अभिषेक कुमार
बांकीपुर उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने शानदार जीत दर्ज की है. प्रशांत ने उस सीट पर बीजेपी को हराया है जहां 31 साल से उसका कब्जा रहा है. नितिन नवीन के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद खाली हुई बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी ने 40 स्टार प्रचारक उतारे. इसके अलावा तमाम विधायकों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने प्रचार किया, लेकिन अपने गढ़ नहीं बचा पाई. राजद की रेखा गुप्ता तीसरे नंबर पर रही.
पटना: बांकीपुर उपचुनाव रिजल्ट ने बिहार की राजनीति को नया एंगल दे दिया है. जनसुराज संस्थापक प्रशांत किशोर ने सबको चौंका दिया है. उन्होंने ना केवल बांकीपुर में जीत दर्ज की है, बल्कि बिहार के लोगों को एक खास मैसेज भी दे चुके हैं. यह बात कहने में कतई गुरेज नहीं है कि बीजेपी प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा पार्टी और गठबंधन की तरफ से इतना ज्यादा सपोर्ट मिलने के बाद भी उन्हें हार मिली है. प्रशांत किशोर का चुनाव जीतना और राज्य की मुख्य विपक्षी आरजेडी के प्रत्याशी रेखा गुप्ता का तीसरे नंबर पर रहना भी बड़ा राजनीतिक संदेश है. आइए समझते हैं बांकीपुर उपचुनाव के राजनीतिक मायने क्या हैं.
हर जाति समुदाय का पुरानी राजनीतिक पार्टियों से थोड़ा मोहभंग कम हुआ
बांकीपुर में कुल 31 राउंड वोटों की गिनती हुई, जिसके बाद जनसुराज प्रत्याशी प्रशांत किशोर को 63946 वोट मिले हैं. वहीं बीजेपी प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को 44700 को वोट मिले हैं. दोनों के बीच अबतक हुई वोटों की गिनती में 19246 वोटों का अंतर रहा. वहीं आरजेडी प्रत्याशी रेखा गुप्ता को 14241 वोट मिले हैं. वह प्रशांत किशोर से 49705 वोटों से पीछे रहीं.
प्रशांत किशोर जब बांकीपुर उपचुनाव में उतरे तो उनके पास ना तो कोई संगठन था, ना तो कोई स्थानीय नेता. जनसुराज के सामने सबसे बड़ी चुनौती ही यही थी कि वह हर जाति समुदाय से कुछ-कुछ लोगों का पुरानी राजनीतिक पार्टियों से मोह भंग करें, तभी उनके लिए रास्ते खुल सकें. बांकीपुर उपचुनाव रिजल्ट ने साबित कर दिया है कि प्रशांत किशोर इसमें सफल हुए हैं. उसी का नतीजा है कि उन्हें इतनी बड़ी जीत मिली है.
2025 के बिहार विधानसभा चुनााव में जनसुराज ने 200 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से केवल दो प्रत्याशियों की जमानत बच पाई थी. वहीं सत्तापक्ष एनडीए को 202 सीटों की प्रचंड जीत मिली. वहीं मुख्य विपक्षी आरजेडी 25 सीटों पर सिमट गई.
ऐसे में सवाल यही उठने लगे कि क्या बिहार की जनता तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रखना चाहती है. 2025 के रिजल्ट से यही मैसेज मिला कि जनता विपक्ष के रूप में भी नया विकल्प चाहती है. बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर को जितने वोट मिले हैं उसके दम पर वह बिहार में विपक्ष के रूप में अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं.
बांकीपुर दे गया विपक्षी एकता का संदेश
बांकीपुर उपचुनाव में आरजेडी और जनसुराज के प्रत्याशी को जितने वोट मिले हैं उससे यह बात एक बार फिर से साबित हो गई कि अगर तमाम विपक्षी पार्टियां मिलकर लड़ें तो बीजेपी और एनडीए को आसानी से हराया जा सकता है. इसके लिए उदाहरण दिया जा रहा है कि 1974 में जबलपुर में सेठ गोविंद दास के निधन के बाद हुए उपचुनाव में शरद यादव विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार बने थे, जिसके चलते उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी के सामने बड़ी जीत मिली थी.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन बनाकर इसी फॉर्मूले के तहत लड़ने की सलाह दी थी, लेकिन ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं के मनमाने रवैये के चलते ना केवल नीतीश कुमार इस गठबंधन से अलग हुए, बल्कि विपक्षी दल करीब जाकर भी बीजेपी को सरकार बनाने से रोक नहीं पाए.
बांकीपुर में प्रशांत किशोर और आरजेडी के प्रत्याशी रेखा गुप्ता को मिले कुल वोटों को जोड़ दें तो इस आंकड़े से पता चलता है कि अपने सबसे मजबूत गढ़ में भी बीजेपी कमजोर हो सकती है.
2015 के विधानसभा चुनाव में जब जेडीयू और आरजेडी ने मिलकर चुनाव लड़े तब भी बीजेपी काफी कमजोर दिखी. बांकीपुर में प्रशांत किशोर को 63203 और आरजेडी की रेखा गुप्ता को 14085 वोट मिले. दोनों को जोड़ दें तो यह नंबर 77288 तक पहुंच जाता है, जो बीजेपी प्रत्याशी नीरज सिन्हा को मिले 44250 वोटों से 33038 ज्यादा है. यानी पूरा विपक्ष एकजुट हो जाए तो बीजेपी अपने गढ़ में बेहद कमजोर नजर आने लगती है.
मजबूरी में बीजेपी और आरजेडी को वोट देने वालों को विकल्प
बिहार की राजनीति को ध्यान से देखेंगे तो पता चलता है कि यहां बड़ा वोटबैंक तो केवल राष्ट्रीय जनता दल के पास ही है. सुनने में यह बात पहली नजर में अटपटी लग सकती है, लेकिन यही सौ फीसदी सही है.
2005 से आरजेडी करीब-करीब बिहार की सत्ता से बाहर है. करीब तीन साल नीतीश कुमार के रहमोकरम वाले काल को छोड़ दें तो आरजेडी विपक्ष में ही है. इसके बावजूद उनका मुस्लिम+यादव और कुछ दलित समाज का गरीब वोटबैंक उनके साथ इंटैक्ट है.
वहीं दूसरी तरफ एनडीए खेमे में खासकर जेडीयू और बीजेपी के वोटबैंक में हमेशा उतार-चढ़ाव देखा जाता रहा है. 2015 के विधानसभा चुनाव में जब एनडीए से नीतीश कुमार अलग हो गए तब बीजेपी चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन में उतरी तो भी इनका सीटें जीतने का आंकड़ा 57 तक ही पहुंच पाया था. जबकि उस वक्त देश में पीएम मोदी की लहर थी और उन्होंने बिहार चुनाव में करीब 50 जनसभाएं की थी.
आज भी बिहार में लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव एनडीए का पूरा प्रचारतंत्र इसी पर होता है कि अगर हमको वोट नहीं दिए तो लालू यादव का परिवार सत्ता में आ जाएगा. ठीक इसी तरह आरजेडी यही डर दिखाता है कि अगर उन्हें वोट नहीं दिया तो बीजेपी सत्ता में आ जाएगी.
इसी वजह से खासकर बिहार के मुसलमान एकजुट होकर आरजेडी को वोट देते आए हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर ने बिहार की जनता के सामने गैर बीजेपी और गैर आरजेडी के रूप में विकल्प देने का काम किया है.
जनसुराज के लिए भी जरूरी रहा बांकीपुर
2025 के विधानसभा चुनाव में बड़े-बड़े दावों के बाद भी जनसुराज राजनीतिक स्वीकार्यता के पैमाने पर निराश किया. 200 से ज्यादा सीटों पर प्रत्याशी उतारने के बाद भी केवल 17 लाख वोट मिले. ऐसे में तमाम राजनीतिक पंडितों ने यही निष्कर्ष निकाला कि खुद प्रशांत किशोर ने चुनाव नहीं लड़ा, जिसके चलते पार्टी का ये हाल हुआ.
2025 की हार के बाद जनसुराज से जुड़े लोगों में हताशा साफ तौर से दिख रही थी. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह पटना छोड़कर दिल्ली शिफ्ट हो गए. ऐसे में जनसुराज से जुड़े लोगों में अगले चार साल उत्साह बनाए रखने के लिए प्रशांत किशोर का मैदान में उतरना जरूरी हो गया था. ताकि वह अपनी टीम का मोटिवेशन बनाए रख पाएं. अब प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज कर अपने कार्यकर्ताओं को संघर्ष के लिए ऊर्जा भरने का काम किया है.
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