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Sunday, June 7, 2026
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कोचिंग और ऑनलाइन टीचिंग की दुनिया को लेकर आज जो सबसे बड़ा भ्रम फैला हुआ है, वह यह है कि इन्हें “टीचर” कहा जाता है। जबकि जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई देती है। असल में यह पूरा सिस्टम एक शिक्षा उद्योग यानी एजुकेशन मार्केट बन चुका है, जहां ज्ञान से ज्यादा फोकस बिज़नेस मॉडल, ब्रांडिंग और एडमिशन बढ़ाने पर होता है। “सरकारी नौकरी की तैयारी” के नाम पर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया गया है, जिसमें करोड़ों छात्र हर साल प्रवेश लेते हैं, लेकिन सफलता का अनुपात बेहद सीमित रहता है।

इस पूरे सिस्टम की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह युवाओं के सबसे कीमती समय को खींच लेता है। 8–10 साल तक लगातार एक ही दिशा में लगाए रखना, बिना यह स्पष्ट किए कि चयन की संभावनाएं कितनी सीमित हैं, कई बार छात्रों के करियर पर भारी पड़ता है। इस दौरान अगर कोई छात्र स्किल डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी या किसी वैकल्पिक करियर पथ पर ध्यान देता, तो शायद वह अलग स्तर पर पहुंच सकता था। लेकिन तैयारी के नाम पर एक ही ट्रैक पर लंबे समय तक बनाए रखना कई सवाल खड़े करता है।

यह भी कहा जाता है कि इस सिस्टम में शिक्षा का स्तर अक्सर सीमित दायरे में रह जाता है। ज्यादातर कंटेंट नोट्स, ट्रिक्स और परीक्षा-आधारित पैटर्न तक सिमट कर रह जाता है। आलोचकों का मानना है कि यहां गहराई से विषय समझाने की बजाय परीक्षा पास कराने की रणनीति ज्यादा हावी रहती है। इसी कारण यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे संस्थान वास्तव में शिक्षा दे रहे हैं या केवल परीक्षा-उन्मुख प्रशिक्षण।

एक और बड़ा मुद्दा यह है कि लाखों छात्रों की भीड़ के बावजूद सरकारी नौकरियों की संख्या बेहद सीमित है। हर साल कुछ लाख पदों के मुकाबले करोड़ों छात्र तैयारी करते हैं, जिससे असंतुलन साफ दिखाई देता है। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी बचे छात्रों का भविष्य क्या होता है, खासकर तब जब वे सालों बाद भी चयनित नहीं हो पाते और न ही किसी अन्य स्किल पर मजबूत पकड़ बना पाते हैं।

इसी संदर्भ में यह आलोचना सामने आती है कि यह पूरा सिस्टम एक तरह का बिज़नेस मॉडल है, जहां छात्र लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और संस्थान लगातार विस्तार करते रहते हैं। “टीचर” की छवि के पीछे एक मजबूत मार्केटिंग और कमर्शियल स्ट्रक्चर काम करता है। इसलिए कई लोग इसे शिक्षा से ज्यादा एक उद्योग मानते हैं, जिसका उद्देश्य ज्ञान से अधिक स्थिर ग्राहक आधार बनाए रखना है।

हालांकि, दूसरी तरफ यह भी सच है कि इसी सिस्टम ने लाखों छात्रों को दिशा भी दी है और कई लोगों का करियर भी बनाया है। लेकिन इसके साथ यह बहस भी लगातार बनी रहती है कि क्या यह मॉडल छात्रों को वास्तविक रूप से सक्षम बना रहा है या सिर्फ एक सीमित लक्ष्य की दौड़ में उलझाए रखता है।


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