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Saturday, August 22, 2026
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झारखंड परीक्षा विवाद : सरकार को हर हाल में सिस्टम के लीकेज को खत्म करना होगा

फणिश्वर नाथ नीलेश  

झारखंड में JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर उठा विवाद अब केवल छात्र आंदोलन या परीक्षा रद्द करने का प्रश्न नहीं रह गया है. यह सरकार की जांच-व्यवस्था, निर्णय लेने की प्रक्रिया और कानूनी सलाह की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है. भ्रष्टाचार के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और कानूनसम्मत कार्रवाई दोनों एक साथ चलनी चाहिए.

सरकार ने छात्र आंदोलन के दबाव में कई परीक्षाओं को रद्द करने और पुरानी परीक्षाओं की जांच कराने का फैसला लिया.लेकिन इतने बड़े फैसले से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि प्रत्येक परीक्षा के संबंध में पर्याप्त तथ्य और ठोस साक्ष्य मौजूद हैं.

यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक हुआ, पैसे लेकर अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया, परीक्षा केंद्रों पर धांधली हुई या परिणाम में हेरफेर किया गया, तो इसकी गंभीर और निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए.

यहीं सरकार की जांच-व्यवस्था की कमजोरी सामने आती है. शिकायत और प्रमाण में अंतर होता है. संदेह और अपराध सिद्ध होने में भी अंतर होता है.किसी परीक्षा के खिलाफ शिकायत होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं हो सकता कि पूरी परीक्षा दूषित थी. सरकार को हर परीक्षा के मामले में अलग-अलग शिकायत, साक्ष्य, अनियमितता की प्रकृति और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करना चाहिए था.

अंतरिम रोक से जटिलताएं बढ़ेंगी

हाईकोर्ट में सरकारी फैसलों को चुनौती और कई रद्दीकरण आदेशों पर अंतरिम रोक इसी बात की ओर संकेत करती है कि इतने बड़े प्रशासनिक निर्णय के लिए कानूनी आधार और प्रक्रिया को अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए था.

यदि किसी परीक्षा के परिणाम के आधार पर नियुक्तियां हो चुकी हैं, तो उन नियुक्तियों को प्रभावित करने वाला फैसला केवल एक सामान्य प्रशासनिक आदेश के जरिए नहीं किया जा सकता. प्रभावित अभ्यर्थियों को नोटिस, अपना पक्ष रखने का अवसर और निर्णय के स्पष्ट कारण जैसे प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों पर पहले से विचार करना जरूरी था. 

इसलिए अब सरकार के सामने सबसे बेहतर रास्ता यह है कि वह अपने फैसलों को केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर आगे बढ़ाने के बजाय एक मजबूत जांच-ढांचा तैयार करे.सभी विवादित JPSC और JSSC परीक्षाओं की जांच CID से कराई जा सकती है और उसकी निगरानी हाईकोर्ट के किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश के स्तर पर हो सकती है. इससे जांच की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी और सरकार के फैसलों को आगे चलकर न्यायिक कसौटी पर टिकने का बेहतर आधार मिलेगा.

जांच का तरीका भी पहले से स्पष्ट और सार्वजनिक होना चाहिए. हर परीक्षा की शिकायत अलग दर्ज हो, उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण हो और यह तय किया जाए कि मामला व्यापक परीक्षा-धांधली का है, सीमित अनियमितता का है या केवल प्रशासनिक त्रुटि का.यदि किसी परीक्षा में व्यापक और मूलभूत भ्रष्टाचार साबित होता है, तो उसे रद्द करना और पुनर्परीक्षा कराना उचित हो सकता है.लेकिन यदि कुछ अधिकारी, कर्मचारी या अभ्यर्थी ही दोषी पाए जाते हैं, तो कार्रवाई उन्हीं तक सीमित रहनी चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उन अभ्यर्थियों का है जिनकी नियुक्तियां हो चुकी हैं. यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका किसी अनियमितता में साबित नहीं होती, तो केवल सामूहिक संदेह के आधार पर उसकी नियुक्ति समाप्त करना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता.

जिस अभ्यर्थी ने सामान्य प्रक्रिया से परीक्षा दी और सफलता हासिल की, उसे केवल इसलिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए कि पूरी परीक्षा पर आरोप लगाए गए हैं. दोष और जिम्मेदारी व्यक्ति की भूमिका तथा उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर तय होनी चाहिए.

छात्रों का आंदोलन भी इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण है. प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र वर्षों की मेहनत और परिवार की उम्मीदों के साथ परीक्षा देता है.यदि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं तो छात्रों को आवाज उठाने का पूरा अधिकार है.

हर विवादित परीक्षा की निष्पक्ष जांच हो, दोषी को सजा मिले और निर्दोष को संरक्षण मिले

लेकिन आंदोलन की सफलता का अर्थ केवल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार दबाव में परीक्षा रद्द कर दे. छात्रों के हित में इससे बड़ी मांग यह होनी चाहिए कि हर विवादित परीक्षा की निष्पक्ष जांच हो, दोषी को सजा मिले और निर्दोष को संरक्षण मिले।

सरकार को भी हाईकोर्ट की रोक को अपनी हार के रूप में नहीं देखना चाहिए. यह उसके लिए अपनी जांच और निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करने का अवसर है. यदि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करना चाहती है तो उसे ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जो राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून से संचालित दिखाई दे.

इसके लिए जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वतंत्रता, स्पष्ट समयसीमा और विशेषज्ञ संसाधन दिए जाने चाहिए. साथ ही बड़े प्रशासनिक फैसलों से पहले अनुभवी कानूनी विशेषज्ञों से यह भी सुनिश्चित कराया जाना चाहिए कि प्रस्तावित आदेश प्राकृतिक न्याय और न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर टिक सके.

दरअसल, इस पूरे विवाद में सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी शायद यही रही कि उसने कार्रवाई की गति पर अधिक ध्यान दिया, लेकिन कार्रवाई के कानूनी और जांच संबंधी आधार को उतनी मजबूती नहीं दी.

भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन यदि जांच अधूरी हो और कानूनी प्रक्रिया कमजोर हो तो वही कार्रवाई अदालत में चुनौती का सामना करेगी और पूरा मामला और लंबा खिंच सकता है.

सरकार को परीक्षा रद्द करो’ की राजनीति से आगे बढ़ना होगा

अब झारखंड को ‘परीक्षा रद्द करो’ की राजनीति से आगे बढ़ना होगा.सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार छात्रों के दबाव में झुकी या छात्रों ने सरकार को झुकाया.असली सवाल यह है कि अनियमितता वास्तव में कहां हुई, किसने की, कितनी व्यापक थी और उससे कौन प्रभावित हुआ.

इसलिए रास्ता साफ है-हर विवादित परीक्षा की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो, जांच हाईकोर्ट की न्यायिक निगरानी में CID से कराई जाए, दोषी और निर्दोष के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए, नियुक्त अभ्यर्थियों को उचित प्रक्रिया का अवसर मिले, और केवल उसी परीक्षा को रद्द किया जाए जिसकी पूरी प्रक्रिया ठोस साक्ष्यों के आधार पर दूषित साबित हो.

भ्रष्टाचार से समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी कानून को दरकिनार करके नहीं लड़ी जा सकती, झारखंड सरकार के लिए अब चुनौती केवल कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि ऐसी कार्रवाई करने की है जो तथ्य, जांच और कानून-तीनों की कसौटी पर टिक सके, यही छात्रों के साथ न्याय करेगा, निर्दोष नियुक्त अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा करेगा और सरकार के फैसले को भी वास्तविक कानूनी मजबूती देगा। 

सवाल परीक्षा रद्द करने का नहीं, सच सामने लाने का है. इस मामले में सरकार को सच तक पहुंचने के लिए सबसे जरूरी है-सिस्टम के लीकेज को दूर करे. इसके लिए मजबूत जांच-ढांचा विकसित करना जरूरी है.


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