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Wednesday, July 29, 2026
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अहिंसक सीजेपी आंदोलनकारियों के विरोध-प्रदर्शन का सच…कहीं खुला तो कहीं मौन समर्थन…!

राहुल देव

मैं ख़ुद को आंदोलनरत तिलचट्टों के साथ जोड़ता हूँ। आप मुझे कॉक्रोच से भी नीचा-छोटा, गया-गुजरा कीड़ा मान लें तो भी कोई आपत्ति नहीं है। दो दिन जंतर मंतर पर गया, शामिल हुआ। एक दिन बेटी के साथ।

गाली-प्रिय होना दूर आज तक मुँह से एक भी गाली नहीं निकली। अच्छी, साफ़-सुथरी भाषा के लिेए काफ़ी विमर्श, प्रयास, भाषण और कर्म किया है। भाषा के गंभीर आयामों पर, सारी भारतीय भाषाओं के सामने खड़े प्राण-संकट पर 25 से अधिक सालों से समाज को चेता रहा हूँ।

जंतर मंतर पर अश्लील, गाली-भरे पोस्टर लेकर खड़ी दो-तीन बेटियों, एक लड़के को टोका, बताया कि इससे उनके आंदोलन का ही नुक़सान होगा। विरोधियों को बदनाम और कमज़ोर करने का बहाना मिलेगा। लड़कियों ने कम से कम उस समय बात मान कर पोस्टर नीचे कर लिए। बाद का पता नहीं। लड़के ने ढिठाई से कहा, “अंकल, यह नया इंडिया है, वह ऐसे ही बोलता है।” उससे बहस नहीं की आगे बढ़ गया।

उसके अगले दिन गालियों पर स्त्रियों को संबोधित एक पोस्ट लिखी जिसका मंतव्य था कि उन्हें पुरुषों द्वारा उनको ही अपमानित करनेवाली गालियों को क्यों दोहराना चाहिए। अपनी गालियाँ गढ़नी चाहिए ताकि पुरुषों को सही जवाब मिले। जब तक वे गालियाँ देना बंद न करें।

शब्दों को पकड़ा और भड़ास निकाल ली

शुभचिंतकों ने बात के मर्म को नहीं समझा, पुरुष सत्ता के एकाधिकार को चुनौती देने की ज़रूरत को नहीं समझा सिर्फ़ शब्द पकड़ कर भड़ास निकाल ली, मेरे घर-परिवार-बेटियों कर पहुँच गए।

ये सब वे ही हैं जो शुरु से आंदोलन के ही पूरी तरह ख़िलाफ़ थे। ये शुरु से सीजेपी और उनके समर्थकों को तिलचट्टे, कीड़े मकोड़े, अंधकार में उपजने-जीने वाले त्याज्य और वध्य मानते-कहते रहे हैं। संयोग देखिए कि सब के सब घनघोर मोदी-भक्त, हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम घृणा से भरे हुए लोग हैं।

सब के सब वे हैं जिन्होंने महामानव और उनके सांसदों-मंत्रियों-विधायकों-अनुनाइयों द्वारा जगह-जगह दी गई सैकड़ों गालियों, अश्लीलताओं, लोकसभा के भीतर गाली देने वाले रमेश बिधूड़ियों की निंदा-विरोध नहीं किया।

जिन्होंने गरीब, बूढ़े मुसलमानों की दाढ़ियाँ-बाल नोचते, पीटते हुए उनसे जयश्रीराम कहलाने वाले बजरंग दली गुंडों को कभी नहीं टोका। जिन्होंने बिल्कीस बानो के बलात्कारियों, उसकी बेटी सहित रिश्तेदारों के सज़ायाफ्ता हत्यारों को क़ानून और सत्ता का बेशर्म इस्तेमाल करके समय से पहले रिहा करवाने पर, बाहर आने पर उनको माला पहनाने वालों पर कभी दुख प्रकट नहीं किया, कोई सहानुभूति नहीं जताई। जिन्हें ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों के साथ ज़िंदा जलाने वाले दारा सिंह का विरोध नहीं खुला या मौन समर्थन किया।

ये वे लोग हैं जिनकी दया-ममता-करुणा केवल संघियों, अंधभक्तों, हिंदूवादियों, हिंदुत्व की राजनीति करने वाले हिंदुओं के लिए आरक्षित है। बाक़ी भारतीयों के लिए उनके पास केवल गालियाँ, घृणा, अवमानना, अपमान, उपहास और हिंसा है।

आज कई लोग खुला आह्वान कर रहे हैं कि जंतर मंतर के ‘गालीबाज़ों’ के साथ-साथ उनके समर्थकों के विरुध्द भी कार्रवाई की जाए। कई मित्र हैं या रहे हैं। तो इन सब महानुभावों के सामने मैं हिंसा करने वालों, पुलिस को पीटने वालों के अलावा हर तरह के अहिंसक सीजेपी आंदोलनकारियों के समर्थक के रूप में स्वयं को कार्रवाई के लिए प्रस्तुत करता हूँ। पहली कार्रवाई मेरे विरुद्ध की जाए। यह गालियों या गालीबाजों का समर्थन नहीं है। यह उनका समर्थन है जिन्हें गालियों के नाम पर आंदोलनकारी युवाओं का समर्थन करने के अपराध में निशाना बनाया जा रहा है।

 


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