31.5 C
Ranchi
Tuesday, July 14, 2026
Advertisement
HomeNationalझारखंड में राधा बाबू की बेचैनी का मौसम आखिर क्या कहता है?

झारखंड में राधा बाबू की बेचैनी का मौसम आखिर क्या कहता है?

-शंभु नाथ चौधरी-

राधाकृष्ण किशोर। झारखंड के वित्त, योजना एवं विकास, वाणिज्य-कर तथा संसदीय कार्य मंत्री। इन दिनों वे एक अजीब-सी कश्मकश से गुजरते दिखाई देते हैं। भीतर जैसे कोई बेचैनी है, जो बार-बार सतह पर आना चाहती है, लेकिन हर बार वे उसे अनुभव और संयम की परतों से ढंक देते हैं।

चेहरे पर सामान्य दिनों जैसी सहजता बनाए रखने की कोशिश दिखती है, मगर उनके शब्दों में उभर आई हल्की-सी खरोंच यह एहसास करा देती है कि कहीं कुछ चुभा जरूर है। राजनीति में जब चुभन भीतर तक उतर जाती है, तो राधाकृष्ण किशोर जैसे अनुभवी नेता बहुत शोर नहीं मचाते, संकेत छोड़ते हैं।

कभी किसी चिट्ठी के जरिए, कभी किसी शेर के बहाने, कभी फेसबुक की कुछ पंक्तियों में और कभी किसी अहम सरकारी कार्यक्रम से गैरहाजिर रहकर।

राधा बाबू का हाल का राजनीतिक व्यवहार इन्हीं संकेतों की एक लंबी श्रृंखला है। वे उन नेताओं में नहीं रहे, जिनकी राजनीति माइक पर पलती हो। उनकी आवाजें विधानसभा में ज्यादा गूंजी हैं, टीवी स्टूडियो में कम। पढ़ने वाले आदमी हैं। बोलते हैं तो वाक्य पूरे करते हैं। सुनते हैं तो सामने वाले की बात खत्म होने देते हैं। इस तेज़ और अधीर समय में यह भी एक अलग किस्म की राजनीति है।

राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक जीवन कभी सीधी सड़क नहीं रहा

लेकिन आदमी सिर्फ अपने गुणों से नहीं बनता, अपने विरोधाभासों से भी बनता है। राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक जीवन सीधी सड़क नहीं रहा। कांग्रेस से निकले। दूसरे पड़ाव आए। फिर कांग्रेस लौटे। जैसे कोई नदी कई घाटों को छूकर फिर उसी मिट्टी में लौट आए, जहां से निकली थी। लेकिन लौटने वाली नदी भी वैसी नहीं रहती। उसमें रास्ते की धूल भी होती है और अनुभव की गहराई भी।

शायद इसलिए राधा बाबू कभी पूरी तरह किसी खांचे में फिट नहीं हुए। दल में रहे, लेकिन दल के भीतर भी अपनी अलग आवाज बनाए रखी। सत्ता में रहे, मगर सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी अपने पास रखा। यही उनकी ताकत भी रही और यही उनकी असुविधा भी।

पिछले एकाध महीने के दौरान उनकी बेचैनी मानो शब्दों की तलाश करती दिख रही है। पहले उन्होंने सुरक्षा काफिले में एक अतिरिक्त वाहन की मांग को लेकर डीजीपी को पत्र लिखा। जवाब नहीं मिला, तो दूसरा पत्र भेजा। उसमें चुप्पी पर सवाल थे और व्यवस्था के रवैये पर भी। अब तीसरा पत्र लिखा है।

इस बार स्वर और मुखर है। बात सिर्फ एक अतिरिक्त वाहन तक सीमित नहीं रही। राज्य की पुलिस व्यवस्था, पीसीआर और पेट्रोलिंग टीमों की सुरक्षा, रसूखदार लोगों को मिली सुरक्षा और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल हैं। आखिर में डीजीपी को एक सीधी नसीहत भी- हठधर्मिता छोड़िए। यह वाक्य सिर्फ डीजीपी से कहा गया है या व्यवस्था से?

पिछले दिनों दिल्ली का एक सरकारी जलसा था, जहां झारखंड के भविष्य का एक नया नक्शा बनने का दावा किया जा रहा था। राधा बाबू भी उन्हीं दिनों दिल्ली में थे, लेकिन उस तस्वीर का हिस्सा नहीं थे। किसी ने उनकी गैरहाजिरी का सबब पूछा तो उन्होंने बस इतना कहा, ‘मुझे निमंत्रण नहीं मिला।’

राजनीति में कई बार अनुपस्थिति भी एक बयान होती है

इसके बाद सवालों ने अपने-अपने जवाब गढ़ने शुरू कर दिए। क्या यह सत्ता के गलियारों में बढ़ती दूरियों का एक मौन संकेत था? या फिर एक वरिष्ठ मंत्री की अपनी चुप नाराजगी? इसका उत्तर न सरकार ने दिया, न राधा बाबू ने। लेकिन राजनीति में कई बार अनुपस्थिति भी एक बयान होती है, और खामोशी…सबसे लंबा संवाद।

यूं लगता है कि राधा बाबू के भीतर कोई ऐसा संवाद लगातार चल रहा है, जिसे वे सीधे शब्दों में कहने से बच रहे हैं। शायद यही वजह है कि इन दिनों वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए रूपकों और प्रतीकों का सहारा ले रहे हैं।

कुछ दिन पहले उन्होंने लिखा था, ‘आसमान अनंत है। आसमान किसी सांसारिक या भौतिक पद पर टिका नहीं है। मानव शरीर नश्वर है, लेकिन उसके अच्छे कृत्य आसमान में चमकते रहते हैं। मैं सूरज पर मकान बनाकर छाया तलाशने वालों में से नहीं हूं।’

और अब बारिश के मौसम में उन्होंने अपने भाव फेसबुक पर इन शब्दों में उकेरे ‘इन बारिशों से इतनी दोस्ती अच्छी नहीं, कच्चा तेरा मकान है…’ ऐसे बिंब मन की उस खिड़की की तरह होते हैं, जहां से भीतर का कंपन बिना शोर किए बाहर आ जाता है।

राजनीति अर्थ से कम और अर्थ निकालने वालों से ज़्यादा चलती है

ऐसी पंक्तियों का पूरा-पूरा अर्थ तो राधा बाबू ही जानते होंगे। लेकिन राजनीति अर्थ से कम और अर्थ निकालने वालों से ज़्यादा चलती है। इसलिए उनके ऐसे हर सोशल मीडिया पोस्ट के बाद चर्चा शुरू हो जाती है। उनकी हर चिट्ठी के बाद अटकलें जन्म ले रही हैं और हर ख़ामोशी के बाद सवाल उठ रहे हैं।

राधाकृष्ण किशोर सरकार के सिस्टम से नाराज दिखते हैं, लेकिन नाराजगी का इजहार करते हुए सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री के प्रति जुबां से कोई तल्ख लफ्ज बाहर नहीं आने देते।

वे बार-बार नौकरशाही की तरफ उंगली उठाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में नौकरशाही और राजनीति की दीवारें इतनी अलग भी नहीं होतीं कि एक पर लगी चोट की आवाज दूसरी तरफ़ न पहुंचे।

राधा बाबू की राजनीति की मौजूदा शैली दिलचस्प भी है और दुरूह भी। वे असहमति जताते हैं, लेकिन बगावत का झंडा नहीं उठाते। नाराज होते हैं, मगर रिश्तों के दरवाजे बंद नहीं करते। शेर लिखते हैं, लेकिन उनमें किसी का नाम नहीं होता।

राधाकृष्ण किशोर ने कहा है कि 2029 के बाद सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना सकते हैं। झारखंड की सत्ता में मुख्यमंत्री के बाद प्रोटोकॉल के लिहाज़ से सबसे वरिष्ठ मंत्री की जुबान से निकला यह वैराग्य का स्वर यूं ही नहीं लगता।

 

राधा बाबू क्या इन दिनों खुद से संवाद कर रहे हैं?

राधा बाबू क्या कहना चाहते हैं, इसका मुकम्मल जवाब फिलहाल शायद उनके पास भी नहीं। इन दिनों वे सीधे वाक्यों से कम, संकेतों और रूपकों से ज़्यादा संवाद कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि उनके शब्द जिस पते पर भेजे जाते हैं, क्या उनके मायने भी वहीं पहुंचते हैं, या रास्ते में सियासत उन्हें अपने-अपने अर्थ पहना देती है।

बरसात का मौसम है। उन्होंने खुद लिखा है..’इन बारिशों से इतनी दोस्ती अच्छी नहीं, कच्चा तेरा मकान है…’ हो सकता है, यह किसी और के लिए लिखी गई पंक्ति हो। हो सकता है, यह खुद से किया गया संवाद भी हो।

राजनीति में सबसे कठिन लड़ाइयां कभी-कभी बाहर नहीं, भीतर लड़ी जाती हैं। बाहर की बारिश से बचने के लिए छाता मिल जाता है, भीतर की बारिश से बचाने वाली कोई छत नहीं होती। शायद राधा बाबू इन दिनों उसी भीतरी मौसम से होकर गुजर रहे हैं।

 


Discover more from Jharkhand Weekly - Leading News Portal

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

Discover more from Jharkhand Weekly - Leading News Portal

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading