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Sunday, March 8, 2026
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मां को गाली पर मोदी खेलने लगे विक्टिम कार्ड, जब मां के नाम के इस्तेमाल की जरूरत पड़ी, तो फिर बायोलॉजिकल बन गए 

– विष्णु नागर (वरिष्ठ पत्रकार)

जो मोदी जी आज बिहार में मां-मां, अपमान-अपमान करते पाए गए, जो एक सरकारी कार्यक्रम की गरिमा को धूल में मिलाकर अपनी मां को गाली देने पर राजनीति करते पाए गए, जो अपनी मां के अपमान को धरती मां के अपमान से जोड़ते पाए गए, जो आरजेडी और कांग्रेस से सातबहिनी और छठी मैया से माफी मांगने की बात करके बिहारियों को भावुक बनाने की कोशिश कर हारी हुई लड़ाई को भावुकता की छिछोरी कोशिश हरकत से जीतने का प्रयत्न करते पाए गए. उनकी मातृभक्ति कितनी सजावटी थी, सबने देखा है। सब जानते हैं मां भी उनके लिए राजनीतिक इस्तेमाल की वस्तु थी।

वह जब भी अहमदाबाद जाते थे, अनेक कैमरों के बीच मां से मिलने जाते थे। मां के साथ कुछ क्षण एकांत में बिताने की बजाय उसे पूरे राजनीतिक नाटक बनाते थे। मातृभक्ति राजनीतिक उपभोग की वस्तु थी और जब वह नहीं रहीं तो माननीय नान बायोलॉजिकल बन गए और जब मां के नाम के इस्तेमाल की आवश्यकता पड़ी, तो फिर बायोलॉजिकल बन गए। समय के अनुसार उनका चोला और उनकी भाषा बदलती रहती है।

और जब उनकी मां की मृत्यु तीस दिसंबर, 2022 को तड़के साढ़े तीन बजे हुई, तो उनके पास मृत मां के लिए भी अधिक समय नहीं था। खबर पाकर वह पौने आठ बजे अहमदाबाद पहुंचे। हवाई अड्डे पर पांच मिनट कुछ बातचीत की और सवा आठ बजे अपने छोटे भाई के घर पहुंच गए।

इसके पांच मिनट बाद ही उनकी मां के पार्थिव शरीर को वहां से अंतिम यात्रा के लिए ले जाया गया। नौ बजकर आठ मिनट पर वे श्मशान पहुंचे। वहां अंतिम संस्कार की रस्म हुई और फिर एक घंटे में ही वह सबको छोड़ निकल लिये-राजभवन पहुंचने के लिए। वह मां इनके भाइयों- बहनों की भी मां थी। अपना और उनका दुख कुछ देर उनके पास बैठकर साझा करने का समय भी उनके पास नहीं था।

वहां से उन्होंने दो कार्यक्रमों में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए शिरकत की। एक कार्यक्रम हावड़ा और न्यू जलपाईगुड़ी के बीच वंदे भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखाने का था। दूसरा किसी जल परियोजना का था।

ये ऐसे काम नहीं थे कि मां की मृत्यु के कारण उस दिन उसे दूसरों के भरोसे नहीं कर सकते थे। उस दिन बदलाव इतना ही हुआ कि ये काम उन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए किए, बल्कि ममता बनर्जी ने तो कहा भी कि आज तो आप कुछ आराम कर लेते!

और फिर सब जानते हैं कि सोनिया गांधी समेत अनेक महिलाओं के लिए जो किसी की मां, किसी की बहन, किसी की पत्नी हैं, उन्होंने समय- समय पर किस- किस तरह की शब्दावली का उपयोग किया है। खुद ममता बनर्जी को संबोधित करने के लिए किस शर्मनाक भाषा का इस्तेमाल किया।

इस आदमी के लिए कुछ भी अशोभन और अकरणीय नहीं है, बस उसका सामयिक राजनीतिक इस्तेमाल होना चाहिए। बताया तो यह भी जा रहा है कि जिस युवक ने प्रधानमंत्री की मां को लेकर अपशब्द कहे थे, वह भी इनकी पार्टी का ही था। संघ-भाजपा की संस्कृति में अपने को चांटा मारकर दूसरों पर ऊंगली उठाकर रोना भी शामिल है। बिहार की चुनावी राजनीति में एक बार फिर मां के नाम को भुुुुनाने की कोशिश की जा सकती है.


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