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Wednesday, November 4, 2026
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गुमला जिला मुख्यालय सहित गुमला सदर थाना चौक से लेकर चंदाली, गुमला समाहरणालय तक जर्जर बदहाल सड़क बनी परेशानी का सबब

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

बारिश के बाद करीब 2.5 किलोमीटर सड़क की हालत जर्जर, धूल और गड्ढों से बढ़ी दुर्घटना की आशंका; रोजाना हजारों लोगों का होता है आवागमन

गुमला : – गुमला जिला मुख्यालय सहित लोहरदगा रोड गुमला थाना चौक से चंदाली स्थित नए समाहरणालय भवन तक जाने वाली करीब 2.5 किलोमीटर लंबी सड़क इन दिनों बदहाली की तस्वीर पेश कर रही है। बारिश के मौसम के बाद सड़क की स्थिति काफी जर्जर हो गई है। जगह-जगह सड़क टूट चुकी है और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। जिला मुख्यालय सम्हरणालय चंदाली गुमला जहां प्रतिदिन जिले के समस्त उच्च पदाधिकारियों का आना-जाना और गुमला – घाघरा नेतरहाट, लोहरदगा से झारखंड की राजधानी रांची सडक महत्वपूर्ण मार्ग होने के बावजूद सड़क की मरम्मत नहीं होने से आम लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

चंदाली क्षेत्र में जिले के अधिकांश महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के अलावा पुलिस लाइन सहित बस स्टैंड, पुराना बस डिपो भी स्थित है। इस कारण सुबह से लेकर देर रात्रि तक इस सड़क पर वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। जिले के टॉप पदाधिकारी, सरकारी कार्यालयों में काम के लिए आने जाने वाले , कर्मचारियों, सहित संबंधित लोगों , विद्यार्थियों और आम राहगीरों के साथ-साथ बड़े छोटे वाहनों, बसों, ट्रकों और अन्य अनेक भारी वाहनों का भी लगातार आवागमन होता है। ऐसे में जर्जर सड़क लोगों के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है।

जर्जर सड़क और गड्ढों के बीच गुजर रहे वाहन

बारिश मौसम के बाद सड़क के कई हिस्सों में बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। इन गड्ढों से बचने के लिए वाहन चालक कई बार अचानक दिशा बदलते हैं, फलस्वरूप सामने या पीछे से आ रहे छोटे बड़े वाहनों, विशेष कर, पिकअप, टेंपो (ऑटो ) दो पहिए बाइक के साथ टक्कर की आशंका बनी रहती है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। गड्ढों में वाहन का पहिया एकाएक पडने से संतुलन बिगड़ने की संभावना भी बनी रहती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क की खराब स्थिति के कारण वाहन चालकों को काफी परेशानी हो रही है। खासकर रात के समय गड्ढों का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। पर्याप्त रोशनी नहीं होने की स्थिति में दुर्घटना का खतरा और बढ़ जाता है, और तो और अनियंत्रित तेज रफ्तार भारी वाहनों से उड़ता धूल का गुबार, चालकों को और भी परेशानी में डाल देती है, राष्ट्रीय उच्च मार्ग होने के कारण इस मार्ग पर बड़े ट्रक और बसों की आवाजाही भी काफी अधिक है। सड़क जर्जर होने के कारण भारी वाहनों के गुजरते ही धूल का गुबार उठने लगता है। तेज गति से गुजरने वाले वाहनों से उड़ती धूल सड़क पर चल रहे दोपहिया वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और पैदल राहगीरों सहित आसपास के लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।

धूल के कारण कई बार कुछ दूरी तक सामने का पूरा रास्ता साफ दिखाई नहीं देता। ऐसे में अचानक सामने से आने वाले वाहन को देख पाना मुश्किल हो सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सड़क की मरम्मत नहीं कराई गई तो किसी बड़ी दुर्घटना से इंकार नहीं किया जा सकता।
मुख्य राष्ट्रीय उच्च पथ – गुमला समाहरणालय और बस डिपो होने के कारण बढ़ता है यातायात का दबाव
गुमला सदर थाना चौक से चंदाली तक का यह मार्ग सामान्य सड़क नहीं है। चंदाली में नए समाहरणालय भवन के साथ ही साथ जिला पुलिस लाइन सहित अन्य अनेक महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा बस डिपो भी इसी क्षेत्र में होने के कारण बड़ी संख्या में बसें और अन्य यात्री वाहन इस मार्ग से गुजरते हैं।

प्रतिदिन बड़ी संख्या अपने कार्यों के निष्पादन हेतु संबंधित विभिन्न विभागों में लोग सरकारी कामकाज के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। अधिकारियों और कर्मचारियों के वाहनों के अलावा आम नागरिकों की आवाजाही भी लगातार बनी रहती है। ऐसे महत्वपूर्ण मार्ग की जर्जर स्थिति एंव राष्ट्रीय उच्च पथ से संबंधित पदाधिकारियों की आप अकर्मण्यता और कार्य शिथिलता के कारण संबंधित राष्ट्रीय उच्च मार्ग की स्थिति काफी जर्जर हो गई है फिर भी संबंध विभाग के पदाधिकारी कान में तेल डालकर सोए हुए हैं, और मूक दर्शक बनकर टुकुर टुकुर तक रहे हैं, कैसी विडंबना है, संबंधित विभाग तो है पर लावारिस पड़ी है राष्ट्रीय उच्च मार्ग, फलस्वरूप उक्त संबंधित विभागीय व्यवस्था पर सवालिया निशान ????? खड़े कर रहे हैं , कोई नहीं है देखन हारा । संबंधित लोगों को झेलनी पड़ रही हैं, परेशानी उन्हें प्रतिदिन उक्त समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है l

राम भक्तों के लिए

बच्चे देश-विदेश में, माता-पिता रांची में अकेले… अब हर जरूरत पर साथ देने का दावा कर रहा SaathiWorld

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अस्पताल जाने से लेकर रोजमर्रा के काम तक, रांची का यह स्टार्टअप दूर रह रहे परिवारों को स्थानीय सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा

रांची।
सुबह-सुबह अमेरिका में रहने वाले बेटे का फोन रांची में रहने वाली मां के पास आता है।

“मां, डॉक्टर को दिखा लिया?”

मां जवाब देती हैं—“हां बेटा, लेकिन अस्पताल अकेले जाना मुश्किल लगता है।”

बेटा फोन के दूसरी तरफ से कहता है—“मैं आ पाता तो साथ चलता…”

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। झारखंड के हजारों परिवारों की जिंदगी में आज ऐसी परिस्थितियां आम होती जा रही हैं। रोजगार, कारोबार और बेहतर अवसरों की तलाश में बच्चे रांची से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे या विदेशों तक चले गए हैं। पीछे रह गए हैं माता-पिता—जिन्हें हर समय देखभाल की जरूरत भले न हो, लेकिन जरूरत के समय किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ की जरूरत जरूर होती है।

इसी बदलती सामाजिक जरूरत के बीच रांची से SaathiWorld नाम का एक सेवा-आधारित स्टार्टअप लोगों को स्थानीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है।

जब परिवार दूर हो, तो कौन बने ‘साथी’?

आज वीडियो कॉल ने दूरी जरूर कम कर दी है, लेकिन हर समस्या फोन से हल नहीं होती।

माता-पिता को अस्पताल लेकर जाना हो, डॉक्टर से मिलवाना हो, अस्पताल की प्रक्रिया पूरी करवानी हो, उन्हें सुरक्षित वापस घर पहुंचाना हो या घर का कोई जरूरी काम करवाना हो—इन कामों के लिए किसी व्यक्ति का मौके पर मौजूद होना जरूरी होता है।

SaathiWorld इसी जरूरत को समझते हुए एक ऐसा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है, जहां जरूरत के मुताबिक स्थानीय सेवाएं बुक की जा सकें।

कंपनी की वेबसाइट पर Health & Medical Assistance तथा Education & Student Support जैसी सेवा श्रेणियां दिखाई गई हैं। वेबसाइट के मुताबिक प्लेटफॉर्म पर सेवाओं की बुकिंग, verified professionals, ratings और reviews तथा transparent payment जैसे फीचर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।

डॉक्टर के पास जाना हो तो भी मिल सकता है साथ

बुजुर्गों के लिए अस्पताल जाना कई बार अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है।

घर से निकलना, वाहन की व्यवस्था करना, अस्पताल पहुंचना, पंजीकरण करवाना, डॉक्टर के कमरे तक पहुंचना, जांच करवाना, रिपोर्ट लेना और फिर वापस घर आना—पूरी प्रक्रिया में कई घंटे लग सकते हैं।

अगर परिवार का कोई सदस्य दूसरे शहर या देश में है तो वह चाहकर भी हर बार माता-पिता के साथ अस्पताल नहीं जा सकता।

ऐसी स्थिति में SaathiWorld जैसे मॉडल की उपयोगिता सामने आती है।

परिवार अपने माता-पिता के लिए स्थानीय सहायता की व्यवस्था कर सकता है, ताकि उन्हें घर से अस्पताल ले जाने, जरूरी प्रक्रियाओं में सहायता करने और वापस घर पहुंचाने जैसे कामों में सहयोग मिल सके।

यह सेवा किसी परिवार के सदस्य की जगह लेने का दावा नहीं करती, बल्कि उस समय स्थानीय मदद उपलब्ध कराने की अवधारणा पर आधारित है जब परिवार का सदस्य खुद वहां मौजूद नहीं हो सकता।

बच्चों की सबसे बड़ी चिंता—“मां-पापा अकेले तो नहीं हैं?”

देश से बाहर रहने वाले बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या अक्सर पैसे या सुविधाओं की नहीं होती।

समस्या होती है—जरूरत के समय मौजूद न रह पाने की।

बेटा लंदन में है। बेटी बेंगलुरु में है। माता-पिता रांची में हैं।

फोन पर हर दिन बात हो सकती है। वीडियो कॉल पर चेहरा देखा जा सकता है। ऑनलाइन दवाइयां भी मंगाई जा सकती हैं।

लेकिन अगर घर में कोई जरूरी काम करवाना हो?

अगर माता-पिता को किसी जगह जाना हो?

अगर अस्पताल में किसी के साथ की जरूरत हो?

अगर घर में किसी काम के लिए भरोसेमंद व्यक्ति चाहिए?

ऐसे समय में स्थानीय सहायता की जरूरत महसूस होती है।

SaathiWorld इसी अंतर को भरने की कोशिश कर रहा है।

सिर्फ मेडिकल सहायता तक सीमित नहीं है विचार

इस तरह की सेवा की जरूरत केवल बीमारी या अस्पताल तक सीमित नहीं है।

रांची में अकेले रहने वाले माता-पिता के लिए रोजमर्रा के कई काम भी चुनौती बन सकते हैं।

मसलन घर का कोई जरूरी काम करवाना, बाजार से सामान लाना, किसी आवश्यक स्थान तक पहुंचने में मदद करना या किसी सेवा के लिए व्यक्ति की व्यवस्था करना।

SaathiWorld की वेबसाइट खुद को एक व्यापक home-service platform के रूप में प्रस्तुत करती है और easy booking, verified professionals तथा transparent payments को अपनी प्रमुख विशेषताओं में गिनाती है।

यानी इसकी संभावित भूमिका केवल “काम करने वाले व्यक्ति” उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं, बल्कि बुकिंग और सेवा को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से व्यवस्थित करने की है।

रांची जैसे शहर में क्यों महत्वपूर्ण है यह मॉडल?

रांची तेजी से बदल रहा शहर है।

शहर में नौकरी और व्यवसाय के अवसर बढ़े हैं। साथ ही रांची से बाहर जाकर काम करने वाले परिवारों की संख्या भी बढ़ी है।

एक समय था जब परिवार के लगभग सभी सदस्य एक ही शहर या आसपास रहते थे। जरूरत पड़ने पर भाई, बहन, चाचा, मामा, पड़ोसी या रिश्तेदार तुरंत मदद के लिए पहुंच जाते थे।

अब परिवार छोटे हो रहे हैं और भौगोलिक दूरी बढ़ रही है।

यही बदलाव एक नए तरह की service economy को जन्म दे रहा है—जहां लोग सिर्फ घरेलू काम के लिए नहीं, बल्कि विश्वसनीय सहायता और companionship के लिए भी सेवाएं तलाश रहे हैं।

भरोसा इस कारोबार की सबसे बड़ी पूंजी

हालांकि ऐसे मॉडल के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी स्पष्ट है—विश्वास।

कोई भी माता-पिता अपने घर में किसी अनजान व्यक्ति को आने की अनुमति आसानी से नहीं देंगे। इसी तरह विदेश या दूसरे शहर में रहने वाला बेटा या बेटी भी बिना सत्यापन के किसी व्यक्ति को अपने माता-पिता के पास भेजने से पहले कई सवाल पूछेगा।

इसलिए verification, safety, professional behaviour, transparent pricing और complaint resolution जैसी व्यवस्थाएं इस तरह के व्यवसाय की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगी।

SaathiWorld की वेबसाइट पर verified professionals, customer ratings/reviews, secure payments और अलग-अलग service तथा safety policies का उल्लेख किया गया है।

अगर इन व्यवस्थाओं को जमीन पर भी उसी मजबूती से लागू किया जाता है, तो यह मॉडल रांची के बाहर रहने वाले परिवारों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

बच्चों के लिए एक भावनात्मक समाधान

SaathiWorld जैसी सेवा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद तकनीक नहीं, बल्कि भावना है।

एक बेटा भले ही हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन वह चाहता है कि जरूरत पड़ने पर उसके माता-पिता को अकेला महसूस न हो।

एक बेटी भले ही किसी दूसरे शहर में नौकरी कर रही हो, लेकिन वह चाहती है कि उसके माता-पिता को अस्पताल जाने के लिए किसी से बार-बार अनुरोध न करना पड़े।

यहीं “service” और “care” के बीच का अंतर सामने आता है।

किसी के घर की सफाई करवाना एक service हो सकती है।

लेकिन किसी बुजुर्ग को अस्पताल लेकर जाना, डॉक्टर से मिलवाना और सुरक्षित घर वापस पहुंचाना—यह परिवार के लिए सिर्फ एक service नहीं, बल्कि भरोसे का मामला है।

स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार का अवसर भी

इस तरह के प्लेटफॉर्म का एक दूसरा पहलू रोजगार से जुड़ा हो सकता है।

SaathiWorld की वेबसाइट पर service providers के लिए registration का विकल्प भी दिया गया है और प्लेटफॉर्म पर सेवा प्रदाताओं को अपना व्यवसाय ऑनलाइन शुरू करने के लिए आमंत्रित किया गया है।

अगर यह नेटवर्क बड़े स्तर पर विकसित होता है तो स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित युवाओं और service professionals के लिए कमाई के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

इससे एक तरफ रांची में सेवा उपलब्ध होगी और दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को रोजगार या entrepreneurship का अवसर मिल सकता है।

रांची से निकलकर दूसरे शहरों तक पहुंचने की संभावना

आज देश के लगभग हर बड़े शहर में ऐसे परिवार मिल जाएंगे जहां बच्चे बाहर रहते हैं और माता-पिता अपने शहर में।

इसलिए SaathiWorld का मॉडल भविष्य में केवल रांची तक सीमित रहने के बजाय दूसरे शहरों तक भी विस्तार कर सकता है—बशर्ते वह सुरक्षा, गुणवत्ता और भरोसे का मजबूत नेटवर्क तैयार कर सके।

फिलहाल इसकी वेबसाइट पर रांची का पता वासुकी नगर, रोड नंबर 2, कोकर चौक के पास, रांची, झारखंड दिया गया है। वेबसाइट पर संपर्क नंबर और ईमेल भी उपलब्ध हैं।

आखिर में सवाल सिर्फ सेवा का नहीं, ‘साथ’ का है

शहर बदल गए हैं।

नौकरियां बदल गई हैं।

परिवारों की संरचना बदल गई है।

बच्चे बेहतर भविष्य के लिए देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जा रहे हैं।

लेकिन माता-पिता की जरूरतें नहीं बदलीं।

उन्हें आज भी बीमारी में किसी के साथ की जरूरत होती है। अस्पताल जाते समय किसी के सहारे की जरूरत होती है। घर के जरूरी काम में मदद की जरूरत होती है।

और सबसे बढ़कर—उन्हें यह भरोसा चाहिए कि बच्चे भले दूर हैं, लेकिन वे अकेले नहीं हैं।

रांची का SaathiWorld इसी बदलती जरूरत के बीच एक नए तरह के स्थानीय सेवा मॉडल को सामने ला रहा है।

इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कितनी मजबूती से सुविधा को भरोसे और तकनीक को इंसानी रिश्तों से जोड़ पाता है।

क्योंकि कभी-कभी किसी परिवार को बड़ी चीज की जरूरत नहीं होती।

उन्हें बस एक “साथी” चाहिए।

 

राम भक्तों के लिए

जीनस इनोवेशन ने रांची के एक्सपो उत्सव 2026 में प्रदर्शित किया हाई-फ्लो हाइब्रिड सोलर इन्वर्टर और मैक्सिलियन लिथियम-आयन इन्वर्टर

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न्यूज – मुस्कान

रांची, अक्टूबर, 2026: भारत में एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (ईएसएस) और रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट सॉल्यूशंस (आरईएमएस) के क्षेत्र की प्रमुख कंपनी, जीनस इनोवेशन लिमिटेड रांची में 1 से 7 अक्टूबर तक आयोजित हो रहे एक्सपो उत्सव 2026 में अपने एनर्जी स्टोरेज और सोलर पॉवर सॉल्यूशंस की रेंज प्रदर्शित कर रही है।
एक्सपो में जीनस इनोवेशन ने अपना हाई-फ्लो हाइब्रिड सोलर इन्वर्टर और मैक्सिलियन लिथियम-आयन इन्वर्टर प्रदर्शित किया है। इसके साथ ही कंपनी ने एनर्जी स्टोरेज और रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट सॉल्यूशंस की अपनी रेंज भी पेश की है। इसमें लिथियम आधारित एनर्जी स्टोरेज, हाइब्रिड सोलर सिस्टम और ऑन-ग्रिड सोलर पॉवर से जुड़े सॉल्यूशंस शामिल हैं। ये ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप भरोसेमंद और बेहतर एनर्जी सॉल्यूशंस देने के कंपनी के फोकस को उजागर करते हैं।
प्रदर्शनी में ईएसएस पोर्टफोलियो के तहत मैक्सिलियन शामिल है। यह घरों, ऑफिस और दुकानों के लिए तैयार की गई इंटीग्रेटेड लिथियम-आयन बैटरी इन्वर्टर सीरीज है। इसके साथ ‘मैक्सीलाइफ’ और ‘फ्लेक्सियन’ लिथियम बैटरियों की रेंज भी प्रदर्शित की गई है। इसके अलावा, कंपनी के आरईएमएस पोर्टफोलियो में ‘हाई-फ्लो हाइब्रिड सोलर इन्वर्टर’ और ‘जीटीआई एक्स1’ ऑन-ग्रिड सोलर इन्वर्टर शामिल हैं। ये सोलर और डिस्ट्रीब्यूटेड एनर्जी सॉल्यूशंस के बढ़ते इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए हैं।
इस मौके पर यश तोदी, डायरेक्टर और चीफ मार्केटिंग एंड सेल्स ऑफिसर, जीनस इनोवेशन लिमिटेड, ने कहा, “एनर्जी की परिभाषा अब सिर्फ पॉवर बैकअप तक ही सीमित नहीं है। लोग अब एनर्जी को स्टोर करने, बनाने और बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने के विकल्प भी चाहते हैं। ऐसे में, ऐसे सॉल्यूशंस की जरूरत बढ़ रही है, जो भरोसेमंद हों, सोलर के साथ काम करें और एनर्जी को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद करें। जीनस इनोवेशन में हम इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए अपना पोर्टफोलियो तैयार कर रहे हैं। इसमें लिथियम आधारित एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस के साथ हाइब्रिड और ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम शामिल हैं। एक्सपो उत्सव के जरिए हमें इन टेक्नोलॉजी को ग्राहकों तक पहुँचाने, उनकी बदलती जरूरतों को समझने और यह बताने का मौका मिल रहा है कि बेहतर एनर्जी सॉल्यूशंस रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा कैसे बन सकते हैं।”
एक्सपो उत्सव 2026 में 1,000 से 1,500 लोगों के आने की उम्मीद है। इससे जीनस इनोवेशन को ग्राहकों, चैनल पार्टनर्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से सीधे जुड़ने और डिस्ट्रीब्यूटेड एनर्जी के क्षेत्र में अपने सॉल्यूशंस की रेंज पेश करने का मौका मिलेगा।
जीनस इनोवेशन एनर्जी स्टोरेज और पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति लगातार मजबूत कर रहा है। कंपनी के पास 7,50,000 यूनिट से ज्यादा की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है, जिसे 1,50,000 वर्ग फुट से ज्यादा की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज का सहयोग मिलता है। 10,000 से ज्यादा पार्टनर्स के रिटेल नेटवर्क के साथ जीनस इनोवेशन अब तक 50 लाख से ज्यादा ग्राहकों तक अपनी पहुँच स्थापित कर चुका है। कंपनी ने 28 से ज्यादा देशों में एक्सपोर्ट के साथ अपनी अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति भी बढ़ाई है।

राम भक्तों के लिए

चुंदरी ग्राम में ड्राइविंग लाइसेंस महाभियान: लर्निंग टेस्ट में 55 और स्था

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित घाघरा प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन सुविधाओं की सुलभता सुनिश्चित करने और सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ग्राम चुंदरी में विशेष लाइसेंस शिविर का आयोजन किया गया। उपायुक्त गुमला दिलेश्वर महतो के निर्देश पर गांव – गांव जागरूकता अभियान के तहत आज चुन्दरी ग्राम में परिवहन विभाग ने एक कैंप का आयोजन किया । इस महाभियान में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिला परिवहन पदाधिकारी के निर्देश पर कैंप में लर्निंग लाइसेंस और ड्राइविंग लाइसेंस का टेस्ट के शिविर का आयोजन किया गया । शिविर में लर्निंग लाइसेंस ( एल एल ) के लिए लगभग 100 लोगों ने आवेदन किया। निर्धारित प्रक्रिया और टेस्ट के बाद 55 आवेदक सफल घोषित किए गए, जबकि 42 आवेदक टेस्ट में असफल रहे।

स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस (डीएल) को लेकर भी ग्रामीणों में उत्साह दिखा। इसके लिए कुल 6 लोगों ने आवेदन किया था, जिनमें से 4 आवेदकों ने सफलतापूर्वक टेस्ट पास कर लिया। शेष 2 आवेदकों को टेस्ट में कमियां पाए जाने पर नियमों का सही से अभ्यास कर दोबारा टेस्ट देने के लिए समझाया गया, ताकि सड़क पर पूर्ण रूप से प्रशिक्षित चालक ही वाहन चलाएं।

पंचायत के समीप स्थित विद्यालय में यातायात नियमों पर विशेष सत्र
लाइसेंस शिविर के सफल संचालन के साथ-साथ पंचायत भवन के बगल में स्थित विद्यालय में सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान भी चलाया गया। इस सत्र के दौरान परिवहन टीम और अधिकारियों ने विद्यार्थियों तथा युवाओं को सुरक्षित यातायात के प्रति जागरूक किया।

छात्र-छात्राओं को दोपहिया वाहन चलाते समय अनिवार्य रूप से हेलमेट पहनने, चारपहिया वाहन में सीटबेल्ट का प्रयोग करने, निर्धारित गति सीमा का पालन करने और बिना वैध लाइसेंस के वाहन न चलाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पंचायत स्तर पर शिविरों का उद्देश्य घर-द्वार पर सुविधा देने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना है कि पारदर्शी जांच प्रक्रिया के बाद योग्य चालकों को ही लाइसेंस मिले। कार्यक्रम के समापन पर सभी उपस्थित ग्रामीणों एवं विद्यार्थियों को यातायात नियमों के निष्ठापूर्वक पालन की शपथ दिलाई गई।

राम भक्तों के लिए

गुमला के लेहा ग्राम में पेड़ से लटका मिला युवक का शव

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला जिला अंतर्गत स्थित घाघरा प्रखंड के लेहा ग्राम के बाजारटांड़ के समक्ष रविवार को निजमा पुसो ग्राम निवासी सतीश मुंडा का शव एक महुआ पेड़ में फांसी के फंदे से लटका हुआ मिला। प्रातः काल जब नित्यक्रम के लिए ग्रामीण अपने अपने घर से निकले तो उन्होंने देखा की गांव के महुआ पेड़ में एक युवक का शव लटक रहा है, तब उन्होंने उक्त इसकी सूचना तत्काल घाघरा पुलिस को दी गई, सूचना मिलते ही घाघरा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए, अपने दलबल के साथ उक्त घटनास्थल पर पहुंचा और उपस्थित लोगों से आवश्यक पूछताछ करते हुए, उक्त शव को अपने कब्जे में करते हुए उक्त शव का पोस्टमार्टम हेतु गुमला सदर अस्पताल स्थित पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया गया , उक्त घटना की सूचना पूरे गांव और आसपास के क्षेत्र में आग की तरह फैल गई और उक्त गांव सहित पूरे आसपास के क्षेत्रों में हड़कंप मच गया और उपस्थित ग्रामीण और मित्र के परिजनों ने बताया की उक्त युवक सतीश करमा त्योहार की खुशियां मनाने गांव आया हुआ था,
परिजनों ने यह भी बताया की सतीश करमा पर्व मनाने के लिए लेहा गांव अपने रिश्तेदार के घर आया हुआ था।

प्रेमिका से मुलाकात के कुछ घंटे बाद ही हुई उक्त घटना

परिजनों के मुताबिक, करमा त्यौहार के दौरान ही सतीश पास के गांव में अपनी प्रेमिका से मिलने गया था। उसने अपनी प्रेमिका को अपने साथ चलने को कहा, लेकिन गांव में करमा त्योहार पूजा होने के कारण प्रेमिका उसके साथ चलने को मना कर दी । इसके बाद सतीश अकेला लौट आया और कुछ घंटे बाद ही उसका शव बाजारटांड़ के पास स्थित महुआ पेड़ से लटका मिला।

घटना के बाद से ही परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। घाघरा पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और परिजनों व ग्रामीणों के बयान के आधार पर सभी संभावित पहलुओं को देखते हुए गहराई से जांच और अनुसंधान में लग गई है, घाघरा थाना पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति स्पष्ट होने की बात कही है l ।

राम भक्तों के लिए

सड़क में गड्ढे या गड्ढों में सड़क? बारिश में तालाब बन रहा NH-43, झारखंड-छत्तीसगढ़ के बीच सफर हुआ मुश्किल

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गुमला न्यूज ब्यूरो प्रमुख – गणपत लाल चौरसिया

गुमला: झारखंड और छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण एनएच-43 इन दिनों अपनी बदहाली को लेकर सवालों के घेरे में है। सड़क पर जगह-जगह बने गहरे गड्ढे और उनमें जमा बारिश का पानी राहगीरों और वाहन चालकों के लिए परेशानी का कारण बन गया है। हालात ऐसे हैं कि कई जगह सड़क और गड्ढे के बीच फर्क करना तक मुश्किल हो जाता है।

बारिश के दौरान यह परेशानी और बढ़ जाती है। गड्ढों में पानी भर जाने के बाद वाहन चालकों को अंदाजा नहीं लग पाता कि पानी के नीचे सड़क कितनी गहरी है। ऐसे में जैसे ही वाहन का पहिया गड्ढे में जाता है, वाहन के अनियंत्रित होने और दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। खासकर रात के समय स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

पानी के नीचे छिपे गड्ढे, हर सफर में जोखिम

एनएच-43 पर कई स्थानों पर सड़क की सतह इस कदर खराब है कि बारिश के बाद गड्ढे पानी से भर जाते हैं। बाहर से आने वाले वाहन चालकों के लिए यह स्थिति और मुश्किल हो जाती है। सड़क सामान्य दिखाई देती है, लेकिन कुछ ही दूरी पर पानी से भरा गड्ढा सामने आ जाता है।

दोपहिया वाहनों के साथ-साथ लाइन ट्रक, ट्रेलर और दूसरे भारी वाहनों के लिए भी ऐसे स्थान परेशानी का कारण बन रहे हैं। रात में रोशनी कम होने और बारिश के बीच पानी के छींटों के कारण सड़क की वास्तविक स्थिति को समझना और कठिन हो जाता है।

दो राज्यों के बीच आवागमन की अहम कड़ी

एनएच-43 सिर्फ स्थानीय लोगों के आवागमन का रास्ता नहीं है। यह झारखंड को छत्तीसगढ़ से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग है। इस सड़क से रोजाना छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। यात्री वाहनों के साथ मालवाहक वाहनों की आवाजाही भी इसी मार्ग से होती है।

ऐसे में सड़क की खराब स्थिति का असर सिर्फ सफर तक सीमित नहीं रहता। वाहन चालकों को गड्ढों से बचने के लिए गति कम करनी पड़ती है और कई जगह सामने से आ रहे वाहनों के कारण सुरक्षित रास्ता चुनना भी मुश्किल हो जाता है।

रात और बारिश में बढ़ जाता है खतरा

दिन के समय किसी तरह गड्ढों को देखकर वाहन चालक रास्ता बदल लेते हैं, लेकिन रात में यही गड्ढे ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। बारिश के दौरान सड़क पर पानी जमा होने से गड्ढों की गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता।

ऐसे में वाहन चालकों को धीमी गति से चलना पड़ता है। अचानक गड्ढा सामने आने पर वाहन को संभालना भी मुश्किल हो सकता है। लगातार खराब सड़क पर चलने से टायर, सस्पेंशन और वाहन के दूसरे हिस्सों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

मरम्मत के बाद फिर क्यों बिगड़ती है सड़क?

एनएच-43 की स्थिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल सड़क के रखरखाव का है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि सड़क की मरम्मत होने के बाद कुछ समय बीतते ही कई हिस्से फिर खराब हो जाते हैं। हालांकि, सड़क निर्माण या मरम्मत की गुणवत्ता और किसी अधिकारी अथवा ठेकेदार की कथित मिलीभगत को लेकर लगाए जाने वाले आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।

फिलहाल जरूरत इस बात की है कि सिर्फ गड्ढे भरने के बजाय सड़क की पूरी स्थिति का तकनीकी निरीक्षण किया जाए और यह देखा जाए कि बारिश के बाद सड़क बार-बार क्यों खराब हो रही है।

सिर्फ गड्ढे भरने से नहीं बनेगी बात

बारिश में सड़क पर पानी जमा होना भी इस समस्या की बड़ी वजह बन रहा है। इसलिए स्थायी समाधान के लिए सड़क की मरम्मत के साथ जलनिकासी व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है।

जिन स्थानों पर लगातार पानी जमा हो रहा है, वहां जलनिकासी की व्यवस्था दुरुस्त किए बिना की गई मरम्मत लंबे समय तक टिकेगी या नहीं, यह भी सवाल है। संवेदनशील स्थानों पर चेतावनी संकेत और सड़क सुरक्षा से जुड़े दूसरे जरूरी इंतजाम किए जाने की जरूरत है।

अब नजर कार्रवाई पर

दो राज्यों को जोड़ने वाले इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग पर खराब सड़क और जलजमाव की समस्या लंबे सफर को मुश्किल बना रही है। बारिश में सड़क की वास्तविक स्थिति छिप जाने से दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ जाता है।

ऐसे में सवाल यही है कि क्या एनएच-43 के गड्ढों की स्थायी मरम्मत होगी या हर बारिश के बाद फिर वही तस्वीर सामने आएगी? अब नजर संबंधित विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग की देखरेख करने वाली एजेंसी की कार्रवाई पर है।

राम भक्तों के लिए

माया रानी ने संभाला महिला बाल विकास परियोजना पदाधिकारी का प्रभार, सेविकाओं ने शॉल ओढ़ाकर किया स्वागत

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News – Kahkashan Farooqi 

गोमिया___गोमिया प्रखंड में सोमवार को महिला बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के रूप में माया रानी ने अपना पदभार ग्रहण किया। उन्हें प्रभारी सीओ सह सीडीपीओ आफताब आलम ने विभागीय प्रभार सौंपा। पदभार ग्रहण करने के दौरान पर्यवेक्षिकाओं एवं आंगनबाड़ी सेविकाओं ने माया रानी का बुके भेंट कर एवं शॉल ओढ़ाकर गर्मजोशी से स्वागत किया।

इस अवसर पर आंगनबाड़ी सेविकाओं ने कहा कि नई पदाधिकारी के आने से विभागीय कार्यों को और गति मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों, गर्भवती एवं धात्री महिलाओं तक सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाने में विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका है। सेविकाओं ने नई पदाधिकारी को हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाया।

प्रभारी सीओ सह सीडीपीओ आफताब आलम ने कहा, “माया रानी को महिला बाल विकास परियोजना पदाधिकारी का प्रभार सौंपा गया है। विभाग से जुड़ी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक समय पर पहुंचे, आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन बेहतर तरीके से हो और विभागीय कार्यों में पारदर्शिता बनी रहे, यही प्राथमिकता होनी चाहिए। उम्मीद है कि सभी पर्यवेक्षिकाओं और सेविकाओं के सहयोग से विभागीय कार्यों को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।”

पदभार ग्रहण करने के बाद माया रानी ने कहा, “महिला एवं बाल विकास विभाग की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। बच्चों के पोषण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के साथ गर्भवती और धात्री महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना मेरी प्राथमिकता होगी। सभी आंगनबाड़ी सेविकाओं एवं पर्यवेक्षिकाओं के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया जाएगा, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम लाभुक तक पहुंच सके।”
आंगनबाड़ी सेविकाओं ने कहा, “नई पदाधिकारी के साथ मिलकर विभागीय कार्यों को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। क्षेत्र की समस्याओं और लाभुकों से जुड़े मुद्दों को उनके समक्ष रखकर समाधान की दिशा में काम करेंगे। हमें उम्मीद है कि उनके मार्गदर्शन से आंगनबाड़ी केंद्रों की व्यवस्था और मजबूत होगी।”
पदभार ग्रहण समारोह के दौरान विभाग से जुड़ी पर्यवेक्षिकाएं, आंगनबाड़ी सेविकाएं एवं अन्य कर्मी उपस्थित रहे। सभी ने माया रानी को नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं।

राम भक्तों के लिए

सेवा संकल्प अभियान के तहत चरका टांगर में पौधारोपण, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश।

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश सेवा और सुशासन के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी की ओर से 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक सेवा संकल्प अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के तहत रविवार को गुमला प्रखंड के चरका टांगर गांव में ‘सेवा मेरा योगदान’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों के साथ मिलकर फलदार एवं छायादार पौधों का पौधारोपण किया और लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया।
कार्यक्रम का नेतृत्व अभियान के संयोजक मंगल सिंह भोगता और सह-संयोजक शंभू सिंह ने किया। कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से विभिन्न स्थानों पर पौधे लगाए। इस दौरान पौधों के संरक्षण और उनकी नियमित देखभाल का भी संकल्प लिया गया।
संयोजक मंगल सिंह भोगता ने कहा कि सेवा संकल्प अभियान का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सेवा और जनकल्याण की भावना को मजबूत करना है। पर्यावरण संरक्षण भी समाज और देश की सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन को रोकने के लिए अधिक से अधिक पौधे लगाना जरूरी है। एक पौधा लगाना आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण की नींव रखने के समान है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। सेवा संकल्प अभियान के माध्यम से भाजपा कार्यकर्ता विभिन्न सामाजिक और जनसेवा के कार्यों से लोगों को जोड़ रहे हैं। उन्होंने लोगों से पौधारोपण के साथ-साथ लगाए गए पौधों की देखभाल करने की अपील की।
सह-संयोजक शंभू सिंह ने कार्यक्रम में शामिल सभी भाजपा कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी आवश्यक है।
भाजपा कार्यकर्ताओं ने कहा कि सेवा संकल्प अभियान के तहत आगे भी विभिन्न सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अभियान के माध्यम से सेवा, पर्यावरण संरक्षण और जनजागरूकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
कार्यक्रम में संजय वर्मा, धीरज लोहरा, धीरेंद्र लोहरा, महावीर लोहरा, फगुआ बड़ाईक, मसद गोप, दीपेंद्र साहू, राजेश साहू सहित बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता और ग्रामीण मौजूद रहे।

राम भक्तों के लिए

सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा के लिए खुलेगा रेल कनेक्टिविटी का रास्ता! 291.881 किलोमीटर लंबी रेल लाइन से बदलेगी क्षेत्र की तस्वीर

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

धरमजयगढ़–पत्थलगांव–लोहरदगा नई रेल लाइन परियोजना से झारखंड और छत्तीसगढ़ के बीच बढ़ेगा संपर्क; 28 स्टेशनों का प्रस्ताव, व्यापार, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मिल सकती है नई गति

गुमला/लोहरदगा। झारखंड के सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा जिलों में बेहतर रेल कनेक्टिविटी की लंबे समय से चली आ रही, गुमला जिले का दुर्भाग्य है कि झारखंड की राजधानी रांची से उड़ीसा रेलवे लाइन , पुराने गुमला जिला ( अब सिमडेगा अलग जिला ) के बानो प्रखंड स्थित पोकला स्टेशन से होकर गुजरती है, रांची से उड़ीसा रेलवे लाइन, फलस्वरूप उम्मीद एक बार फिर ( जगी है ) चर्चा में है। छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ और पत्थलगांव क्षेत्र को झारखंड के लोहरदगा से जोड़ने की प्रस्तावित रेल परियोजना क्षेत्रीय विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इस रेल मार्ग के माध्यम से झारखंड और छत्तीसगढ़ के बीच परिवहन संपर्क को मजबूत करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों को भी रेल नेटवर्क से जोड़ने की संभावनाएं बन सकती हैं, जहां आज भी लोगों को लंबी दूरी की यात्रा के लिए मुख्य रूप से सड़क परिवहन पर निर्भर रहना पड़ता है।

प्रस्तुत परियोजना संबंधी इन्फोग्राफिक में लगभग 291.881 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन, झारखंड क्षेत्र में करीब 144.5 किलोमीटर रेल मार्ग और 28 प्रस्तावित स्टेशनों का उल्लेख किया गया है। यदि परियोजना को आवश्यक स्वीकृतियां मिलती हैं और इसका निर्माण निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ता है, तो यह केवल एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि तीन जिलों के आर्थिक, सामाजिक और बुनियादी ढांचागत विकास के लिए महत्वपूर्ण पहल बन सकती है।

हालांकि, परियोजना की वर्तमान स्थिति, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), अंतिम मार्ग, स्टेशन संख्या, लागत और निर्माण की समय-सीमा की पुष्टि संबंधित रेलवे एवं सरकारी विभागों के आधिकारिक दस्तावेजों से किया जाना आवश्यक है।

रेल कनेक्टिविटी के अभाव में विकास की राह में चुनौतियां

सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा झारखंड के ऐसे जिले हैं, जिनकी पहचान प्राकृतिक संपदा, कृषि, वनोपज, जनजातीय संस्कृति और ग्रामीण जीवनशैली से जुड़ी है। इन क्षेत्रों में विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन बेहतर परिवहन व्यवस्था का अभाव कई बार स्थानीय लोगों और कारोबारियों के लिए चुनौती बन जाता है।

रेल संपर्क की कमी के कारण लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोगों को कई परिस्थितियों में बसों, निजी वाहनों या अन्य सड़क परिवहन साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। सड़क मार्ग से यात्रा करने में समय और खर्च अधिक हो सकता है। वहीं, बड़े शहरों में पढ़ाई, नौकरी, व्यापार या इलाज के लिए जाने वाले लोगों को अपनी यात्रा की योजना परिवहन की उपलब्धता के अनुसार बनानी पड़ती है।

ऐसे में प्रस्तावित रेल लाइन क्षेत्रीय संपर्क को बेहतर बनाने का अवसर प्रदान कर सकती है। यदि इसका मार्ग स्थानीय आबादी और प्रमुख बाजारों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है, तो इसका लाभ दूरदराज के गांवों तक भी पहुंच सकता है।

धरमजयगढ़ से लोहरदगा तक प्रस्तावित रेल संपर्क

प्रस्तुत इन्फोग्राफिक के अनुसार, धरमजयगढ़–पत्थलगांव–लोहरदगा रेल परियोजना की कुल लंबाई लगभग 291.881 किलोमीटर बताई गई है। इसमें झारखंड में करीब 144.5 किलोमीटर रेल लाइन प्रस्तावित दर्शाई गई है। परियोजना के अंतर्गत 28 स्टेशनों का भी उल्लेख किया गया है।

प्रस्तावित रेल मार्ग का उद्देश्य छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच रेल संपर्क का विस्तार करना है। इससे सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा क्षेत्र को बेहतर परिवहन नेटवर्क से जोड़ने की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

रेल मार्ग के अंतिम निर्धारण में यह महत्वपूर्ण होगा कि किन गांवों, कस्बों और व्यापारिक केंद्रों को स्टेशन की सुविधा मिलती है। स्टेशन केवल यात्री चढ़ने-उतरने का स्थान नहीं होते, बल्कि समय के साथ उनके आसपास बाजार, परिवहन सेवाएं, छोटे कारोबार और अन्य आर्थिक गतिविधियां भी विकसित हो सकती हैं।

इसलिए स्थानीय लोगों की अपेक्षा रहेगी कि परियोजना की योजना बनाते समय क्षेत्रीय जरूरतों, जनसंख्या, प्रमुख बाजारों और शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संस्थानों की पहुंच को भी प्राथमिकता दी जाए।

सिमडेगा जिले को मिल सकता है परिवहन का नया विकल्प

सिमडेगा जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, खेल प्रतिभाओं, कृषि और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। बेहतर रेल संपर्क मिलने से जिले के लोगों के लिए दूसरे शहरों तक पहुंचना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों तक जाने में मदद मिल सकती है। नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के लिए नए क्षेत्रों तक पहुंचना आसान हो सकता है। वहीं, व्यापारियों और छोटे उद्यमियों को अपने उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने का अवसर मिल सकता है।

सिमडेगा के ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादित कृषि उपज और अन्य स्थानीय वस्तुओं के परिवहन में भी सुधार की संभावना रहेगी। हालांकि, वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित रेल मार्ग जिले के किन हिस्सों को जोड़ता है और वहां यात्री एवं मालगाड़ियों की क्या व्यवस्था होती है।

गुमला के विकास को मिल सकती है नई दिशा

गुमला जिला प्राकृतिक संसाधनों और जनजातीय विरासत से समृद्ध है। यहां कृषि, पशुपालन, वनोपज और स्थानीय व्यापार बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका से जुड़े हैं। बेहतर रेल कनेक्टिविटी इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को व्यापक बाजारों से जोड़ने में सहायक हो सकती है।

यदि रेल लाइन का मार्ग गुमला और उसके आसपास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रभावी रूप से जोड़ता है, तो लोगों को आवागमन के लिए एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है। इससे विद्यार्थियों, श्रमिकों, कारोबारियों और आम यात्रियों को सुविधा मिलने की उम्मीद रहेगी।

रेल संपर्क के विस्तार से पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। प्राकृतिक स्थलों, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक आयोजनों में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए यात्रा की योजना बनाना आसान हो सकता है। इससे स्थानीय परिवहन, भोजनालयों, छोटे होटलों, हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है।

हालांकि, पर्यटन से वास्तविक आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए बेहतर सड़क संपर्क, आवास, स्वच्छता, सुरक्षा और प्रचार-प्रसार जैसी सुविधाओं का विकास भी आवश्यक होगा।

लोहरदगा बन सकता है बेहतर क्षेत्रीय संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र

लोहरदगा जिला झारखंड के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल है। प्रस्तावित रेल संपर्क से इस क्षेत्र की अन्य जिलों और पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के साथ आवाजाही की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

यदि परियोजना के माध्यम से लोहरदगा को अतिरिक्त रेल संपर्क मिलता है, तो इसका लाभ यात्रियों के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों को भी मिल सकता है। स्थानीय बाजारों को नए ग्राहक मिल सकते हैं और परिवहन से संबंधित सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।

रेलवे स्टेशन के आसपास समय के साथ दुकानों, छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, भोजनालयों, माल ढुलाई सेवाओं और अन्य रोजगारपरक गतिविधियों के विकसित होने की संभावना रहती है। इससे स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार के अवसर भी मिल सकते हैं।

लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन संभावनाओं का वास्तविक रूप परियोजना के अंतिम स्वरूप, ट्रेन परिचालन, स्टेशन सुविधाओं और यात्री मांग पर निर्भर करेगा।

किसानों और वनोपज से जुड़े लोगों को मिल सकता है लाभ

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवहन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसान अपनी उपज को समय पर बाजार तक पहुंचा सकें, इसके लिए सस्ती और विश्वसनीय परिवहन व्यवस्था आवश्यक है।

यदि प्रस्तावित रेल परियोजना के साथ पर्याप्त माल परिवहन सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो कृषि उत्पादों और क्षेत्र में उपलब्ध अन्य संसाधनों को दूर के बाजारों तक पहुंचाने में सहायता मिल सकती है। इससे व्यापारियों और उत्पादकों के लिए बाजार का दायरा बढ़ सकता है।

झारखंड के कई ग्रामीण क्षेत्रों में वनोपज भी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में बेहतर संपर्क से संबंधित उत्पादों के विपणन और परिवहन में संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, स्थानीय उत्पादों को रेलवे के माध्यम से बड़े बाजारों तक पहुंचाने के लिए संग्रहण केंद्र, भंडारण, उचित पैकेजिंग और माल ढुलाई की व्यावहारिक व्यवस्था भी जरूरी होगी।

खनिज और औद्योगिक विकास को मिल सकता है प्रोत्साहन

झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य हैं। बेहतर रेल नेटवर्क से औद्योगिक क्षेत्रों को कच्चे माल और तैयार उत्पादों के परिवहन में सहायता मिल सकती है।

यदि प्रस्तावित रेल लाइन को मालगाड़ियों के परिचालन के अनुकूल विकसित किया जाता है, तो संबंधित क्षेत्रों में माल ढुलाई के विकल्प बढ़ सकते हैं। इससे परिवहन लागत और समय को कम करने की संभावनाएं बन सकती हैं।

इसके अलावा, बेहतर रेल संपर्क से नए उद्योगों और व्यावसायिक इकाइयों के लिए क्षेत्र की उपयोगिता बढ़ सकती है। उद्योग स्थापित करने से पहले कंपनियां परिवहन, बिजली, पानी, बाजार और श्रम उपलब्धता जैसे पहलुओं पर विचार करती हैं। रेल संपर्क में सुधार इन पहलुओं में से एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकता है।

हालांकि, केवल रेल लाइन बनने से औद्योगिक विकास सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए स्थानीय आधारभूत संरचना, पर्यावरण संरक्षण, निवेश, कौशल विकास और रोजगार संबंधी योजनाओं का समन्वय भी जरूरी होगा।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में हो सकता है सुधार

बेहतर परिवहन व्यवस्था का सबसे प्रत्यक्ष लाभ आम लोगों को मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रशिक्षण संस्थानों तक पहुंचने के लिए अक्सर दूसरे शहरों की यात्रा करनी पड़ती है।

रेल संपर्क विकसित होने से ऐसे विद्यार्थियों को यात्रा के अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं। नियमित ट्रेनें और सुविधाजनक समय-सारिणी उपलब्ध होने पर पढ़ाई तथा रोजगार से संबंधित यात्राएं अधिक आसान हो सकती हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भी रेल कनेक्टिविटी उपयोगी साबित हो सकती है। गंभीर बीमारी के उपचार, विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श या बड़े अस्पतालों में जांच के लिए बाहर जाने वाले मरीजों को बेहतर परिवहन विकल्प मिल सकता है।

हालांकि, आपातकालीन चिकित्सा के लिए रेल हर परिस्थिति में उपयुक्त नहीं होती। ऐसे मामलों में एंबुलेंस, स्थानीय अस्पताल और सड़क संपर्क की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं

किसी भी बड़ी रेल परियोजना का प्रभाव उसके निर्माण और परिचालन दोनों चरणों में दिखाई दे सकता है। निर्माण के दौरान श्रमिकों, मशीन ऑपरेटरों, तकनीकी कर्मचारियों, परिवहन सेवा प्रदाताओं और विभिन्न प्रकार के आपूर्तिकर्ताओं की जरूरत पड़ सकती है।

स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता और आवश्यक कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है, तो परियोजना का लाभ क्षेत्रीय युवाओं तक अधिक प्रभावी रूप से पहुंच सकता है।

रेलवे स्टेशन चालू होने के बाद टिकटिंग से जुड़ी सेवाओं, खानपान, दुकानों, ऑटो एवं टैक्सी सेवाओं, माल ढुलाई और अन्य छोटे व्यवसायों के लिए अवसर विकसित हो सकते हैं। स्थानीय उद्यमी इन अवसरों का लाभ उठाकर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

इसके साथ ही, रेल संपर्क बढ़ने से युवाओं को दूसरे शहरों में रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर तलाशने में भी सुविधा मिल सकती है।

पर्यटन और स्थानीय संस्कृति को मिलेगा विस्तार का अवसर

सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा का क्षेत्र प्राकृतिक दृश्यों, स्थानीय परंपराओं, जनजातीय कला और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध है। बेहतर परिवहन संपर्क से इन क्षेत्रों की पहचान राज्य के बाहर के लोगों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

यदि रेल परियोजना के साथ पर्यटन स्थलों तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़कें, स्थानीय गाइड, आवास और पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो क्षेत्र में पर्यटन आधारित रोजगार बढ़ने की संभावना है।

स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पादों, खानपान और सांस्कृतिक आयोजनों को भी इससे लाभ मिल सकता है। इससे स्थानीय संस्कृति को व्यापक पहचान मिलने के साथ समुदायों की आय बढ़ाने के अवसर पैदा हो सकते हैं।

इस दिशा में योजनाएं बनाते समय स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना भी जरूरी होगा, ताकि पर्यटन का विकास समुदायों के हितों के अनुरूप हो।

परियोजना की लागत और भूमि अधिग्रहण बड़ी चुनौती

इतनी लंबी रेल लाइन का निर्माण एक बड़ा बुनियादी ढांचा कार्य होगा। इसके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, भूमि, तकनीकी तैयारी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता होगी।

प्रस्तुत इन्फोग्राफिक में परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 13,162.604 करोड़ रुपये बताई गई है। इसमें पांच प्रतिशत मूल्य वृद्धि सहित लगभग 14,550.53 करोड़ रुपये की राशि भी दर्शाई गई है। ये आंकड़े आधिकारिक परियोजना दस्तावेजों से सत्यापित किए जाने चाहिए, क्योंकि अनुमानित लागत में संशोधन संभव है।

इसी प्रकार, इन्फोग्राफिक में कुल 2,158.202 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता का उल्लेख है। इसमें लगभग 1,662.587 हेक्टेयर निजी भूमि और 495.615 हेक्टेयर वन भूमि दर्शाई गई है। भूमि संबंधी इन आंकड़ों की भी आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।

भूमि अधिग्रहण के दौरान प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और लागू कानूनी प्रावधानों के तहत अधिकार देना महत्वपूर्ण होगा। विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभाओं, स्थानीय समुदायों और परंपरागत अधिकारों से जुड़े पहलुओं पर संवेदनशीलता के साथ विचार करना आवश्यक है।

वन और पर्यावरण संरक्षण पर भी देना होगा ध्यान

झारखंड और छत्तीसगढ़ के कई हिस्से जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हैं। इसलिए नई रेल लाइन के निर्माण में पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन महत्वपूर्ण होगा।

रेल मार्ग के कारण वन भूमि के उपयोग, वन्यजीवों के आवागमन, जल स्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन किया जाना चाहिए। जहां आवश्यक हो, वहां संबंधित पर्यावरणीय और वन स्वीकृतियां प्राप्त करनी होंगी।

निर्माण कार्य के दौरान मिट्टी के कटाव, जल निकासी और प्राकृतिक जल स्रोतों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है। उचित योजना और प्रभावी निगरानी के माध्यम से विकास की जरूरतों तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

पुल, सुरंग और अन्य तकनीकी संरचनाओं की होगी महत्वपूर्ण भूमिका

प्रस्तुत इन्फोग्राफिक में परियोजना के लिए कई प्रकार की तकनीकी संरचनाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें बड़े और छोटे पुल, रेलवे ओवरब्रिज, अंडरब्रिज तथा अन्य संरचनाएं शामिल बताई गई हैं।

रेल लाइन के निर्माण में इन संरचनाओं की जरूरत भौगोलिक स्थिति, नदियों, नालों, सड़कों और प्रस्तावित मार्ग के स्वरूप पर निर्भर करेगी। पहाड़ी या वन क्षेत्रों में निर्माण कार्य के लिए विशेष इंजीनियरिंग योजना की आवश्यकता भी हो सकती है।

इन संरचनाओं का सही निर्माण यात्रियों की सुरक्षा, ट्रेन परिचालन की विश्वसनीयता और आसपास के क्षेत्रों में सड़क संपर्क बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा।

हालांकि, पुलों, सुरंगों और अन्य संरचनाओं की वास्तविक संख्या एवं डिजाइन का निर्धारण आधिकारिक इंजीनियरिंग सर्वेक्षण और अंतिम परियोजना रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

रेल परियोजना और क्षेत्रीय असमानता दूर करने की उम्मीद

विकास का लाभ तभी व्यापक माना जाता है, जब वह बड़े शहरों के साथ ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक भी पहुंचे। बेहतर रेल संपर्क इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा के कई ग्रामीण इलाकों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच बढ़ाने की जरूरत महसूस की जाती है। यदि नई रेल लाइन इन क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित होती है, तो इससे क्षेत्रीय असमानता कम करने में मदद मिल सकती है।

रेल संपर्क के माध्यम से लोगों की आवाजाही बढ़ने से अलग-अलग जिलों के बीच सामाजिक और आर्थिक संबंध भी मजबूत हो सकते हैं। इससे स्थानीय व्यापारियों, विद्यार्थियों, श्रमिकों और छोटे उद्यमियों को नए अवसर तलाशने में सुविधा मिल सकती है।

अब आगे क्या? आधिकारिक मंजूरी और निर्माण पर टिकी नजरें

किसी भी रेल परियोजना में प्रारंभिक सर्वेक्षण, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, वित्तीय आकलन, तकनीकी परीक्षण, आवश्यक स्वीकृतियां और निर्माण की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में पूरी होती है। इसलिए DPR तैयार होने की जानकारी को परियोजना की अंतिम मंजूरी या निर्माण शुरू होने की घोषणा के समान नहीं माना जाना चाहिए।

इस परियोजना के संबंध में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह हैं कि रेलवे की ओर से इसे किस स्तर तक मंजूरी मिली है, अंतिम मार्ग क्या होगा, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया कब शुरू होगी, बजट में कितनी राशि आवंटित की जाएगी और निर्माण के लिए क्या समय-सीमा निर्धारित होगी।

इन सवालों के आधिकारिक जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रस्तावित रेल लाइन कब तक धरातल पर उतर सकती है और इसका लाभ स्थानीय लोगों को किस समय से मिलने लगेगा।

निष्कर्ष: तीन जिलों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है परियोजना

धरमजयगढ़–पत्थलगांव–लोहरदगा प्रस्तावित रेल परियोजना सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा के लिए बेहतर परिवहन संपर्क की दिशा में एक महत्वपूर्ण संभावना है। इसके माध्यम से आवागमन, व्यापार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यटन के क्षेत्र में नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

हालांकि, परियोजना के वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेंगे कि इसे कब स्वीकृति मिलती है, इसका अंतिम मार्ग कैसा होता है, किन क्षेत्रों को स्टेशन की सुविधा मिलती है और ट्रेन परिचालन किस प्रकार शुरू किया जाता है।

क्षेत्र के लोगों के लिए यह केवल रेल लाइन का सवाल नहीं, बल्कि विकास की मुख्यधारा से अधिक मजबूती से जुड़ने की उम्मीद भी है। अब स्थानीय जनता की नजरें रेलवे और संबंधित सरकारी विभागों के अगले कदमों पर टिकी हैं।

यदि यह परियोजना आवश्यक स्वीकृतियों के साथ समयबद्ध तरीके से पूरी होती है, तो आने वाले वर्षों में सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा के विकास को नई गति मिल सकती है और झारखंड तथा छत्तीसगढ़ के बीच संपर्क का एक महत्वपूर्ण नया अध्याय शुरू हो सकता है।

राम भक्तों के लिए

छोटानागपुर – झारखंड की आन – बान – शान और सम्मान का गौरवशाली इतिहास स्वर्ण अक्षरों से हुआ दर्ज, अब लोक वाद्ययंत्र मांदर *मांदर ऑफ़ झारखंड के नाम से रजिस्टर हो चुका है, लोक वाद्ययंत्र मांदर

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न्यूज – गनपत लाल चौरसिया – ब्यूरो प्रमुख – गुमला

गुमला : – गुमला जिला प्रशासन द्वारा लोक वाद्ययंत्र मांदर को जी.आई टैक (भौगोलिक संकेतक ) दिलाने में पाँच साल के कड़े संघर्ष का सामना करने के बाद छोटानागपुर – झारखंड की आन – बान – शान और सम्मान लोक वाद्ययंत्र मांदर के लियें प्रारंभ से लेकर अब तक की संघर्ष की कहानी , अंततः लाया रंग और *मांदार ऑफ़ झारखंड के नाम से रजिस्टर हुआ लोग *वाद्ययंत्र मांदर – जी आई – टैक. ( भौगोलिक संकेतक ) को प्राप्त करने की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी और कहानी किस प्रकार है,,,,, झारखंड की सांस्कृतिक पहचान ‘मांदर’ को मिला भौगोलिक संकेतक पंजीकरण

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में गुमला से शुरू हुई पहल ने दिलाई झारखंड की पारंपरिक कला को विशिष्ट पहचान झारखंड की मिट्टी, लोकजीवन और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा पारंपरिक वाद्य ‘मांदर’ अब अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान के साथ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हो गया है। गुमला जिले से प्रस्तावित मांदर को भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्राप्त होना झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और मांदर निर्माण से जुड़े पारंपरिक कारीगरों के लिए एक महत्वपूर्ण एवं गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

मांदर केवल एक पारंपरिक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। पर्व-त्योहारों, पारंपरिक नृत्य, सामाजिक आयोजनों और सामुदायिक जीवन में मांदर की थाप लंबे समय से झारखंड की पहचान को स्वर देती रही है। ऐसे में मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान मिलना उन कारीगर परिवारों की पीढ़ियों पुरानी कला, कौशल और पारंपरिक ज्ञान को औपचारिक पहचान मिलने के रूप में भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपने हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।

मांदर को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण दिलाने की यह यात्रा गुमला जिले से शुरू हुई और इसके पीछे राज्य सरकार के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन, संबंधित संस्थाओं तथा मांदर कारीगरों के लंबे समय तक चले सामूहिक प्रयास रहे हैं। माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन एवं दिशा-निर्देशन में झारखंड की पारंपरिक कला, संस्कृति और स्थानीय कारीगरों को पहचान एवं सम्मान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के क्रम में गुमला जिला प्रशासन द्वारा मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने की पहल को आगे बढ़ाया गया।

इस दिशा में तत्कालीन उपायुक्त सुशांत गौरव की महत्वपूर्ण पहल रही। उन्होंने स्वयं मांदर कारीगरों के बीच पहुंचकर उनके पारंपरिक हुनर और मांदर निर्माण की प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर समझा। कारीगरों की स्थिति, उनके पारंपरिक ज्ञान, निर्माण तकनीक और इस कला से जुड़ी स्थानीय पहचान को समझने के बाद इसके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और आगे की प्रक्रिया के लिए पहल की गई। उनके प्रयासों से मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों और उनकी पारंपरिक कला को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार हुआ।

इस प्रारंभिक पहल को आगे बढ़ाने में तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके कार्यकाल में मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने से संबंधित तकनीकी और प्रक्रियात्मक कार्यों को गति मिली। आवश्यक दस्तावेजों के संकलन, शोध, तकनीकी प्रस्तुतीकरण तथा संबंधित स्तरों पर समन्वय के माध्यम से इस प्रयास को आगे बढ़ाया गया। गुमला से शुरू हुई यह पहल इसी क्रम में एक व्यवस्थित भौगोलिक संकेतक प्रक्रिया में परिवर्तित हुई।

मांदर की भौगोलिक संकेतक पंजीकरण यात्रा का औपचारिक चरण 24 सितंबर 2021 को शुरू हुआ, जब आवेदन एवं प्रकरण विवरण दाखिल किया गया। इसके बाद 18 अक्टूबर 2021 को औपचारिकता जांच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ। प्रक्रिया के अगले चरण में 30 जून 2022 को प्रथम अनुपालन जांच-2 जारी हुई। आवश्यक उत्तर एवं दस्तावेजी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 6 मई 2024 को आवेदक द्वारा अनुपालन जांच का उत्तर प्रस्तुत किया गया। इसके बाद 24 जून 2024 को अतिरिक्त अनुपालन जांच के उत्तर के साथ मानचित्र, प्रतीक चिह्न एवं अंतिम प्रतिवेदन आदि आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए।

भौगोलिक संकेतक पंजीकरण की प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ते हुए 30 जनवरी 2025 को परीक्षण प्रतिवेदन जारी हुआ। इसके जवाब में आवेदक द्वारा 23 जनवरी 2026 को परीक्षण प्रतिवेदन का उत्तर प्रस्तुत किया गया। लंबे समय तक चले इस तकनीकी, दस्तावेजी एवं प्रक्रियात्मक चरण के बाद अब मांदर को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि एक दिन के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि कई वर्षों से लगातार किए जा रहे प्रशासनिक, तकनीकी और दस्तावेजी प्रयासों की परिणति है।

इस पूरी प्रक्रिया में तत्कालीन उपायुक्त प्रेरणा दीक्षित द्वारा भी आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई एवं समन्वय किया गया। अलग-अलग चरणों में प्रक्रिया की प्रगति पर ध्यान देते हुए आवश्यक स्तर पर कार्रवाई को आगे बढ़ाया गया। वहीं वर्तमान उपायुक्त दिलेश्वर महतो द्वारा भी इस पूरी प्रक्रिया की निरंतर निगरानी की गई तथा पूर्व में शुरू किए गए प्रयासों को आवश्यक प्रशासनिक सहयोग और समन्वय के साथ आगे बढ़ाया गया।

मांदर को भौगोलिक संकेतक पहचान दिलाने की प्रक्रिया में जिला प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों की सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण आधार रही। ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रायडीह सहित मांदर निर्माण से जुड़े क्षेत्रों में कारीगरों की पहचान, उनके कौशल एवं निर्माण प्रक्रिया से संबंधित जानकारी का संकलन किया गया। पारंपरिक निर्माण पद्धति, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों तथा मांदर से जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों को भी दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में शामिल किया गया।

मांदर की पहचान को केवल भौगोलिक संकेतक पंजीकरण तक सीमित रखने के बजाय कारीगरों के कौशल और आजीविका को मजबूत करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। मांदर किसान उत्पादक कंपनी लिमिटेड, ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रायडीह के माध्यम से कारीगरों को संगठित करने और मांदर निर्माण की पारंपरिक कला को आजीविका से जोड़ने का प्रयास किया गया है। ग्राम जरजट्टा में 40 कारीगरों को मांदर निर्माण का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वहीं पालकोट प्रखंड के टेंगरिया गांव में 20 कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। सिसई प्रखंड के लकेया गांव में आगामी अक्टूबर माह में 20 कारीगरों को मांदर निर्माण का प्रशिक्षण देने की योजना है।

भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के बाद अब मांदर की प्रामाणिकता और इसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई है। इससे झारखंड के स्थानीय स्तर पर मांदर बनाने वाले कारीगरों के उत्पाद को व्यापक बाजार से जोड़ने, उनकी कला की पहचान को मजबूत करने तथा पारंपरिक शिल्प को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ेंगी। आने वाले समय में मांदर की पहचान, बाजार उपलब्धता, कौशल विकास और विपणन के क्षेत्र में भी नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

इस महत्वपूर्ण कार्य को धरातल पर आगे बढ़ाने में तत्काल गुमला जिला उद्यमी समन्वयक सूरज कुमार, मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड के पदाधिकारियों एवं कर्मियों तथा गुमला जिला प्रशासन की संबंधित टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आवेदन प्रक्रिया, शोध, आवश्यक दस्तावेजों के संकलन, कारीगरों के चिन्हांकन एवं मानचित्रण, प्रशिक्षण तथा प्रस्तुतीकरण सहित विभिन्न चरणों में टीम द्वारा निरंतर समन्वय एवं प्रयास किया गया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने मांदर निर्माण से जुड़े सभी कारीगरों, संबंधित विभागों, अधिकारियों, कर्मियों, तकनीकी दल तथा इस पूरी प्रक्रिया में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने विशेष रूप से मांदर कारीगरों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि उनकी पीढ़ियों से चली आ रही कला, मेहनत और पारंपरिक ज्ञान की पहचान है।

उपायुक्त ने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में झारखंड की पारंपरिक कला, संस्कृति और स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में मांदर को प्राप्त भौगोलिक संकेतक पंजीकरण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। गुमला से शुरू हुआ यह प्रयास अब झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है। जिला प्रशासन का प्रयास रहेगा कि भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के बाद मांदर के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ इससे जुड़े कारीगरों के कौशल विकास, आजीविका, उत्पादन, पहचान और बाजार उपलब्धता को भी मजबूत किया जाए।

मांदर को मिला भौगोलिक संकेतक पंजीकरण गुमला जिले के लिए भी विशेष महत्व रखता है। जिस पारंपरिक कला को स्थानीय कारीगर वर्षों से अपने हाथों और अनुभव के माध्यम से जीवित रखे हुए हैं, उसे अब एक औपचारिक भौगोलिक पहचान प्राप्त हुई है। यह उपलब्धि झारखंड की संस्कृति, यहां के कारीगरों और उनकी परंपरागत कला के सम्मान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

मांदर की थाप झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की आवाज रही है और अब इसकी विशिष्ट पहचान को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर भी औपचारिक मान्यता मिली है।

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