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Thursday, July 2, 2026
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पीएम जनमन योजना एवं जनकल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा बैठक संपन्न; उपायुक्त ने दिए कार्यों में तेजी लाने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश

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गुमला (ब्यूरो प्रमुख ) – गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला उपायुक्त दिलेश्वर महत्तो की अध्यक्षता में सोमवार को जिला स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें पीएम जनमन (पीएम – जनमन ) योजना सहित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की विस्तृत समीक्षा की गई। बैठक में सभी संबंधित विभागों के अधिकारियों को लंबित कार्यों को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूर्ण करने तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

बैठक के दौरान पीएम जनमन योजना के अंतर्गत जिले में संचालित बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों की समीक्षा करते हुए उपायुक्त ने निर्माणाधीन आंगनबाड़ी केंद्रों के कार्यों में तेजी लाने और उन्हें जल्द पूर्ण करने का निर्देश दिया। वहीं योजना के तहत बनने वाले स्कूल भवनों की समीक्षा करते हुए संबंधित विभाग को निविदा प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कर कार्य प्रारंभ करने को कहा गया।

उपायुक्त ने जिले के सभी चिन्हित क्षेत्रों एवं घरों में विद्युत कनेक्शन सुनिश्चित करने का निर्देश देते हुए कहा कि कोई भी योग्य परिवार बिजली सुविधा से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसके साथ ही मोबाइल नेटवर्क एवं टावर से संबंधित कार्यों की समीक्षा करते हुए दूरस्थ क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लंबित कार्यों को शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिए गए।

कल्याण एवं शिक्षा विभाग से संबंधित योजनाओं की समीक्षा के दौरान उपायुक्त ने सभी स्कूली बच्चों के बैंक खातों को एनपीसीआई से लिंक कराने की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया। एलडीएम को बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट के माध्यम से विद्यालयों में विशेष कैंप आयोजित कर शत-प्रतिशत एनपीसीआई मैपिंग सुनिश्चित करने को कहा गया।

बैठक में भवन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर भी उपायुक्त ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने संबंधित अभियंताओं एवं अधिकारियों को निर्देशित किया कि सभी सरकारी भवनों का निर्माण निर्धारित मानकों एवं उच्च गुणवत्ता के साथ किया जाए तथा किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

शिक्षा विभाग की समीक्षा के दौरान शैक्षणिक सत्र 2025-26 के छूटे हुए योग्य विद्यार्थियों के बीच साइकिल वितरण कार्य को अविलंब पूरा करने का निर्देश दिया गया। साथ ही आगामी सत्र 2026-27 के लिए लाभुकों की सूची जल्द उपलब्ध कराने हेतु प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों को निर्देशित किया गया।

पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की समीक्षा करते हुए उपायुक्त ने डुमरी क्षेत्र में पाइपलाइन निर्माण कार्य को बिना किसी विलंब के शीघ्र पूर्ण करने का निर्देश दिया ताकि ग्रामीणों को स्वच्छ एवं नियमित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

बैठक में उपायुक्त ने कहा कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर पहुंचे, यह जिला प्रशासन की प्राथमिकता है। उन्होंने सभी अधिकारियों को योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीरता एवं जवाबदेही के साथ कार्य करने का निर्देश दिया।

बैठक में मुख्य रूप से निदेशक आईटीडीए लिली एनोला लकड़ा , सिविल सर्जन गुमला शंभूनाथ चौधरी, जिला कल्याण पदाधिकारी आलोक रंजन,जिला समाज कल्याण पदाधिकारी आरती कुमारी, विद्युत आपूर्ति कार्यपालक अभियंता , आईडीएम गुमला सहित अंग संबंधित पदाधिकारी एवं कर्मी मौजूद रहें।

राम भक्तों के लिए

अधिकांश स्वास्थ्यकर्मी गुमला जिले में अपनी निजी वाहनों पर रेड प्लस + चिह्न लगाने वालों पर अब होगीसख्त कार्रवाई

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गुमला (ब्यूरो प्रमुख ) – गणपत लाल चौरसिया

अधिकांश स्वास्थ्यकर्मी अपनी पुरानी ढेरों पर चलते हुए कानून की धज्जियां उड़ा रहे : उपाधीक्षक

गुमला : – गुमला इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ( आई एम ए ) के स्पष्ट नियमों और निर्देशों के बावजूद सदर अस्पताल गुमला में आश्चर्यजनक पुराना ढर्रा देखने को मिल रहा है । अस्पताल के कई गैर-चिकित्सकीय कर्मी (नॉन-मेडिकल स्टाफ) अपने निजी वाहनों पर धड़ल्ले से रेड प्लस + (लाल + प्लस) के निशान का उपयोग कर रहे हैं। नियमों के मुताबिक यह चिह्न केवल पंजीकृत डॉक्टरों (रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स) के लिए ही वैध है, लेकिन गुमला में लैब टेक्नीशियन से लेकर एंबुलेंस चालक तक उक्त स्वास्थ्य विभाग के शानदार प्रतीक चिन्ह को अपनी बाइक, स्कूटी आदि वाहनों पर चस्पा कर अपने आपको ( उच्च स्तरीय स्वास्थ्यकर्मी होने का दावा प्रस्तुत करते हैं ) स्वास्थ्य विभाग का उच्च स्तरीय चिकित्साकर्मी होने का दावा ठोकते नजर आते हैं, और तो और आम जनता, मरीज और परिजनों के बीच भ्रम, फैलाकर भ्रष्टाचार का खुला खेल फर्रुखाबादी का खेल खेलते हैं और मरीज और परिजनों को समय-समय पर परेशान भी करते हैं जानकारों और स्वास्थ्य विभाग के नियमों के अनुसार, रेड प्लस + का निशान सड़क पर डॉक्टरों को आपातकालीन स्थिति में विशेष प्राथमिकता और पहचान देने के लिए है। लेकिन गुमला सदर अस्पताल के पैथोलॉजिस्ट, कंपाउंडर, ड्रेसर और चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों द्वारा इसका खुलेआम इस्तेमाल किए जाने से आम लोगों में भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। गुमला जिले का एक मात्र बड़ा सदर अस्पताल गुमला मेंआने वाले सीधे-साधे मरीज और उनके परिजन और परिजनों को अक्सर उक्त कर्मचारियों के वाहनों पर लगे चिह्न को देखकर उन्हें डॉक्टर समझ बैठते हैं। कई बार लोग अस्पताल परिसर के बाहर या सड़कों पर भी इनसे डॉक्टरी सलाह या आपातकालीन मदद की उम्मीद कर बैठते हैं, जिससे मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होने का खतरा काफी बढ़ गया है। नॉन-मेडिकल स्टाफ के वाहनों में लगा उक्त रेड प्लस + चिन्ह का दुरुपयोग किया जा रहा है । सदर अस्पताल गुमला की इस अव्यवस्था पर स्थानीय नागरिकों – समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि सरकारी अस्पतालों और निजी क्लीनिकों में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों की पहचान स्पष्ट करने के लिए नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए ताकि आम लोगों में भ्रम की स्थिति न पैदा हो । आम लोगों का कहना है कि ऐसे वाहनों की चेकिंग कर उक्त वैध चिकित्सा विभाग का प्रतीक चिन्ह (रेड प्लस + चिन्ह ) का अवैध रुप से प्रयोग करने वाले व्यक्तियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और उक्त प्रचलन को अभिलंब रोका जाए, ताकि दूर-दराज से आने वाले गरीब मरीजों और उनके परिजनों और अभिभावकों को किसी भी तरह के धोखे या भ्रम की स्थिति का सामना न करना पड़े। इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए सदर अस्पताल गुमला के उपाधीक्षक डॉ. अनुपम किशोर ने सख्त रुख अपनाया है। *उन्होंने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया की उक्त मामला हमारे संज्ञान में आया है* मैं चिंतित हूं और नियम बेहद स्पष्ट हैं-किसी भी स्वास्थ्यकर्मी, कंपाउंडर, पैथोलॉजिस्ट या अन्य गैर-चिकित्सकीय स्टाफ को अपने वाहनों पर रेड प्लस चिह्न का उपयोग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यदि कोई ऐसा कर रहा है, तो वह पूरी तरह से गलत और अवैध है। डॉ. किशोर ने आगे कहा कि जल्द ही अस्पताल के सभी श्रेणी के स्वास्थ्य कर्मियों को आधिकारिक पत्राचार (नोटिस) जारी कर अपने निजी वाहनों से तुरंत रेड प्लस चिन्ह हटाने का निर्देश दिया जाएगा। इसके बाद भी यदि कोई कर्मचारी

उक्त आदेश का उल्लंघन करता पाया गया, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक और विभागीय कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कुछ समय पूर्व चिकित्सकों की पहचान को बिल्कुल अलग, विशिष्ट और स्पष्ट बनाने के उद्देश्य से अपने आधिकारिक प्रतीक चिह्न (लोगों) में बदलाव किया था। नए नियमों के तहत पुराने रेड प्लस के दुरुपयोग को रोकने की कवायद की गई थी। इसके बावजूद गुमला में जमीनी स्तर पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है ।

राम भक्तों के लिए

सिर्फ समृद्धि का अहसास करते रहें, जबकि…पिछले 10 साल में भारतीय परिवारों का कर्ज 40-45 लाख करोड़ से बढ़कर 136 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया

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भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी जीडीपी नहीं है। सबसे बड़ी कहानी है कर्ज। और यह कहानी इतनी खामोशी से लिखी गई कि करोड़ों लोगों को पता ही नहीं चला कि वे समृद्ध नहीं हो रहे, बल्कि धीरे-धीरे उधार पर जी रहे हैं।

पिछले 10 साल में भारतीय परिवारों का कुल कर्ज लगभग 40-45 लाख करोड़ से बढ़कर 136 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। यह सिर्फ बैंक का आंकड़ा नहीं है। यह भारत के मध्यवर्ग, लोअर मिडिल क्लास और युवापीढ़ी की मानसिक स्थिति का एक्स-रे है। यह वह पैसा है जो लोगों ने घर खरीदने, गाड़ी खरीदने, मोबाइल लेने, शादी करने, इलाज कराने और कई बार सिर्फ महीने का खर्च चलाने के लिए उधार लिया।

लेकिन सरकार और टीवी क्या दिखाते हैं? चमकते एयरपोर्ट, भरे हुए मॉल, नई एक्सप्रेस-वे, 5 ट्रिलियन इकॉनमी, विश्वगुरु, तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। कोई यह नहीं पूछता कि यह सब खरीद कौन रहा है। जवाब है- उधार लेकर जनता।

आज का आर्थिक मॉडल “आय बढ़ाओ” नहीं, बल्कि “कर्ज बढ़ाओ” है

भारत में पिछले दशक का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल “आय बढ़ाओ” नहीं, बल्कि “कर्ज बढ़ाओ” रहा है। क्योंकि अगर लोगों की कमाई नहीं बढ़ रही, नौकरियां पर्याप्त नहीं हैं, वास्तविक मजदूरी स्थिर है, तो बाजार कैसे चलेगा? तब सरकार और बैंक क्या करते हैं? लोगों को आसान लोन दो, ईएमआई दो, क्रेडिट कार्ड दो, Buy Now Pay Later दो। यानी असली समृद्धि नहीं, समृद्धि का एहसास पैदा करो।

कल्पना कीजिए। किसी परिवार की आय 25 हजार रुपये है। लेकिन वह EMI पर iPhone खरीदता है, EMI पर बाइक, EMI पर टीवी, EMI पर फ्रिज। बाहर से लगता है कि परिवार बहुत विकसित है। लेकिन भीतर हर महीने तनाव है, हर महीने ब्याज है, हर महीने कटौती है। यही आज पूरे देश के स्तर पर हो रहा है।

चमकती जीडीपी के बीच जेबों पर अंधेरों का घना साया

सबसे खतरनाक बात यह है कि जीडीपी इस दर्द को नहीं दिखाती। अगर आपने 80 हजार का फोन EMI पर खरीदा, तो जीडीपी में 80 हजार जुड़ गया। सरकार बोलेगी  “खपत बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था मजबूत है।” लेकिन आपकी जेब अगले 24 महीने तक खाली होती रहेगी। यानी जीडीपी चमकती है, परिवार कमजोर होता है।

यही कारण है कि आज भारत में एक अजीब विरोधाभास दिखता है। बाजार चमक रहे हैं, लेकिन लोग भीतर से टूट रहे हैं। मॉल भरे हैं, लेकिन बचत खाली है। UPI रिकॉर्ड बना रहा है, लेकिन लाखों लोग महीने के आखिर में उधार खोजते हैं।

सबसे डरावना आंकड़ा भारतीय परिवारों की बचत का है। 2021-22 में घरेलू वित्तीय बचत GDP की 11.5 प्रतिशत थी। 2022-23 में यह गिरकर 5.1 प्रतिशत रह गई। यानी आधे से भी कम। 50 साल में सबसे निचला स्तर। यह सामान्य बात नहीं है।

EMI संस्कृति में बदल गया भारत

भारत की संस्कृति बचत पर बनी थी। “उधार लेकर घी मत पियो” सिर्फ कहावत नहीं थी, यह आर्थिक दर्शन था। आज वही भारत EMI संस्कृति में बदल गया है।सरकार इसे “Financial Inclusion” कहती है। कहती है कि अब गरीब भी बैंकिंग सिस्टम से जुड़ गया। लेकिन सवाल यह है कि अगर कोई गरीब परिवार 30–36 प्रतिशत ब्याज पर पर्सनल लोन ले रहा है, तो यह financial inclusion है या modern exploitation?

और यह सब क्यों हो रहा है? क्योंकि असली समस्या छुपानी है। अगर रोजगार पर्याप्त नहीं हैं, निजी निवेश कमजोर है, फैक्ट्रियां पर्याप्त नहीं लग रहीं, आय नहीं बढ़ रही  तो अर्थव्यवस्था को चलाएंगे कैसे? उत्तर है कर्ज से। यानी जनता को उपभोक्ता बनाए रखो, भले वह उधार पर जी रही हो।

यह ठीक वैसा है जैसे किसी बीमार आदमी को लगातार painkiller दिया जाए। दर्द कुछ समय शांत रहेगा, बीमारी अंदर बढ़ती रहेगी। भारत की अर्थव्यवस्था में यही हो रहा है। और सबसे बड़ा खतरा अभी बाकी है। अगर नौकरियां और कमजोर हुईं, ब्याज दरें बढ़ीं, EMI टूटने लगीं, तो यही कर्ज NPA बन जाएगा। फिर बैंक संकट आएगा। फिर वही होगा जो दुनिया में कई बार हो चुका है- निजी लाभ, सार्वजनिक नुकसान।

उधार पर टिका है विकास का बड़ा हिस्सा

सबसे बड़ी विडंबना देखिए। टीवी पर बताया जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इस विकास का बड़ा हिस्सा उधार पर टिका है। यानी विकास कम, भविष्य की कमाई को आज खर्च करना ज्यादा है। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जीडीपी कितनी बढ़ी।

असली सवाल यह है कि क्या लोगों की आय बढ़ी? क्या बचत बढ़ी? क्या रोजगार सुरक्षित हुए? क्या आर्थिक स्थिरता बढ़ी? अगर जवाब “नहीं” है, तो चमकते आंकड़े सिर्फ भ्रम हैं। बहुत महंगे भ्रम। क्योंकि उधार लेकर कुछ समय तक समृद्धि दिखाई जा सकती है। लेकिन कर्ज का दर्द धीरे-धीरे पूरे समाज को खा जाता है। और जब वह दर्द फूटता है, तब टीवी स्टूडियो नहीं, आम परिवार टूटते हैं।

  • ज्ञानेंद्र अवस्थी
राम भक्तों के लिए

विस्थापित संघर्ष समिति, टीटीपीएस-ललपनिया का तीसरा सम्मेलन संपन्न

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News – Kahkashan Farooqi 

ललपनिया: विस्थापित संघर्ष समिति, गोमिया_टीटीपीएस-ललपनिया का तीसरा सम्मेलन डुमरी बिहार में संपन्न हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता विस्थापित नेता भीम महतो ने की, जबकि संचालन सहदेव महतो ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत झंडोत्तोलन के साथ हुई। सम्मेलन में नई कमेटी का गठन किया गया, जिसमें लखन महतो को अध्यक्ष, राजेंद्र प्रजापति को कार्यकारी अध्यक्ष, विनय महतो एवं सहदेव महतो को सचिव तथा कोषाध्यक्ष चुना गया।

सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सीटू के प्रदेश उपाध्यक्ष रामचंद्र ठाकुर ने कहा कि विस्थापित संघर्ष समिति, टीटीपीएस-ललपनिया का यह सम्मेलन पूर्व सचिव श्यामसुंदर महतो को हमेशा याद करेगा। उन्होंने कहा कि डुमरी बिहार से टीटीपीएस तक रेल पथ निर्माण में हुए विस्थापितों के अधिकारों के लिए समिति लगातार संघर्ष करती रही है। समिति के संघर्ष का ही परिणाम है कि दर्जनों विस्थापितों को नियोजन मिला तथा गांवों में विकास कार्य हुए हैं। उन्होंने कहा कि अब फिर से संगठन को मजबूत कर मुआवजा, नियोजन और ग्रामीण विकास जैसी लंबित मांगों के लिए संघर्ष तेज करना होगा।

विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित सीटू राज्य कमेटी सदस्य सह विस्थापित संघर्ष समिति, गोमिया के सचिव राकेश कुमार ने कहा कि पूरे क्षेत्र में विस्थापित संघर्ष समिति अपनी अलग पहचान बना रही है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन विस्थापितों के संघर्ष को नई दिशा देगा। उन्होंने उपस्थित लोगों से संघर्ष के लिए तैयार रहने का आह्वान करते हुए कहा कि उनके आंदोलन के नेतृत्व के लिए संगठन पूरी तरह तैयार है।

उन्होंने बताया कि टीटीपीएस-ललपनिया से प्रेरणा लेकर गोमिया में रेल ओवरब्रिज से प्रभावित लोगों ने भी विस्थापित संघर्ष समिति, गोमिया का गठन किया है। साथ ही कहा कि बहुत जल्द समिति टीटीपीएस प्रबंधन को मांग पत्र सौंपकर नए आंदोलन की शुरुआत करेगी। उन्होंने प्रबंधन से विस्थापितों की लंबित मांगों पर सकारात्मक पहल करने की अपील की।

सम्मेलन में नवनिर्वाचित अध्यक्ष लखन महतो, कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र प्रजापति तथा सचिव विनय महतो और सहदेव महतो ने संयुक्त रूप से कहा कि क्षेत्र के विस्थापित एकजुट हैं और अपनी मांगों को लेकर संघर्ष के लिए तैयार हैं।

इस अवसर पर अरुण प्रजापति, रीतलाल प्रजापति, बबुआ मांझी, उपेंद्र सिंह, मनोज महतो, राजेश पासवान, हरिचरण सिंह, नरेश चौधरी, बुधनी देवी, नुनी बिला देवी, रतनी देवी सहित बड़ी संख्या में विस्थापित उपस्थित थे।

राम भक्तों के लिए

मजदूर मसीहा स्व. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर कथारा में श्रद्धांजलि सभा सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी मजदूरों से नहीं टूटा नाता

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News – Kahkashan Farooqi 

गोमिया। झारखंड-बिहार के पूर्व मंत्री, इंटक के राष्ट्रीय महासचिव एवं दिग्गज मजदूर नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह की छठी पुण्यतिथि कथारा स्थित क्षेत्रीय कार्यालय सह राजेंद्र प्रसाद सिंह स्मृति भवन में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में यूनियन पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता शामिल हुए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आरसीएमयू के क्षेत्रीय अध्यक्ष अजय कुमार सिंह ने की, जबकि संचालन क्षेत्रीय सहायक सचिव विजय यादव ने किया। इस अवसर पर क्षेत्रीय अध्यक्ष अजय कुमार सिंह, उपाध्यक्ष राजेश शर्मा, चंद्रशेखर प्रसाद, क्षेत्रीय सहायक सचिव आशीष चक्रवर्ती सहित अन्य पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने स्व. राजेंद्र बाबू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पुष्पांजलि अर्पित की।
सभा को संबोधित करते हुए अजय कुमार सिंह ने कहा कि राजेंद्र बाबू ने अपना पूरा जीवन कोयला मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया। उन्होंने खदानों में कार्यरत श्रमिकों के हित में कई कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने में अहम भूमिका निभाई। उनके संघर्षों की बदौलत ही मजदूरों को सम्मान और अधिकार प्राप्त हो सके।
क्षेत्रीय उपाध्यक्ष राजेश शर्मा ने कहा कि संयुक्त बिहार एवं झारखंड में मंत्री तथा कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे राजेंद्र सिंह ने इंटक एवं राकोमसं को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। संगठन को मजबूत बनाने में उनका योगदान अविस्मरणीय है।


मोहम्मद इसराफिल अंसारी ने कहा कि स्व. राजेंद्र प्रसाद सिंह ऐसे जननेता थे, जो सभी की बातें सुनते थे और सबको साथ लेकर चलते थे। मजदूर संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अद्वितीय थी। सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद उन्होंने खुद को कभी मजदूरों और मजदूर संगठन से अलग नहीं किया। यही कारण है कि आज भी मजदूर वर्ग उन्हें अपना मसीहा मानता है।
मौके पर सुनीता सिंह, देवाशीष आस, प्रमोद यादव, राजेंद्र वर्मा, कमलकांत सिंह, रणजीत सिंह, दीपक कुमार, गोपाल राम, श्रवण चौहान, अर्जुन चौहान, सुरेश महतो, आरके सिंह, विजय कुमार नायक, शंभू कुमार, बिरजा कृष्ण, संतोष कुमार सिंह, रवि कुमार, रमाकांत सिंह, नसीम अख्तर, मोहम्मद शमी, बेणेश्वर नोनिया, राजकुमार राय सहित बड़ी संख्या में यूनियन पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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अनिमेश रंजन ने उप विकास आयुक्त-सह-मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, गुमला के पद पर किया पदभार ग्रहण

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गुमला (ब्यूरो प्रमुख ) – गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला जिला के उप विकास आयुक्त अपने पदभार ग्रहण किया – भारतीय प्रशासनिक सेवा (झारखंड संवर्ग-2021) के अधिकारी अनिमेश रंजन ने आज उप विकास आयुक्त-सह-मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, गुमला के पद पर पदभार ग्रहण किया।
पदभार ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने उपायुक्त गुमला दिलेश्वर महत्तो से शिष्टाचार मुलाकात की। इस अवसर पर उपायुक्त ने उन्हें नई जिम्मेदारी हेतु शुभकामनाएं देते हुए जनहित एवं विकासात्मक कार्यों के सफल क्रियान्वयन के लिए शुभेच्छा व्यक्त की।
उपायुक्त ने कहा कि जिला प्रशासन की टीम भावना एवं समन्वय के साथ कार्य करते हुए जिले के विकास को नई गति प्रदान की जाएगी। वहीं अनिमेश रंजन ने भी जिले के समग्र विकास एवं जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु प्रतिबद्धता व्यक्त की।

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पुलिस से बचने के क्रम में गौ तस्करों की स्कॉर्पियो पलटी, दो गोवंश घायल

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गुमला (ब्यूरो प्रमुख ) – गणपत लाल चौरसिया

स्कार्पियो में सवार गौ तस्कर अंधेरे और जंगली क्षेत्रों का लाभ उठाते हुए भागने में सफल रहें

गुमला: – गुमला जिला अर्न्तगत स्थित बसिया थाना क्षेत्र के लोंगा ग्राम में पुलिस गश्ती दल को देखकर भाग रहे कथित गौ तस्करों की स्कॉर्पियो अनियंत्रित होकर पलट गई, और उक्त स्कार्पियो में सवार गौ तस्कर अंधेरे और जंगली क्षेत्रो का फायदा उठाते हुए, भागने में सफल रहें, वही उक्त दुर्घटनाग्रस्त वाहन में ठूंस ठूंसकर ले जा रहे चार गोवंशों में से दो गंभीर रूप से घायल हो गए, बसिया थाना पुलिस के अनुसार, बसिया थाना पुलिस अपनी नियमित गस्ती पर थी। इसी क्रम में पुलिस को एक संदिग्ध काले रंग की स्कॉर्पियो वाहन (JH-01AK-9282) दिखाई दी, जो एकाएक पुलिस वाहन को देखते ही उक्त स्कार्पियो वाहन के चालक ने अपने वाहन को तेज रफ्तार से भगानी शुरू कर दी, जिससे पुलिस को संदेह हुआ, तब बसिया थाना की गस्ती पुलिस टीम ने उक्त स्कार्पियों का पीछा करने लगी, इसी क्रम में उक्त तेज रफ्तार स्कॉर्पियो वाहन काफी तेज रफ्तार से काफी आगे निकल गई,और आगे जाकर, लोंगा ग्राम के समझ उक्त तेज रफ्तार अनियंत्रित स्कॉर्पियो वाहन पलट गया, और बसिया पुलिस जब तक दुर्घटना स्थल पहुंची, तब तक उक्त वाहन में सवार गौ तस्कर अंधेरे और सुनसान जंगली क्षेत्रों का फायदा उठाकर भागने में सफल रहें।
बाद में पुलिस ने उक्त दुर्घटनाग्रस्त स्कार्पियो की तलाशी ली, तो उसमें चार गोवंश बरामद हुए, जिसमें से दो गोवंश गंभीर रूप से घायल पायें गए, जिसका इलाज कराया गया और बसिया थाना पुलिस ने त्वरित कारवाही करते हुए उक्त स्कॉर्पियो और सभी गोवंशों को अपने कब्जे में लेकर बसिया थाना ले आई ।
इस सम्बन्ध में बसिया थाना प्रभारी कृष्णा कुमार ने बताया कि उक्त गौ तस्करी मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और फरार आरोपियों की पहचान कर गिरफ्तारी के लिए संबंधित स्थानों पर छापेमारी की जा रही है।

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सावधान खबरदार गुमला जिला में साइबर अपराधियों का बोलबाला

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गुमला (ब्यूरो प्रमुख ) – गणपत लाल चौरसिया

गुमला : – गुमला जिला के विभिन्न क्षेत्रों में RTO CHHALAN APK के नाम पर व्हाट्सएप पर अगर आपको भी मैसेज आ रहे है तो सावधान हो जाए। विगत तीन दिनों में भरनो और करंज थाना क्षेत्र के कई लोग शिकार हो चुके हैं। सरकार अपने तंत्र से लाख जागरूक करने की कोशिश कर रही है, परंतु लोग साइबर क्राइम की शिकार होने से नहीं बच रहे हैं। ताजा मामला डूडीया के संजय प्रामाणिक, पहाड़ बंगरू के महेंद्र सिंह, डोम्बा के राजकुमार साहू और भरनो के रोहित सारंगी के साथ घटी है इनके मोबाइल पर RTO CHHALAN APK के नाम पर एक एप्लिकेशन आया जिसे इनलोगों के द्वारा जैसे ही टच किया गया पूरा मोबाइल कंट्रोल साइबर अपराधियों के पास पहुंच गया। सिम कार्ड को सस्पेंड कर व्हाट्सएप कौन हैक कर लिया गया फिर संजय और महेंद्र से जुड़े सभी संपर्क लोगों से पैसों की डिमांड मैसेज भेजकर करने लगे कुछ लोग तो पैसे भी डाल दिए और कुछ लोग स्थिति को समझ के पैसा नहीं डाले। दूसरे दिन काफी मसक्कत के बाद सिम कार्ड फिर से एक्टिव कराकर व्हाट्सएप्प रिकवर किया गया। जबकि राजकुमार और रोहित का हैक होते होते बच गया समय रहते उन्होंने एंटीवायरस की मदद से अपना मोबाइल ठीक कर लिया। अब आपलोग भी रहें सतर्क एवं सावधान।

राम भक्तों के लिए

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को यूपीए सरकार के ‘ऑयल बॉन्ड’ को राजनीतिक ढाल बनाकर मौजूूूदा सरकार बचना चाहती है…जानिए सच्चाई…!

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जब भी देश में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर बहस छिड़ती है, तो सत्ता समर्थक या आईटी सेल तुरंत एक घिसा-पिटा तर्क लेकर आ जाते हैं-अरे भाई, मोदी सरकार तो मजबूर है, वह पिछली यूपीए (UPA) सरकार द्वारा लिए गए ‘ऑयल बॉन्ड’ (Oil Bonds) का कर्ज और उसका ब्याज चुका रही है, इसलिए तेल महंगा बेचना पड़ रहा है।

यह आधा सच और पूरा झूठ सोशल मीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग में इस कदर भर दिया गया है कि लोग इसे ही अंतिम सच मान बैठे हैं। आइए, आज इस ‘ऑयल बॉन्ड’ के पूरे सच को सरकारी आंकड़ों और साधारण गणित के जरिए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।

आखिर ‘ऑयल बॉन्ड’ क्या बला है?

साल 2014 से पहले, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही थीं (लगभग $100 से $140 प्रति बैरल तक), तब केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के सामने दो रास्ते थे- या तो वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों के हिसाब से भारत में पेट्रोल ₹110-₹120 लीटर कर देते, जिससे देश में भयानक महंगाई बढ़ जाती और गरीब-मध्यम वर्ग पूरी तरह तबाह हो जाता। या फिर सरकार तेल का दाम नियंत्रित रखती और कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई खुद करती।

सरकार ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने तेल कंपनियों से कहा कि आप जनता को सस्ता तेल बेचिए (तब पेट्रोल ₹60 से ₹70 के बीच था)। इस सस्ते तेल के कारण कंपनियों को जो घाटा हुआ, उसकी भरपाई के लिए सरकार ने कंपनियों को नकद पैसा देने के बजाय प्रॉमिसरी नोट्स’ यानी ‘ऑयल बॉन्ड जारी कर दिए। इसका सीधा मतलब था कि सरकार इन कंपनियों को यह कर्ज एक तय समय (10-15 साल) के बाद ब्याज समेत चुकाएगी।

यूपीए सरकार कितना कर्ज छोड़ कर गई थी ?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को कुल ₹1.34 लाख करोड़ ($1.34 Lakh Crore) के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे। यह वह मूलधन (Principal Amount) था जिसे आने वाली सरकारों को 2026 तक अलग-अलग किश्तों में ब्याज समेत चुकाना था। ब्याज मिलाकर यह राशि लगभग ₹2 से ₹2.5 लाख करोड़ के आसपास बैठती है।

तेल का असली खेल

अब देखिए असली खेल: मोदी सरकार ने टैक्स से कितना कमाया? अब आते हैं उस बड़े झूठ पर, जिसमें कहा जाता है कि इस कर्ज के कारण देश का खजाना खाली हो गया और तेल महंगा करना पड़ा।

रिकॉर्ड तोड़ टैक्स वसूली-पिछले 10 से 12 वर्षों में मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर ‘एक्साइज ड्यूटी’ (केंद्रीय उत्पाद शुल्क) और उपकर (Cess) लगा-लगाकर जनता की जेब से ₹35 लाख करोड़ (₹35,00,000 Crore) से ज्यादा की वसूली की है। तुलना करके देखिए (आमने-सामने का गणित)

चुकाना था कुल कर्ज (ब्याज समेत) लगभग ₹2.5 लाख करोड़, जनता से टैक्स वसूला- ₹35 लाख करोड़ से ज्यादा! यह बिल्कुल वैसा ही है कि किसी व्यक्ति को अपनी दुकान चलाने के लिए ₹250 का पुराना कर्ज चुकाना हो, और वह उस ₹250 के कर्ज का बहाना बनाकर अपने ग्राहकों से ₹3,500 की एक्स्ट्रा वसूली कर ले और रोना रोए कि मैं तो कर्ज में दबा हूँ!

ऑयल बॉन्ड का कर्ज तो कुछ ही महीनों में वसूल हो गया !

अगर सरकार चाहती, तो ऑयल बॉन्ड का पूरा का पूरा ₹1.34 लाख करोड़ का मूलधन सिर्फ 4 से 5 महीनों की टैक्स वसूली से साफ कर सकती थी। सरकार को हर साल तेल पर टैक्स से इतनी बंपर कमाई होती है कि ऑयल बॉन्ड की सालाना किश्त और ब्याज चुकाना उनके कुल राजस्व 1 प्रतिशत भी नहीं है।

लेकिन, पिछले कई सालों से इस ₹1.34 लाख करोड़ के आंकड़े को टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया पर इस तरह पेश किया जाता है जैसे मानो इसी कर्ज की वजह से देश की अर्थव्यवस्था चल रही है।

कोरोना काल का मुनाफा कहाँ गया?

साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान जब दुनिया भर में लॉकडाउन लगा, तब कच्चे तेल की कीमतें इतिहास में सबसे निचले स्तर ($20 प्रति बैरल से भी नीचे) पर आ गई थीं। तब सरकार चाहती तो देश की जनता को ₹35-₹40 लीटर पेट्रोल दे सकती थी, जिससे लॉकडाउन की मार झेल रही जनता को बड़ी राहत मिलती। लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटी कीमतों का फायदा जनता को देने के बजाय पेट्रोल पर ₹13 और डीजल पर ₹16 प्रति लीटर टैक्स बढ़ा दिया। उस अकेले दौर में सरकार ने जो लाखों करोड़ रुपये कमाए, क्या वह ऑयल बॉन्ड का कर्ज चुकाने के लिए काफी नहीं थे?

दरअसल, ऑयल बॉन्ड’ सिर्फ एक राजनीतिक ढाल है. साफ है कि ऑयल बॉन्ड कोई ऐसा वित्तीय बोझ नहीं था जिसे चुकाने में सरकार के पसीने छूट जाएं। यह मौजूदा सरकार के लिए केवल एक राजनीतिक ढाल’ है।

जब भी जनता महंगाई, टैक्स की मार और ₹110 लीटर के पेट्रोल पर सवाल उठाती है, सरकार इस ढाल को आगे कर देती है ताकि जनता का ध्यान असल आर्थिक नीतियों और सरकारी तेल कंपनियों के ₹77,280 करोड़ के अंधे मुनाफे से भटक जाए। अगली बार जब कोई आपके सामने ‘ऑयल बॉन्ड’ का रोना रोए, तो उसे ₹35 लाख करोड़ बनाम ₹2.5 लाख करोड़ का यह सीधा गणित जरूर थमा दीजिएगा।

  • अशोक झा

 

राम भक्तों के लिए

सियासत में गालीबाज़ी और व्यक्तिगत हमलों का कल्चर सबसे ज्यादा मोदी की राजनीति में मजबूत हुआ

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इस समय पूरे उत्तर प्रदेश और खासकर बनारस की राजनीति में सबसे बड़ा ड्रामा एक कथित एआई वीडियो को लेकर खड़ा किया गया है। कहा जा रहा है कि अजय राय जी ने नरेंद्र मोदी को अपमानजनक शब्द कहे। लेकिन सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि खुद अजय राय साफ कह चुके हैं कि यह वीडियो एआई से बनाया गया है और उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया।

इसके बावजूद भाजपा की पूरी आईटी सेल, ट्रोल गैंग और टीवी डिबेट ब्रिगेड अचानक ऐसे एक्ट कर रही है जैसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला हो गया हो। सवाल यह है कि आखिर एक कथित वीडियो से इतनी घबराहट क्यों है। जवाब सीधा है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बनारस की जनता ने पहली बार सत्ता के सबसे बड़े चेहरे को खुली चुनौती दी थी।

10 राउंड तक पीछे रहने की खबरों ने उस अजेय छवि को हिला दिया था जिसे वर्षों से प्रचार की मशीनें चमका रही थीं। बाद में मामूली अंतर से जीत मिली और फिर घड़ियाली आंसुओं का पूरा भावनात्मक नाटक देश ने देखा। जनता आज भी उस चुनाव को लेकर सवाल पूछ रही है और यही बेचैनी सत्ता को डरा रही है।‎

अगर यही तर्क दिया जा रहा है कि मोदी ने अजय राय की तबीयत खराब होने पर “गेट वेल सून” का मेसेज भेजा था इसलिए विपक्ष को मर्यादा रखनी चाहिए, तो फिर इतिहास का पूरा सच भी सुनना पड़ेगा।

स्व. राजीव गांधी जी ने अटल बिहारी वाजपेयी का इलाज करवाया था। उस दौर में राजनीतिक मतभेद के बावजूद इंसानियत बची हुई थी। लेकिन बाद में उसी राजीव गांधी जी को भाजपा नेताओं ने “भ्रष्टाचारी नंबर 1” तक कह दिया। यानी जब संवेदना दिखानी हो तब इंसानियत याद आती है और जब चुनाव जीतना हो तब मृत नेताओं तक को नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नैतिकता है।‎

भाजपा समर्थक आज गालीबाज़ी पर लंबा प्रवचन दे रहे हैं लेकिन देश ने पिछले 10 साल में राजनीति की भाषा को सबसे ज्यादा जहरीला होते भी देखा है।

21 सितंबर 2023 को लोकसभा में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने दानिश अली के खिलाफ जिस तरह की सांप्रदायिक और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने संसद की गरिमा को शर्मसार कर दिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सदन में खेद जताना पड़ा। लेकिन तब भाजपा की नैतिकता छुट्टी पर चली गई थी। उसी भाजपा के लोग आज एक कथित एआई वीडियो पर लोकतंत्र खतरे में बता रहे हैं।

सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने राहुल गांधी को “देश का नंबर 1 आतंकवादी” कह दिया। यह बयान किसी सड़कछाप ट्रोल ने नहीं बल्कि देश के मंत्री ने दिया था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पूरे देश में विरोध किया लेकिन भाजपा नेतृत्व ने तब कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की। इसी तरह साध्वी निरंजन ज्योति ने 1 दिसंबर 2014 को दिल्ली की रैली में “रामजादे” वाला बयान दिया।

प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने राहुल गांधी को “विदेशी महिला का पुत्र” कहा। अनुराग ठाकुर ने संसद में राहुल गांधी की जाति पर तंज कसा। कंगना रनौत ने उन्हें “टपोरी” कहा। भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल, राहुल गांधी की जाति और गांधी परिवार की निजी जिंदगी तक को निशाना बनाया। लेकिन जब विपक्ष सवाल पूछे तो अचानक भाजपा को संस्कृति और सभ्यता याद आने लगती है।‎

➤ संसद में विपक्ष को गालियां दी गईं

➤ गांधी परिवार पर निजी हमले हुए

➤ महिलाओं तक पर अमर्यादित टिप्पणियां हुईं

➤ मृत नेताओं को भी नहीं छोड़ा गया

➤ फिर भाजपा खुद को संस्कारी बताती रही

 सच्चाई यह है कि सियासत में गालीबाज़ी और व्यक्तिगत हमलों का कल्चर सबसे ज्यादा मोदी की राजनीति में मजबूत हुआ। मोदी ने चुनावी मंचों से लेकर संसद तक ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे सभ्य समाज में बोलना भी शर्मनाक माना जाता है। “जर्सी गाय”, “हाइब्रिड बछड़ा”, “पप्पू”, “शहजादा”, “नीच”, “भ्रष्टाचारी नंबर 1” जैसे शब्दों को राजनीतिक हथियार बनाया गया। भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया को गालीबाज़ी का अड्डा बना दिया। पत्रकारों, महिलाओं, छात्रों, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को अपमानित किया गया। लोकतांत्रिक बहस की जगह ट्रोलिंग और नफरत ने ले ली।

अगर भाजपा के लिए सच में गालीबाज़ी मुद्दा होती तो कपिल मिश्रा जैसे लोग आज सत्ता में मंत्री नहीं होते। वही कपिल मिश्रा जिन्होंने कभी मोदी और मानसी सोनी को लेकर निजी किस्से और आरोप फैलाए थे। लेकिन आज वही भाजपा सरकार में मंत्री हैं। इससे साफ दिखता है कि भाजपा के लिए भाषा नहीं बल्कि राजनीतिक फायदा मायने रखता है। जब उनका आदमी बोले तो रणनीति और जब विपक्ष बोले तो राष्ट्रद्रोह। यही भाजपा की असली राजनीति है।‎

 लेकिन इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक पक्ष वह है जिसे दबाने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में दलित बेटी के साथ गैंगरेप की घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। जनता सवाल पूछ रही थी कि बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार में दलित बेटियां आखिर कब सुरक्षित होंगी। लोग सरंगी बाबा और सत्ता संरक्षण की चर्चा कर रहे थे। तभी अचानक एआई वीडियो का तूफान खड़ा कर दिया गया। सोशल मीडिया पर पूरा नैरेटिव बदल दिया गया। ऐसा लगा जैसे किसी स्क्रिप्ट के तहत जनता का ध्यान असली मुद्दे से हटाया जा रहा हो। लेकिन अब जनता समझदार हो चुकी है। उसे पता है कि जब भी सरकार घिरती है तब कोई नया तमाशा खड़ा कर दिया जाता है

बनारस की जनता आज महंगाई, बेरोजगारी, टूटी सड़कें, गंगा किनारे की बदहाली और स्थानीय व्यापारियों की परेशानी से परेशान है। 2024 के चुनाव में पहली बार लोगों ने खुलकर सवाल पूछे। यही कारण है कि चुनाव इतना कड़ा हुआ। बनारस की गलियों में आज भी चर्चा होती है कि आखिर 10 राउंड तक पीछे रहने के बाद अचानक तस्वीर कैसे बदली। जनता के भीतर यह बेचैनी अभी खत्म नहीं हुई है। शायद यही कारण है कि एक वायरल एआई वीडियो ने सत्ता के गलियारों में इतनी बेचैनी पैदा कर दी। क्योंकि उन्हें पता है कि बनारस अब सिर्फ पोस्टर और प्रचार से नहीं चलने वाला।‎

➔ राजीव गांधी का अपमान किया गया

➔ नेहरू जी की विरासत पर तंज कसे गए

➔ राहुल गांधी को आतंकवादी तक कहा गया

➔ विपक्ष को राष्ट्रविरोधी बताया गया

➔ फिर भाजपा नैतिकता का भाषण देती रही

इसके बावजूद यह भी सच है कि अजय राय जी को मोदी के स्तर पर नहीं उतरना चाहिए। विपक्ष की ताकत उसकी भाषा, संयम और लोकतांत्रिक संस्कृति में दिखनी चाहिए। अगर भाजपा गटरछाप भाषा का इस्तेमाल करती है तो विपक्ष को उससे ऊपर खड़ा होना चाहिए। जनता फर्क देखना चाहती है। लेकिन भाजपा समर्थकों को भी आईना देखना होगा। जो लोग आज गालीबाज़ी पर मगरमच्छी आंसू बहा रहे हैं, उन्हें पहले अपने नेताओं के पुराने भाषण सुनने चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता और जनता की नाराजगी को एआई वीडियो कहकर दबाया नहीं जा सकता।‎

प्रधानमंत्री का पद केवल सत्ता का पद नहीं बल्कि देश के लिए उदाहरण बनने का पद होता है। अगर सच में राजनीति की भाषा सुधारनी है तो इसकी शुरुआत सबसे ऊपर से होनी चाहिए। मोदी को काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर यह संकल्प लेना चाहिए कि अब आगे की राजनीति गाली, नफरत और व्यक्तिगत हमलों पर नहीं चलेगी। क्योंकि जब देश का प्रधानमंत्री ही जहरीली भाषा बोलेगा तो उसके समर्थक भी वही सीखेंगे। देश को नफरत नहीं बल्कि रोजगार, न्याय, सुरक्षा और इंसाफ की राजनीति चाहिए। बनारस की जनता अब यह बात खुलकर कह रही है और शायद यही बात सत्ता को सबसे ज्यादा डरा रही है।

राम भक्तों के लिए
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