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Thursday, June 25, 2026
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दान में घोटाला नहीं, ईश कृपा है…इसे समझने के लिए साधना चाहिए, ऑडिट नहीं…पूजा चाहिये… पुलिस नहीं…!

आजकल कुछ लोग मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं के दान में होने वाले झूठे घोटालों को लेकर बहुत परेशान दिखाई देते हैं। वे जांच की मांग कर रहे हैं, एसआईटी बैठाने की बात कर रहे हैं, और कुछ तो हिसाब-किताब तक पूछ रहे हैं। ऐसे लोगों पर मुझे बड़ी दया आती है। मूढ़ मति हैं वे। वे आध्यात्मिक विषयों को सांसारिक दृष्टि से देखने की भूल कर रहे हैं। मिथ्या भौतिक वस्तु के लिए परेशान हैं।

अरे भाई ! दान में घोटाला कोई राजनीतिक या कानूनी विषय नहीं है, यह तो भक्ति का अत्यंत सूक्ष्म और रहस्यमय पक्ष है। भक्त वत्सलता का सजीव उदाहरण। भक्त को निर्धन रखने वाला ईश्वर भला कैसे ईश्वर समझा जायेगा।

सदियों से हमें सिखाया गया है कि ईश्वर की कृपा से रंक राजा बन जाता है। यदि किसी धार्मिक संस्था का साधारण कर्मचारी, ड्राइवर, मुनीम या चपरासी अचानक करोड़पति हो जाए तो इसमें आश्चर्य कैसा? यह तो कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जाकी कृपा पंगु गिरि लांघें सजीव हो उठा। जो लोग पूछते हैं कि उसके खाते में इतने करोड़ रुपये कहाँ से आए, वे वस्तुतः ईश्वरीय लीला पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। जो ईश्वर बांझ को पुत्र दे सकता है, अन्धों को आँखें दे सकता है, वो किसी के खाते में क्या कुछ करोङ रुपए नही डाल सकता? जब ऐसा करेगा तभी तो निर्धन को माया देने का मंत्र सार्थक होगा।

हमारे यहां भक्ति के अनेक मार्ग हैं जैसे ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, भक्ति मार्ग। अब लेटेस्ट दान मार्ग भी विकसित हो चुका है। बल्कि बहुत पॉपुलर भी है। इस भक्ति मार्ग में भक्त दान देता है, कोई संस्था उसे संभालती है, फिर वह धन ईश्वर की रहस्यमय आध्यात्मिक प्रक्रिया से कुछ चुने हुए निर्धन भक्त लोगों के खातों में प्रकट हो जाता है। इसे समझने के लिए साधना चाहिए, ऑडिट नहीं। पूजा चाहिये पुलिस नहीं।

कई लोग कहते हैं कि दान का पैसा मंदिर निर्माण, सेवा या धर्मकार्य में लगना चाहिए। यह विचार अत्यंत पुराना हो चुका है। आधुनिक आध्यात्मिकता का सिद्धांत कहता है कि धर्म का प्रसार तभी होगा जब धर्म से जुड़े लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो। यदि कोई व्यक्ति धर्म की सेवा करते-करते बंगला, गाड़ी और फार्महाउस का स्वामी बन जाए तो समझिए कि धर्म फल-फूल रहा है। अन्य लोगों को धर्म की वत्सलता का ज्ञान हो जाता है।

जिस संस्था से जितने अधिक करोड़पति निकले, उसे उतना बड़ा आध्यात्मिक केंद्र माना जाना चाहिए

जांच एजेंसियां भी कभी-कभी बड़ी नासमझ होती हैं। वे बैंक स्टेटमेंट, संपत्ति और लेन-देन देखती हैं। जबकि उन्हें ध्यान, समाधि और चमत्कारों और पूजन के प्रायोगिक महत्व पर चकित होना चाहिए और अपना शीश नवाना चाहिए। संभव है कि करोड़ों रुपये किसी अलौकिक आशीर्वाद के रूप में प्रकट हुए हों। आखिर लक्ष्मी जी के आने का कोई निश्चित लेखा-जोखा थोड़े ही होता है। वो कभी किसी भी रूप में आ सकती हैं। टेम्पो चालक के एकाउंट में करोङो की राशि बनकर लक्ष्मी माता ही आ सकती हैं।

मेरा तो मत है कि भविष्य में धार्मिक दान के घोटालों, सोरी व्यवस्था को “आध्यात्मिक उपलब्धि” और ‘ईश कृपा’ घोषित कर देना चाहिए। जिस संस्था से जितने अधिक करोड़पति निकलें, उसे उतना बड़ा आध्यात्मिक केंद्र माना जाए। वहां श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ेगी, क्योंकि लोग दर्शन के साथ-साथ समृद्धि का शॉर्टकट भी जानना चाहेंगे।

अंततः यही कहा जा सकता है कि दान में घोटाले को घोटाला कहना श्रद्धा की कमी का लक्षण है। सच्चा भक्त प्रश्न नहीं करता, केवल चमत्कार देखता है। हाथ जोड़ता है, जयकारे लगाता है। जब दान की राशि किसी के खाते में चमत्कारिक ढंग से पहुंच जाए, तब उसे जांच का नहीं, जयकारे का विषय समझना चाहिए। आखिर भक्ति में तर्क का क्या काम? जहां आस्था शुरू होती है, वहां हिसाब-किताब समाप्त हो जाता है। सब खत्म करो।

-सर्वेश अस्थाना

 


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