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Saturday, March 7, 2026
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मधुबन में त्याग, तपस्या, संयम-साधना और आत्मशुद्धि का पर्व दशलक्षण प्रारंभ, देश-विदेश से आए तीर्थयात्रियों ने भगवान महावीर और पार्श्वनाथ का अभिषेक किया

(कमलनयन)

गिरिडीह : जैन धर्मावलंबियों के सर्वोच्च तीर्थ क्षेत्र मधुबन शिखरजी में 10 दिवसीय पर्यूषण पर्व की शुरुआत शनिवार को श्रद्धा-भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के माहौल में आरंभ हुई। महापर्व के पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म समर्पित किया गया है। सुबह से देश-विदेश से हजारों की संख्या में आए तीर्थयात्रियों ने मुनिश्री के और आर्यिकाओं के सानिध्य में भगवान महावीर और पार्श्वनाथ का अभिषेक किया।

साधु-संतों और आचार्यों ने बड़े पैमाने पर दीक्षार्थियों को क्षमा धर्म के महत्व के संदर्भ कहा कि क्षमा केवल एक गुण नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की दिशा है। क्षमा से व्यक्ति के जीवन में क्रोध, वैर भाव से मुक्ति मिलती है। इससे शांति और सहनशीलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

सबसे श्रेष्ठ क्षमा धर्म की आराधना 

प्रवचन के दौरान यह संदेश दिया गया कि क्षमा का अभ्यास से द्वैतवादी प्रदूषण से मुक्ति और आत्मा की शुद्धि है। मुनिश्री ने कहा कि पर्व को दशलक्षण इसलिए कहा जाता है क्योंकि दस दिनों में दस विशेष विषयों की साधना की जाती है। इनमें क्षमा, मार्दव (अहंकार का त्याग), आर्जव (सरलता), शौच (शुद्धि), सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य शामिल हैं। पहले दिन क्षमा धर्म की आराधना को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह सभी दस्तावेजों की मूल प्रति है।

दशलक्षण पर्व आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है, जिसमें उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम अकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य जैसे 10 उत्तम गुणों की आराधना की जाती है।

इस पर्व पर भक्त मंदिरों में जाकर तप, उपवास, प्रार्थना और दान करते हैं, जिससे उन्हें पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग मिलता है। दशलक्षण महापर्व के दौरान भक्त क्षमता अनुसार उपवास कर धर्मग्रन्थों के पाठ कर दान करते हैं। जिससे उन्हें पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है।

यह महापर्व जीवन को अहिंसा और संयम की ओर ले जाता है

दशलक्षण महापर्व के दौरान भक्त क्षमता अनुसार उपवास कर धर्मग्रंथों के पाठ कर दान करते हैं। इस पर्व में बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा तप, ध्यान और स्वाध्याय की साधना में लीन रहते हैं। जैन समाज इसे आत्मशुद्धि और आत्मानुशासन की पवित्र यात्रा के रूप में देखता है। जैन धर्मावलबियों का मानना है कि यह पर्व न केवल जीवन को अहिंसा और संयम की ओर ले जाता है, बल्कि भविष्य के सुख और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।


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