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Friday, March 13, 2026
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर कार्यक्रम न होने से उठे कई सवाल

गुमला – गुमला जिला मुख्यालय में भारतीय जनता पार्टी के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय केवल एक ऐतिहासिक नेता नहीं, बल्कि उसकी विचारधारा के आधार स्तंभ हैं। उनके “एकात्म मानववाद” के सिद्धांतों पर ही जनसंघ से लेकर भाजपा तक की नीतियां और संगठनात्मक ढांचा विकसित हुआ है। यही कारण है कि भाजपा हर वर्ष उनकी जयंती और पुण्यतिथि को विशेष रूप से मनाती आई है। लेकिन इस बार गुमला जिले में भाजपा की जिला इकाई पूरी तरह से निष्क्रिय रही। न तो कोई आधिकारिक कार्यक्रम आयोजित किया गया और न ही भाजपा के किसी प्रमुख नेता ने इस अवसर पर कोई सार्वजनिक श्रद्धांजलि अर्पित की।
यह स्थिति न केवल स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बन गई बल्कि यह भी प्रश्न उठता है कि क्या भाजपा अब अपनी मूल विचारधारा और प्रेरणास्रोतों को भूलने लगी है।
क्या सदस्यता अभियान की व्यस्तता एक बहाना थी
संयोगवश, 11 फरवरी को भाजपा का सदस्यता अभियान भी अपने अंतिम चरण में था। इस अभियान के दौरान भाजपा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को नए सदस्यों को जोड़ने का लक्ष्य दिया गया था। प्रत्येक कार्यकर्ता को कम से कम 50 सदस्य जोड़ने का निर्देश मिला था। लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं सहित अधिकांश पदाधिकारी अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर सके।
सूत्रों की मानें तो 10 फरवरी को वरिष्ठ भाजपा नेता एवं प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सतनारायण सिंह विशेष रूप से सदस्यता अभियान की समीक्षा के लिए गुमला पहुंचे थे। लेकिन अभियान की स्थिति देखकर वे बिना किसी ठोस नतीजे के लौट गए। यह इस बात का संकेत है कि या तो संगठन के अंदर समन्वय की कमी है या फिर भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा ने सदस्यता अभियान को प्राथमिकता देते हुए अपने वैचारिक दायित्वों को दरकिनार कर दिया? क्या भाजपा के लिए अब संगठनात्मक विस्तार अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बजाय इसके कि वह अपने संस्थापक नेताओं की स्मृति को बनाए रखे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को राजस्थान के धनकिया गांव में हुआ था। वे भारतीय जनसंघ के प्रमुख स्तंभ थे और उनके विचारों पर ही भाजपा का राजनीतिक और आर्थिक दर्शन विकसित हुआ। उनका “एकात्म मानववाद” का सिद्धांत भारतीय संस्कृति, समाज और आर्थिक संरचना के अनुकूल एक सशक्त विचारधारा प्रदान करता है।
वे स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और भारतीयता को मजबूत करने के समर्थक थे। भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि भाजपा ने उन्हें अपने आदर्श नेताओं में शामिल किया और उनकी जयंती और पुण्यतिथि को नियमित रूप से मनाने की परंपरा स्थापित की।
यही कारण है कि जब इस बार गुमला जिले में उनकी पुण्यतिथि पर कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया, तो इसने पार्टी के भीतर ही असंतोष को जन्म दे दिया।

गुमला में भाजपा की वर्तमान स्थिति:

गुमला जिला भाजपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी की पकड़ यहां कुछ कमजोर पड़ती दिख रही है।
कई वरिष्ठ नेता संगठनात्मक गतिविधियों से दूर होते जा रहे हैं।
नए नेतृत्व को उचित मार्गदर्शन नहीं मिल रहा, जिससे कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी दिख रही है।
संगठन में स्पष्ट रणनीति का अभाव भी दिख रहा है।
इस बार का सदस्यता अभियान भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सका।
भाजपा के कई बड़े नेता इस अभियान में सक्रिय नहीं दिखे।
आप सवाल उठ गया उठना है कि क्या भाजपा आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है
गुमला, सिसई, चैनपुर, बसिया, घाघरा, अलबर्ट एक्का जारी और कामडारा जैसे क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ पहले से कमजोर होती दिख रही है। इस क्षेत्र में झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस का प्रभाव भी बढ़ता दिख रहा है।
भाजपा पहले एक वैचारिक संगठन थी, लेकिन क्या अब वह सिर्फ चुनावी गणित में उलझ गई है।
जब संगठन का ध्यान सिर्फ विस्तार और संख्या पर रहेगा, तो विचारधारा और संस्कार पीछे छूट सकते हैं।
क्या भाजपा अब सिर्फ चुनावी राजनीति पर केंद्रित हो गई है और वैचारिक मामलों को दरकिनार कर रही है?
क्या संगठनात्मक गुटबाजी और आंतरिक असंतोष के कारण यह गलती हुई या इसका कारण और भी कुछ है।
यदि भाजपा को अपने संगठन और विचारधारा को मजबूत बनाए रखना है, तो उसे अपनी मूल विचारधारा की ओर लौटना होगा। सिर्फ सदस्यता बढ़ाने और चुनाव जीतने की रणनीति से लंबे समय तक संगठन की आत्मा को जीवित नहीं रखा जा सकता।

न्यूज़ – गणपत लाल चौरसिया 


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