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Saturday, June 6, 2026
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सिर्फ समृद्धि का अहसास करते रहें, जबकि…पिछले 10 साल में भारतीय परिवारों का कर्ज 40-45 लाख करोड़ से बढ़कर 136 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया

भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी जीडीपी नहीं है। सबसे बड़ी कहानी है कर्ज। और यह कहानी इतनी खामोशी से लिखी गई कि करोड़ों लोगों को पता ही नहीं चला कि वे समृद्ध नहीं हो रहे, बल्कि धीरे-धीरे उधार पर जी रहे हैं।

पिछले 10 साल में भारतीय परिवारों का कुल कर्ज लगभग 40-45 लाख करोड़ से बढ़कर 136 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। यह सिर्फ बैंक का आंकड़ा नहीं है। यह भारत के मध्यवर्ग, लोअर मिडिल क्लास और युवापीढ़ी की मानसिक स्थिति का एक्स-रे है। यह वह पैसा है जो लोगों ने घर खरीदने, गाड़ी खरीदने, मोबाइल लेने, शादी करने, इलाज कराने और कई बार सिर्फ महीने का खर्च चलाने के लिए उधार लिया।

लेकिन सरकार और टीवी क्या दिखाते हैं? चमकते एयरपोर्ट, भरे हुए मॉल, नई एक्सप्रेस-वे, 5 ट्रिलियन इकॉनमी, विश्वगुरु, तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। कोई यह नहीं पूछता कि यह सब खरीद कौन रहा है। जवाब है- उधार लेकर जनता।

आज का आर्थिक मॉडल “आय बढ़ाओ” नहीं, बल्कि “कर्ज बढ़ाओ” है

भारत में पिछले दशक का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल “आय बढ़ाओ” नहीं, बल्कि “कर्ज बढ़ाओ” रहा है। क्योंकि अगर लोगों की कमाई नहीं बढ़ रही, नौकरियां पर्याप्त नहीं हैं, वास्तविक मजदूरी स्थिर है, तो बाजार कैसे चलेगा? तब सरकार और बैंक क्या करते हैं? लोगों को आसान लोन दो, ईएमआई दो, क्रेडिट कार्ड दो, Buy Now Pay Later दो। यानी असली समृद्धि नहीं, समृद्धि का एहसास पैदा करो।

कल्पना कीजिए। किसी परिवार की आय 25 हजार रुपये है। लेकिन वह EMI पर iPhone खरीदता है, EMI पर बाइक, EMI पर टीवी, EMI पर फ्रिज। बाहर से लगता है कि परिवार बहुत विकसित है। लेकिन भीतर हर महीने तनाव है, हर महीने ब्याज है, हर महीने कटौती है। यही आज पूरे देश के स्तर पर हो रहा है।

चमकती जीडीपी के बीच जेबों पर अंधेरों का घना साया

सबसे खतरनाक बात यह है कि जीडीपी इस दर्द को नहीं दिखाती। अगर आपने 80 हजार का फोन EMI पर खरीदा, तो जीडीपी में 80 हजार जुड़ गया। सरकार बोलेगी  “खपत बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था मजबूत है।” लेकिन आपकी जेब अगले 24 महीने तक खाली होती रहेगी। यानी जीडीपी चमकती है, परिवार कमजोर होता है।

यही कारण है कि आज भारत में एक अजीब विरोधाभास दिखता है। बाजार चमक रहे हैं, लेकिन लोग भीतर से टूट रहे हैं। मॉल भरे हैं, लेकिन बचत खाली है। UPI रिकॉर्ड बना रहा है, लेकिन लाखों लोग महीने के आखिर में उधार खोजते हैं।

सबसे डरावना आंकड़ा भारतीय परिवारों की बचत का है। 2021-22 में घरेलू वित्तीय बचत GDP की 11.5 प्रतिशत थी। 2022-23 में यह गिरकर 5.1 प्रतिशत रह गई। यानी आधे से भी कम। 50 साल में सबसे निचला स्तर। यह सामान्य बात नहीं है।

EMI संस्कृति में बदल गया भारत

भारत की संस्कृति बचत पर बनी थी। “उधार लेकर घी मत पियो” सिर्फ कहावत नहीं थी, यह आर्थिक दर्शन था। आज वही भारत EMI संस्कृति में बदल गया है।सरकार इसे “Financial Inclusion” कहती है। कहती है कि अब गरीब भी बैंकिंग सिस्टम से जुड़ गया। लेकिन सवाल यह है कि अगर कोई गरीब परिवार 30–36 प्रतिशत ब्याज पर पर्सनल लोन ले रहा है, तो यह financial inclusion है या modern exploitation?

और यह सब क्यों हो रहा है? क्योंकि असली समस्या छुपानी है। अगर रोजगार पर्याप्त नहीं हैं, निजी निवेश कमजोर है, फैक्ट्रियां पर्याप्त नहीं लग रहीं, आय नहीं बढ़ रही  तो अर्थव्यवस्था को चलाएंगे कैसे? उत्तर है कर्ज से। यानी जनता को उपभोक्ता बनाए रखो, भले वह उधार पर जी रही हो।

यह ठीक वैसा है जैसे किसी बीमार आदमी को लगातार painkiller दिया जाए। दर्द कुछ समय शांत रहेगा, बीमारी अंदर बढ़ती रहेगी। भारत की अर्थव्यवस्था में यही हो रहा है। और सबसे बड़ा खतरा अभी बाकी है। अगर नौकरियां और कमजोर हुईं, ब्याज दरें बढ़ीं, EMI टूटने लगीं, तो यही कर्ज NPA बन जाएगा। फिर बैंक संकट आएगा। फिर वही होगा जो दुनिया में कई बार हो चुका है- निजी लाभ, सार्वजनिक नुकसान।

उधार पर टिका है विकास का बड़ा हिस्सा

सबसे बड़ी विडंबना देखिए। टीवी पर बताया जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इस विकास का बड़ा हिस्सा उधार पर टिका है। यानी विकास कम, भविष्य की कमाई को आज खर्च करना ज्यादा है। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जीडीपी कितनी बढ़ी।

असली सवाल यह है कि क्या लोगों की आय बढ़ी? क्या बचत बढ़ी? क्या रोजगार सुरक्षित हुए? क्या आर्थिक स्थिरता बढ़ी? अगर जवाब “नहीं” है, तो चमकते आंकड़े सिर्फ भ्रम हैं। बहुत महंगे भ्रम। क्योंकि उधार लेकर कुछ समय तक समृद्धि दिखाई जा सकती है। लेकिन कर्ज का दर्द धीरे-धीरे पूरे समाज को खा जाता है। और जब वह दर्द फूटता है, तब टीवी स्टूडियो नहीं, आम परिवार टूटते हैं।

  • ज्ञानेंद्र अवस्थी

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