सत्ता को केंद्रीकृत करने की जैसी भूख मोदी सरकार में है, वैसी इस देश ने पहले कभी नहीं देखी। सबसे गरीब मजदूर वर्ग को कुछ राहत देनेवाली महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के खिलाफ तो प्रधानमंत्री बहुत शुरू से थे, क्योंकि वह आज की राजनीतिक शब्दावली में यूपीए सरकार का ‘मास्टर स्ट्रोक’ थी।
अब उससे महात्मा गांधी का नाम हटाकर तो इस सरकार ने अपना असली चेहरा दिखा ही दिया है, इसके अलावा यह योजना कार्यान्वित न हो, इसका भी पूरा प्रबंध कर दिया है।
आर्थिक संकट से जूझ रहे राज्यों पर केंद्र सरकार ने नये नाम से प्रस्तावित इस योजना का चालीस प्रतिशत खर्च का बोझ डाल दिया है, जबकि पहले राज्य सरकारों को इस पर मात्र दस प्रतिशत खर्च उठाना होता था। इससे भी वह संतुष्ट नहीं है बल्कि केंद्र सरकार ही तय करेगी कि किस राज्य के किस क्षेत्र में रोजगार दिया जाए। यह अधिकार भी अब राज्यों के पास नहीं रहा।
इसके अलावा खेती के सीजन में यह कार्यक्रम बंद रहेगा, ताकि खेत मालिकों को सस्ते मजदूर मिल सकें। यानी बोझ राज्यों का बढ़ाएंगे और स्वतंत्रता राज्यों की छीनेंगे और गरीब रोटी के साथ सब्जी खा सके, गुड़ की डली मुंह में रख सके,यह इन्हें मंजूर नहीं। इन्हें कांग्रेस मुक्त नहीं, गरीब मुक्त भारत चाहिए। ग़रीबों की कमर पूरी तरह तोड़ने के लिए अब की तरह इस योजना की मांग अधिक होने पर केंद्र सरकार अपने बजट राशि नहीं बढ़ाएगी।
अगर जरूरत के हिसाब से खर्च अधिक हो तो उसे संपूर्ण रूप से राज्य सरकारें वहन करें! पता नहीं केंद्र सरकार का सारा पैसा कहां चला जाता है? उससे किसका पैंट भरा जाता है और यह सब तथाकथित ‘विकसित भारत’ के नाम पर किया जा रहा है। इस तरह करेंगे ये भारत को विकसित!
इसी तरह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी केंद्रीयकरण को बढ़ावा देने के लिए एक विधेयक लाया गया है। वैसे अभी यह संयुक्त संसदीय समिति को विचारार्थ भेजा गया है मगर यह सरकार किसी समिति की सुनती कब है? और जब यह समिति एनडीए के किसी सांसद की अध्यक्षता में बनेगी तो वही फैसले लिए जाएंगे, जो सरकार चाहेगी। विपक्षी दल असहमति का नोट देते रहें, क्या फर्क पड़ता है! पहले संसद की स्थाई समितियां तथा संयुक्त संसदीय समिति का कोई अर्थ होता था, अब महज यह दिखावा रह गया है।
सत्ता के केंद्रीकरण की मोदी सरकार की कितनी भूख कितनी बढ़ चुकी है, इसका एक उदाहरण केरल सरकार द्वारा हर वर्ष तिरुवनंतपुरम में आयोजित होनेवाला फिल्म महोत्सव भी बन चुका है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के हस्तक्षेप के कारण यह महोत्सव अब संकट में पड़ गया है क्योंकि इसमें पहले से दिखाने के लिए तय 19 फिल्मों को दिखाने की मंजूरी केंद्रीय मंत्रालय ने नहीं दी है। फिल्म समारोह की फिल्में सेंसर नहीं होतीं मगर केंद्र सरकार से इन्हें प्रदर्शित करने की औपचारिक अनुमति लेनी होती है।
हास्यास्पद यह है कि सोवियत युग की विश्व की आधुनिक क्लासिक फिल्म और दशकों से भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में देखी और सराही गई सौ साल पुरानी फिल्म ‘बैटलशिपोटेमकिन’ (जो यू ट्यूब पर उपलब्ध है) तक को दिखाने से मना कर दिया गया। यही नहीं जो फिल्में भारत सरकार द्वारा गोवा में आयोजित फिल्म समारोह में दिखाई जा चुकी हैं, वे भी केरल सरकार के इस फिल्म समारोह में दिखाने से मना कर दिया गया है।
एक स्पेनी फिल्म का नाम ‘बीफ’ है मगर उसका गोमांस से कोई संबंध नहीं है, उसे भी दिखाने से रोक दिया गया है। कितना हास्यास्पद है यह सब मगर कोई तानाशाही सरकार खुद को हास्यास्पद बनाने से बच भी तो नहीं सकती! यह सरकार सत्ता लिप्सा में पगलाती जा रही है। जो चाहे अंधाधुंध कर रही है। दिल्ली में कांग्रेस की रैली में आए कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘मोदी तेरी क़ब्र खुलेगी’ का नारा लगा दिया तो प्रधानमंत्री जी की जान खतरे में आ गई!
कितना हास्यास्पद है कि इस पर सत्तापक्ष ने ही संसद नहीं चलने दी। इन्हें यह नहीं मालूम कि ये नारे मोदी जी की सरकार के आने से पहले भी लगते रहे हैं और पहले के प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की जान को खतरा इस तरह के नारों से कभी नहीं हुआ मगर अपनी जनविरोधी नीतियों से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के अजीब और बेहूदा करतब यह सरकार करती रहती है।
वंदेमातरम पर लोकसभा व राज्यसभा में बहस कराकर केंद्र अपनी किरकिरी करवा चुकी है
अभी वंदेमातरम पर लोकसभा और राज्यसभा में बहस कराकर इसने मुंह की खाई पर यह सुधरेगी नहीं। घमंड सिर पर चढ़कर बोल रहा है। यह घमंड बताता है कि मोदी सरकार की खुद की इच्छा 2029 तक चलने की है नहीं। रोज लोगों का गला घोंटकर तो सरकार लंबे समय तक चलाई नहीं जा सकती।
अब उससे महात्मा गांधी का नाम हटाकर तो इस सरकार ने अपना असली चेहरा दिखा ही दिया है, इसके अलावा यह योजना कार्यान्वित न हो, इसका भी पूरा प्रबंध कर दिया है।
आर्थिक संकट से जूझ रहे राज्यों पर केंद्र सरकार ने नये नाम से प्रस्तावित इस योजना का चालीस प्रतिशत खर्च का बोझ डाल दिया है, जबकि पहले राज्य सरकारों को इस पर मात्र दस प्रतिशत खर्च उठाना होता था। इससे भी वह संतुष्ट नहीं है बल्कि केंद्र सरकार ही तय करेगी कि किस राज्य के किस क्षेत्र में रोजगार दिया जाए। यह अधिकार भी अब राज्यों के पास नहीं रहा। इसके अलावा खेती के सीजन में यह कार्यक्रम बंद रहेगा, ताकि खेत मालिकों को सस्ते मजदूर मिल सकें। यानी बोझ राज्यों का बढ़ाएंगे और स्वतंत्रता राज्यों की छीनेंगे और गरीब रोटी के साथ सब्जी खा सके, गुड़ की डली मुंह में रख सके,यह इन्हें मंजूर नहीं। इन्हें कांग्रेस मुक्त नहीं, गरीब मुक्त भारत चाहिए।
ग़रीबों की कमर पूरी तरह तोड़ने के लिए अब की तरह इस योजना की मांग अधिक होने पर केंद्र सरकार अपने बजट राशि नहीं बढ़ाएगी। अगर जरूरत के हिसाब से खर्च अधिक हो तो उसे संपूर्ण रूप से राज्य सरकारें वहन करें!
पता नहीं केंद्र सरकार का सारा पैसा कहां चला जाता है? उससे किसका पैंट भरा जाता है और यह सब तथाकथित ‘विकसित भारत’ के नाम पर किया जा रहा है। इस तरह करेंगे ये भारत को विकसित!
इसी तरह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी केंद्रीयकरण को बढ़ावा देने के लिए एक विधेयक लाया गया है। वैसे अभी यह संयुक्त संसदीय समिति को विचारार्थ भेजा गया है मगर यह सरकार किसी समिति की सुनती कब है? और जब यह समिति एनडीए के किसी सांसद की अध्यक्षता में बनेगी तो वही फैसले लिए जाएंगे, जो सरकार चाहेगी। विपक्षी दल असहमति का नोट देते रहें, क्या फर्क पड़ता है! पहले संसद की स्थाई समितियां तथा संयुक्त संसदीय समिति का कोई अर्थ होता था, अब महज यह दिखावा रह गया है।
सत्ता के केंद्रीकरण की मोदी सरकार की कितनी भूख कितनी बढ़ चुकी है, इसका एक उदाहरण केरल सरकार द्वारा हर वर्ष तिरुवनंतपुरम में आयोजित होनेवाला फिल्म महोत्सव भी बन चुका है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के हस्तक्षेप के कारण यह महोत्सव अब संकट में पड़ गया है क्योंकि इसमें पहले से दिखाने के लिए तय 19 फिल्मों को दिखाने की मंजूरी केंद्रीय मंत्रालय ने नहीं दी है।
फिल्म समारोह की फिल्में सेंसर नहीं होतीं मगर केंद्र सरकार से इन्हें प्रदर्शित करने की औपचारिक अनुमति लेनी होती है। हास्यास्पद यह है कि सोवियत युग की विश्व की आधुनिक क्लासिक फिल्म और दशकों से भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में देखी और सराही गई सौ साल पुरानी फिल्म ‘बैटलशिपोटेमकिन’ ( जो यू ट्यूब पर उपलब्ध है) तक को दिखाने से मना कर दिया गया। यही नहीं जो फिल्में भारत सरकार द्वारा गोवा में आयोजित फिल्म समारोह में दिखाई जा चुकी हैं,वे भी केरल सरकार के इस फिल्म समारोह में दिखाने से मना कर दिया गया है। एक स्पेनी फिल्म का नाम ‘बीफ’ है मगर उसका गोमांस से कोई संबंध नहीं है, उसे भी दिखाने से रोक दिया गया है। कितना हास्यास्पद है यह सब मगर कोई तानाशाही सरकार खुद को हास्यास्पद बनाने से बच भी तो नहीं सकती!
यह सरकार सत्ता लिप्सा में पगलाती जा रही है। जो चाहे अंधाधुंध कर रही है। दिल्ली में कांग्रेस की रैली में आए कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘मोदी तेरी क़ब्र खुलेगी’ का नारा लगा दिया तो प्रधानमंत्री जी की जान खतरे में आ गई! कितना हास्यास्पद है कि इस पर सत्तापक्ष ने ही संसद नहीं चलने दी। इन्हें यह नहीं मालूम कि ये नारे मोदी जी की सरकार के आने से पहले भी लगते रहे हैं और पहले के प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की जान को खतरा इस तरह के नारों से कभी नहीं हुआ मगर अपनी जनविरोधी नीतियों से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के अजीब और बेहूदा करतब यह सरकार करती रहती है। अभी वंदेमातरम पर लोकसभा और राज्यसभा में बहस कराकर इसने मुंह की खाई पर यह सुधरेगी नहीं। घमंड सिर पर चढ़कर बोल रहा है।
यह घमंड बताता है कि मोदी सरकार की खुद की इच्छा 2029 तक चलने की है नहीं। रोज लोगों का गला घोंटकर तो सरकार लंबे समय तक चलाई नहीं जा सकती।
-विष्णु नागर के फेसबुक वाल से
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