इस समय पूरे उत्तर प्रदेश और खासकर बनारस की राजनीति में सबसे बड़ा ड्रामा एक कथित एआई वीडियो को लेकर खड़ा किया गया है। कहा जा रहा है कि अजय राय जी ने नरेंद्र मोदी को अपमानजनक शब्द कहे। लेकिन सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि खुद अजय राय साफ कह चुके हैं कि यह वीडियो एआई से बनाया गया है और उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया।
इसके बावजूद भाजपा की पूरी आईटी सेल, ट्रोल गैंग और टीवी डिबेट ब्रिगेड अचानक ऐसे एक्ट कर रही है जैसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला हो गया हो। सवाल यह है कि आखिर एक कथित वीडियो से इतनी घबराहट क्यों है। जवाब सीधा है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बनारस की जनता ने पहली बार सत्ता के सबसे बड़े चेहरे को खुली चुनौती दी थी।
10 राउंड तक पीछे रहने की खबरों ने उस अजेय छवि को हिला दिया था जिसे वर्षों से प्रचार की मशीनें चमका रही थीं। बाद में मामूली अंतर से जीत मिली और फिर घड़ियाली आंसुओं का पूरा भावनात्मक नाटक देश ने देखा। जनता आज भी उस चुनाव को लेकर सवाल पूछ रही है और यही बेचैनी सत्ता को डरा रही है।
अगर यही तर्क दिया जा रहा है कि मोदी ने अजय राय की तबीयत खराब होने पर “गेट वेल सून” का मेसेज भेजा था इसलिए विपक्ष को मर्यादा रखनी चाहिए, तो फिर इतिहास का पूरा सच भी सुनना पड़ेगा।
स्व. राजीव गांधी जी ने अटल बिहारी वाजपेयी का इलाज करवाया था। उस दौर में राजनीतिक मतभेद के बावजूद इंसानियत बची हुई थी। लेकिन बाद में उसी राजीव गांधी जी को भाजपा नेताओं ने “भ्रष्टाचारी नंबर 1” तक कह दिया। यानी जब संवेदना दिखानी हो तब इंसानियत याद आती है और जब चुनाव जीतना हो तब मृत नेताओं तक को नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नैतिकता है।
भाजपा समर्थक आज गालीबाज़ी पर लंबा प्रवचन दे रहे हैं लेकिन देश ने पिछले 10 साल में राजनीति की भाषा को सबसे ज्यादा जहरीला होते भी देखा है।
21 सितंबर 2023 को लोकसभा में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने दानिश अली के खिलाफ जिस तरह की सांप्रदायिक और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने संसद की गरिमा को शर्मसार कर दिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सदन में खेद जताना पड़ा। लेकिन तब भाजपा की नैतिकता छुट्टी पर चली गई थी। उसी भाजपा के लोग आज एक कथित एआई वीडियो पर लोकतंत्र खतरे में बता रहे हैं।
सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने राहुल गांधी को “देश का नंबर 1 आतंकवादी” कह दिया। यह बयान किसी सड़कछाप ट्रोल ने नहीं बल्कि देश के मंत्री ने दिया था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पूरे देश में विरोध किया लेकिन भाजपा नेतृत्व ने तब कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की। इसी तरह साध्वी निरंजन ज्योति ने 1 दिसंबर 2014 को दिल्ली की रैली में “रामजादे” वाला बयान दिया।
प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने राहुल गांधी को “विदेशी महिला का पुत्र” कहा। अनुराग ठाकुर ने संसद में राहुल गांधी की जाति पर तंज कसा। कंगना रनौत ने उन्हें “टपोरी” कहा। भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल, राहुल गांधी की जाति और गांधी परिवार की निजी जिंदगी तक को निशाना बनाया। लेकिन जब विपक्ष सवाल पूछे तो अचानक भाजपा को संस्कृति और सभ्यता याद आने लगती है।
➤ संसद में विपक्ष को गालियां दी गईं
➤ गांधी परिवार पर निजी हमले हुए
➤ महिलाओं तक पर अमर्यादित टिप्पणियां हुईं
➤ मृत नेताओं को भी नहीं छोड़ा गया
➤ फिर भाजपा खुद को संस्कारी बताती रही
सच्चाई यह है कि सियासत में गालीबाज़ी और व्यक्तिगत हमलों का कल्चर सबसे ज्यादा मोदी की राजनीति में मजबूत हुआ। मोदी ने चुनावी मंचों से लेकर संसद तक ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे सभ्य समाज में बोलना भी शर्मनाक माना जाता है। “जर्सी गाय”, “हाइब्रिड बछड़ा”, “पप्पू”, “शहजादा”, “नीच”, “भ्रष्टाचारी नंबर 1” जैसे शब्दों को राजनीतिक हथियार बनाया गया। भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया को गालीबाज़ी का अड्डा बना दिया। पत्रकारों, महिलाओं, छात्रों, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को अपमानित किया गया। लोकतांत्रिक बहस की जगह ट्रोलिंग और नफरत ने ले ली।
अगर भाजपा के लिए सच में गालीबाज़ी मुद्दा होती तो कपिल मिश्रा जैसे लोग आज सत्ता में मंत्री नहीं होते। वही कपिल मिश्रा जिन्होंने कभी मोदी और मानसी सोनी को लेकर निजी किस्से और आरोप फैलाए थे। लेकिन आज वही भाजपा सरकार में मंत्री हैं। इससे साफ दिखता है कि भाजपा के लिए भाषा नहीं बल्कि राजनीतिक फायदा मायने रखता है। जब उनका आदमी बोले तो रणनीति और जब विपक्ष बोले तो राष्ट्रद्रोह। यही भाजपा की असली राजनीति है।
लेकिन इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक पक्ष वह है जिसे दबाने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में दलित बेटी के साथ गैंगरेप की घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। जनता सवाल पूछ रही थी कि बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार में दलित बेटियां आखिर कब सुरक्षित होंगी। लोग सरंगी बाबा और सत्ता संरक्षण की चर्चा कर रहे थे। तभी अचानक एआई वीडियो का तूफान खड़ा कर दिया गया। सोशल मीडिया पर पूरा नैरेटिव बदल दिया गया। ऐसा लगा जैसे किसी स्क्रिप्ट के तहत जनता का ध्यान असली मुद्दे से हटाया जा रहा हो। लेकिन अब जनता समझदार हो चुकी है। उसे पता है कि जब भी सरकार घिरती है तब कोई नया तमाशा खड़ा कर दिया जाता है
बनारस की जनता आज महंगाई, बेरोजगारी, टूटी सड़कें, गंगा किनारे की बदहाली और स्थानीय व्यापारियों की परेशानी से परेशान है। 2024 के चुनाव में पहली बार लोगों ने खुलकर सवाल पूछे। यही कारण है कि चुनाव इतना कड़ा हुआ। बनारस की गलियों में आज भी चर्चा होती है कि आखिर 10 राउंड तक पीछे रहने के बाद अचानक तस्वीर कैसे बदली। जनता के भीतर यह बेचैनी अभी खत्म नहीं हुई है। शायद यही कारण है कि एक वायरल एआई वीडियो ने सत्ता के गलियारों में इतनी बेचैनी पैदा कर दी। क्योंकि उन्हें पता है कि बनारस अब सिर्फ पोस्टर और प्रचार से नहीं चलने वाला।
➔ राजीव गांधी का अपमान किया गया
➔ नेहरू जी की विरासत पर तंज कसे गए
➔ राहुल गांधी को आतंकवादी तक कहा गया
➔ विपक्ष को राष्ट्रविरोधी बताया गया
➔ फिर भाजपा नैतिकता का भाषण देती रही
इसके बावजूद यह भी सच है कि अजय राय जी को मोदी के स्तर पर नहीं उतरना चाहिए। विपक्ष की ताकत उसकी भाषा, संयम और लोकतांत्रिक संस्कृति में दिखनी चाहिए। अगर भाजपा गटरछाप भाषा का इस्तेमाल करती है तो विपक्ष को उससे ऊपर खड़ा होना चाहिए। जनता फर्क देखना चाहती है। लेकिन भाजपा समर्थकों को भी आईना देखना होगा। जो लोग आज गालीबाज़ी पर मगरमच्छी आंसू बहा रहे हैं, उन्हें पहले अपने नेताओं के पुराने भाषण सुनने चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता और जनता की नाराजगी को एआई वीडियो कहकर दबाया नहीं जा सकता।
प्रधानमंत्री का पद केवल सत्ता का पद नहीं बल्कि देश के लिए उदाहरण बनने का पद होता है। अगर सच में राजनीति की भाषा सुधारनी है तो इसकी शुरुआत सबसे ऊपर से होनी चाहिए। मोदी को काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर यह संकल्प लेना चाहिए कि अब आगे की राजनीति गाली, नफरत और व्यक्तिगत हमलों पर नहीं चलेगी। क्योंकि जब देश का प्रधानमंत्री ही जहरीली भाषा बोलेगा तो उसके समर्थक भी वही सीखेंगे। देश को नफरत नहीं बल्कि रोजगार, न्याय, सुरक्षा और इंसाफ की राजनीति चाहिए। बनारस की जनता अब यह बात खुलकर कह रही है और शायद यही बात सत्ता को सबसे ज्यादा डरा रही है।
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