इतिहास में पहली बार किसी से पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बनाया और राज्य का विभाजन भी कर दिया। लेकिन दस साल बाद हुए चुनाव में मतदान के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इंडिया गठबंधन को पूर्ण बहुमत देकर जनता ने बीजेपी के दांव-पेंच पर अपना गु़स्सा निकाला है।
हरियाणा में कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक फ़ीसदी से भी कम वोटों का अंतर रहा है और वहां बीजेपी की जीत चुनावी मैदान में दिख रही जन-भावना के बिलकुल उलट है। किसान, जवान, पहलवान के प्रति बीजेपी सरकार का ग़ुस्सा किसी कल्पना की उपज नहीं था।
अशोक वर्मा
दो राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि बाज़ी बराबर पर छूटी है। एक राज्य बीजेपी के खाते में गया और एक राज्य इंडिया गठबंधन के खाते में। लेकिन गोदी मीडिया के लिए जम्मू-कश्मीर में बीजेपी को मिली हार का कोई मतलब ही नहीं है। वह हरियाणा में मिली जीत का ढोल बजाकर जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की विफलता को नेपथ्य में डालना चाहता है। जबकि यह हार सिर्फ़ बीजेपी की नहीं, आरएसएस की पूरी विचारधारा की है। अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर राज्य का दर्जा छीनने तक, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के साथ जो-जो किया, उसे इंडिया गठबंधन को जिताकर जनता ने पूरी तरह नकार दिया है। हरियाणा में कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक फ़ीसदी से भी कम वोटों का अंतर रहा है और वहां बीजेपी की जीत चुनावी मैदान में दिख रही जन-भावना के बिलकुल उलट है। किसान, जवान, पहलवान के प्रति बीजेपी सरकार का ग़ुस्सा किसी कल्पना की उपज नहीं था। सारे चुनावी सर्वेक्षण एक ही दिशा में इंगित करते हुए बता रहे थे कि लोगों में बीजेपी सरकार को लेकर भारी नाराज़गी है। स्वतंत्र पत्रकार और पर्यवेक्षक भी यही बता रहे थे लेकिन बीजेपी फिर भी जीत गयी। कांग्रेस ने धांधली के जो आरोप लगाए हैं, वे काफ़ी गंभीर हैं जिनकी जांच होना लोकतंत्र पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए ज़रूरी है।
थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाये कि हरियाणा के नतीजे बिना किसी धांधली के आए हैं तो, भी यह कोई ऐसी जीत नहीं है जिससे लोकसभा चुनाव में बहुमत न जुटा पानेवाले पीएम मोदी को फिर से महाबली ठहराया जा सके। हरियाणा में न उनकी रैलियों में लोग जुटे और न उन्हें बड़ी तादाद में लोग सुनने को ही तैयार थे। अंत समय में तो पोस्टरों से भी मोदी जी का चेहरा हटा लिया गया था। ज़ाहिर है, हरियाणा में मिली जीत अप्रत्याशित है, लेकिन इसके सहारे जम्मू-कश्मीर में मिली पराजय को छिपाने की कोशिश की जा रही है। यह बीजेपी ही नहीं, आरएसएस के बड़े सैद्धांतिक प्रयोग की हार भी है।

बीजेपी से सभी दावे फेल
मोदी सरकार का दावा है कि उसने दस साल में जम्मू-कश्मीर की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। तमाम आतंकी हमलों और घटनाओं को दरकिनार करते हुए घाटी में शांति लाने का वह ज़ोरदार दावा करती है। अनुच्छेद 370 हटाना तो बीजेपी के पूर्व अवतार जनसंघ के समय ही मुद्दा रहा है जो उसके मुताबिक़ कश्मीर को स्वर्ग बनाने के लिए ज़रूरी था। इसके लिए उसने संविधान-सभा बुलाना तो दूर विधानसभा से भी प्रस्ताव पास कराना ज़रूरी नहीं समझा और राज्यपाल में ही विधानसभा की शक्ति को समाहित मान लिया था। यही नहीं, इतिहास में पहली बार किसी से पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बनाया और राज्य का विभाजन भी कर दिया। यह सब जनता की ख़ुशहाली के नाम पर किया गया था। लेकिन दस साल बाद हुए चुनाव में मतदान के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इंडिया गठबंधन को पूर्ण बहुमत देकर जनता ने बीजेपी के दांव-पेंच पर अपना गु़स्सा निकाला है। यह ग़ुस्सा प्रेस की आज़ादी और अन्य नागरिक अधिकारों के दमन के ख़िलाफ़ भी निकला है।
परिसीमन के नाम पर भी खेल हुआ
जम्मू-कश्मीर में जीत हासिल करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने वह सब किया जो वह कर सकती थी। पहला खेल तो परिसीमन के नाम पर किया गया। जिस जम्मू में बीजेपी मज़बूत मानी जाती है वहां की सीटें बढ़ा दी गई। जम्मू क्षेत्र में छह नई विधानसभा सीटें जोड़ी गई जबकि कश्मीर में सिर्फ़ एक। इन छह नई सीटों में बीजेपी ने पांच पर जीत हासिल की है। जम्मू में पहले 37 और कश्मीर में 46 सीटें थीं जो इस बार बढ़कर जम्मू में 43 और कश्मीर में 47 हो गयी थीं। यानी कुल 90 सीटों पर चुनाव हुए। जब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया गया तब राज्य विधानसभा में सिर्फ़ 107 सीटें रह गई थीं। पुनर्गठन अधिनियम में इन सीटों को बढ़ाकर 114 कर दिया गया। इनमें 90 सीटें जम्मू-कश्मीर के लिए और 24 पाक अधिकृत कश्मीर के लिए हैं।
तमाम दावों के बावजूद लोकसभा चुनाव में बीजेपी कश्मीर घाटी में चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा सकी। 2024 लोकसभा चुनाव में उसने जम्मू की दो सीटों पर तो उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कश्मीर घाटी की तीनों सीटों पर कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। केंद्र में सरकार चला रही किसी पार्टी के लिए यह शर्मनाक है कि उसे देश के किसी हिस्से में इस तरह पराया महसूस किया जाए या वह ख़ुद ऐसा करे।
इंजीनियर रशीद भी फिसड्डी साबित हुए
विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ। घाटी की 47 सीटों में बीजेपी ने महज़ 19 पर प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी ने दावा किया था किया था कि जनता बीजेपी की ओर आशा भरी निगाह से देख रही है, लेकिन यहां उसका खाता भी नहीं खुला। बीजेपी ने जो 29 सीटें जीतीं, वे सभी जम्मू क्षेत्र की हैं। बीजेपी की पूरी कोशिश इंडिया गठबंधन के मतदाताओं में बिखराव का फ़ायदा उठाने की थी। इसके लिए कई उग्रपंथियों को जेल से निकाल कर चुनाव लड़ने की सुविधा दी गई। यहां तक कि प्रतिबंधित जमाते-इस्लामी के सदस्यों को भी निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया। रणनीतिक रूप से ऐसे तमाम उम्मीदवार खड़े किये गये जिससे इंडिया गठबंधन को नुकसान पंहुचे। आतंकी फ़ंडिंग के आरोप में जेल में बंद इंजीनियर रशीद ने लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला को हराकर सनसनी मचा दी थी। उन्हें भी 11 सितंबर को जेल से रिहा कर दिया गया।
हद तो ये है कि अपनी विभाजनकारी राजनीति के तहत नेशनल कान्फ़्रेंस को पाकिस्तान-परस्त साबित करने की कोशिश की गई जिसने अनुच्छेद 370 की पुनर्बहाली के लिए क़ानूनी रास्ता अख़्तियार करने का वादा किया था। इस मुद्दे पर कांग्रेस को भी कठघरे में खड़ा किया गया। यह भी कहा गया कि पूर्ण राज्य की बहाली सिर्फ़ बीजेपी कर सकती है, बिना इस बात का जवाब दिए कि आख़िर केंद्र शासित प्रदेश बनाकर जनता के अधिकार को छीनने का ‘पाप’ भी उसी ने किया था।

घाटी में ‘त्रिशंकु’ विधानसभा योजना फ्लॉपबीजेपी की पूरी रणनीति जम्मू-कश्मीर में ‘त्रिशंकु’ विधानसभा लाने की थी। ताकि वह कुछ निर्दलीयों और अपने प्रॉक्सी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने में क़ामयाब हो जाये। पांच एग्ज़िट पोल में ‘हंग असेंबली’ की भविष्यवाणी भी की गयी थी। इसी योजना के तहत मतदान के बाद उपराज्यपाल की ओर से पांच सदस्यों के मनोनयन का प्रस्ताव भी आ गया ताकि ज़रूरत पड़ने पर बहुमत का इंतज़ाम हो सके। लेकिन जम्मू-कश्मीर की जनता किसी भ्रम में नहीं पड़ी। उसने बीजेपी की सारी साज़िश की हवा निकाल दी। यहां तक कि जिस पीडीपी ने पिछली बार सबसे ज़्यादा (28) सीट जीतकर बीजेपी के साथ सरकार बनाई थी उसे भी बड़ा सबक़ सिखाते हुए तीन सीटों पर समेट दिया। इंजीनियर रशीद की अगुवाई वाली अवामी इत्तेहाद पार्टी के 44 उम्मीदवारों में एक भी नहीं जीत सके। किसी किंतु-परंतु की गुंजाइश को नकारते हुए जनता ने अकेले नेशनल कान्फ्रेंस को 42 सीटों पर विजय दिला दी। साथ में कांग्रेस को छह और सीपीएम को भी एक सीट मिली। यानी इंडिया गठबंधन के पास 49 सीटें आ गयीं। अब अगर उपराज्यपाल पांच सीटों पर मनोनयन भी करते हैं तो भी सरकार पर आंच नहीं आएगी क्यों कि तब कुल सीटें बढ़कर 95 हो जायेंगीं। यानी बहुमत के लिए 48 सीटों की ही ज़रूरत होगी। बदली परिस्थिति में चार निर्दलीय विधायकों का इंडिया गठबंधन को समर्थन देना आश्चर्यजनक नहीं है।
RSS के वैचारिक प्रयोग की क़रारी हार पर चर्चा नहीं
इसके बावजूद गोदी मीडिया जम्मू-कश्मीर चुनाव में बीजेपी और आरएसएस के बड़े वैचारिक प्रयोग की क़रारी हार पर चर्चा नहीं कर रहा है। उल्टा ये बता रहा कि बीजेपी हार कर भी जीत गयी क्योंकि कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव हुए और बड़ी तादाद में लोगों ने बेख़ौफ़ होकर वोट दिया। हक़ीक़त ये है कि जम्मू-कश्मीर में 2014 की तुलना में 1.12% कम मतदान हुआ। तब 65% वोट पड़े थे जबकि 2024 में मतदान का आंकड़ा 63.88% ही रहा।
हरियाणा की जीत पर दिखाए जा रहे अति उत्साह का कारण यही है। हरियाणा की जीत को परदा बनाकर जम्मू-कश्मीर में आरएसएस-बीजेपी की क़रारी वैचारिक पराजय को ढंकने की कोशिश हो रही है। ग़ौर से देखिए तो लोकसभा चुनाव के बाद हुए एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच मुक़ाबला अनिर्णीत रहा है। देश का मूड समझने के लिए महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव का इंतज़ार करना होगा जहां हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के साथ चुनाव करवाने की हिम्मत मोदी सरकार नहीं दिखा पाई।
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