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Saturday, March 7, 2026
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ऐसे ‘ब्राहमणों’ की कमी नहीं, जो संघी राजनीति की वैसाखी बने हुए हैं

जरूरी नहीं कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के समर्थक सिर्फ सवर्ण ब्राह्मण ही हों. जिस तरह ब्राह्मणों में अनेकानेक क्रांतिकारी व बदलावकारी आंदोलन के नेतृत्वकर्ता बने हैं, उसी तरह बहुजनों में अनेक ब्राहमणवाद का खुल कर या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हैं.

नक्सल मूवमेंट हो या माओवादी संघर्ष, इसके नेतृत्वकर्ता ब्राह्मण रहे हैं. कम्युनिस्ट आंदोलन में हमेशा ब्राह्मण प्रभावी रहे हैं. उसी तरह बहुजन समुदाय के रूप में जिन पिछड़ों, एसटी, एसी, ओबीसी की गणना स्वाभाविक रूप से होती है, उनमें ऐसे ‘ब्राहमणों’ की कमी नहीं, जो संघी राजनीति की वैसाखी बने हुए हैं. चंद्राबाबू नायडू, नीतीश कुमार, चिराग पासवान, मायावती, बाबूलाल मरांडी ऐसे ही बहुजन ब्राह्मण हैं जो मनुवादी व्यवस्था को बनाये रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में धर्म की राजनीति तीव्र हुई है. इसके आधार पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तीव्र हुआ है. देश को मध्य युग में ले जाने की कोशिशें हो रही है. स्त्री के प्रति अपराध दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. धर्मिक कठमुल्लापन और कारपोरेटपरस्त राजनीति शबाब पर है. भ्रष्टाचार का नंगा नाच हो रहा है.

एपीस्टियन फाइलों से शीर्ष राजनेता और उद्योगपतियों के रिश्ते उजागर हो रहे हैं. बावजूद इसके इन बहुजन ब्राह्मणों की निष्ठा बनी हुई है. बनी हुई ही नहीं है, संकट के समय ये खुल कर ब्राह्मणवादी की राजनीति का समर्थन करने में लग जाते हैं.

पता नहीं बाबूूूूलाल किस लिप्सा से ‘सरना-सनातन एक हैं’ का नारा लगानेवालों में शामिल हो गए हैं…!

ब्राह्मणों के बचाव में मायावती का खुल कर सामने आना और उनके ताजा बयान इसी बात की ओर संकेत करते हैं.

चिराग पासवान इस बात को स्वीकार करते हैं कि दलित, आदिवासी और पिछड़ों के साथ भेदभाव हो रहा है. फिर वे संघी राजनीति के समर्थक क्यों बने हुए है?नायडू तो प्रबुद्ध नेता माने जाते हैं? नीतीश 74 के छात्र आंदोलन से निकल कर राजनीति में आये हैं, उन्हें बिहार की अधोगति नहीं दिखाई दे रही? बाबूलाल किस लिप्सा से ‘सरना-सनातन एक है’ का नारा लगाते रहते हैं.

दरअसल, आर्थिक स्थिति में सुधार होते ही, वर्ग बदलते ही वर्ग चरित्र में भी बदलाव होने लगता है और ब्राह्मण बनने का कीड़ा अंदर में कुलबुलाने लगता है. बहुत कम लोग ही इस मानसिक बदलाव से अप्रभावित रह पाते हैं. और ये बहुजन ब्राह्मण, सवर्ण ब्राह्मणों से ज्यादा खतरनाक होते हैं. मोदी और आज की पतनशील राजनीति को बनाये रखने में इनकी बेहद अहम भूमिका होती है.

और सवर्ण राजनीति भी अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए इन्हें सर पर बिठाये रखने में कोई संकट नहीं देखती. लक्ष्य तो सदियों से सत्ता और समाज पर काबिज सवर्णों के वर्चस्व को बनाये रखना है.

-विनोद कुमार के वाल से


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