का कपाट खुल गया हैं। इस महा सदाशिव मंदिर मरदा गुमला के निर्माण कार्य में लगभग 5 वर्षो का समय लगा। मंदिर निर्माण के लिए उड़ीसा से 8-10 कारीगरो का एक ग्रुप बुलाए गए थे जो मंदिर निर्माण, वास्तु कला के जानकार और देवी देवताओं को मूर्त रूप देने वाले विशेषज्ञों द्वारा मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया गया था। मंदिर निर्माण कार्य में सभी कलाकारों द्वारा अद्भुत कला का प्रदर्शन करते हुए उक्त मंदिर निर्माण को पूर्ण कराया गया। वह भी लगातार बीना रुके 5 वर्षो की कड़ी मेहनत और इच्छा शक्ति से पूर्ण कराया गया। इस मंदिर की कलाकृति उत्कल वास्तुकला के अनुरुप बनाई गई है जिसमें मंदिर निर्माण के कारीगर एवं प्रोफेसनल आर्किटेक दोनो के द्वारा मंदिर की मज़बूती और उसके रख– खाव को ध्यान में रख कर किया गया है।

इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 100 फीट है जो कि लगभग 2 एकड़ भूखंड पर फैला हुआ है जिसमें एक विशाल उद्यान भी है। इस उद्यान की खासियत यह है कि माह अक्टूबर से लेकर माह मार्च तक कई प्रकार के फुलो से भरा रहता है एवं भक्तजन आके इस उद्यान का आनंद लेते हैं।
इस मंदिर में श्री श्री 108 श्री देवों के देव महादेव, 26 शिश और 52 भुजाओं वाले शिव शम्भू, अनेकों रूप, अनेकों नाम वाले कैलाश पति हर हर महादेव , अर्धनागेश्वर अपने सबसे अद्भुत विराट विकराल रूप धारण किये औवघडदानी भोलानाथ, बोले भंडारी, महादेव जो अवतरित नहीं हुए और जिनके माता-पिता भी नहीं शंभू शिवशंकर अपने अलौकिक दिव्य रूप धारण किए साक्षात विराजमान हैं। यह स्वरूप अनूठा और अदभुत नहीं तो और क्या है। जिसके दर्शन मात्र से सभी सनातनी हिन्दू धर्मलंम्बी सहित अन्य अनेक धर्म जाति पंथ सभी लोग, सभी भक्तजन शिव शंभू को अपना गुरु मानते हुए रोमंचित और भावविभोर हो उठते हैं। इसमें कोई किंतु परंतु नहीं हैं। हमारे महासदाशिव स्वरूप शिव के अनेक रूप में से एक है। महा सदाशिव, जिसमें साक्षात चेतन और आचेतन की व्यापकता समाहित है।
अलौकिक दिव्य ज्योति जागृति लिये उक्त मंदिर के अंदर और बाहर सभी प्रमुख देवी – देवताओं की कुल 80 प्रतिमाएं हैं , जो काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। शिव जी का यह रूप देश के कुछ गिने चुने प्रमुख मंदिरो में ही स्थापित है। अब हम उक्त महान् आत्मा के द्वारा महा सदाशिव मंदिर की स्थापना से लेकर आज तक के 6 वर्षों का सफर तय करते हुए मा सदाशिव मंदिर का निर्माण गुमला जिला अंतर्गत रायडीह थाना स्थित मरदा ग्राम में स्वर्गीय श्रीधर सिंह जो की एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनकी प्रबल इच्छा थी कि उनके गांव मर्दा ग्राम में एक मंदिर बने उनकी इसी इच्छापूर्ति के लिए मंदिर का निर्माण स्वर्गीय श्रीधर सिंह की स्मृति में किया गया है। मंदिर के निर्माण में लगभग 5 वर्ष का समय लगा जो की उड़ीसा से आए 8 -10 मूर्ति निर्माण विशेषज्ञों ने अपने सधे हुए हाथों से लगातार बिना रुके अपने कार्य को अंजाम देते रहे। 5 वर्षों की अथक मेहनत और प्रयास ने रंग लाया और मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। इस मंदिर की कलाकृति उत्कल वास्तु कला के अनुरूप बनाई गई है। इस मंदिर और देवी देवताओं के निर्माण कार्य , के कलाकारी के जादूगर विशेषज्ञ एवं प्रोफेशनल आर्किटेक दोनों के द्वारा मंदिर की मजबूती और उसके रखरखाव को ध्यान रखते हुए , इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 100 फीट रखी गई हैं।

जब मंदिर का गुंबद बन कर तैयार हुआ तो धार्मिक प्रथा के अनुसार गुंबद में अन्न धन भरा जाता है। इस अनुष्ठान में क्षेत्र के विभिन्न गांवों से भारी संख्या में अन्न का भंडारण हुआ। लोगों का अन्न संग्रहण में उत्साह मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा को दर्शा रहा था।
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर में जब घंट, शंख इत्यादि बजाए जाते हैं तो ओम की ध्वनि सुनाई पड़ती है।
प्राण प्रतिष्ठा-
इस भव्य और विराट मंदिर का प्रथम प्राण- प्रतिष्ठा समारोह बड़े ही धूमधाम से फलगुल शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को प्रारंभ हो कर तीन दिनों तक अर्थात दिनांक 7-9 मार्च 2019 मनाया गया। प्रथम प्राणप्रतिष्ठा समारोह अप्रत्याशित रूप से सफल रहा और क्षेत्र के हजारों भक्तजन, नर- नारी की भारी भीड़ आराध्यदेव महासदाशिव के दर्शन के लिए उमड़ पड़ी। सबके हृदय मे छब्बीस शीश वाले महादेव के दर्शन का कौतूहल था। दर्शन के उपरांत भक्तों ने अपने आप को धन्य कहा। इस प्रथम समारोह में, जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी का भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ। उन्होंने न केवल इस मंदिर की भूरी भूरी प्रसंशा करते हुए इसका नामकरण भी विज्ञानेश्वर महादेव मंदिर करते हुए एक प्रशस्तिपत्र भी प्रदान किया अपितु प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने के लिए अपने 6 शिष्य भी भेजे। त्रयंबकेश्वर नासिक के 11 आचार्यों द्वारा सारे यज्ञोपवीत कर्मकांड वैदिक विधिविधान से संपादित कराए गए। इन आचार्यों के अतिरिक्त वाराणसी, मथुरा, रामरेखाधाम आदि से दर्जनों साधु संतों का शुभागमन हुआ था।
प्रथम प्राण प्रतिष्ठा समारोह का मुख्य आकर्षण कलश यात्रा थी जिसमें तीन हजार मां बहनों ने भाग लिया। कलश यात्रा नवागढ़ दुर्गा मंदिर से शुरू हो कर भलमंडा होते हुए लगभग ढाई किलोमीटर चल कर मंदिर पहुंची। इस कलश यात्रा में ओडिशा की कीर्तन मंडली, सरस्वती शिशु मंदिर अंबाटोली के बैंड समूह, सिमडेगा और कोलेबिरा के पाइका नर्तक, ढोल नगाड़ा पार्टी, टोटो गुमला की ताशा पार्टी, झांकियां, और साथ में चल रहे पताका वाहकों की टोली सम्मिलित हुई जिससे संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय हो गया था। यह कलश यात्रा इस क्षेत्र के लिए अभूतपूर्व थी। कलश यात्रा के बाद अखण्ड हरिकीर्तन में ओडिशा से पधारी मंडली के सिवा पांच अन्य मंडलियों ने भाग लिया। पूजन हवन भजन एवं अभिषेक का संपादन वैदिक विधि से त्रयंबकेश्वर से पधारे आचार्यों द्वारा हुआ। संध्या में दोनों दिन संतो का प्रवचन चला और अंतिम दिन रात में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए जिसमें झारखंड के अतिरिक्त अन्य राज्यों के कलाकारों ने भी भाग लिया। रात भर दर्शक झूमते रहे।
इस समारोह में वृहत स्तर पर भंडारा का आयोजन किया गया था जो प्रथम और दूसरे दिन तक चला जिसमें लगभग बीस हजार भक्तों ने प्रसाद/भोजन ग्रहण किया।
इसके बाद इस मंदिर की ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही गई। दूसरे वर्ष का वार्षिकोत्सव और भी भव्य और विशाल हुआ। हालांकि कोविड काल में इसकी गति धीमी हुई थी परंतु गत वर्ष इसमें पुन: गति आई और इस वर्ष इसके अभूतपूर्व होने की संभावना है।
इस मंदिर की सहायता श्रीधर सेवा संस्थान से होती है। इस संस्थान का कॉविड काल में अत्यंत सराहनीय भूमिका रही है। हमारी सेवा से प्रभावित हो कर गुमला जिला प्रशासन ने हमारे अनेक कर्मियों को उनके समर्पित मानव सेवा के लिए प्रशंसा प्रमाण पत्र दे कर सम्मानित भी किया है। महासदा शिव की कृपा से कॉविड के दिनों में सैकड़ों श्रमिकों को भोजन और कपड़े प्रदान कर हमने जो सराहनीय कार्य किया है वह एक बड़ी उपलब्धि है।
आज गुमला जिला ही नहीं झारखंड में इस मंदिर का बड़ा नाम है। गुमला जिले की तो यह शान है। इस मंदिर के दर्शन के लिए भक्तजन अन्य राज्यों से भी पधारते हैं। गुमला प्रशासन ने अपने पर्यटन नक्शे में इस मंदिर को प्रथम स्थान पर रखा है।
इस मंदिर की स्थापना के पीछे धार्मिक भावना के अतिरिक्त क्षेत्र में हिंदू एकता, जागरूकता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। इस काम में हम सफल हुए हैं । आज इस मंदिर के कारण क्षेत्र के हिंदुओं में इतनी जागृति आई कि हर गांव में छोटा बड़ा एक मंदिर का निर्माण हो गया है। इस मंदिर के निर्माण से मरदा जैसे पिछड़े गांव का तेजी से विकास हुआ है। मंदिर के आस पास कई दुकानें खुल गई है जो पूजा सामग्रियों के सिवा किरने का सामान बेचती हैं । कुछ होटल और कपड़े की भी दुकान खुल गई है। इस तरह देखा जाय तो इस मंदिर ने इस क्षेत्र के लोगों को न केवल एकता के सूत्र में बांधा है बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास में भी अहम भूमिका निभा रहा है। आज इस मंदिर के दर्शन के लिए छोटे बड़े अधिकारी, नेता, आम व्यक्ति और भक्त गण आते ही रहते हैं।
इस वर्ष मंदिर का वार्षिक महोत्सव 11 और 12 मार्च को भव्य आयोजन के साथ मनाने की तैयारी जोरो – सोरों से चल रही है जिसमें लगभग 60 – 70 हजार लोगो की आने की उम्मीद है साथ ही देश के विभिन्न स्थानों से लगभग 30 साधु – संत भी इस महोत्सव में शामिल होके इसकी भव्यता को बढ़ाएंगे। साथ ही अन्य वर्ष की भांति इस वर्ष भी भव्य कलश यात्रा, झांकी , पाइका नृत्य, तासा पाटी, 8-10 कृतन मंडली , नागपुरी कलाकारों द्वारा संस्कृतिक कार्यक्रम, भव्य मेला जिसमे कई प्रकार के झूले ,दो दिन तक भंडारा, मीना बाजार एवं त्रयम्बकेश्वर नासिक के 11 आचार्यो द्वारा विधि- विधान से पूजा – अर्चना एवं यज्ञ कराया जाएगा।
News – गनपत लाल चौरसिया
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