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Friday, November 6, 2026
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आइए जानते हैं…सरकारी बैंक को नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी पर कैसे सत्ता तंत्र मेहरबान रहा और महालूट हो गई

टाइमलाइन की सच्चाई पर गौर करें… जिसके बारे में राहुल गांधी ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था

30 मई 2017 की वह शाम शायद ही कोई भूल पाए, जब जर्मनी की राजधानी बर्लिन के बेहद आलीशान होटल एडलॉन में सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक और बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की मुलाकात हुई थी। उस वक्त मुख्यधारा के मीडिया ने इसे महज एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट का नाम देकर खूब प्रचारित किया।

इस चमक-दमक के पीछे का स्याह सच देश से छिपा रहा। ठीक उसी दौर में भारत के सरकारी बैंक नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी से जनता की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ रुपये वसूलने के लिए हाथ-पैर मार रहे थे। उस समय प्रियंका चोपड़ा नीरव मोदी के लक्जरी ज्वेलरी ब्रांड की ग्लोबल ब्रांड एंबेसडर थीं और उनके बड़े-बड़े विज्ञापनों से उस ब्रांड को घर-घर चमकाया जा रहा था, जबकि बैकग्राउंड में पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की जड़ों में दीमक लगाई जा चुकी थी।

14,000 करोड़ की महालूट 

लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (LoU) के जरिए खेला गया यह खेल कोई मामूली हेरफेर नहीं था। कागजों पर दर्ज 13,500 से 14,000 करोड़ रुपये की यह महालूट देश के आम टैक्सपेयर और गरीब किसानों के पसीने की कमाई थी-हालांकि कई मंचों पर यह दावा 50,000 करोड़ तक भी किया जाता रहा।

30 मई 2017 को बर्लिन में वह हाई-प्रोफाइल मुलाकात होती है और इसके महज सात महीने बाद, 1 जनवरी 2018 के आसपास, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी तमाम सुरक्षा तंत्रों की नाक के नीचे से बड़ी नफासत के साथ देश छोड़कर उड़ जाते हैं।

जब तक 29 जनवरी 2018 को PNB ने CBI के पास पहली औपचारिक शिकायत की और 16 फरवरी 2018 को FIR दर्ज हुई, तब तक चिड़िया खेत चुगकर सात समंदर पार जा चुकी थी।

दिखावे के लिए जब जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसा, तो फरवरी 2018 में फायरस्टार डायमंड्स के सीनियर एग्जीक्यूटिव विपुल अंबानी को गिरफ्तार किया गया। लेकिन मजबूत कानूनी दांवपेच और लचर पैरवी के चलते उन्हें भी आसानी से जमानत मिल गई और वे आजाद घूमते रहे। वहीं दूसरी ओर, जब पानी सिर से ऊपर निकल गया, तब जाकर प्रियंका चोपड़ा ने भी कानूनी नोटिस भेजकर उस ब्रांड से अपना पल्ला झाड़ लिया।

उस समय पूरे सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर बर्लिन की उस मुलाकात के दौरान प्रियंका चोपड़ा के कपड़ों और उनके बैठने के अंदाज पर जानबूझकर बहस छेड़ी गई, ताकि आम जनता का ध्यान क्रोनी कैपिटलिज्म और पर्दे के पीछे चल रहे इस विशालकाय घोटाले से पूरी तरह भटक जाए।

आज जब 2017 और 2018 की इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखा जाता है, तो साफ जाहिर होता है कि कैसे चंद बड़े पूंजीपतियों के आगे पूरी व्यवस्था बौनी बनकर खड़ी थी और सत्ता तंत्र सिर्फ मूकदर्शक बना रहा। नुकसान हुआ तो सिर्फ इस देश के उस आम नागरिक का, जो पाई-पाई जोड़कर बैंकों में अपनी सुरक्षा तलाशता है।

-चंदन कुमार के फेसबुक वाल से

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