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Wednesday, September 16, 2026
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HomeNational‎‎मोदी और आरएसएस की शक्तिशाली इमेज़ों से लड़ना आसान नहीं

‎‎मोदी और आरएसएस की शक्तिशाली इमेज़ों से लड़ना आसान नहीं

असत्य का नशा अफ़ीम के नशे से भी ज्यादा गहरा होता है। यह एक तरह का अंधविश्वास है। इसका लक्ष्य है मोदी को महान बनाना। ये लोग पहले असत्य को खबर बनाते हैं, बाद में उसे टीवी टॉक शो और ह्वाट्सएप मैसेज बनाते हैं। क्योंकि असत्य बनाने में सत्य खर्च नहीं होता।

हां, लेकिन मोदी को हर महीने असत्य पंथियों का साइबर सेल चलाने के लिए सैंकड़ों करोड़ रुपये सालाना पगार जरूर देना पड़ता है। कई हजार असत्यवादी उसमें काम कर रहे हैं। इनका काम है रोज सैंकडों गप्पें बनाना, गालियां लिखना, अपमान करना और हेट कैम्पेन करना। संघ-भाजपा- मीडिया और सोशल मीडिया को इन सबमें में मशगूल रखना।

मसलन्, जान लेना, घूस लेना आदि। त्याग उनके यहां दुर्लभ तत्व है। उनके पास अथाह संपदा है। लेकिन सतह पर ये लोग सादगी का ढोंग करते हैं। इन दिनों ये लोग सन् 2007-08 से हाइपर रीयल तकनीक का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। अत: संघ, भाजपा और मोदी की हायपर रीयल इमेजों में हम सब घिरे रहते हैं। इनसे लड़ने के लिए हाइपर रीयल परिप्रेक्ष्य की सही समझ का होना जरुरी है। यह परंपरागत मीडिया इमेज से भिन्न है।

हाइपर रीयल अवस्था में कोई इमेज टिकाऊ नहीं होती। बल्कि प्रत्येक इमेज में ‘छूमंतर’ वाला गुण होता है। इमेज की हम सतह देखते हैं, मर्म से अनभिज्ञ और अछूते रहते हैं। आप जिस क्षण इमेज देखते हैं उसी क्षण भूल जाते हैं। हम जानते ही नहीं हैं कि इन्दिरा गांधी की फोटोग्राफिक इमेज कहां गायब हो गयी, एनटीआर कहां लुप्त हो गए? ज्योति बाबू कहां छूमंतर हो गए? बुश कहां अन्तर्ध्यान हो गए? ओबामा को चुनते समय बिल क्लिंटन की इमेज कहां गायब हो गयी ? इसी तरह मोदी की इमेज भी कहां गायब हो जाएगी कोई नहीं जानता।

राजनीतिक इमेज वास्तव इमेज नहीं होती. आदर्श इमेज होती है। निर्मित इमेज होती है। कृत्रिम इमेज होती है। राजनेता जो कार्य करते हैं वह उनकी जिंदगी की वास्तविक समझ का परिचय नहीं देते, बल्कि वे जो कार्य करते हैं वह उनकी राजनीतिक मंशाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करते हैं।

राजनीतिक इमेज में नेता का व्यक्ति मन राजनीतिक मंशा और आदर्श इमेज का गुलाम होता है। आदर्श का गुलाम होने के कारण उसमें सौम्यता और सामंजस्य का भाव नहीं होता. इसके विपरीत वह आदर्श के अनुरूप कार्य करते हुए अपने व्यक्ति मन के साथ बदले लेता रहता है।

आरएसएस और मोदी संस्कृति की विशेषता है ‘रहस्यमयता”

राजनीतिक व्यक्ति की फोटो जब देखते हैं तो उसकी व्यक्तिगत पहचान गायब हो जाती है और राजनीतिक पहचान सामने आ जाती है। आरएसएस और मोदी संस्कृति की विशेषता है ‘रहस्यमयता”. इन दोनों को जितना जानते हैं उतना ही कम जानते हैं। वे दोनों हम सबके लिए रहस्य हैं। रहस्य और वर्चुअल का अन्तस्संबंध है जो मोदी की फैंटेसी इमेज सम्प्रेषित करता है।

मोदी और संघ के रहस्य यथावत् बने रहते हैं। इन दोनों की इमेज ‘अति आधुनिक’ और ‘अति सक्रिय’ है। फलत: इनकी गतिविधियों की सिर्फ बाहरी परतों को देखते हैं। उसके शुद्ध ‘ऑपरेशन’ और शुद्ध ‘सर्कुलेशन’ को देखते हैं। इससे इनकी गतिविधियों का मर्म और साइड इफेक्ट नजर नहीं आता।

मोदी और संघ ने एकाधिकार और प्रतिस्पर्धा को आधारभूत तत्व बनाया है। इसका लुंपेन कैपिटलिज्म से गहरा संबंध है। इसकी संगति और सूचना फ्लो के तहत ही सारा सूचना प्रवाह चल रहा है। इस सूचना प्रवाह से निकले प्रतीक महज प्रतीक नहीं होते बल्कि शक्तिशाली के सुनिश्चित भावबोध को संप्रेषित करते हैं।

इन प्रतीकों को महाशक्तिशाली की भूमिका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जब चीजें, व्यक्ति, विचार, स्थापत्य आदि ग्लोबल पावर के साथ अन्तर्ग्रथित होकर आते हैं तो उनका काम है जगत को नियंत्रण में रखना।

हाइपररीयल इमेज़ कभी भी ध्वस्त हो सकती है

महाशक्तिशाली का काम है जगत को नियंत्रण में रखना। इस धारणा को किसी एक वस्तु, पार्टी, सांस्कृतिक माल, स्थापत्य, मंदिर, नारे आदि में सीमित करके नहीं देखना चाहिए। लोग राम मंदिर की इमेज देख रहे थे. चढावा चोरी ने उस इमेज़ को नष्ट कर दिया।

कुंभ के प्रबंधन की इमेज देख रहे थे लेकिन भगदड़ की घटना ने सुप्रबंधन की इमेज नष्ट कर दी, अच्छे दिन आएंगे, की इमेज देख रहे थे, मोदी के कामकाज ने उस इमेज़ को नष्ट कर दिया। कहने का आशय यह है कि हाइपररीयल इमेज़ कभी भी ध्वस्त हो सकती है। वह अनियंत्रित होती है। मोदी और संघ स्वयं हाइपर रीयल के कंधों पर सवार हैं इसलिए वे हमेशा अनियंत्रित रहते हैं और अपनी बनाई इमेज को अपने ही हाथों से नष्ट करते रहते हैं।

मुश्किल यह है कि हमने अपने को हाइपर रीयल इमेजों में उलझा रखा है। ये लोग अपनी आलोचना भी अपनी शर्तों पर करना और करवाना चाहते हैं। इनकी शर्तों पर आलोचना करने से बचें, उससे आलोचना का भ्रम पैदा होता है। इसी तरह हमें प्रतीकात्मक पहचान के भ्रमों से बाहर निकलकर देखना चाहिए।

राम बनाम परशुराम की जंग खड़ी करके मोदी को नहीं हराया सकता

हाइपर रीयल इमेजों को प्रतीकों के जरिए ध्वस्त नहीं किया जा सकता। मसलन् वे हिंदू प्रतीक पेश कर रहे हैं तो विपक्ष भी यदि हिंदू प्रतीक प्रत्युत्तर में पेश करेगा तो इससे अलगाव, अ-सामाजिकीकरण और संकीर्णतावाद बढ़ेगा। इससे लड़ाई का क्षेत्र प्रतीक बनेंगे, जबकि लड़ाई का क्षेत्र है लुंपेन पूंजीवाद और आरएसएस की विचारधारा।

मसलन, राम बनाम परशुराम की जंग खड़ी करके मोदी को नहीं हरा सकते। हिंदुत्व और हिंदू धर्म की जंग छेड़कर नहीं हरा सकते। क्यों कि इसमें प्रतीक इमेजों में ही विनिमय होगा और उसमें मोदी जीतेंगे। कायदे से हाइपर रीयल इमेज और रियलिटी के बीच संघर्ष खड़ा किया जाय।

आजकल मोदी के खिलाफ संघर्ष जटिल हो गया है। संघर्ष के नाम पर अपने यथार्थ से ही लड़ते रहते हैं। इससे मोदी को नष्ट नहीं कर सकते। मोदी की राजनीतिक संरचनाओं को नष्ट नहीं कर सकते। यह काम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में नहीं कर सकते।

राजनीतिक और आर्थिक तौर पर भी नहीं कर सकते। इससे मोदी को यथार्थ में परास्त करना संभव नहीं है। क्योंकि मोदी ने अपने को इमेजों की आड़ में रूपान्तरित कर लिया है। मोदी पर हमले के नाम पर हम नए प्रतीकों को बदलते हैं, निशाना बनाते हैं। किंतु प्रतीक तो व्यवस्था की सतह हैं ये व्यवस्था की अंतर्वस्तु नहीं हैं। मोदी के सिस्टम या व्यवस्था को तब ही पलट सकते हैं जब उस की नीतियों को पलटने और लागू करने की क्षमता हो। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक मोदी के खिलाफ संघर्ष मोदी को कमजोर नहीं बनाता। 

  • जगदीश्वर चतुर्वेदी

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