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Friday, June 5, 2026
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पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को यूपीए सरकार के ‘ऑयल बॉन्ड’ को राजनीतिक ढाल बनाकर मौजूूूदा सरकार बचना चाहती है…जानिए सच्चाई…!

जब भी देश में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर बहस छिड़ती है, तो सत्ता समर्थक या आईटी सेल तुरंत एक घिसा-पिटा तर्क लेकर आ जाते हैं-अरे भाई, मोदी सरकार तो मजबूर है, वह पिछली यूपीए (UPA) सरकार द्वारा लिए गए ‘ऑयल बॉन्ड’ (Oil Bonds) का कर्ज और उसका ब्याज चुका रही है, इसलिए तेल महंगा बेचना पड़ रहा है।

यह आधा सच और पूरा झूठ सोशल मीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग में इस कदर भर दिया गया है कि लोग इसे ही अंतिम सच मान बैठे हैं। आइए, आज इस ‘ऑयल बॉन्ड’ के पूरे सच को सरकारी आंकड़ों और साधारण गणित के जरिए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।

आखिर ‘ऑयल बॉन्ड’ क्या बला है?

साल 2014 से पहले, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही थीं (लगभग $100 से $140 प्रति बैरल तक), तब केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के सामने दो रास्ते थे- या तो वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों के हिसाब से भारत में पेट्रोल ₹110-₹120 लीटर कर देते, जिससे देश में भयानक महंगाई बढ़ जाती और गरीब-मध्यम वर्ग पूरी तरह तबाह हो जाता। या फिर सरकार तेल का दाम नियंत्रित रखती और कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई खुद करती।

सरकार ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने तेल कंपनियों से कहा कि आप जनता को सस्ता तेल बेचिए (तब पेट्रोल ₹60 से ₹70 के बीच था)। इस सस्ते तेल के कारण कंपनियों को जो घाटा हुआ, उसकी भरपाई के लिए सरकार ने कंपनियों को नकद पैसा देने के बजाय प्रॉमिसरी नोट्स’ यानी ‘ऑयल बॉन्ड जारी कर दिए। इसका सीधा मतलब था कि सरकार इन कंपनियों को यह कर्ज एक तय समय (10-15 साल) के बाद ब्याज समेत चुकाएगी।

यूपीए सरकार कितना कर्ज छोड़ कर गई थी ?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को कुल ₹1.34 लाख करोड़ ($1.34 Lakh Crore) के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे। यह वह मूलधन (Principal Amount) था जिसे आने वाली सरकारों को 2026 तक अलग-अलग किश्तों में ब्याज समेत चुकाना था। ब्याज मिलाकर यह राशि लगभग ₹2 से ₹2.5 लाख करोड़ के आसपास बैठती है।

तेल का असली खेल

अब देखिए असली खेल: मोदी सरकार ने टैक्स से कितना कमाया? अब आते हैं उस बड़े झूठ पर, जिसमें कहा जाता है कि इस कर्ज के कारण देश का खजाना खाली हो गया और तेल महंगा करना पड़ा।

रिकॉर्ड तोड़ टैक्स वसूली-पिछले 10 से 12 वर्षों में मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर ‘एक्साइज ड्यूटी’ (केंद्रीय उत्पाद शुल्क) और उपकर (Cess) लगा-लगाकर जनता की जेब से ₹35 लाख करोड़ (₹35,00,000 Crore) से ज्यादा की वसूली की है। तुलना करके देखिए (आमने-सामने का गणित)

चुकाना था कुल कर्ज (ब्याज समेत) लगभग ₹2.5 लाख करोड़, जनता से टैक्स वसूला- ₹35 लाख करोड़ से ज्यादा! यह बिल्कुल वैसा ही है कि किसी व्यक्ति को अपनी दुकान चलाने के लिए ₹250 का पुराना कर्ज चुकाना हो, और वह उस ₹250 के कर्ज का बहाना बनाकर अपने ग्राहकों से ₹3,500 की एक्स्ट्रा वसूली कर ले और रोना रोए कि मैं तो कर्ज में दबा हूँ!

ऑयल बॉन्ड का कर्ज तो कुछ ही महीनों में वसूल हो गया !

अगर सरकार चाहती, तो ऑयल बॉन्ड का पूरा का पूरा ₹1.34 लाख करोड़ का मूलधन सिर्फ 4 से 5 महीनों की टैक्स वसूली से साफ कर सकती थी। सरकार को हर साल तेल पर टैक्स से इतनी बंपर कमाई होती है कि ऑयल बॉन्ड की सालाना किश्त और ब्याज चुकाना उनके कुल राजस्व 1 प्रतिशत भी नहीं है।

लेकिन, पिछले कई सालों से इस ₹1.34 लाख करोड़ के आंकड़े को टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया पर इस तरह पेश किया जाता है जैसे मानो इसी कर्ज की वजह से देश की अर्थव्यवस्था चल रही है।

कोरोना काल का मुनाफा कहाँ गया?

साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान जब दुनिया भर में लॉकडाउन लगा, तब कच्चे तेल की कीमतें इतिहास में सबसे निचले स्तर ($20 प्रति बैरल से भी नीचे) पर आ गई थीं। तब सरकार चाहती तो देश की जनता को ₹35-₹40 लीटर पेट्रोल दे सकती थी, जिससे लॉकडाउन की मार झेल रही जनता को बड़ी राहत मिलती। लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटी कीमतों का फायदा जनता को देने के बजाय पेट्रोल पर ₹13 और डीजल पर ₹16 प्रति लीटर टैक्स बढ़ा दिया। उस अकेले दौर में सरकार ने जो लाखों करोड़ रुपये कमाए, क्या वह ऑयल बॉन्ड का कर्ज चुकाने के लिए काफी नहीं थे?

दरअसल, ऑयल बॉन्ड’ सिर्फ एक राजनीतिक ढाल है. साफ है कि ऑयल बॉन्ड कोई ऐसा वित्तीय बोझ नहीं था जिसे चुकाने में सरकार के पसीने छूट जाएं। यह मौजूदा सरकार के लिए केवल एक राजनीतिक ढाल’ है।

जब भी जनता महंगाई, टैक्स की मार और ₹110 लीटर के पेट्रोल पर सवाल उठाती है, सरकार इस ढाल को आगे कर देती है ताकि जनता का ध्यान असल आर्थिक नीतियों और सरकारी तेल कंपनियों के ₹77,280 करोड़ के अंधे मुनाफे से भटक जाए। अगली बार जब कोई आपके सामने ‘ऑयल बॉन्ड’ का रोना रोए, तो उसे ₹35 लाख करोड़ बनाम ₹2.5 लाख करोड़ का यह सीधा गणित जरूर थमा दीजिएगा।

  • अशोक झा

 


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