तकनीक की पहुंच भारत के छोटे शहरों और दूर-दराज़ गांवों में पीढ़ियों, जिलों और लैंगिक भेदभाव के बीच की खाई को ख़त्म कर रही है।
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की शानिया देवी और दीक्षा शर्मा ने यह साबित कर दिया है कि सपनों को उड़ान देने के लिए सिर्फ जज़्बा चाहिए।
ये कहानी है एकनिष्ठ समर्पण और ऊँचे सपनों से प्रेरित उन किशोरियों की, जो अब अदाणी स्किल डेवलपमेंट सेंटर (जिसे आमतौर पर अदाणी सक्षम कहा जाता है) के विकास की प्रतीक बन चुकीं हैं। यह सेंटर अब बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर झारखंड के गोड्डा और हिमाचल प्रदेश के गगल जैसे छोटे शहरों तक पहुँच चुका है, जहां यह पूरे भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित कौशल विकास मिशन चला रहा है।
सौभाग्य से, दूरी की चुनौती शानिया और दीक्षा के लिए कोई रुकावट नहीं बनी। उन्हें अदाणी सक्षम (गगल केंद्र) के माध्यम से अत्याधुनिक तकनीक आधारित प्रशिक्षण मिला। यह केंद्र हिमाचल प्रदेश का पहला रिमोट पायलट ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन (आरपीटीओ) बनने का गौरव भी रखता है।
16 मई 2016 को अदाणी फाउंडेशन द्वारा शुरू किया गया अदाणी सक्षम, सरकार के ‘स्किल इंडिया’ मिशन को गति देने वाला एक प्रभावशाली कदम है।
इसका पाठ्यक्रम ड्रोन संचालन, सिमुलेशन-आधारित प्रशिक्षण, थ्री-डायमेंशनल (3डी) प्रिंटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसे आधुनिक विषयों पर आधारित है। यह कार्यक्रम वैश्विक रुझानों के अनुरूप है और एक ऐसा माहौल तैयार करने का प्रयास करता है जो युवाओं को तेजी से डिजिटल होती दुनिया में भविष्य के लिए सक्षम बना सके।
यह स्पष्ट है कि अदाणी सक्षम एक जैसा सभी के लिए उपयुक्त मॉडल नहीं है। यहां पाठ्यक्रम को हाइब्रिड फॉर्मेट में पढ़ाया जाता है, जिसमें वर्चुअल लैब्स और प्रैक्टिकल (हाथों से सीखने वाले) प्रशिक्षण दोनों शामिल होते हैं। यहां प्रतिभागी केवल जानकारी प्राप्त नहीं करते, बल्कि सिमुलेशन चलाते हैं, ड्रोन उड़ाते हैं और वास्तविक समस्याओं का समाधान करते हैं, जैसा कि शानिया और दीक्षा के सफल करियर से साफ़ झलकता है।
एक लंबा सफर पिछले दिनों को देखें तो शानिया की डिजिटल समझ उसकी साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि के बिल्कुल विपरीत थी।
वह बिलासपुर जिले के छोटे से कस्बे घुमारवीं की रहने वाली है। यह एक ऐसा स्थान है जहां जाने वाली सड़कें पुराने समय की याद दिलाती हैं। घुमारवीं, चीड़ के जंगलों और धुंध से ढके पहाड़ों के बीच बसा एक पारंपरिक पहाड़ी कस्बा है, जहां आज भी इंटरनेट सिग्नल बहुत कमजोर है और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का विचार अब भी किसी दूसरे ग्रह की बात लगती है।
कम उम्र में ही शानिया को जीवन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब उसके पिता का निधन हो गया। एक ही रात में उसकी मां को पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी और वह एक स्थानीय क्लिनिक में स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगीं। हालांकि उनकी मासिक आय बहुत कम थी, लेकिन इस संकल्पित विधवा मां ने ठान लिया था कि अपनी बेटी की पढ़ाई कभी रुकने नहीं देगी, चाहे हालात जैसे भी हों।
सौभाग्य से, शानिया ने स्कूल की पढ़ाई में अच्छी सफलता हासिल की। लेकिन फिर कठोर हकीकत ने उसे मुश्किल से घेर लिया। जल्दी ही उसे यह एहसास हुआ कि उसकी स्किल्स और छोटे शहर की पृष्ठभूमि उच्च प्रतिस्पर्धी नौकरी की कड़ी मांगों के साथ मेल नहीं खातीं। अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में, शानिया को अदाणी सक्षम के बारे में पता चला। हालांकि, एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) उसे सिर्फ भविष्यवादी नहीं, बल्कि एक अजनबी शब्द जैसा लगता था।
फिर भी, सभी कठिनाइयों को चुनौती देते हुए, शानिया ने अदाणी सक्षम में दाखिला लिया, हालांकि पहले वह थोड़ी हिचकिचा रही थी। शुरुआत में उसे यह यकीन नहीं था कि वह एक भी मॉड्यूल समझ पाएगी। लेकिन जल्द ही, सब कुछ समझ आने लगा। शानिया ने न केवल सीखना शुरू किया, बल्कि उसमें उत्कृष्टता भी हासिल की।
कोर्स पूरा करने के बाद, उसे पहली नौकरी का ऑफर मिला। शुरुआत में वह एटीएस मोहाली में कस्टमर सपोर्ट रोल में थीं, और दो महीने बाद उन्हें नेउरीका टेक्नोलॉजी से प्रोडक्ट असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव का दूसरा जॉब ऑफर मिला, साथ ही वेतन में 35% का इम्प्रेसिव इन्क्रीमेंट भी मिला।
दीक्षा की जीवन कहानी भी शानिया से काफी मिलती-जुलती है। वह बिलासपुर जिले के छकोह गांव में एक सीमांत किसान परिवार में पली-बढ़ी, जहां संसाधन बहुत सीमित थे, लेकिन संस्कार और मूल्य गहराई से रचे-बसे थे। गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद, दिक्षा अपने लक्ष्य को लेकर पूरी तरह से दृढ़ संकल्पित रही। उसका मानना था कि ज्ञान ही अवसरों का रास्ता खोल सकता है।
दीक्षा किसी विशेष सुविधा या साधन के साथ नहीं आई थी, लेकिन उसके पास एक स्पष्ट उद्देश्य था। जब उसने अदाणी सक्षम के एआई कोर्स में दाखिला लिया, तो वह सिर्फ मशीनों के बारे में नहीं सीख रही थी बल्कि वह ऐसा भविष्य गढ़ना सीख रही थी, जहां ग्रामीण भारत की लड़कियों को जिम्मेदारी और महत्वाकांक्षा के बीच चुनाव ना करना पड़े। दीक्षा ने इस सफर को पकड़े रखा, प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि योगदान देने के लिए।
आज दीक्षा पंजाब की एक कंपनी, एरियल टेलीकॉम सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड में वीज़ा फाइलिंग ऑफिसर के रूप में काम कर रही हैं। वह वीज़ा आवेदन की डाक्यूमेंटेशन और प्रोसेसिंग का कार्य संभालती हैं, साथ ही यह सुनिश्चित करती हैं कि सभी कार्य नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार हों।
शानिया और दीक्षा विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन रही हैं। उनकी शानदार यात्रा भारत के उस बड़े बदलाव का प्रतीक बन रही है, जहाँ प्रौद्योगिकी तक पहुँच छोटे शहरों और दूरदराज के गाँवों में भूगोल, लिंग और पीढ़ियों के बीच की दूरियों को कम कर रही है।
दो दिन पहले मनाए गए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी प्रौद्योगिकी को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक पड़ाव बताया और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, विशेष रूप से भारत की स्वदेशी क्षमता को बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में।
अपनी स्थापना के बाद से अदाणी सक्षम ने 200 करोड़ से अधिक मानव घंटे का निवेश करके 1.85 लाख से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया है। सामूहिक रूप से, वे सालाना 479 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व उत्पन्न कर रहे हैं। यह कार्यक्रम देश के 15 राज्यों के 40 से अधिक शहरों में चलाया जा रहा है।
यह पहल अदाणी फाउंडेशन की समाज के वंचित वर्गों के उत्थान और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
मुस्कान
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