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Wednesday, July 22, 2026
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प्राइवेट स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देने से हुआ कोचिंग सेंटरों का बोलबाला  और नौनिहालों के सरकारी स्कूल बन रहे डंपिंगयार्ड, माफियाओं के हाथों में है शिक्षा की कमान

भारत में शिक्षा प्रणाली को लंबे समय से निजी हाथों में सौंप दिया गया है. यह सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हुआ है. सरकारी स्कूल डंपिंगयार्ड बन चुके हैं. स्कूूल मर्जर के नाम पर सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है. लाखों सरकारी स्कूलों के जीर्णशीर्ण भवनों का हाल बुरा है. वहीं लंबे समय से स्कूूूूलों को बगैर शिक्षक के रखना आम बात है. अब प्राथमिक शिक्षा की बदहाली से सरकारी तंत्र को कोई लेेेेेेेेना-देना नहीं है और न ही कोई जवाबदेही.

यह हकीकत है कि केंद्र-राज्य की सरकारों ने प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन लाने का कभी प्रयास नहीं किया. आज देश में शिक्षा निजी हाथों में चला गया है. कोचिंग सेंटरों की देश में भरमार है. शिक्षा माफिया सरकारी तंत्र के लचीले रवैये का खूब फायदा उठा रहा है. इसलिए भारत में शिक्षा महंगी हो चुकी है. गरीब के बच्चे निजी स्कूूूूलों में नहीं पढ़ सकते. ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों की तो और भी बुरी स्थिति है.

“सरकारी नौकरी की तैयारी” के नाम पर इकोसिस्टम शिक्षा व्यवस्था पर हावी है

कोचिंग और ऑनलाइन टीचिंग की दुनिया को लेकर आज जो सबसे बड़ा भ्रम फैला हुआ है, वह यह है कि इन्हें “टीचर” कहा जाता है। जबकि जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई देती है।

असल में यह पूरा सिस्टम एक शिक्षा उद्योग यानी एजुकेशन मार्केट बन चुका है, जहां ज्ञान से ज्यादा फोकस बिज़नेस मॉडल, ब्रांडिंग और एडमिशन बढ़ाने पर होता है। “सरकारी नौकरी की तैयारी” के नाम पर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया गया है, जिसमें करोड़ों छात्र हर साल प्रवेश लेते हैं, लेकिन सफलता का अनुपात बेहद सीमित रहता है।

इस पूरे सिस्टम की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह युवाओं के सबसे कीमती समय को खींच लेता है। 8–10 साल तक लगातार एक ही दिशा में लगाए रखना, बिना यह स्पष्ट किए कि चयन की संभावनाएं कितनी सीमित हैं, कई बार छात्रों के करियर पर भारी पड़ता है।

सिर्फ परीक्षा पास कराने की रणनीति 

इस दौरान अगर कोई छात्र स्किल डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी या किसी वैकल्पिक करियर पथ पर ध्यान देता, तो शायद वह अलग स्तर पर पहुंच सकता था। लेकिन तैयारी के नाम पर एक ही ट्रैक पर लंबे समय तक बनाए रखना कई सवाल खड़े करता है।

यह भी कहा जाता है कि इस सिस्टम में शिक्षा का स्तर अक्सर सीमित दायरे में रह जाता है। ज्यादातर कंटेंट नोट्स, ट्रिक्स और परीक्षा-आधारित पैटर्न तक सिमट कर रह जाता है। आलोचकों का मानना है कि यहां गहराई से विषय समझाने की बजाय परीक्षा पास कराने की रणनीति ज्यादा हावी रहती है। इसी कारण यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे संस्थान वास्तव में शिक्षा दे रहे हैं या केवल परीक्षा-उन्मुख प्रशिक्षण।

एक और बड़ा मुद्दा यह है कि लाखों छात्रों की भीड़ के बावजूद सरकारी नौकरियों की संख्या बेहद सीमित है। हर साल कुछ लाख पदों के मुकाबले करोड़ों छात्र तैयारी करते हैं, जिससे असंतुलन साफ दिखाई देता है। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी बचे छात्रों का भविष्य क्या होता है, खासकर तब जब वे सालों बाद भी चयनित नहीं हो पाते और न ही किसी अन्य स्किल पर मजबूत पकड़ बना पाते हैं।

“टीचर” की छवि के पीछे मजबूत मार्केटिंग और कमर्शियल स्ट्रक्चर काम करता है

इसी संदर्भ में यह आलोचना सामने आती है कि यह पूरा सिस्टम एक तरह का बिज़नेस मॉडल है, जहां छात्र लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और संस्थान लगातार विस्तार करते रहते हैं। “टीचर” की छवि के पीछे एक मजबूत मार्केटिंग और कमर्शियल स्ट्रक्चर काम करता है। इसलिए कई लोग इसे शिक्षा से ज्यादा एक उद्योग मानते हैं, जिसका उद्देश्य ज्ञान से अधिक स्थिर ग्राहक आधार बनाए रखना है।

हालांकि, दूसरी तरफ यह भी सच है कि इसी सिस्टम ने लाखों छात्रों को दिशा भी दी है और कई लोगों का करियर भी बनाया है। लेकिन इसके साथ यह बहस भी लगातार बनी रहती है कि क्या यह मॉडल छात्रों को वास्तविक रूप से सक्षम बना रहा है या सिर्फ एक सीमित लक्ष्य की दौड़ में उलझाए रखता है।

इस वक्त लाखों गरीब परिवार के बच्चे आन लाइन शिक्षा से लाभान्वित हो पा रहे हैं. दूसरी तरफ हमें इस बात को अब स्वीकार कर लेेेना चाहिए कि कोचिंग सेंटर इसलिए खुले, क्योंकि स्कूलों की शिक्षा का स्तर गिर गया है. गरीब मां-बाप भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहते. हमारी प्राथमिक शिक्षा पर शिक्षा माफियाओं का कब्जा है.  

नर्सरी से ही शुरू हो जाता है प्राइवेट स्कूलों का दोहन

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का स्तर प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर का नहीं है, इसलिए इस गैप कोचिंग संस्थान दूहते हैं। अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य संवारने की गरज से खेत गिरवी रखकर या कर्ज लेेेकर कोचिंग में पढ़ाने के लिए मजबूर होती है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या हमारी सरकारें सभी को काम दे सकती हैं? 

हालांकि यह कटू सत्य है कि कोचिंग तो बहुत बाद की बात है, प्राइवेट का ये तथाकथित घिनौना खेल तो बच्चे के साथ नर्सरी से ही शुरू हो जाता है. प्राइवेट स्कूलों प्रबंधनों की मनमानी को सरकारों का मौन समर्थन है. क्योंकि इनके बच्चे सरकारी स्कूलों का मुंह नहीं देख सकते. 

अहम सवाल ये कि जब सरकारें सब कुछ प्राइवेट हाथों में सौंप रही है, तब हम ही बड़े खुश होकर समर्थन में लगे हुए हैं-अच्छी सर्विस, अच्छी व्यवस्था के नाम पर और अब कोचिंग के प्राइवेट होने पे इतनी हाय-तौबा क्यों? दूसरी तरफ ये भी हकीकत है कि बहुत सारे कोचिंग सेंटरों ने बेहद गरीब बच्चों के सपनों को भी उड़ान भरने का अवसर उपलब्ध कराया है। 


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